मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन संबंधी सिद्धांत की संक्षिप्त व्याख्या

मार्क्स के अनुसार, समाज कोई अस्थायी ढांचा नहीं बल्कि गतिशील परिपूर्णता है। इस परिपूर्णता को आर्थिक कारक ही गति प्रदान करता है। आर्थिक कारक पर अपने सम्पूर्ण सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत को आधारित करते हुए मार्क्स ने लिखा है, राजनीतिक, न्यायिक, दार्शनिक, साहित्यिक और कलात्मक विकास आर्थिक विकास पर निर्भर होता है। लेकिन ये एक-दूसरे पर प्रक्रिया करते हैं और ये प्रतिक्रिया, आर्थिक आधार पर करते हैं। इसका यह अर्थ नहीं होता है कि आर्थिक स्थिति ही एकमात्र क्रियाशील कारक है, और अन्य सभी का परोक्ष प्रभाव है। आर्थिक आवश्यकता के क्षेत्र पर परस्पर सम्पर्क होता है और इस भांति अंतिम रूप से इसी का प्रभाव रहता है। 

इस प्रकार कार्ल मार्क्स का यह दृढ़ मत रहा है कि समाज की सांस्कृतिक सुपर संरचना का आधार उत्पादन संबंधी सम्बन्ध हैं। इस दृष्टि से उत्पादन सम्बन्धी इन सम्बन्धों से मार्क्स का तात्पर्य सामाजिक सम्बन्धों से ही है। 

इस प्रकार उसके इस सिद्धांत का सारभूत आधार यही है कि इन उत्पादन सम्बन्धी सम्बन्धों में परिवर्तन आने से समाज में परिवर्तन होता है।

मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत 

कार्ल मार्क्स का सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत  karl marx ka samajik parivartan ka siddhant नीचे दिया जा रहा है -

मार्क्सवादी सामाजिक परिवर्तन की धारणा इतिहास की उपरोक्त भौतिकवादी व्याख्या से बहुत-कुछ स्पष्ट हो जाती है। मार्क्स के मतानुसार इतिहास के सभी परिवर्तन उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन के ही फलस्वरूप होते हैं। भौगोलिक परिस्थितियाँ, जनसंख्या की वृद्धि आदि कारकों का प्रभाव मानव-जीवन पर अवश्य ही पड़ता है, परन्तु ये सब सामाजिक परिवर्तन के निर्णायक कारण नहीं हैं।

मार्क्स के अनुसार जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक भौतिक मूल्यों (भोजन, कपड़ा, मकान, उत्पादन के उपकरण आदि) की उत्पादन-प्रणाली ही सामाजिक परिवर्तन की निर्णायक शक्ति है।

व्यक्ति को जीवित रहने के लिए भौतिक मूल्यों (वस्तुओं) की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु वह उत्पादन करता है और उत्पादन करने के लिए उसे उत्पादक-शक्ति की आवश्यकता होती है। साथ ही, उत्पादन के सिलसिले में वह अन्य व्यक्तियों के साथ उत्पादन-सम्बन्ध स्थापित करता है। दूसरे शब्दों में, उत्पादन की प्रणाली उत्पादन के कुछ निश्चित सम्बन्धों (जैसे, जमींदार और किसान, स्वामी और दास, पूंजीपति और मजदूर के बीच पाए जाने वाले उत्पादन-सम्बन्ध) को उत्पन्न करती हैं। ये उत्पन्न-सम्बन्ध व्यक्ति की स्वेच्छा पर आश्रित नहीं होते, वरन् उत्पादक-शक्तियों के अनुसार अनिवार्य होते हैं। ये उत्पादन-सम्बन्ध किसी भी युग की सांस्कृतिक व्यवस्था, उसके नैतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विचार एवं संस्थाओं का मुख्यता निर्धारण करते हैं। जब समाज की उत्पादक-शक्ति में कोई परिवर्तन होता है, तो उसी के साथ-साथ उत्पादन-सम्बन्ध बदलता है और उत्पादन के सम्बन्धों में परिवर्तन होने से सामाजिक परिवर्तन घटित होता है। अत: संक्षेप में यही मार्क्सवादी सामाजिक परिवर्तन की धारणा है। 

अब हम इस विषय में मार्क्स के विचारों की विस्तारित विवेचना करेंगे जोकि निम्नवत् हैं- सिद्धांत की व्याख्या (Explanation of the Theory) मार्क्स के अनुसार समस्त सामाजिक परिवर्तन उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन के फलस्वरूप होते हैं। इस उत्पादन-प्रणाली के दो पक्ष होते हैं-पहला, उत्पादन-शक्ति (जोकि उत्पादन के उपकरण, श्रमिक और उत्पादन-अनुभव श्रम-कौशल से मिलकर बनती है), और दूसरा, उत्पादन के सम्बन्ध। उत्पादन-प्रणाली की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह किसी भी अवस्था में अधिक समय तक स्थिर नहीं रहती, अपितु सदा परिवर्तन तथा विकास की दिशा में उन्मुख रहती है। साथ ही, उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन होने से सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था, विचारों राजनीतिक मतों और राजनीतिक संस्थाओं में परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाता है, क्योंकि उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन होने से समग्र सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था का भी पुन: निर्माण अनिवार्य होता है।

उत्पादन-प्रणाली की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनमें परिवर्तन और विकास तभी होता है जब उत्पादक-शक्तियों में परिवर्तन व विकास होता है और इससे भी पहले उत्पादन के उपकरणों-औजार, यन्त्र आदि में परिवर्तन व विकास होता है। इस प्रकार उत्पादक-शक्तियों में भी परिवर्तन व विकास होता है। समाज की उत्पादक-शक्तियों में परिवर्तन का परिणाम यह होता है कि इन उत्पादक-शक्तियों से सम्बन्धित और इस पर आधारित मनुष्यों के उत्पादन-सम्बन्धों में भी परिवर्तन हो जाता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उत्पादन-सम्बन्ध का कोई प्रभाव उत्पादन-शक्ति पर नहीं पड़ता है, न ही इसका यह अर्थ है कि उत्पादन-शक्ति उत्पादन-सम्बन्धों पर भी निर्भर नहीं है। यद्यपि उत्पादन-सम्बन्धों का विकास उत्पादक-शक्ति के विकास पर ही निर्भर है, फिर भी उत्पादन-सम्बन्ध भी उत्पादन-शक्ति पर अपना प्रभाव डालते ही हैं और वह इस अर्थ में कि उत्पादन-सम्बन्ध उत्पादक-शक्ति के विकास की गति को धीमी या तीव्र करते हैं। ये दोनों एक-दूसरे से एक निश्चित ढंग से जुड़े हुए हैं और इनसे जुड़ा हुआ है मनुष्य का सम्पूर्ण सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन और संबंध। 

मार्क्स ने स्पष्ट ही लिखा है कि सामाजिक संबंध उत्पादक-शक्तियों से घनिष्ठ रूप से जुडे़ हुए हैं। नई उत्पादक-शक्तियों के प्राप्त होने पर मनुष्य अपनी उत्पादन-प्रणाली बदल देते हैं। अपनी उत्पादन-प्रणाली तथा अपनी जीविका-उपार्जन की प्रणाली बदलने से वे अपने समस्त सामाजिक सम्बन्ध को परिवर्तित करते हैं। जब हाथ की चक्की थी तब सामन्तवादी समाज था भाप से चलने वाली चक्की वह समाज बनाती है जिसमें प्रभुत्व औद्योगिक पूंजीपति का होता है। क्या आप जानते हैं उत्पादन-प्रणाली में ही सामाजिक परिवर्तन वफा रहस्य छिपा हुआ है।

उत्पादन-प्रणाली की तीसरी विशेषता यह है कि नवीन उत्पादन-शक्तियों तथा उनसे सम्बन्धित उत्पादन के सम्बन्धों का उद्भव पुरानी व्यवस्था से पृथक या पुरानी व्यवस्था के लोप हो जाने के बाद नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था के अन्तर्गत ही होता है। दूसरे शब्दों में, नवीन व्यवस्था का बीज पुरानी व्यवस्था में ही अन्तर्निहित या छिपा होता है।

अत: सामाजिक परिवर्तन एक अनोखी नहीं, वरन् एक स्वाभाविक घटना है यही प्रकृति का नियम है कि सब-कुछ अपने आन्तरिक स्वभाव द्वारा विकसित व परिवर्तित होगा। इतना ही नहीं, नवीन उत्पादन-शक्तियों का जन्म मनुष्य की विचारपूर्वक तथा सचेत-क्रिया के फलस्वरूप नहीं, बल्कि आप-से-आप या स्वत:, अचेत रूप में तथा मानव-इच्छा से स्वतन्त्र रहकर होता है। ऐसा दो कारणों से होता हैμपहला, तो यह कि जब नवीन पीढ़ी का जन्म होता है तो वह एक विशेष प्रकार की उत्पादन शक्ति तथा उत्पादन-संबंधों को मौजूद पाता है और अपनी जीविका-उपार्जन या भौतिक मूल्यों के उत्पादन हेतु उसे उन्हीं को ग्रहण करना तथा उनसे अनुकूल करना पड़ता है।

दूसरा, कारण यह है कि जब मनुष्य उत्पादन के किसी उपकरण को किसी उत्पादक-शक्ति को सुधारता है या नवीन आविष्कार करता है तो वह उससे होने वाले ‘सामाजिक परिणामों’ का अन्दाजा नहीं लगा पाता है। वह केवल इतना ही सोच पाता है कि इस सुधार के कारण अपनी जीविका-उपार्जन के लिए उसे अब कम मेहनत करनी पड़ेगी।

उदाहरणार्थ, जब हाथ से चलने वाले उत्पादन के उपकरणों के स्थान पर भाप या बिजली से चलने वाली मशीनों को उत्पादन-कार्य में लगाया गया तो उस समय शायद ही किसी ने यह सोचा हो कि इस परिवर्तन का ‘सामाजिक परिणाम’ यह होगा कि सम्पूर्ण सामन्तवादी व्यवस्था का उद्भव होगा। सामाजिक परिवर्तन इसी प्रकार परिवर्तित उत्पादन-प्रणाली का एक ‘सामाजिक परिणाम’ होता है।

परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उत्पादन के सम्बन्धों में परिवर्तन या उत्पादन के पुराने सम्बन्धों का उत्पादन के नवीन सम्बन्धों में बदलना निर्विध्नता से, बिना किसी संघर्ष या बिना किसी उथल-पुथल के हो जाता है। इसके विपरीत, इस प्रकार वफा परिवर्तन साधारणत: क्रान्ति के द्वारा होता है। क्रान्ति के द्वारा पुरानी व्यवस्था या उत्पादन के सम्बन्धों को उखाड़ फेंका जाता है और उनके स्थान पर नवीन व्यवस्था या उत्पादन के सम्बन्धों को प्रतिष्ठित किया जाता है। कुछ समय तक तो उत्पादक-शक्तियों का विकास तथा उत्पादन-संबंधों में परिवर्तन स्वाभाविक गति से तथा स्वतन्त्रतापूर्वक होता रहता है, परन्तु यह तभी तक होता है जब तक कि नवीन तथा विकासोन्मुख उत्पादन-शक्ति पूर्ण रूप से परिपक्व न हो जाए। इनके परिपक्व होते ही विद्यमान उत्पादन के सम्बन्ध तथा उनके प्रवर्तन अर्थात् शासक-वर्ग के लिए एक ऐसी ‘अलंघनीय’ बाधा बन जाती है जिसे कि बलपूर्वक क्रान्ति के द्वारा ही हटाया जा सकता है। 

इसी को हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार समझा सकते हैं कि जैसे ही उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन होता है, उसके फलस्वरूप एक नवीन वर्ग का जन्म होता है। यह नया वर्ग पुराने वर्ग के द्वारा उत्पीड़ित होता है क्योंकि उत्पादन के सभी साधन उसी पुराने वर्ग के अधिकार में होते हैं। इस प्रकार पुराना वर्ग नए वर्ग की प्रगति को रोकता है और नाना प्रकार से उसका शोषण करता है। नवीन वर्ग की यह दयनीय दशा या उसका सामाजिक अस्तित्व उसमें विशिष्ट प्रकार ही चेतना को जन्म देता है। इसलिए मार्क्स ने लिखा है कि मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, वरन् उसका सामाजिक अस्तित्व ही उसकी चेतना को निश्चित करता है। धीरे-धीरे नए वर्ग में यह चेतना दृढ़ होती जाती है कि वे बुराइयाँ, जिनके कारण उसका शोषण हो रहा है और उसकी प्रगति रुकी हुई है, पुरानी आर्थिक व्यवस्था का ही अभिन्न अंग हैं, और जब तक सम्पूर्ण पुरानी व्यवस्था या उस पुराने वर्ग को, जोकि उसका उत्तरोत्तर शोषण करता जा रहा है, समाप्त न कर दिया जाए तब तक उन बुराइयों या उत्पीड़न से छुटकारा नहीं मिल सकता। 
इस प्रकार पुराने वर्ग (जिसके हाथों में उत्पादन के साधन अधिकाधिक केन्द्रीकृत होते जाते हैं) और नए वर्ग (जोकि पुराने वर्ग के शोषण का उत्तरोत्तर शिकार होते जाते हैं) के बीच तनाव पनपने लगता है। धीरे-धीरे इस संघर्ष का रूप स्पष्ट हो जाता है और नया वर्ग पुराने वर्ग को क्रान्ति के द्वारा बलपूर्वक उखाड़ फेंककर एक नवीन सामाजिक व्यवस्था को जन्म देता है।

सामाजिक परिवर्तन या प्रगति में विचारों, सिद्धांतों, मतों और संस्थाओं का भी स्थान होता है। ये समाज के भौतिक जीवन पर तो अवश्य आश्रित होते हैं, किन्तु इनका सामाजिक-शक्तियों को समेटने और संगठित करने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। नए विचार और सिद्धांत नई भौतिक परिस्थितियों में उत्पन्न होते हैं। इनके द्वारा जन-साधारण को भौतिक जीवन की त्रुटियों और आन्तरिक विरोधों का ज्ञान हो जाता है। जब ये विचार जनता की निधि बनते हैं, तो वे सामाजिक परिवर्तन के लिए अमूल्य हो जाते हैं। इनकी पृष्ठभूमि में ही जनता उन शक्तियों का विध्वंस कर सकती है जो समाज की प्रगति में बाधक हैं। 

मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत का मूल्यांकन

मार्क्स ने सामाजिक व्यवस्था और उसमें होने वाले परिवर्तनों का आधार उत्पादन-प्रणाली को ही माना है, फिर भी अपने लेखों तथा पत्र-व्यवहारों में उन्होंने इस बात को भी स्पष्ट किया है कि उनके सिद्धांत का यह अर्थ नहीं है कि आर्थिक या भौतिक कारकों के अतिरिक्त अन्य सभी कारकों को पूर्णतया गौण या व्यर्थ माना जाए। एंगेल्स के शब्दों में, राजनीतिक, वैधानिक, दार्शनिक, धार्मिक, साहित्यिक, कलात्मक विकास आदि आर्थिक विकास पर ही आधारित हैं। परन्तु ये सभी एक-दूसरे को और आर्थिक आधार को भी प्रभावित करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि आर्थिक प्रभाव एकमात्र कारण है और वह ही सक्रिय है, जबकि दूसरे और सभी प्रभाव निष्क्रिय हैं। 

वास्तव में आर्थिक आवश्यकता, जोकि अन्त में सदैव अपने महत्व को प्रमाणित करती है, के आधार पर विभिन्न कारकों में अन्तःक्रिया होती रहती है। अधिक स्पष्ट रूप में एंगेल्स ने और भी लिखा है, इतिहास की भौतिकवादी धारणा के अनुसार वास्तविक जीवन में उत्पादन और पुन:उत्पादन ही अन्तिम रूप से (न कि एकमात्र) निर्णायक तत्त्व है।

भौतिक प्रभाव को इससे अधिक महत्व न मार्क्स ने और न ही मैंने प्रदान किया है। यदि कोई हमारे कथनों को तोड़-मोड़कर इस भाँति प्रस्तुत करें कि ‘मार्क्स के अनुसार आर्थिक प्रभाव ही एकमात्र निर्णायक कारक है’ तो ऐसा करके वह भौतिकवादी व्याख्या को अर्थहीन और हास्यास्पद बना देता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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