लेखाकरण की परिभाषा, आवश्यकता, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, लाभ

कोई भी व्यवसाय आम तौर पर उसके स्वामी द्वारा लगाए गए धन (पूंजी) से आरम्भ किया जाता है। व्यवसाय का स्वामी बाह्य स्रोतों जैसे बैंक तथा लेनदारों से अतिरिक्त धन प्राप्त कर सकता है। इस निधि का उपयोग व्यवसाय के लिए आवश्यक परिसंपत्तियों को प्राप्त करने तथा व्यवसाय संबंधी अन्य कार्यकलापों के संचालन के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में अनेक लेन-देन और कार्य व्यापार होते है।। लेखाकार इन विभिन्न लेन-देन एवं कार्य व्यापारों को पहचानता है, उन्हें धनराशि के रूप में मापता है तथा समुचित लेखा पुस्तक में रिकॉर्ड करता है। इसके पश्चात वह उन्हें अलग-अलग लेखा शीषोर्ं के अंतर्गत वर्गीकृत करता है। समय-समय पर उनके सार को लाभ हानि खाता एवं तुलन पत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। साथ ही उनका विश्लेषण और व्याख्या करने के बाद परिणाम को इच्छुक पक्षों को सूचित करता है। सार रूप में यही लेखाकरण है।

लेखाकरण की परिभाषा

विषय के विभिन्न विद्वानों ने लेखाकरण की परिभाषा अलग-अलग ढंग से की है। लेखाकरण एक विशद विषय है। तथा किसी एक परिभाषा के द्वारा इसकी संतोषजनक व्याख्या करना कठिन है। यहाँ दो परिभाषाएँ दी जा रही हैं, जिससे आपको लेखाकरण के स्वरूप और कार्यक्षेत्र की पूरी जानकारी मिल सके।

अमेरिकन एकाउंटिंग एसोसिएशन ने लेखाकरण की परिभाषा इस प्रकार की है- लेखाकरण “आर्थिक सूचनाओं को पहचानने मापने तथा सप्रेंषित करने की वह प्रक्रिया है जिसके आधार पर सूचनाओं का उपयोग करने वाले उचित सचू नाओं पर आधारित निर्णय ले सकते है। ‘‘

यह परिभाषा निम्नलिखित तीन बातों पर बल देती है- आर्थिक सूचनाओं को पहचानना, उन्हें मापना तथा आगे संप्रेषित करना।

अमेरिकन इस्ंटीटîटू अॉफ सर्टिफाइड पब्लिक एकाउंटंटेस् द्वारा नियुक्त पारिभाषिक शब्दावली की समिति के अनुसार “लेखाकरण एक ऐसी कला है जिसके द्वारा वित्तीय लेनदेन एवं कार्य व्यापारों को धनराशि के रूप में सार्थक ढंग से रिकॉर्ड किया जाता है, उनका वर्गीकरण करके सार प्रस्तुत किया जाता है तथा उनके परिणामों की व्याख्या की जाती है।’’

लेखाकरण की यह सर्वमान्य परिभाषा है जो लेखाकरण संबंधी कार्यकलापों के स्वरूप और कार्यक्षेत्र की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि लेखाकरण वित्तीय लेन-देन एवं कार्य व्यापारों को धनराशि के रूप में पहचानने मापन करने रिकार्ड करने, वर्गीकृत करने और उनका सार प्रस्तुत करने, उनका विश्लेषण तथा व्याख्या करने, और उन्हें सप्रेंषित करने की प्रक्रिया है।

लेखाकरण की आवश्यकता

लेखाकरण के महत्व के बारे में विस्तार से समझें। मान लीजिए कि आपको सब्जी लाने के लिए दस रुपये दिए जाते हैं तथा आपसे इस राशि का हिसाब मांगा जाता है। आपने चार रुपये के भाव से एक किलो टमाटर, तीन रुपये से एक किलो आलू तथा दो रुपये से एक किलो बैंगन खरीदें। इस प्रकार आपने कुल मिलाकर नो रुपये खर्च किए। अब आपके पास केवल एक रुपये शेष है। ऐसी स्थिति में हम यह कहेंगे कि आपने दस रुपये का हिसाब दे दिया। यह खर्च आपने एक ही बार में किया है, अत: जो कुछ आपने खर्च किया उसे आप याद रख सकेंगे।

मान लीजिए कि आपको घर का खर्च चलाने के लिए 2,000 रुपये दिए जाते है। तथा माह के अंत में इस राशि का आपसे हिसाब मांगा जाता है। माह के दौरान आप खाद्य सामग्री, दूध, सब्जी, फल खरीदते है, बिजली के बिल का भुगतान करते हैं और स्कूल या कालेज की फीस आदि का भुगतान करते है। इस प्रकार हर दिन आप कुछ न कुछ अवश्य ही खर्च करते है। ऐसी स्थिति में क्या आपके लिए यह सम्भव है कि आप प्रतिदिन किए जाने वाले सभी भुगतानों को याद रख सकें तथा माह के अंत में हिसाब दे सकें? नहीं, यह सब याद रख पाना संभव नहीं है, खास तौर पर जब विभिन्न मदों में किए गए भुगतानों की संख्या अधिक हो। केवल यही नहीं, बल्कि स्मरण शक्ति पर निर्भर रहना भी उचित नहीं है। अत: जो भी भुगतान किया जाए उसे लिख लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह भी उचित है। कि आप जो भी भुगतान करें उसके लिए रसीद या बिल अवश्य प्राप्त कर लें। ऐसा करने से आप जो हिसाब देंगे उस पर कोई भी संदेह नहीं कर सकता।

उपयुक्त उदाहरण सरल है, क्योंकि इसमें 2,000 रुपये इकट्ठे प्राप्त हुए और उन्हें। कई मदों में खर्च किया गयां परन्तु व्यवसाय में स्थिति भिन्न होती है। व्यवसाय में किसी अवधि के दौरान आपको सैकड़ों हजारों बार क्रय या विक्रय करना पड़ सकता है। आप अनेक बार राशि प्राप्त करते है। तथा अनेक बार भुगतान करते है। इसे लेन-देन (transaction) कहते है। क्या आपके लिए यह संभव होगा कि व्यवसाय में हुए सारे लेन-देनों को याद रख सकें? किसी निश्चित अवधि में व्यवसाय में हुए समस्त लेन-देन को याद रखना किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। यदि आप किसी प्रकार सभी लेनदेन को याद रख भी लें, तब भी समस्त लेन-देन के कुल परिणाम का परिकलन करना अर्थात लाभ का हिसाब लगाना आपके लिए लगभग असंभव ही होगा। अत: यह आवश्यक है कि व्यवसाय के समस्त लेनदेन को रिकॉर्ड कर लिया जाए। यहीं लेखाकरण की आवश्यकता की बात आती है।

जैसे-जैसे व्यवसाय के आकार में वृद्धि होती है, वैसे-वैसे व्यवसायी को अपनी सहायता के लिए अन्य व्यक्तियों को नियुक्त करना आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में माल या पैसा की चोरी संभव है, यह भी हो सकता है कि बिक्री से प्राप्त समस्त राशि को गल्ले में ही न डाला जाए। विशेष रूप से जब बाहरी व्यक्तियों को व्यवसाय में नियुक्त किया जाता है, तो नियंत्रण रखने के उद्देश्य से लेखाकरण आवश्यक होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि एकल स्वामित्व संगठन में भी लेखाकरण का रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। अन्य प्रकार के व्यावसायिक संगठनों में लेखाकरण का विधिवत रिकॉर्ड रखना और भी अधिक महत्वपूर्ण है।

साझेदारी फर्म में सभी साझेदार व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के प्रबंध में सक्रिय रूप से भाग ले भी सकते है। और नहीं भी। अत: यदि सभी लेनदेन को उचित ढंग से रिकॉर्ड कर लिया जाए, तो साझेदारों को संतोष रहेंगे। कम्पनी संगठन की स्थिति में कंपनी के स्वामियों (अर्थात कंपनी में अपना धन लगाने वाले शेयरधारिया ) की संख्या इतनी अधिक होती है कि उन सबका व्यवसाय के दैनिक प्रबंध में भाग लेना संभव नहीं होता। साधारणत: कंपनी के प्रबंध का कार्य वेतन भोगी प्रबंधकों को सौंप दिया जाता है। ऐसी स्थिति में समस्त लेनदेन को रिकॉर्ड करना और भी आवश्यक है।

व्यवसाय संबंधी जानकारी की आवश्यकता आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के उपयोग के लिए पड़ती है। उदाहरण के लिए प्रबंधकों को अपने काम के लिए अर्थात व्यवसाय की योजना बनाने उस पर नियंत्रण करने तथा व्यवसाय के परिचालन के मूल्यांकन के लिए बहुत सारी जानकारी की आवश्यकता होती है। बाहरी व्यक्तियां,े जैसे बैंक , लेनदारों आदि को भी व्यवसाय संबंधी जानकारी की आवश्यकता होती है। बिक्री कर, आयकर तथा अन्य कर संबंधी विवरणियाँ अधिकारी को प्रस्तुत करने के लिए भी सचू नाओं की आवश्यकता होती है। जब कभी कोई फर्म किसी बैंक से ऋण के लिए आवेदन करती है या किसी से माल उधार खरीदना चाहती है, तब बैंक या लेनदार फर्म की वित्तीय स्थिति की जानकारी चाहते हैं, (यह जानना चाहते हैं कि फर्म की माली हालत अच्छी है या नहीं) तथा वे उस फर्म की लाभ अर्जन क्षमता के बारे में जानना चाहते है।। अब प्रश्न यह उठता है कि यह सचूना किस प्रकार प्राप्त की जाए। व्यवसाय के समस्त लेन-देन के लेखाकरण का विधिवत रिकार्ड रखा जाए, यही इसका हल है।

लेखाकरण की आवश्यकता न केवल व्यावसायिक संगठनों में ही होती है बल्कि अव्यावसायिक संगठनों (जिनका उद्देश्य लाभ अर्जन नहीं होता) जैसे स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, पुस्तकालयों आदि में भी इसकी आवश्यकता होती है।

लेखाकरण के उद्देश्य

ऊपर की चर्चा के आधार पर लेखाकरण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं: प) विधिवत रिकार्ड रखना: वित्तीय लेन-देन का विधिवत रिकार्ड रखने के लिए लेखाकरण किया जाता है। जैसे कितना माल खरीदा और कितना बेचा, रोकड़ प्राप्तियां एवं भुगतान कितने हें आदि के बारे में लेखाकरण से ही सचू ना प्राप्त होती है। ऐसे ही व्यवसाय की विभिन्न परिसंपत्तियों एवं देयताओं के संबंध में भी विधिवत रिकार्ड रखा जाता है।

पप) व्यवसाय की लाभ .हानि मालूम करना: यह हम भली.भांति जानते हैं कि व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना है। व्यवसायी लाभ.हानि की स्थिति जानने के लिए सदैव इच्छुक रहता है। यदि आय तथा व्यय का सम्पूर्ण ब्यौरा ठीक से रखा जाए तो लाभ.हानि खाता (आय विवरण) तैयार करने में आसानी हो जाती है। लाभ.हानि खाते में से हमें यह मालूम होता है कि किसी अवधि विशेष में व्यवसाय में कितना लाभ हुआ अथवा कितनी हानि हुई।

पपप) व्यवसाय की वित्तीय स्थिति का निश्चित पता लगाना: व्यवसायी केवल यही नहीं जानना चाहता कि उसे कितना लाभ हुआ अथवा कितनी हानि हुई बल्कि वह व्यवसाय की वास्तविक वित्तीय स्थिति को भी जानना चाहता। है? दूसरे शब्दों में, व्यवसायी यह जानना चाहता है कि उसे किसको कितना ऋण चुकाना है तथा उसके पास कितना धन मौजूद है। वह यह भी जानना चाहता है कि उसकी पूंजी का क्या हुआ-उसकी पूंजी में कुछ वृद्धि हुई है या कमी हुई या पूंजी उतनी ही है। विभिन्न परिसंपत्तियों एवं देयताओं (assets and liabilities) का विधिवत रिकार्ड हो तो तुलन पत्र (balance sheet) या स्थिति विवरण (position statement) बनाने में सहायता मिलती है। तुलन पत्र से उपर्युक्त सभी प्रश्नों का उत्तर हमें मिल जाता है। 

पअद्ध इच्छुक पक्षों को लेखाकरण संबंधी सूचना देना: व्यवसाय के स्वामी के अतिरिक्त ऐसे और भी अन्य पक्ष है। जो व्यवसाय के संबंध में सचू ना प्राप्त करना चाहते हैं, जैसे प्रबंधक, बैंक, लेनदार, कर प्राधिकारी आदि लेखाकरण से ही उक्त सभी पक्षों को अपेक्षित सूचनाएँ मिलती है।

लेखाकरण के कार्यक्षेत्र

लेखाकरण का कार्यक्षेत्र निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

1 लेखाकरण का संबंध एसे वित्तीय लेन-देन आरै कार्य व्यापारों से होता है जिनके परिणामस्वरूप व्यावसायिक फर्म के संसाधनों (या धन) में कोई परिवर्तन होता है। एसे लेन-देन के कार्य जब भी होते हैं तभी उन्हें पहचानना पड़ता है। यह कार्य कठिन नहीं है, क्योंकि इनके प्रमाण स्वरूप काई बिल या रसीद (वाउचर) अवश्य ही होगी। इन बिलों तथा रसीदों की सहायता से किसी लेन-देन को पहचानना सरल हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब आप कोई वस्तु खरीदते है। तब आपको एक बिल मिलता है तथा जब आप उस बिल का भुगतान करते हैं, तब , आपको एक रसीद मिलती है।

2 यदि ये लेन देन के कार्य पहले से ही धनराशि के रूप में मापित या व्यक्त न किए गए हा,ें तो उन्हें धनराशि क रूप में व्यक्त किया जाना चाहिए। साधारण: यह समस्या उत्पन्न ही नहीं होती, क्योंकि लेन-देन के जो प्रमाण उपलब्ध हैं, उनमें तो लेन-देन धनराशि के रूप में ही व्यक्त है। उदाहरण के लिए यदि 20 रु. प्रति पुस्तक की दर से 10 पुस्तकें खरीदी जाती हैं, तब कुल 200 रु. का बिल बनाया जाएगा। परन्तु यदि किसी लेन-देन या कार्य व्यापार को धनराशि के रूप में व्यक्त न किया जा सके तो एसे लेन-देन का कार्य व्यापार लेखाकरण के कार्यक्षेत्र में नहीं आता। 3. जब लेन-देन को धनराशि के रूप में पहचान और माप लिया जाता है, तो उन्हें एक बही (जिसे “जर्नल’’ कहते हैं) में रिकॉर्ड किया जाता है अथवा “जर्नल” के किसी उपखंड (सहायक बही) में लिखा जाता है।

4 रिकार्ड किए गए लेन-देन का वगीर्करण इस प्रकार से किया जाता है जिससे कि एक प्रकार के सभी लेने-देने को एक ही स्थान पर लिखा जा सके। वर्गीकरण का यह कार्य एक अलग बही में किया जाता है, जिसे खाता बही (लेजर) कहते है।। लजेर में प्रत्येक मद के लिए अलग खाता खोला जाता है, ताकि उससे संबंधित सभी लेन-देन एक ही स्थान पर लिखे जा सके। उदाहरणार्थ वेतन के सभी भुगतान “वेतन खाते में दर्ज किए जाते है।

5 अनके लेनदेन को रिकॉर्ड करने तथा उन्हें वर्गीकृत करने से हमारे पास बहुत बड़ी संख्या में वित्तीय आंकड़े एकत्र हो जाते हैं। अत: यह आवश्यक हो जाता है कि समय-समय पर (कम से कम वर्ष में एक बार) इन आंकड़ों का सार-संक्षेप सार्थक रूप में प्रस्तुत किया जाए। सार-संक्षेप दो रूपों में तैयार किया जाता है - पहला लाभ हानि खाता, जिसमें व्यावसायिक संगठन को हुए लाभ और घाटे को दिखाया जाता है। दूसरा तुलन पत्र जिसमें संगठन की वित्तीय स्थिति दिखाई जाती है।

लेखाकरण के लाभ

लेखाकरण प्रणाली के विधिवत पालन करने के लाभ है। 
  1. हिसाब याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती: लेखाकरण प्रणाली द्वारा समस्त वित्तीय लेन-देनों को लेखाबहियों में रिकॉर्ड कर लिया जाता है। अत: केवल स्मृति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। लेखा बहियाँ ऐतिहासिक रिकॉर्ड का काम करती हैं। जब कभी पहले की सूचना की आवश्यकता हो, तो उसे तत्काल लेखा बही से प्राप्त किया जा सकता है।
  2. परिसंपत्तियों पर नियंत्रण की सुविधा: लेखाकरण से हमें यह पता चलता है कि व्यवसाय में कितनी रोकड़ शेष है तथा बंकै में हमारे खाते में कितनी राशि जमा है अपने पास स्टॉक में कितना माल है, विभिन्न पक्षों से कितनी राशि प्राप्त करनी है, अन्य विभिन्न परिसंपत्तियों में कितनी राशि लगाई गई है आदि। उपर्युक्त सूचनाएँ व्यवसाय के मालिक तथा प्रबंधकों के लिए परिसंपत्तियों का उपयोग सबसे अच्छे ढंग से करने में सहायक होती है।।
  3. वित्तीय विवरण तैयार करने में सुविधा : लेखाकरण के रिकार्डो में दिए गए आधार पर वित्तीय विवरण (लाभ.हानि लेखा तथा तुलन पत्र) तैयार किए जा सकते हैं। इस प्रकार व्यवसाय संचालन का वित्तीय परिणाम (लाभ या हानि) का पता चलता है तथा व्यवसाय की वित्तीय स्थिति ज्ञात होती है।
  4. इच्छुक पक्षों की सहायता: लेखाकरण से इच्छुक पक्षों को जैसे मालिक, प्रबंधक वर्ग, ऋणदाता, लेनदार आदि को आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं।
  5. तुलनात्मक अध्ययन में सुविधा: वित्तीय विवरणों के आधार पर उद्यम की वर्तमान स्थिति की तुलना गत वर्षों की स्थिति से की जा सकती है। इसी प्रकार अन्य समान उद्यमों की स्थिति से भी तुलना की जा सकती है। इससे व्यवसायी को महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने तथा अपने कार्य में और सुधार लाने में सहायता मिलती है। 
  6. प्रबंधकों की अनके प्रकार से सहायता: लेखाकरण से उन कारणों को पहचाना जाता है, जिनके परिणामस्वरूप लाभ अर्जित किया गया है या हानि उठानी पड़ी है। इन कारणों का पता लग जाने पर लाभ की मात्रा में और अधिक वृद्धि करने अथवा हानि से बचने के लिए आवश्यक उपाय किए जा सकते हैं। किसी उद्यम के अस्तित्व की सार्थकता तभी सिद्ध होती है, जब वह लाभ अर्जित करें तथा अपनी ऋण शोधन शक्ति (साख) बनाए रखें। एक समझदार व्यवसायी को चाहिए कि वह आगे की आरे देखे और व्यवसाय के कार्यकलापों की तदनुसार याजेना बनाए। लेखाकरण से प्राप्त सूचनाएँ व्यवसाय की योजना बनाने तथा उसके नियंत्रण में सहायता करती हैं।
  7. कपट या चोरी को छिपाना कठिन होता है। कपट या चोरी आदि को छिपाना कठिन होता है, क्योंकि लेखा बहियों में नियमित रूप से हिसाब लगाने के कारण स्वत: ही जांच होती रहती है। यदि कोई कपट या चोरी की भी जाती है तो उसका सरलता से शीघ्र ही पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त, बडे.़ बड़े संगठनों में रिकार्ड रखने का कार्य कई व्यक्तियों में बंटा हुआ होता है, अत: किसी एक व्यक्ति के लिए कपट या चोरी कर पाने की संभावना कम हो जाती है।
  8. कर संबंधी मामलों में सुविधा: सरकार अनेक प्रकार से कर लगाती है, जैसे सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, विक्रय कर, आय कर आदिं यदि व्यवसाय का हिसाब.किताब ठीक ढंग से रखा जाता है तो कर प्राधिकारियों के साथ कर संबंधी मामलों को निपटाने में सहायता मिलती है।
  9. व्यवसाय का मूल्य ज्ञात करने में सहायक : फर्म के बचे जाने की स्थिति में लेखाकरण के रिकार्डों से व्यवसाय के मूल्य का निश्चित पता लगाने में सुविधा रहती है।

लेखाकरण की सीमाएँ

लेखाकरण की जानकारी के आधार पर विभिन्न पक्ष व्यवसाय की लाभ अर्जित करने की क्षमता तथा उसकी वित्तीय संपन्नता के संबंध में अनुमान लगाते हैं। अत: लेखाकरण की सीमाओं का ज्ञान होना भी अत्यंत आवश्यक है। लेखाकरण की निम्नलिखित सीमाएँ है।
  1. लेखाकरण में उन लेनदेन व घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं किया जाता जिन्है। धनराशि के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। अत: लेखाकरण से किसी व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं मिल सकती। लेखा पुस्तकों में कई महत्वपूर्ण तथ्यों का कोई लेखा-जोखा नहीं किया जाता, जैसे - मानव संसाधनों की गुणवत्ता, अधिकृत लाइसेंस , व्यवसाय के किसी विशेष स्थान में स्थित होने के फलस्वरूप उससे होने वाले लाभ, व्यावसायिक संबंध आदि।
  2. लेखाकरण में रिकॉर्ड किए गए आंकड़ों की प्रकृति ऐतिहासिक होती है। लेखाकार समस्त परिसंपत्तियों एवं दयेताओं का मूल्यांकन ऐतिहासिक लागत के आधार पर करते है। अत: उनसे वर्तमान मूल्य ज्ञात नहीं होता। यह बिल्कुल संभव है कि कुछ मदों को (जैसे भूमि एवं भवन आदि) वर्तमान मूल्य बैलेंस शीट में दिखाए गए मूल्य से बहुत अधिक हो।
  3. वित्तीय विवरण में दिखाए गए तथ्य लेखाकरण की सकंल्पनाओं तथा लेखाकारों के व्यक्तिगत विचारों से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं। अत: वे व्यवसाय की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाते। कई बार विभिन्न मदों का मूल्य निर्धारित करने के लिए अनुमानों का प्रयोग भी किया जाता है। उदाहरण के लिए देन दारों का मूल्य ऋण की वसूली के आधार पर, माल का मूल्य उसकी बिक्री योग्यता के आधार पर, स्थायी परिसंपत्तियों का मूल्य उनके प्रयोग काल के आधार पर निर्धारित किया जाता है। ये सभी अनुमान व्यक्तिगत विचारों से बहुत अधिक प्रभावित होते है।
  4. वित्तीय विवरण से प्राप्त आंकड़े उचित विश्लेषण करने के लिए तथा निर्णय लेने के लिए पर्याप्त नहीं होते। वित्तीय विवरणों से हमें केवल व्यवसाय की कुल लाभ अर्जित करने की क्षमता के बारे में जानकारी मिलती है। विभिन्न कार्यकलाप की लागत तथा लाभ अर्जित करने की क्षमता के संबंध में अलग अलग जानकारी नहीं मिलती।

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