सारंगी का इतिहास और प्रकार

भारतवर्ष के प्राचीन, पौराणिक संगीत ग्रन्थों के आधार पर इस मधुर वाद्य सारंगी का आविष्कार श्रृंगी ऋषि’ को माना जाता है। श्रृंगी ऋषि से यह वाद्य पुलस्त्य को, पुलस्त्य से विश्रवस तथा उनसे राक्षसराज रावण ने प्राप्त किया।
देश, काल और परिस्थिति के अनुसार इस वाद्य के स्वरूप, आकार, वादनशैली तथा उपयोगिता परिवर्तित होते गये। शनै: शनै: प्रगति और उत्तरोत्तर विकास करते हुए यह वाद्य आधुनिक युग में अपने पूर्णस्वरूप में सम्पूर्ण तंत्रीवाद्यों में सबसे कठिन, किन्तु मानवकंठ की अन्तिम सीमा तक समान रूप से संगति करने में सबसे अधिक सक्षम एवं प्रमुख सहयोगी वाद्य के रूप में निर्विवाद रूप से विद्यमान है। 

भारत वर्ष के अनेक भागों में भिन्न-भिन्न आकार, बनावट वादन-शैली एवं उपयोग में अत्यन्त लोकप्रिय, सुमधुर वाद्य रहा है। सारंगी फारस, इरान, अफगानिस्तान आदि देशों में भी चिकारा, सारन्दा आदि नाम से थोड़ी भिन्नता के साथ प्राप्त होता चला आ रहा है। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में गुणी सारंगीवादक द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली तरबदार सारंगी तीन रूपों में पाई जाती है जिसे क्रमश: टोटा, डेढ पसली एवं दोमगजा के नाम से जाना जाता है।

सारंगी का इतिहास
सारंगी


सारंगी के प्रकार

1. टोटा- इस सारंगी में 11 तार एवं 3 रोदा (पशुओं की ऑत की नसो (ताँत) से बना होता है। पतली ताँत को जील, इससे मोटी ताँत को डेवढ और उससे मोटी ताँत के खरज कहा जाता है इन पर कमानी द्वारा घर्षण करने से भिन्न-भिन्न स्वर निकलते है।

2. डेढ पसली- इस वाद्य के मध्यभाग में 11 अथवा 13 तार पीतल के 3 रोदा और बाघ के बगल के हिस्से में 9 तार लोहे के लगे होते है, यह सारंगी आकार में छोटी होती है। 

3. दोमगजा- इसमें वाद्य के मध्यभाग में 15 तार, बगल में 11 तार एवं वाद्य के मस्तक के भाग में भी 10-11 लोहे अथवा पीतल के तथा उरोदा (ताँत का) लील, डेवढ़ खरज का होता है। इस सारंगी का आकार उपर्युक्त दोनों से बड़ा होता है।

लोक संगीत एवं शास्त्रीय संगीत दोनों ही क्षेत्रों में कई शताब्दियों से उपलब्ध साल, पनस या घनता से युक्त अन्य लकड़ी से निर्मित वाद्य सारंगी की उत्पत्ति के विषय में अनेक किवदन्तिया प्रचलित है कुछ इसका आविष्कारक राक्षसराज रावण को मानते है। शहिन्दा (सन् 1914 ई0) नामक व्यक्ति के अनुसार प्राचीन भारत के एक हकीम को जंगल के रास्ते से पैदल यात्रा के सिलसिले में एक वृक्ष की धाया में विश्राम करने के समय सुरीली ध्वनियों का आभास हुआ ध्यान पूर्वक सुरीली ध्वनियों के स्रोत को खोजने में उन्हें एक मृत बंदर की सुखी चमड़ी पेड़ की शाखाओं के मध्य तनी मिली और वायु के चलने पर उन सुखी ऑतों से एक ध्वनि निकलती सुनाई पड़ी हकीम ने अपनी परिकल्पना से इन ध्वनियों को काष्ठ, तॉत आदि के उचित समन्वय से इन शाखाओं से उतार कर सारंगी वाद्य के रूप में संगीत-संसार में प्रवेश दिलाया। एक अन्य कथा के अनुसार युनानी मथन गणितज्ञ पाइथागोरस का शिष्य एक युनानी बू अली इब्न सिना इस कथानक का मुख्य चरित्र था।

अब्दुल हलीम जाफर के मतानुसार अपेक्षाकृत नवीन वाद्य सारंगी का आविष्कार प्रसिद्ध ख्याल गायक सदारंग के द्वारा हुआ। सारंगी एक लोक-वाद्य और शास्त्रीय वीणा भी है। यह एक भारतीय वाद्य है जो हमारी कुछ लोक परम्पराओं में गहरे तक रचा बसा है और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है लोक संगीत के विभिन्न प्रान्तों में बिना तख वाली सारंगी जोगियों द्वारा बजायी जाती है, पश्चिमी राजस्थान के भील समुदाय में प्रचलित रावण हत्था अलबर के मेयो वर्ग में प्रचलित मेयो का चिकारा, जोगिया सारंगी, राजस्थान के लंगा जाति में प्रचलित गुजरातन सांरगी मंगा जाति में प्रचलित कमायचा, निहालदे के जोगियों में प्रचलित धानी सारंगी, भील और गरसिया जाति में प्रचलित अपंग, भीलों में प्रचलित सुरिन्दा, जैसलमेर के मंजीनिया जाति में प्रचलित अलायु सारंगी बिहार के संस्थाल परगना (वासियों) में (रावण हत्या वर्ग के समान) प्रचलित बनाम महराष्ट्र एवं आन्द्र के प्रधानों में प्रचलित किंगरी, मणिपुर के पेन, केरलीय पल्लवों में प्रचलित कुंज, उड़ीसा प्रान्त में प्रचलित केनरा एवं वानम आदि 

उपर्युक्त विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न नामों से प्रचलित सारंगी के समान कन्धें से सटाकर कमानी या गज से बजाये जाते रहे है भारतीय शास्त्रीय संगीत के परिप्रेक्ष्य में गायकी क्षेत्र में सारंगी का महत्व वीणा के समानान्तर रहा है लेकिन कर्नाटक संगीत में उकसी पूर्णत: उपेक्षा हुई है किन्तु कही-कहीं पर पाया जाता है आश्चर्य है कि इसके प्रयोग के कही-कहीं उदाहरण भी ओडुवारों में उपलब्ध है जहाँ वे संगीतकार है जो प्राचीन तालिम भक्तिगीत तेवरम गाते थे। इस प्रकार के अपवादों को छोड़ दक्षिण के बहुत से क्षेत्रों ने सारंगी को नहीं अपनाया है।

उत्तर भारत में सारंगी को नर्तकियो की संगत के वाद्य के रूप में अधिक जाना जाता था और सामाजिक तौर पर सारंगीवादक कलाकार संगीतकारों में सबसे नीचे तबके के माने जाते थे आज तस्वीर बिल्कुल उलटा है उच्च संगीत सभाओं में सारंगी की बहुत मांग है इसके वादकों ने राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त किया है। वादन शैली- काशी के सुविख्यात प्राय: सभी घरानों में शेरखानी बाज एवं ठप्पा अंग की वादन शैली की प्रमुखता रही है अपवाद स्वरूप शम्भुनाथ मिश्र का घराना है जिसमें ध्रुपद धमार ख्यात टप्पा ठुमरी एवं बेडार अंग की विशिष्ट वादन शैली का विलक्षण समन्वय मिलता है। 

काशी के सभी सारंगी घरानों में ठप्पा अंग की विशिष्ट से मंडित कुशल स्वतंत्र वादक एवं संगीतकार हुए, जिन्हे युगों-युगों तक याद किया जायेगा किन्तु शम्भुनाथ मिश्र के घराने के सारंगी वादकों की विशिष्ट परम्परा में ख्याल अंग की गायकी की विशिष्टताओं से ओतप्रोत वादन शैली में स्वतंत्र वादन तथा संगीत दोनों ही क्षेत्रों की अपूर्व क्षमता विद्यमान रही है, काशी के सभी घराने एक-दूसरे के अत्यन्त निकटतम रह कर भी अपनी वंशपरम्परा की निजता तथा मौलिकता को अपनी साधना एवं निष्ठ से बनाये रखने में सफल रहे, जिसका गौरवशाली इतिहास प्राप्त है।

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