वायलिन का इतिहास

वायलिन का इतिहास
वायलिन

भारतीय संगीत का प्राचीनतम रूप वेदों में मिलता है। प्राचीन काल से ही भारतीय संगीत भक्तिमय और अनुष्ठानों से सम्बद्ध रहा है। चारों देवों में कहीं-कहीं पर बाण, गोथा, अघाटी, कर्करी तथा गर्गर तन्त्रीं वाद्य का वर्णन किया गया है।
 
शारगंदेव कृत ‘संगीत रत्नाकर’ में नाद ब्रह्म का वर्णन करते हुए कहा है- चैतन्य सर्वभूतनम्। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार जो व्यक्ति वीणा वादन में कुशल है, श्रुति व ताल पूर्णरूपेण अधिकार रखता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। वैदिक काल में तंत्री वाद्यों का प्रयोग धार्मिक क्रियाकलापों, अनुष्ठानों एवं मनोरंजनार्थ किया जाता था। रामायण-महाभारत, संस्कृति नाटकों, पुराणों में तंत्रीवाद्यों का महत्व रहा है। भाषा की सीमा एवं शब्दों के जाल को तोड़ कर, सम्पूर्ण जगत में संगीत कला की मूल आधार शिला स्वर और लय की स्थापना में तंत्रीवाद्य की अहम्-भूमिका है। तंत्री वाद्य गायन के मुख्य आधार के रूप में, संगत के दृष्टि से, नृत्य एवं नाटक के परिवेश को उभारने में महत्वपूर्ण अंग है। प्राचीन काल से ही यह मान्यता रही है कि गायक को तन्त्री वाद्य का ज्ञान होना चाहिए।

वाद्य वद् धातु से बना है। वद् का अर्थ है बोलना अर्थात् स्वर की अभिव्यक्ति करना। कहने का अभिप्राय यह है कि वह यंत्र जिसके द्वारा बोला जाता है या स्वरों को अभिव्यक्त किया जाता है। तत् को नाट्य शास्त्र में तंत्रीकृत कहा गया है। यह ‘‘तत म्’’ शब्द के सन्धि से बना है जो कि वीणा, सितार, बेला, सारंगी, सरोद आदि वाद्य अपने तारों या तंतु में व्याप्त स्वर का विस्तार करने वाले वाद्यों के लिए यथार्थ रूप में प्रयोग होता है।

प्राचीन काल से ही भारत में प्रहार एवं गज से बजाने वाले वाद्यों का बहुत महत्व रहा है। गज से बजाने वाले वाद्य सारंगी, दिलरूबा, इसराज एवं बेला है। वायलिन एवं सांरगी का अधिकर प्रचलन देखने को मिलता है।

जहाँ तक वायलिन (बेला) की बात है उसका अपना एक इतिहास है। इस विदेशी वाद्य को भारत के लोगों ने अपनाया और आज ये अत्यन्त ही लोकप्रिय है। 

वायलिन शब्द की प्रकृति के संबंध में कई विद्वानों ने अपनी-अपनी विचार धारा प्रकट किये है। श्री विमल कान्त राय चौधरी जी ने भारतीय संगीत कोश में इस वाद्य का नाम ‘बेहला’ बताया है और कुछ एक स्थानों में इसे ‘बाहुलिन’ के नाम से जाना जाता है। जबकि दक्षिण भारत में इसके वायलिन एवं फिडिल के नाम का प्रचलन है।

वायलिन की उत्पत्ति

प्राचीन काल से ही प्रहार वाद्यों का सदा से ही बोल बाला व प्रचलन चला आ रहा है। उस समय भी गायन या नृत्य के साथ प्रहार से-बजने वाले वाद्य मृदंग, तबला, डमरू का प्रयोग होता था। परन्तु उस समय मन्द से बजने वाले वाद्यों का प्रचलन उतना नहीं था।

वर्तमान काल में तो प्रहार वाद्यों के साथ-साथ गज वाद्यो का प्रयोग अधिक होने लगा। जैसे बेला, दिलरूबा, सारंगी, इसराज वायलिन इन गज वाद्यो का प्रयोग नृत्य गायन के साथ-साथ एकल वादन में भी होने लगा। वायलिन और सारंगी का मुख्य स्थान समाज में स्थापित हो गया है।

वायलिन एक प्राचीन वाद्य माना जाता है, परन्तु कई मतभेद है वायलिन को उत्तर भारतीय पद्धति में आए मुश्किल से 120 वर्ष बीते होंगे। उत्तर भारतीय पद्धति से पूर्व इसका प्रचार कर्नाटक संगीत में लगभग 400 साल से चला आ रहा है।

वायलिन का अविष्कार किसने किया इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। कई विचारधारा इसे भारतीय वाद्य सिद्ध करने का दावा करते है। उनाक कहना है कि यह वाद्य हमारे रामायण जैसे महाकाव्यों में व्यक्त है। वायलिन शब्द में भी कई मतभेद पाये जाते है। श्री विमलकान्त राम चौधरी ने भारतीय संगीत कोश में वायलिन को ‘बेहला’ नाम दिया है, परन्तु ‘बेला’ शब्द से ही वायलिन का नाम जाना जाता है।

कुछ लोगों का कहना है कि गाँस्पर हुई फोप्रगर तो कुछ लोग आन्द्रे अमाती को बेला वाद्य का जनक मानते है और भी लोगों के अनुसार टाइरोल के रहने वाले गॉस्पारो बरतोलेत्ती की कृपा से ही वायलिन को आधुनिक रूप मिल सका है। वायलिन को ‘‘वायल’’ नाम के एक वाद्य से विकसित मानते है। ऐसा भी कुछ विद्वानों का मानना है। इन मतभेदों में विश्वविख्यात वायलिन वादिका डा0 श्रीमती एन0 राजम् के मतानुसार बेला की सर्वप्रथम रचना अभिकला का प्रतिपादन सोलहवीं सदी के द्वितीय चरण में बोलोन के निवासी गाँस्पर हुई फोप्रगर को माना है क्योंकि बेला उनके बाद ही अमाती, स्टेनर, होप, स्टाडिवैरिस तथा अन्य प्रवृत्त हुए। एक और विदेशी विद्वान डा0 एन0 आर0 हैविस के लिखे पुस्तक ओल्ड वायलिन एण्ड वायलिन लोर में स्पष्ट लिखा है कि डुई फोप्रगर का जन्म 1514 में फासन बेवेसि टायरोल में हुआ था। वे वाद्यों को सजाने का कार्य करते थे। तथा पैरिस में आकर लियान्स में कार्य शुरू किया वैरियट द्वारा बनाया गया इसके साथ वायलिन का चित्र आज भी ब्रासेल्स कजंरवेटर म्युजियम के क्यूरेटर विक्टर माहिजान में रखा हुआ है।

जोसेफ वर्ग आन्द्रे अमाती को ही वायलिन का जनक मानते थे। डिक्शनरी ऑफ वायलिन मेकर्स के अनुसार यह सन् 1525 ई0 में बनाया गया था। परन्तु इन्स्ट्रुमेन्ट इन द हिस्ट्री वेस्टर्न म्यूजिक और द हिस्ट्री ऑफ म्युजिकल इन्स्ट्रुमेन्ट्स में इसका समय 1535 से 1699 तक बताया गया है। आधुनिक काल के लेखक श्री प्रकाश नारायण अपनी पुस्तक वायलिन वादन में बताते है कि वायलिन को रूप देने वाले टायरोल के निवासी गँस्पारो बरतोलेत्ती है क्योंकि इनकी कृपा से ही हमें वायलिन का आधुनिक रूप मिलता है। गैस्पारो ने वायलिन को इतना लोकप्रिय बना दिया कि दो शताब्दी में यूरोप में इसका बहुत प्रचार हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि गास्परदि सालो और सेस्पारो बरलतोलनी दोनों अलग-अलग व्यक्ति है, परन्तु उनका गाँस्पारो बरतोलेत्ती का जन्म इटली के सालों नामक जगह पर हुआ था। इसलिए इनका नाम गेस्परदि सालो हो गया।

विदेशों के संग्रहालयों में ऐसे चित्र मिलते है जिनमें कुछ वायलिन मिलते है। जो वर्तमान वायलिनों से मिलती जुलती है। पर गारोफालो के दिवाल लटकी तस्वीरों में एक महिला हाथ में वायलिन पकड़ी हुई है जो कि सन् 1505 व 1508 के बीच की है। एक बालक हाथ में तीन तार वाला वायलिन पकड़ा है जो कि 1529 का चित्र है 1534 मे कई वाद्यों के साथ वायलिन का भी चित्र है। इससे ये ज्ञात होता है कि उस समय भी वायलिन या उसके पहले भी वायलिन का प्रयोग होता था। वितत् वाद्य शिक्षा शीर्षक पुस्तक के लेखक श्री पद बन्दोपाध्याय जी ने लिखा है कि 16वीं शताब्दी में यूरोप में वायलिन का प्रयोग हेाता होगा और वायल की उन्नति की पराकाष्ठा ही वायलिन होगा। क्योंकि दोनों वाद्य एक दुसरे की तरह दिखते है।

ग्रोवर कहते है कि 17वीं शताब्दी तक वायल का प्रचलन इतना नही था। कुछ लोगों का मत ऐसा नही है। जोसेफ वर्ग के अनुसार पुराने वायल से ही वायलिन का विकास हुआ है। परन्तु कुछ लोग इसको नकारते हुए कहते हे कि वायलिन का विकास वायल से नहीं हुआ है उनमें- अरनाल्ड, डोलमेट्स और अलक्जेन्डर हेजेड जी प्रमुख है। इससे यह पता चलता है कि वायलिन का विकास वायल से नहीं हुआ है।

मुस्लिम देशों में गजवाद्यो या गजवाने वाद्यो को रबाब कहा जाता था, क्योंकि अबर देशों में रबाब से बजाया जाता था। काल गैरिगर ने अपने किताब ‘स्ट्रुमेन्ट इन द हिस्ट्री ऑफ वेस्टर्न म्युजिक में रिबेक के बारे में लिखा है। रबाब के बाद मुस्लिम देशों में रिबेक तथा गीग वाद्य का निर्माण हुआ। कुछ लोग रिबेक को वायलिन में महत्वपूर्ण योगदान मानते है और कुछ लोग फिडर वाद्य को ही नही बल्कि रिबेक का भी योगदान मानते है।

आस्कर थामसन का कहना है कि वायलिन रबाव का ही आधुनिक रूप है। मूर के स्पेन पर आक्रमण करने के बाद ही सन् 1711 मे रबाब यूरोप में पहुँचा, जिसे रिबेक नाम मिला। काल गैरियर ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि वियेल ओर रिबेक का एक ही कार्य है कि वे अपने गुणों से अन्य वाद्यों को बनाने में यागदान प्रदान करे। इसमें ल्यूट, वियल और लिरादवेसियों का संगीत में प्रयोग नहीं हुआ, पर अन्य वाद्य यन्त्रों में वायलिन का बहुत महत्व है। इससे यह पता चलता है कि रबाब, रिबेक और विकल फिर उसके बाद वायलिन ये क्रम से वाद्य बने है।

भारत में वायलिन के अविष्कारों में कई मतभेद मिलते है। भारतीयता से प्रेरित हो के कई विद्वान वायलिन को भारत का वाद्य मानते है क्योंकि भारत में गज वाद्यों की अपनी एक परम्परा रही हैं, और ऐसा मानना है कि लंकापति रावण जो कि एक महान संगीतकार थे। वे दो तारों से बना एक यंत्र बजाते थे जिसे रावण हस्त वीणा कहते थे। उस समय ईसा की पहली शताब्दी मानी जाती थी। पं0 हरिपाल देव लिखित ‘संगीत सुधाकर’ में गज द्वारा बजने वाली पिनाक वाद्य का वर्णन किया गया है जो कि 11वीं और 12वीं शताब्दी में बना रहेगा। परन्तु अगर हम एक नजर भारत के महाकाव्यों पर डाले तो हमें ये पता चलता है कि यंत्र वाद्यों का प्रचलन पौराणिक है।

डॉ0 कोर्टरोक के अनुसार स्पेन में रचित ग्रन्थों में सन् 10वीं या 11वीं शताब्दी में गजवाद्यों का उल्लेख मिलता है। श्री ई0एन0डोरिंग ने संगीत कोष में से वायलिन के बारे में लिखा है कि प्राचीन समय में वायलिन के ही तरह लम्बी गर्दन व गज से बजने वाला वाद्य का प्रयोग होता था। इसके बाद ही सारे विश्व में इसका प्रचलन हुआ। मोहन जोदड़ों एवं हड़प्पा की खुदाई में कई ऐसे वाद्यों का अस्तित्व प्राप्त हुआ है जो दो तारों वाले वाद्य थे। और हड्डी के गज से बजाए जाते थे। भारत के ऐसे कई मन्दिर है जिसमें वायलिन को जिस मुद्रा में बजाया जाता है, उसी तरह की कई आकृतियाँ मन्दिर की दीवारों इत्यादि पर बनी है। जैसे-मैसूर के ही नरसिंहपुर तहसील के अग्यस्तेश्वर मंदिर में एक महिला की मूर्ति है जो कि वायलिन की मुद्रा में वाद्य ली है। यह शिल्प 11वीं शताब्दी के पूर्वाध का है। दक्षिण भारत में चिदम्बरम के नटराज मंदिर में एक शिल्प है जो कि वायलिन की तरह है। 10वीं शताब्दी की बनी मंदिर मल्लिकार्जुन मंदिर में शिल्प बनी है जो कि गज द्वारा बजने वाले वाद्य को स्पष्ट करता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत वर्ष से ही गज वाद्यों के निर्माण की प्रेरणा अन्य देशों को मिला है।

दक्षिण भारत में वायलिन के प्रचार-प्रसार में बालुस्वामी दीक्षितर, जो की श्री मुत्तुस्वामी दीक्षितर के छोटे भाई थे, का बहुत योगदान था। बालुस्वामी जी दक्षिण भारतीय संगीत में वायलिन वादन की योग्य प्रविधि प्राप्त कर भारतवर्ष में संगीत की सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया।

दक्षिण भारत में वायलिन का अत्यधिक प्रयोग होता है। वहां पर नृत्य का सुन्दर प्रयत्न किया। इन्होंने सरोद पर वायलिन शैली से वादन आरम्भ किया। उनके बाद फिरोजपुर के कलाकार श्री बलवन्त सिंह हुगन का नाम आता है।

19वीं शताब्दी के प्रथम दशक से लेकर तीसरे दशक तक वायलिन को लोकप्रिय बनाने का पूर्ण श्रेय श्री गगन बाबु, श्री पी0 सुन्दरम अय्यर तथा उस्ताद अलाउद्दीन खाँ जी को जाता है। गगन बाबू के गुरू उस्ताद करामतुल्ला थे। वे एक प्रसिद्ध सरोद वादक हुआ करते थे। गगनबाबु को उत्तर भारत में गत शैली का प्रर्वतक कहना उचित होगा। उनके कई शिष्य हुए। श्री दुंडीराज पलुस्कर, श्री पटवर्धन एवं श्री पाठक ने वायलिन की शिक्षा श्री पी0 सुन्दरम् अय्यर से प्राप्त कर उत्तर भारत में इसका प्रचार किया। पं0 ओकारनाथ ठाकुर जी के छोटे भाई भी वायलिन वादन करते थे।

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने वायलिन को उत्तर भारतीय संगीत में स्थापित करने के लिए अपने कई शिष्यों को वायलिन वादन की अच्छी शिक्षा दी एवं उनका पूरा मार्गदर्शन किया। प्रसिद्ध वायलिन वादक वी0जी0 जोग जी ने वायलिन की संगत में अपना एक स्थान बनाया। उन्होंने अपनी परिश्रम साधना द्वारा पूरे उत्तर-भारत में वायलिन को एक अलग ही स्थान प्राप्त करवाया। उन्होंने भारत में ही नहीं देश-विदेशों में भी शास्त्रीय संगीत को वायलिन के द्वारा प्रसिद्ध किया।

वर्तमान वायलिन वाद्य का रूप पाश्चात्य देशों की देन है। परन्तु वायलिन किसने और कहा शुरू किया उसको, लेकर अभी भी विवाद खड़ा है। दक्षिण भारत में इसका प्रचलन लगभग 400 साल से है। और दक्षिण पद्धति से व गायन के साथ-साथ एकल वादन में भी वायलिन का प्रयोग होता है। इसी तरह दक्षिण भारत के मैसूर शहर में श्री रंगपट्टनम में स्थित दरिया दौलत महल में बना सन् 1784 का एक शिल्प मिला है। जिसमें संगीत नृत्य इत्यादि की छाया देखने को मिलता है उस चित्र में एक महिला नृत्य कर रही है उस चित्र में वायलिन को भी देखा जा सकता है। इससे यह पता चलता है कि दक्षिण भारत में नृत्य संगीत 18वीं शताब्दी से ही शुरू हो गया था, और दक्षिण भारत के ही संगीतकार श्री बालुस्वामी दीक्षित्तर द्वारा बेला वादन का प्रारम्भ किया गया। इस सत्य को असत्य नही किया जा सकता है।

उत्तर भारत में आजकल वायलिन इतना लोकप्रिय हो गया है कि हर संगीत में चाहे वह शास्त्रीय हो चाहे सुगम संगीत हो दोनों में ही वायलिन का प्रयोग अत्यधिक होने लगा। इसी को देखते हुए वायलिन वादन को दो भागों में बाँट दिया गया है। पहला शास्त्रीय संगीत, दूसरा सुगम और वाद्य वृन्द।

श्री नारायण विश्वनाथपंडित के अनुसार, पं0 विष्णु दिगम्बर के निवेदन पर श्री पी0ए0 सुन्दरमअय्यर विश्व विख्यात वादन ई0 1911-12 के लगभग गान्धर्व महाविद्यालय आये और उन्होंने भी पाठक, श्री पटवर्धन व श्री घुण्डीराज पलुस्कर जी को वायलिन की शिक्षा दी। उत्तर भारतीय संगीत में वायलिन को लोकप्रिय बनाने का श्रेय श्री गगन बाबु (सन् 1890 से 1949) को जाता है। उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां ने वायलिन वादन में पश्चिमी संगीत की शिक्षा मास्टर लोबो से प्राप्त की फिर सन् 1911 में उन्होंने अहमद खाँ से सरोद की शिक्षा प्राप्त की। वर्तमान युग के कई एक दक्षिण भारतीय कलाकार पाश्चात्य शैली का भी वादन कर रहे है।

इसलिए वायलिन केवल संगत का ही नहीं बल्कि एकल वादन का भी एक महत्वपूर्ण वाद्य है। उत्तर भारत में यह दो दशकों से प्रभावित हुआ। आजकल कलाकार वायलिन को लोकप्रिय बनाने के लिए गत शैली तथा गायकी शैली, तान, धुन इत्यादि को अपना कर वायलिन की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति कर रहे हैं। वायलिन के प्रचार-प्रसार हेतु उत्तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय संगीत के कलाकारों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

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