दूध के प्रकार और औषधीय उपयोग

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प्रधान रूप से मधुर रस को दूध कहते हैं। प्राय: दूध मधुर रस वाला ही होता है। दूध सभी प्राणधारियों के लिये सात्म्य अर्थात् हितकारी है।

समस्त दूध प्राय: मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, शीत, पुष्टि देने वाले, बृंहण शरीर को बढ़ाने वाले, (वृण्य) वीर्यवर्धक, (मेध्य) बुद्धि के लिये हितकारी, (बल्य) शरीर को बल देने वाले, (मनस्कर) मन को प्रसन्न करने वाले, (जीवनीय) जीवन के लिये हितकारी, (क्षमहर) थकावट को मिटाने वाले तथा श्वास और कास (कफ, कास को छोड़कर शेष समस्त कासों को) मिटाने वाले होते हैं। 

दूध रक्तपित्त को नाश करने के साथ-साथ टूटे हुए को जोड़ने वाला है। समस्त प्राणियों के लिये सात्म्य दोषों का शमन अर्थात् स्वस्थान में स्थित दोषों को शान्त करने वाला है, प्यास का नाश करने वाला, अग्निवर्धक, क्षीण और क्षत रोगियों के लिये हितकारी, पाण्डु रोग, वातपित्त, शोष, गुल्म, उदर, अतीस ज्वर (जीर्ण ज्वर), दाह और शोथ रोग में विशेष करके पथ्य और हितकारी है। 

शुक्ररोगों में, मूत्रकृच्छ्र रोग में तथा मलावरोध में ये पथ्य हैं। दूध नस्य कर्म में, अवगाहन क्रिया में आलेपन में, वमन में, आस्थापन में, बस्ति में, विरेचन क्रिया में, स्नेहकर्म में, समस्त स्थानों पर रसायन अर्थात् वाजीकरण आदि में भी प्रयुक्त होता है। 

दूध के प्रकार

दूध कितने प्रकार के होते है, दूध आठ प्रकार के होते हैं
  1. गाय का दूध 
  2. भैंस का दूध
  3. ऊँटनी का दूध
  4. घोड़ी का दूध
  5. बकरी का दूध
  6. भेड़ का दूध
  7. हथिनी का दूध
  8. स्त्रियों का दूध
1. गोदूध- मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु, मन्द और प्रसन्न- इन दस गुणों वाला गाय का दूध होता है। दश गुणों की समानता से दूध ओज को बढ़ाता है। तदेवंगुणमेवौज: सामान्यादभिवर्धयेत्। प्रवरं जीवनीयनां क्षीरमुक्तं रसायनम्।।4 जिस प्रकार जल में जीवन का गुण होता है। उसी प्रकार दूध में भी जीवन के गुण हैं।

2. भैंस का दूध- भैंस का दूध गाय के दूध से भारी, गाय के दूध से ठण्डा और उसमें स्नेह अर्थात् घी भी अधिक होता है, निद्रा न आने वाले के लिये तथा अग्नि के बहुत बढ़ने में यह हितकारी होता है। भैंस का दूध गुरु, शीत और अधिक स्निग्ध होता है, अधिक बलवर्धक तथा बृंहण (शरीर को उपचित करने वाला) में श्रेष्ठ होता है। 

3. ऊँटनी का दूध-  ऊँटनी का दूध रुक्ष, लघु और सालवण अर्थात् कुछ लवण रस वाला होता है, यह मधुर रस के अनुरस से जानना चाहिये। ऊँटनी का दूध प्रायश: मधुर होता है, ऐसा कहा गया है न कि सर्वथा (सम्पूर्ण रूप से) मधुर ही होता है। ऊँटनी का दूध वात नाशक, कफ नाशक, इसके अतिरिक्त आनाह, कृमि, शोफ, उदर एवं अर्श रोगों में भी हितकारी है।

4. घोड़ी या एक खुर वाले पशुओं का दूध- एक खुर वाले घोड़ी या गधी, खच्चर आदि जानवरों का दूध बल कारक, शरीर को स्थिर बनाने वाला, उष्ण, अम्ल-लवण रस, रुक्ष, हाथ पाँव के वातविकारों का नाश करने वाला और लघु है। दूसरे दूधों की शीतता की अपेक्षा वडवा (घोड़ी) का दूध उष्ण होते हुए भी मूत्र और मधु की अपेक्षा शीत ही होता है।

5. बकरी का दूध- बकरी का दूध कषाय, मधुर, शीतल, संग्राहि एवं लघु होता है। बकरी का दूध रक्तपित्त तथा अतिसार का नाश करने वाला है। इसके अतिरिक्त क्षय, कास, ज्वर में भी बकरी के दूध को औषधीय रूप से उपयोग में लाया जाता है।

6. भेंड का दूध- भेड़ी का दूध- हिक्का, श्वास रोग उत्पन्न करने वाला, गरम तथा पित्त एवं कफ को उत्पन्न करने वाला होता है।

7. हथिनी का दूध- हथिनी का दूध गुरु तथा शरीर को दृढ़ करने वाला होता है। यद्यपि हस्तिनी (हथिनी) के क्षीर आदि का प्रयोग शास्त्र में नही कहा गया हैै तथापि इनके कथित गुणों को जानकर यथावश्यक इसका प्रयोग करना चाहिये।

8. स्त्री का दूध- स्त्रियों का दूध जीवनीय, बृंहणीय, शरीर के लिये सात्म्य, स्नेहक, नस्य के लिये रक्तपित्त में हितकारी, आँख के दुखने में तर्पण करने के लिये उत्तम है।

दूध से बने उपयोगी पदार्थ

इसके अतिरिक्त दूध से बने पदार्थ जैसे दधि, मट्ठा, नवनीत (मक्खन) तथा घृत भी औषध के रूप में उपयोग में लाया जाता है- दधि- पीनस, अतिसार, शीतजन्य विषमज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र और स्वाभाविक कृषता में दही उत्तम है। दही के ऊपर की मलाई शुक्र की वृद्धि करने वाली होती है। दही का मण्ड स्वच्छ द्रवभाग (मस्तु), कफ-वात नाशक होता है।

तक्र (मट्ठा)- शोफ, अर्ष, ग्रहणी, मूत्रघात, उदर रोग, अरुचि, स्नेहकर्मजन्य रोगों में, पाण्डुरोग में तथा संयोगजन्य विष में छाछ औषध रूप में उपयोग में लाया जाता है। नवनीत (मक्खन) मक्खन, संग्राही, अग्निदीपक, हृद्य, ग्रहणी, अर्शरोग-नाशक, अर्दित तथा अरूचि को मिटाता है। ताजा मक्खन ही अधिक गुणकारी होता है। 

गाय के घी से स्मरण शक्ति, बुद्धि, अग्नि शुक्र, ओज, कफ-मेद, बढ़ता है। वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, दौर्भाग्य, अशुभ एवं ज्वर का नाशक है। सभी स्नेहों में घृत उत्तम है, शीतल, मधुर है।

पीयूष, मोरट और अनेक प्रकार के किलाट- पीयूष (ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खील) मोरट (यही पीयूष जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, तो इसको मोरट कहते है), किलाट (जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल लिया जाय) तथा इस प्रकार की अन्य वस्तुएँ जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो या जिनको अनिद्रा रोग हो, उनके लिये सुखदायक है। ये गुरु, तृप्तिकारक पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक एवं वातनाशक हैं।

इसके अतिरिक्त वृक्षों के दूध भी औषधीय रूप में उपयोग में लाये जाते हैं-

तीन वृक्षों का दूध शोधन कर्म में उपयोग में लाया जाता है। वे तीन वृक्ष हैं-

1. स्नुही (थूहर) 2. अर्क (आक) 3. अश्मन्तक। अश्मन्तक का दूध वमन के लिये; स्नुही का दूध विरेचन के लिये और आक का दूध वमन और विरेचन दोनों कायोर्ं के लिये प्रयुक्त होता है। इस प्रकार गाय आदि के आठ प्रकार के दूध तथा तीन वृक्षों के दुग्धों के सेवन से कई प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलता है। 

इनका सभी प्राणधारियों के लिये उचित मात्रा में सेवन करना अत्यधिक हितकारी एवं लाभकारी है। तथा प्राणधारियों के लिये जीवनीय गुणों से युक्त होने के साथ-साथ ये दूध उत्तम औषधि के रूप में उपयोगी हैं

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