समकालीन कविता का लक्षण स्वरूप एवं स्थिति

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समकालीन कविता प्रगतिशील रुझानों में जनवादी पक्षधरता के साथ मानवीय सौन्दर्यबोध में, सृजनात्मक चेतना के रूपान्तरण की कविता है। जो अपने दौर की काव्य सृजन में, विगत लगभग दो दशकों के ऐतिहासिक कालखण्ड में विकसित प्रगति विरोधी- प्रतिक्रियावादी कलाअतियों, अकवितावादियों का निषेध करती हुई मानवीय रागात्मकता की समग्रता एवं वर्गहीन समाज की आस्थाशील कविता हैं।]

समकालीन कविता का लक्षण स्वरूप एवं स्थिति

समकालीन कविता के सृजनात्मक संसार को किसी एक विशेष विचारधारा के प्रतिफलन की अवधारणा में ‘रिड्यूस’ न्यस्त नहीं किया जा सकता..., वैसे भी कुरूपता व असौन्दर्य के अभाव में सौन्दर्य की स्थापना संभव नहीं है। यह तथ्य वस्तुपरक है कि समकालीन कविता के विस्तृत परिपे्रक्ष्य में प्रगतिवादी-जनवादी सृजन के परम्परा विरोध में न केवल प्रयोगवादी अकवितावादी काव्य सृजन की स्थापना हुई है बल्कि उनकी कलाअतियों व कला सिद्धांतों की स्थापना विश्व शीतयुद्ध के सन्दर्भ में, विवेचित भी हुई है। 

मुक्तिबोध की अवधारणा थी कि नयी कविता के क्षेत्र में प्रगतिवाद पर जोरदार हमले किये गये और कुछ सिद्धांतों की एक रूपरेखा प्रस्तुत की गयी। ये सिद्धांत और उनके हमले, वस्तुत: उस शीतयुद्ध के अंग थे जिसक प्रेरणा लन्दन और वाशिंगटन से ली गयी थी।1 समकालीन कविता के पूर्व पक्ष नयी कविता में ही नहीं, सातवें दशक में कविता के अस्तित्ववादी निषेध-भाव, मनोमय जगत् के फ्रायडीय व अकवितावादी आन्दोलन भी चेतन-अवचेतन रूप में उसी शीतयुद्ध की उपज रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर तीसरी दुनिया के उपनिवेशवादी-गुलाम देशों की सशस्त्र क्रांतियां न केवल बुद्धिजीवियों का मार्गदर्शन कर रही थीं बल्कि समकालीन रचनाकारों के लिए देशगत परिस्थितियों में प्रेरक बन रही थीं। 1967-68 के आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई। एकछत्र शासन के स्थान पर बहुत से राज्यों में मिली-जुली सरकारें बनीं। 1968 के परवर्ती काल में नक्सलवादी आंदोलन ने सम्पूर्ण देश की राजनीतिक, सांस्कृतिक, सृजनात्मक चेतना को झकझोरा जिससे हमारे सारे ऐतिहासिक, मानवीय, सृजनात्मक, नैतिक, धार्मिक सौन्दर्यबोधी रागात्मक सन्दर्भ-दर्शन पुनरावलोकन के लिए प्रस्तुत हुए। विद्रोह व जन-संघर्ष की अवधारणा, वामपंथी जनवादी सृजनात्मक व सौन्दर्यबोधी रचनाओं में कलात्मक रूप से प्रक्षेपित हुई। जिसकी सुदूर जड़े सम्पूर्ण छायावादोत्तर काव्यालोचना की परम्परा रूप में सक्रिय रही है।

समकालीन कविता वैविध्यमय जीवन के प्रति आत्मचेतस व्यक्ति की भाषागत संवेदनात्मक प्रतिक्रिया है। कविता जहां समाज-सापेक्ष रूप में रची जाती है वहां वह सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक प्रक्रिया होने के साथ-साथ सौन्दर्यबोधी होती है। माक्र्स के विचारानुसार मनुष्य एक सृजनात्मक प्राणी होता है। उसके द्वारा होने वाले सृजन का आधार सौन्दर्यशास्त्रीय नियम होते हैं......माक्र्स ने कहा भी है कि मैंन देयरफोर आल्सो फाम्र्स थिंग इन एकार्डेन्स विद द ला आफ ब्यूटी।

समकालीन कविता में यथार्थ के कलात्मक प्रतिबिम्बन स्वरूप में गत्यात्मक परिदृश्य को तलाशा जा सकता है...... समकालीन कविता अपने समय के मुख्य अन्तर्विरोधों की कविता है और इन प्राथमिकताओं को अपने जीवनानुभवों से पहचान कर उनके लिए लड़ने का संकल्प है।’’...... समकालीन कविता में, जो हो रहा है (बिकमिंग) का सीधा खुलासा है, इसे पढ़कर वर्तमान काल का बोध हो सकता है क्योंकि उसमें जीते, संघर्ष करते, लड़ते, बौखलाते, तड़पते-गरजते तथा ठोकर खाकर सोचते वास्तविक आदमी का परिदृश्य है। आज की कविता में काल अपने गत्यात्मक रूप में ठहरे हुए हैं, ठहरे हुए क्षण या क्षणांश के रूप में नहीं। यह काल क्षण की कविता नहीं काल प्रवाह के आघात और विस्फोट की कविता है।

समकालीन कविता में ‘युगीन पात्र-मनुष्यों का द्वन्द्वशील स्वरूप वर्णित हुआ है। विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के अनुसार ‘समकालीन कविता में मनुष्य की प्रतिमा स्थिर, जड़, निष्क्रिय और दार्शनिक नहीं है। उसमें चित्रित आदमी की शक्ल है जिससे आप यह जान सकते है, जबकि नयी कविता के क्षणवादियों के जब-तब कोंधते क्षणांशों में निमग्न मानव प्रतिमा को आप पूरी तरह नहीं जानते। ‘अंधायुग’, ‘आत्मजयी’, ‘असाध्यवीणा’, ‘संशय की एक रात’ आदि में जो वित्रित व्यक्ति है, वह काल के प्रति ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं देखता सिर्फ दार्शनकि दृष्टि से देखता है।’’ समकालीन कविता में द्वंद दृष्टिकोण व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यथार्थवादी अभिव्यक्ति दर्शनीय है जिसमें अभिव्यक्ति के खतरे उठाती हुई ‘अंधेरे में’ की लड़ाई पूरी ‘पटकथा’ को अनावृत्त करती हुई ‘मुक्ति-प्रसंग’ व ‘जनता का आदमी’ का सार्थक बयान अभिज्ञापित करती है। पूर्व पीढ़ी की ‘हरिजन-गाथा’ ही नहीं ‘नगई महरा’ जैसी काव्य-रचनाएं नयी पीढ़ी को ‘हक की लड़ाई’ के लिए प्रेरित करती हैं। युगीन पात्रों व मनुष्यों द्वारा यथार्थ के कलात्मक वर्णन की अपेक्षा माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र में एंगेल्स-माक्र्स के अतिरिक्त, गोर्की व जार्ज लूकाच ने भी की है।

समकालीन कविता के पर्याय साम्प्रतिक कविता, कालांकि कविता, तात्कालिक नाम-रूपों का प्रकरण भी प्रस्तुत प्रसंग में समसामयिक होगा कि ‘साम्प्रतिक कविता कालांकित कविता है। समकालीन कविता के पूर्व की कविता पर भी अपने समय का प्रभाव है, छाप है किन्तु आज की कविता में अपने समय के साथ जितनी सीधी और उग्र मुलाकात होती है उतनी पहले की कविता में नहीं होती। 

उपर्युक्त समकालीन कविता की भूमिका में विश्वम्भरनाथ उपाध्याय का यह भी अभिमत है कि भूतपूर्व कविता में ‘सामान्य’ या ‘शाश्वत’ तत्वों और रूझानों के प्रति जितना लगाव मिलता है उतना समकालीन कविता में नहीं मिलता। यथा स्वच्छन्दतावादी (रोमांटिक) तथा ‘नयी कविता’ में कालातीत दृष्टियों और मूल्यों की प्रवृत्ति अधिक है। कालातीत (ट्रांसेडैंस) होने अथवा सारतत्वों (एसैंस) को पकड़ने का चाव, साम्प्रतिक कविता में बहुत कम है। 

उपर्युक्त विश्लेषण में सरलीकरण रूप में नयी कविता की एक विशेष ‘कालातीत’ प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया जो सकारात्मक जीवनसंघष्र्ाी सौन्दर्य मूल्यों से परे हैं। वैसे नयी कविता में कालगत सारतत्वों का भी चयन रहा है।

समकालीन कविता के प्रस्थान बिन्दु, पद, काल-निर्धारण के सन्दर्भ में यह रोचक तथ्य है कि विभिन्न आलोचकों ने साठोत्तरी कविता, साम्प्रतिक कविता, छायावादोत्तर कविता, तात्कालिक कविता, समसामयिक कविता और समकालीन कविता को एक-दूसरे का पर्याप्य माना है और कहीं-कहीं अलगाव भी इनमें दर्शाया है। परन्तु इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि काव्य-प्रवृत्तियों, काव्य-सृजनाओं का विभाजन-बदलाव रचनात्मक धारणाओं के कारण हो या वह सन्, वार, दशक या ऐतिहासिक घटनाओं के विभाजन के आधार पर हों वैसे भी किसी भी युग की काव्यानुभूति, सौन्दर्यबोध, भाषा और अभिव्यक्ति पर राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक-सांस्कृतिक दबाव होना अवश्यम्भावी होता है।

समकालीन कविता के प्रस्थान बिन्दु 1962 के भारत-चीन सीमा संघर्ष के मोहभंग में हैं। सृजनात्मक बदलाव के पूर्व पूर्वपक्ष की नयी कविता में यह आकस्मिक नहीं है कि सौन्दर्यमयी अभिजात्य मुद्रावालों, आत्ममुग्ध, आत्मकेन्द्रित संशयवादी, सौन्दर्यमयी, चित्रात्मक कविताएं जब लिखी जा रही थीं तब मुक्तिबोध बीहड़ मानसिकता की कविताएं लिखते हुए बंजर-भग्न पहाड़ों व संघर्षरत जिजीविषा वाले सौन्दर्य में नये माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की पहल कर रहे थें वस्तुत: समकालीन कविता के यथार्थ संघष्र्ाी अवधारणाओं के बीज निराला की ‘कुकुरमुत्ता’ व ‘वेला’, ‘नये पत्ते की रानी और कानी’, ‘खजुराहो’, ‘गर्म पकौड़ी’, ‘कुत्ता भोंकने लगा’, ‘झींगुर डट कर बोला’, ‘मास्को डायलाग्स’ और ‘महंगू महंगा रहा’ आदि कविताओं में प्राप्त होते हैं। कवि दूधनाथ सिंह भी ‘अपनी शताब्दी के नाम’ संग्रह में गीतधर्मी रूमानियत में अभिव्यक्त करते हैं, निराला को कविताओं में मैंने पोस्त के फूल की तरह सूँघा है।

समकालीन कविता की परिभाषा के पूर्व सजग रचनाकारों-आलोचकों के पारस्परिक लेन-देन, प्रगतिवादी परम्पराऔ के सार्थक बिन्दुओं पर सहमति के साथ-साथ समकालीन पद की विवेचना आवश्यक है। ‘फिलहाल’ आलोचना संग्रह के रचनाकार अशोक वाजपेयी ने ‘समकालीन’ ‘आज की कविता का एक लेखा-जोखा’ कर्म में विजयदेव नारायण साही के ऐतिहासिक पर अधूरे लेख ‘लघु मानव के बहाने हिन्दी कविता पर एक बहस’ की सार्थकता को स्वीकारा है। जो छायावादोत्तर काव्य की ‘प्रसाद’ से लेकर ‘औय’ की परम्परा का कवि अभिज्ञापित किया गया है। जो तत्कालीन अर्थात छायावादोत्तर काल की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थिति से एक नये और सार्थक तारतम्य से जोड़ता हैं समकालीन कविता की बदली हुई परिस्थितियों में सौन्दर्यबोधी चेतना के रूपान्तरण में जब नयी कविता व किसिम-किसिम के आन्दोलन अपनी मौत आप मर रहे थे और राजनीतिक चेतना से युक्त सृजनात्मक कार्य और कला सिद्धांत शक्तिशाली प्रमाणित हो रहे थे तब प्रतिक्रियावादी आंदोलन प्रवर्तकों ने अपनी अस्तित्व रक्षा केन्द्रित जेहाद फिर से छेड़ा और यह प्रयत्न किया कि समूचे परवर्ती विकास को ‘सप्तकों’ व नयी कविता की अगली कड़ी में घटा दें। ‘नयी कविता ‘ प्रकाशन से प्रकाशित ‘त्रयी’ और ‘त्रयी-2’ नामक संकलन और ‘चौथा सप्तक’ का प्रकाशन इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

समकालीन कविता के वैविध्यमय स्वरूप में ‘जीवन संघष्र्ाी सौन्दर्यबोध’ की समझ के अभाव के कारण, प्रतिक्रियावादी शक्तियों की पहचान संभव नहीं होती है जो किसिम-किसिम के आंदोलनों व ‘सप्तकों’ व ‘त्रयी’ में दिग्दर्शित होती है। यह भी रोचक तथ्य होगा कि ‘नामों-आंदोलन’ में बांटकर कविता की परीक्षा में कई खतरे हैं बकौल सुरेन्द्र चौधरी के समकालीन कविता में कई तरह के आंदोलन खड़े किये गये हैं अकवितावादी, युयुत्सुकविता, अन्यथावादी, अस्वीकृत कविता आदि-आदि नामों से बंधकर परीक्षा करने में कई खतरे हैं। महत्वपूर्ण रूप से इन धाराओं के भीतर जो समानता है, वह इस बात को लेकर कि सारे आन्दोलन समकालीन कविता को ‘नयी कविता’ से अलगाने की दिशा में चलाये जा रहे हैं। चूंकि नयी कविता एक नाम है, इसलिए हम समकालीन कविता को एक बदला हुआ नाम देना चाहते हैं। वैसे हमारी पहचान के लिए यह कुछ दूर तक आवश्यक भी है: मगर नाम देकर अपने को बांधने वाली धारा निश्चित रूप से रचना की प्रक्रिया को महत्वहीन कर देती है। मेरा विचार है कि नामों की सीमा में पूरी समकालीन पीढ़ी की रचनादृष्टि को समझना सम्भव नहीं है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि नयी कविता का अतर्कित आस्था, तटस्थता और लघुमानवन पर फिदा पूर्ववर्ती पीढ़ी से समकालीन कवियों का असंवाद तथा घोर यंत्रणा की स्थितियों और नियामकतत्वों के प्रति घृणा और खुला विद्रोह समकालीन कविता का प्रमुख स्वर है।8 जबकि समकालीन कविता.....प्रगतिवादी जनवादी सृजना के ‘प्रतिरोध-नयी कविता’ के ‘प्रतिरोध’ की कविता न होकर निबन्ध के निषेध रूप जीवन संघष्र्ाी सकारात्मक सौन्दर्यबोधी रूपान्तरण की कविता है। 

सन्दर्भ -
  1. मुक्तिबोध, नयी कविता का आत्म संघर्ष तथा अन्य निबन्ध, पृ0 37
  2. माक्र्स : इकोनामिक एण्ड फिलासफिकल मेनुस्क्रिप्टस 1844
  3. विश्वम्बरनाथ उपाध्याय - समकालीन कविता की भूमिका, पृ0 3
  4. अशोक बाजपेयी, फिलहाल पृ0 194
  5. सुरेन्द्र चौधरी कल्पना, अंक 193, फरवरी 1968, पृ0 30
  6. जगदीश नारायण श्रीवास्तव, समकालीन कविता पर एक बहस, पृ0 21

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