योग दर्शन के प्रतिपादक कौन हैं ?

योग दर्शन के प्रतिपादक महर्षि पंतजलि माने जाते है। योगदर्शन और सांख्य दर्शन एक-दूसरे के पूरक कहे जाते हैं। योग दर्शन यदि प्रयोगात्मक है, तो सांख्य दर्शन सिद्धान्त परक है। पंतजलि ने सांख्य दर्शन के 25 तत्वों को मानकर अपने सिद्धांन्तों का प्रतिपादन किया है -

(अ) योग के आठ अंग -

(1) यम, (2) नियम (3) आसन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार (6) धारण (7) ध्यान (8) समाधि। योगदर्शन में कर्म की विस्तार के साथ व्याख्या की गई है। यम के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की गणना की जाती है। नियम में शैय, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणी धान का समावेश है। आसन और प्राणायाम का सम्बन्ध शरीर से है। प्रत्याहार और धारण इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करके चित्त को एकाग्र करने के साधन है। ध्यान में ध्येय वस्तु की ओर चित्त की निरन्तरता एवं अविरोधी प्रवाह आवश्यक है। समाधि योग का अन्तिम अंग हैं। इस अवस्था में ध्याता ध्यान और ध्येय तीनों एकाकार हो जाते है।

(ब) योग के अन्य प्रकार -

योग के आठ अंगों के अतिरिक्त उसके अन्य प्रकार भी है, जिनमें तन्त्र योग, हठ योग और राज योग प्रमुख हैं। इनमें राज-योग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। योगी अपनी साधना से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है, किन्तु योग का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है न कि सिद्धयों की उपलब्धि।

(स) ईश्वर

योग दर्शन में सांख्य के 25 तत्वों को स्वीकार करते हुए ईश्वर नामक छब्बीसवां तत्व भी माना है। इस दर्शन में ईश्वर को सर्वज्ञ माना गया है। ईश्वर सृष्टि का कत्र्ता नहीं है। वह विश्व पर अनुग्रह करते हुए सन्मार्ग दिखाने के लिये गुरू का कार्य करता है। ईश्वर अनादि काल से अनन्त काल तक प्रकृति के विकास की अध्यक्षता करता रहा है। ईश्वर सर्वदा सत्यगुण से संयुक्त होकर अपने कार्य करता है। ‘ओइम्‘ उस ईश्वर का प्रतीक हे। आगे चलकर योग दर्शन में ईश्वर की प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हो गई और उसको पुरूष से अभिनय करने का प्रयत्न किया गया। पुरूष प्रकृति से मुक्त होकर ही ईश्वर के साथ को प्राप्त कर सकता है।

(द) मोक्ष अथवा निर्वाण

योग ऊँ पद्धति से सम्यक् दर्शन के द्वारा पुरूष के लिये प्रकृति के पास से मुक्ति प्राप्त करने की योजना पाई जाती है। मोक्ष के लिए पुरूष को प्रकृति का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। वास्तव में पुरूष प्रकृति चित्त तत्व से मुक्ति पानी है। चित्त से मुक्ति प्राप्त करने के हेतु अष्टांगिक योग की प्रतिष्ठा की गई। चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है। चित्त के माध्यम से ही पुरूष पर विश्व का प्रभाव पड़ता है। यदि योग के माध्यम से चित्त को अपने काम से पृथक् कर दिया तो पुरूष के लिये इस विश्व का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता है।

येाग की मुक्ति का नाम कैवल्य हैं , कैवल्य के द्वारा पुरूष अमरत्व को प्राप्त होता है। वह प्रकृति के पास से मुक्त हो जाता है। अविधा पुरूष को बन्धन में डालती है। विवेक प्राप्त होने पर अनायास ही शरीर और चित्त से पुरूष की मुक्ति हो जाती है। समाधि की अवस्था में पहुंचा हुआ योगी अपने कर्मों की निर्जरा करना प्रारम्भ प्राप्त कर देता है क्योंकि इसके बिना पुरूष आवागमन के बन्धन से नहीं छूटता।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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