वल्लभाचार्य की रचनाएं

वल्लभाचार्य

विक्रम की 13वीं शताब्दी में विष्णुस्वामी सम्प्रदाय की उच्छिन्न गद्दी पर श्री वल्लाभाचार्य जी बैठे और उन्होंने श्री विष्णुस्वामी के सिद्धान्तों से प्रेरणा लेकर शुद्धाद्वैत सिद्धान्त तथा भगवद् अनुग्रह अथवा पुष्टि द्वारा प्राप्त प्रेम भक्ति के मार्ग की स्थापना की। हिन्दी ब्रज भाषा के अष्टछाप कवि इसी सम्प्रदाय के भक्त थे। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट जो कि तैलंग ब्राह्मण व परम कृष्ण भक्त थे। वल्लभाचार्य का जन्म संवत 1535 वि. के वैशाख मास में हुआ। 13 वर्ष की अवस्था तक वेद, वेदांग, पुराण आदि ग्रन्थ इन्होंने पढ़ लिये ।

वल्लभाचार्य श्री ने सम्पूर्ण भारतवर्ष के तीर्थ तथा मुख्य-मुख्य स्थानों की कई बार यात्रायें की थी। ये यात्रायें वल्लभ सम्प्रदाय में आचार्य श्री जी 'पृथ्वी- प्रदक्षिणायें' कहलाती हैं।

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महाराष्ट्र के पण्ढ़रपुड में श्री विट्ठल मूर्ति के भव्य दर्शनों से ये बहुत प्रभावित हुये। ये देश घूम-घूम कर वैष्णव भक्ति का उपदेश देते रहे। यात्रा करते हुये इन्हें ब्रज और श्रीनाथ जी की सेवा प्रेरणा हुई और वैशाख शुक्ल तृतीया संवत् 1556 वि0 को गोवर्धन में श्री नाथ जी के बड़े मंदिर की नींव डाली। इन्होंने अपने कई शिष्यों को कृष्ण स्वरूप सेवा के लिये दिये जिनमें ये हैं – गोकुल के नारायण ब्रह्मचारी को श्री गोकुलचन्द्रमाजी, गज्जन धावन को नवनीत प्रियजी, दामोदर सेठ को श्री द्वारिका नाथ जी और पद्मनामदास को श्री मथुरेश जी। इन्होंने प्रयाग के पास अलर्कपुर (अड़ैल) को अपना निवास स्थान बनाया।

यहाँ संवत् 1567 वि. आश्विन कृष्ण द्वादशी को बड़े पुत्र श्री गोपीनाथ एवं संवत् 1572 में द्वितीय पुत्र विट्ठल नाथ जी का जन्म हुआ। श्री वल्लभाचार्य जी ने कई भक्तों के घर कृष्ण के स्वरूप स्थापित किये थे। इन भक्तों ने आचार्य के अंतिम काल में ये कृष्ण मूर्तियाँ श्री वल्लभाचार्य जी के पास अड़ैल पहुँचा दिया था जिनमें पाँच प्रमुख स्वरूप हैं श्रीनवीनीत प्रिय जी, श्री मदन मोहन जी, श्री विट्ठलनाथ जी, श्री द्वारिकानाथ जी एवं श्री गोकुल नाथ जी। संवत् 1587 में आचार्य जी का गोलोक वास हुआ। -

श्री वल्लभाचार्य के गोलोक वास होने पर इनके बड़े पुत्र गोपीनाथ आचार्य ने वैष्णव धर्म का प्रचार गुजरात तक किया इनके एक पुत्र हुये। श्री पुरूषोत्तमदास ब्रज जिनका देहान्त इनके जीवन काल में हो गया था। 1595 में वि. सं. को इनका भी देहान्त हो गया।

इसके बाद श्री वल्लभाचार्य के द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी इनके दो विवाह हुये प्रथम रूक्मिणी जिनसे छः पुत्र क्रमशः श्री गिरीधर जी, गोविन्द राय जी, बालकृष्ण जी, गोकुलनाथ जी, रघुनाथ जी, यदुनाथ जी एवं द्वितीय पत्नी से श्री घनश्याम जी हुये । लगभग संवत 1623 वि. को विट्ठलनाथ जी ने अड़ैल छोड़कर 1628 में ब्रज के गोकुल में निवास स्थान बनाया। श्री वल्लभाचार्य के कृष्णसेव्यरूपों की सेवा करने लगे।

श्री विट्ठलनाथ जी के 252 वैष्णव भक्त बहुत प्रसिद्ध हुये जो कि आचार्य के शिष्यों की तरह भाषा के उच्च कोटि के कवि व गवैये हुये। उन्होने चार सर्वश्रेष्ठ भक्त कवि अपने तथा चार अपने पिता के मिलाकर अष्टछाप भक्त कवियों की स्थापना की। इनका सम्बन्ध अकबर बीरबल व राजा मान सिंह से था जो कि इनका बहुत सम्मान करते थे। वार्ता साहित्य से पता चलता है कि बीकानेर के राजा पृथ्वी सिंह, राजा आशुकरण, रानी दुर्गावती आदि कई राजा भी इनके शिष्य थे। इन्होंने शुद्धाद्वैत सिद्धान्त तथा भक्ति मार्ग पर अनेक ग्रन्थ रचना की। इन्होंने चौरासी ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों में शंकर वेदान्त के मायावाद का खण्डन, अपने मत ब्रह्मवाद, अविकृत परिणामवाद तथा शुद्धादैतवाद का प्रतिपादन तथा प्रेम भक्ति के सिद्धान्तों का कथन हैं एवं भक्ति - मुक्ति का अनिवार्य साधन हैं। इनकी 10 सभी रचना संस्कृत में हैं । "

वल्लभाचार्य की रचनाएं

  1. तत्वद्वीप निबन्ध— 3 भाग, शास्त्रार्थ प्रकरण, सर्व निर्णय, प्रकरण एवं भागवतार्थ प्रकरण।
  2. पूर्व मीमांसा भाष्य अथवा जैमिनी सूत्र भाष्य।
  3. प्रकरणनि– अप्राप्य
  4. भागवत टीका - प्रथम अध्याय प्राप्त
  5. अणु भाष्य
  6. सुबोधिनी
  7. षोडश ग्रन्थ– यमुनाष्टक, बाल बोधक, सिद्धान्त मुक्तावली, पुष्टि-प्रवाह– मर्यादा-भेद, नवरत्न, सिद्धान्त रहस्य, अन्तःकरण प्रबोध, विवेक धैयाश्रिय, कृष्णाश्रय, चतुःश्लोकी, भक्ति वर्धिनी, जलभेद, पञ्च पद्य, सन्यास निर्णय, निरोध लक्षण, सेवा फल।
  8. पत्रावलम्बन
  9. प्रेमावृत
  10. शिक्षा श्लोक, 5 श्लोक
  11. मधुराष्टक
  12. न्यासादेश
  13. पुरूषोत्तम सहस्त्रनाम
  14. त्रिविध नामावली
  15. सेवाफल विवरण |
श्री वल्लभाचार्य श्री के शुद्धाद्वैत वेदान्तवाद तथा पुष्टि भक्ति मार्ग का प्रचार ब्रज मण्डल, राजस्थल तथा गुजरात में सबसे ज्यादा हुआ है

श्री विट्ठलनाथ जी कृत रचना

विद्व–मण्डन, निबन्ध प्रकाश टीका, अनुभाष्य का अन्तिम डेढ़ अध्याय, सुबोधिनी पर टिप्पणी, भक्ति हंस, भक्ति हेतु, भक्ति निर्णय, षोड़श ग्रन्थ पर टीका, विज्ञप्ति, श्रृंगार रस मण्डन, निर्णय ग्रन्थ एवं स्फुट स्त्रोत्रादि तथा टीकायें ।

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