वल्लभाचार्य का जीवन परिचय

वल्लभाचार्य का जीवन परिचय

मध्ययुगीन जनमानस की वीणा पर कृष्ण भक्ति की जो रागिनी अवतरित हुई, वल्लभाचार्य उसके अमर गायकों में से हैं। वल्लभाचार्य भक्ति सम्प्रदाय के आचार्यों में अंतिम प्रमुख आचार्य है । वल्लभाचार्य ने भक्ति के शास्त्रप्रतिपादित रुप को ही अधिक महत्व दिया। उत्तर भारत में कृष्ण भक्ति के दृढ़ीकरण में आचार्य वल्लभ का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उन्होंने भगवदनुग्रह पर आधारित एक भक्ति सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन किया जो पुष्टिमार्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस मार्ग के अर्न्तगत उन्होंने भक्ति का शास्त्रीय विवेचन किया तथा स्वमतानुसार विधि-विधान सहित पूजा की प्रणाली भी निश्चित की। इस सम्प्रदाय का एक पुष्ट दार्शनिक आधार भी वल्लभाचार्य ने प्रस्तुत किया । वल्लभ का व्यक्तित्व भारत के धार्मिक - दार्शनिक क्षेत्र का एक अत्यन्त संशक्त व्यक्तित्व है। वे आचार्य भी है और भक्त भी । '

15वीं - 16वीं शती में भारत की जैसी शोचनीय राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक दशा थी, उसमें वल्लभाचार्य का आविर्भाव अत्यन्त महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना थी । अन्य धार्मिक विभूतियों की भाँति श्री वल्लभाचार्य के साथ भी अनेक चमत्कार - गाथाएँ जुड़ी है। 

यह भी पढ़ें: वल्लभ संप्रदाय के संस्थापक कौन है?

वल्लभाचार्य का जीवन परिचय

वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई0 में हुआ था। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम यल्लमगरु था । लक्ष्मण भट्ट स्वयं विद्वान थे। इनकी जन्मभूमि मध्यप्रदेश के रायपुर के पास चम्पारण्य नामक ग्राम में थी । यह परिवार पूर्ण सदाचारी, वैष्णवी दीक्षावाला, शुद्ध वेलनाट ( यावेलनाडू), यजुर्वेदी, तैत्तिरीय शाखा तथा भारद्वाज गोत्रीय था। सात वर्ष की अवस्था में वल्लभ की शिक्षा वाराणसी के प्रकाण्ड विद्वानों के नेतृत्व में प्रारम्भ हुई। थोड़े समय में चारों वेद, भारतीय दर्शन की सोलह विधियों के अतिरिक्त उन्होंने शकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य तथा निम्बार्क के दार्शनिक विचारों का अध्ययन किया । बाल्यावस्था में इनकी रुचि धर्म और दर्शन में थी । लक्ष्मण भट्ट अपने पुत्र को विद्वान बनाना चाहते थे । परन्तु उनकी आकस्मिक मृत्यु ने ग्यारह वर्षीय वल्लभ के लिए कठिनाईयाँ पैदा कर दी। परन्तु माँ ने पुत्र की शिक्षा में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने दी ।'

वल्लभाचार्य की रुचि भ्रमण में थी । वे दक्षिण भारत में विजयनगर गये । वहाँ पर कृष्णदेव राय ने धार्मिक चर्चा के लिए आमंत्रित किया । धार्मिक चर्चा में इन्होंने शकराचार्यों के शिष्यों को परास्त किया। कृष्णदेव राय ने वल्लभाचार्य को 'आचार्यश्री' की उपाधि से विभूषित किया । इन्होंने कई जगहों का भ्रमण करने के बाद इन्होंने वाराणसी में अपना शेष जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया । वाराणसी में पीड़ितों के उग्र विरोध के कारण उन्होंने प्रयाग में गंगा-जमुना के संगम के समीप अरैल नामक स्थान पर रहने का निश्चय किया। अरैल में रहकर इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। शुद्धाद्वैत दर्शन के मानक ग्रंथ 'अणुभाष्य' की रचना भी यहाँ हुई।

मध्ययुगीन अन्य समाज सुधारकों की भाँति बल्लभाचार्य ने जाति प्रथा का विरोध किया। बल्लभाचार्य की दृष्टि में शुद्र निम्न नहीं है, अन्य वर्गों की सेवा करके वे ईश्वर की सेवा करते थे। वे धर्म तथा संस्कृति के माध्यम से हिन्दू - मुसलमानों के बीच सामजस्य चाहते थे। इनका द्वार शुद्रों, अछूतों तथा मुसलमानों के लिए सदैव खुला रहता था । '

कृष्ण भक्ति के प्रचार और प्रसार के लिए उन्होंने जीवन भर यत्न किये। 18 वर्षों का समय लगाकर उन्होंने भारतवर्ष की जो तीन परिक्रमाएँ की, उनका एकमात्र उद्देश्य कृष्ण भक्ति का प्रचार ही था । इस उद्देश्य में उन्हें पूरी सफलता भी मिली। उन्होंने स्थान-स्थान पर श्रीमद्भागवत का पाठ किया, जनता को कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया और देवालय स्थापित किये। उनके प्रयत्नों से लोग कृष्ण भक्ति की ओर विशेष रुप से आकृष्ट हुए । व्रजक्षेत्र जो निम्बार्क और माध्व सम्प्रदायों के प्रभाव से कृष्ण भक्ति की स्थिति पर्याप्त सम्पन्न थी, किन्तु दक्षिणांचल, काठियावाड़ (गुजरात) तथा मारवाड़ आदि प्रदेशों में कृष्णोपासना के प्रति जनता की आस्था और श्रद्धाभाव जगाने का श्रेय आचार्य वल्लभ को है ।'

वल्लभाचार्य ने प्रभूत मात्रा में ग्रंथ की रचना की। उनकी रचनाएँ संस्कृत में ही है। भाषा में उन्होंने काव्य रचना नहीं की किन्तु अपने शिष्यों को उन्होंने भाषा में रचना करने की आज्ञा दी। उनके सम्प्रदाय के शिष्यों ने संस्कृत और भाषा दोनों में ही रचनाएँ की । प्रायः सिद्धान्त सम्बंधी ग्रंथ संस्कृत में तथा भक्तिपरक रचनाएँ ब्रज भाषा में की गई है। स्वयं भाषा में रचना न करते हुए श्री वल्लभाचार्य ने अपेन शिष्यों को ब्रज भाषा में रचना करने की प्रेरणा दी । अष्टछाप के कवि इसका प्रमाण है। इन कवियों के साहित्य ने कृष्ण भक्ति की लोकप्रियता भक्ति के इतिहास में अन्यतम है । अष्टछाप के कवियों में सूरदास, कुम्भनदास, कष्णदास तथा परमानन्ददास वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे तथा नन्ददास, चतुर्भुजदास, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, श्रीविट्ठलनाथ के शिष्य थे । इन्हें 'अष्टछाप' का नाम भी श्रीविट्ठल ने दिया था । वल्लभाचार्य के शिष्यों में सूरदास कृष्ण लीला के अन्यतम गायक है ।

Post a Comment

Previous Post Next Post