बाल अपराध की परिभाषा, विशेषताएं, कारण एवं प्रकार

अनुक्रम
अपराध की तरह बाल अपराध भी एक गंभीर समस्या है। जिस तरह अपराध सार्वभौमिक है उसी तरह बाल अपराध भी सार्वभौमिक है। यह एक ऐसी समस्या है जो मूलत: पारिवारिक एवं सामुदायिक विघटन की देन है। बाल अपराध सामान्य लक्षणों की तरह अपराध की ही भाँति है। यह भी समाज विरोधी कार्य और इसमें भी कानूनों का उल्लंघन होता है।

साधारणतया बालक का अपराध बाल अपराध कहा जाता है। अर्थात् एक निश्चित आयु से कम आयु के बच्चों का अपराधपूर्ण कार्य बाल अपराध समझा जाता है। किन्तु प्रश्न उठता है कि बालक किसे कहा जाए? इसके लिए कम या अधिकतम आयु सीमा क्या है? इस संबंध में यह लिखना अनुचित नही प्रतीत होता है कि विभिन्न राज्यों या राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न आयु के बच्चे को बाल अपराध माना गया है। उदाहरण स्परूप भारतवर्ष में किसी बच्चे को बाल अपराधी घोषित करने की निम्नतम उम्र 14 वर्ष तथा अधिकतम आयु 18 वर्ष है। इसी तरह मिश्र में यह आयु क्रमश: 7 वर्ष से 15 वर्ष, ब्रिटेन में 11 से 16 वर्ष तथा ईरान में 11 से 18 वर्ष है। अत: बाल अपराधियों के निम्नतम तथा अधिकतम आयु के संबंध में कोई सार्वभौमिक धारणा प्रचालित नही हैं। इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि एक निश्चित आयु तक के बालको के अपराध को बाल अपराध कहा जाता है।

बाल अपराध की परिभाषा

  1. सिरिल बर्ट के अनुसार - ‘‘तकनीकी दृष्टि से एक बालक को उस समय अपराधी माना जाता है जब उसकी समाज विरोधी प्रवृत्तियाँ इतनी गम्भीर हो जाएं कि उसके विरूद्ध शासन वैधानिक कार्यवाही करें या कार्यवाही कराना आवश्यक हो जाए।’’
  2. मार्टिन न्यूमेयर के अनसुार- ‘‘एक बालक अपराधी निर्धारित आयु से कम आयु का वह व्यक्ति है जो समाज विरोधी कार्य करने का दोषी है और जिसका दुराचार कानून का उल्लघंन है।’’
  3. एच. एच. लाऊ के अनुसार- ‘‘बाल अपराध किसी ऐसे बालक द्वारा किया गया विधि विरोधी कार्य है जिसकी अवस्था कानून में बाल अवस्था की सीमा में रखी गयी है और जिसके लिए कानूनी कार्यवाही तथा दंड व्यवस्था से भिन्न है।’’
  4. सोल रूविन ने बाल अपराध के कानूनी अर्थ को एक पंक्ति में व्यक्त करते हुए लिखा है कि:- ‘‘कानून जिस कार्य को बाल अपराध मानता है वही बाल अपराध है।’’ 
  5. मावरर ने बाल अपराध की परिभाषा इस प्रकार दी है- ‘‘वह व्यक्ति जो जान बूझकर इरादे के साथ तथा समझते हुए उस समाज की रूढ़ियों की उपेक्षा करता है जिससे उसका संबंध है।’’

बाल अपराधी के लक्षण

बाल अपराधियों के कुछ सामान्य लक्षण -
  1. बाल अपराधी की शारीरिक संरचना सामान्य गठीला शरीर शक्तिशाली तथा निडर होते है।
  2. वे स्वभाव से बेचैन उग्र बहिर्मुखी तथा विघटनकारी होते है।
  3. इनका व्यक्तित्व अनैतिक अत्यधिक संवेगशील, स्वार्थी तथा आत्मकेन्द्रित होते है।
  4. अदूरदश्री तथा अपराध के परिणाम से अनभिज्ञ रहते हैं।
  5. बाल अपराधी प्राय: सामान्य बालकों की अपेक्षा मनोस्नायु विकृति से पीड़ित होते है।
  6. बाल अपराधियों में इदम् (id) अहम् (ego) तथा पराहम् (super ego) में समुचित संतुलन का अभाव होता है।
  7. ये प्राय: विषादग्रस्त निराश हताश और गुमसुम दिखाई देते हैं।
  8. ये शासन सत्ता के विरोधी नियम कानून का उल्लंघन करने वाले तथा अविश्वासी प्रवृत्ति के होते है।
  9. ये अपनी किसी समस्या को सुलझाने के लिए सुनियोजित रूप से किसी कार्ययोजना का पूर्व निर्धारण नहीं करते हैं।

बाल अपराधी की विशेषताएं

संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क शहर के बाल न्यायालय अधिनियम में बाल अपराध की व्यावहारिक विशेषताओ का उल्लेख इस प्रकार किया गया है -
  1. बाल अपराधी आदतन उद्दण्ड तथा आज्ञाओं का उल्लंघन करने वाले होते है
  2. यह प्राय: राजकीय नियमों एवं कानूनो का उल्लंघन करते है।
  3. इनकी संगीत आवारा, अनैतिक एवं चरित्रहीन व्यक्तियों के साथ होती है।
  4. इनका व्यवहार अनैतिक एवं अशोभनीय है।
  5. यह बिना आज्ञा के निरूद्देश्य देर रात तक घर से बाहर घूमते रहते हैं।
  6. कानूनी रूप से निषद्ध स्थानो पर धूमने अवश्य जाते हैं।
  7. ऐसे बालक स्टेशनों मेलों एवं तीर्थस्थानों पर भीख मांगते हुए प्राय: दिखाई पडते है।
  8. ये तस्करी आदि गैर कानूनी धंधो में लिप्त रहते है।
  9. इनमें स्कूल एवं घर से भागने की आदत होती है।
  10. ऐसे बालक समाज में सम्मानित पाने के बड़े उत्सुक रहते है। समाज में अपना स्थान पाने के लिए नीच से नीच कार्यकरने से नही चूकतें।

बाल अपराध के प्रकार

हावर्ड बेकर (1966: 226-38) ने बाल अपराध के चार प्रकारो का उल्लेख किया है -
  1. व्यक्तिगत बाल अपराध - यह उस अपराध की ओर संकेत करता है जिसमें अपराध कार्य करने में केवल एक बालक ही लिप्त होता है और उसका कारण उस बाल अपराधी के अन्तर होता है। इस अपराधिक व्यवहार की मनोचिकित्सकों ने अधिकांश व्याख्याऐं दी है। उनका तर्क है कि बाल अपराध मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण होता है जो मुख्य रूप से दोषपूर्ण अनुचित रोगात्मक परिवारिक अन्त: क्रिया के संरूपो से उत्पन्न होती है।
  2. समूह द्वारा समर्थित बाल अपराध - इस प्रकार के अपराध दूसरों की संगति में किये जाते है और इसका कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व में स्थित नहीं होता और न ही अपराधी के परिवार में, अपितु व्यक्ति और पड़ोस की संस्कृति में होता है।
  3. संगठित बाल के अपराध - यह बाल अपराध उन बाल अपराधों का उल्लेख करता है जो औपचारिक रूप से संगठित गुटों को विकसित करके किये जाते है। इन बाल अपराधों का विश्लेषण अमरीका में 1950 के दशक में किया गया और अपराधी उप संस्कृति की अवधारणा को विकसित किया गया। यह अवधारणा उन मूल्यों और प्रतिमानों का उल्लेख करती है जो कि गुट के सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करते है अपराध करने को प्रोत्साहित करते है ऐसे कार्यो के आधार पर प्रतिष्ठा प्रदान करते है और उन लोगो से विशिष्ट संबंधो का उल्लेख करते है जो उन समूहीकरण के बाहर होते है जो समूह के प्रतिमानो से प्रभावित होते है कोहिन वह पहला व्यक्ति था जिसने इस प्रकार के अपराध का उल्लेख किया
  4. परिस्थितिवश बाल अपराध - परिस्थितिवश अपराध एक भिन्न परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है यहां यह मान्यता है कि अपराध की जडें गहरी नही होती और अपराध के लिए प्रेरणाऐं और उसे नियंत्रित करने के साधन बहुधा अपेक्षाकृत सरल होते है। एक युवा व्यक्ति अपराधिक कार्य अपराध के प्रति गहरी वचनबद्धता के बिना करता है क्योंकि उसमें मनोवेग निंयत्रण कम विकसित होता है और या पारिवारिक नियंत्रण कम सुदृढ होते है और क्योंकि पकडें जाने पर भी उसके पास खाने के लिए अपेक्षाकृत बहुत कम होता है।

बाल अपराध के कारण

यहां पर किशोरापराध के कारणो को तीन वर्गो में विभाजित कर उनका अध्ययन किया गया है- 1. सामाजिक कारण 2. मनोवैज्ञानिक कारण तथा 3. आर्थिक कारण।

सामाजिक कारण 

किशोरापराध के कारणों मे से सबसे अधिक व्यापक सामाजिक कारण है। इनमें मुख्य कारण है:- 1. परिवार 2. विद्यालय 3. बुरी संगती 4. मनोरंजन 5. युद्ध 6. स्थानान्तरण 7. सामाजिक विघटन
  1. परिवार:- किशोरापराध के कारणो में इलियट व मैरिल ने दूषित पारिवारक प्रभाव को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना है। हीली व ब्रोनर ने शिकागों तथा बोस्टन के 4000 किशोरोपराधियों में 50 प्रतिशत विश्रंृखलित घरों में आये हुए किशोरो को पाया। परिवार के संबंध में मुख्य परिस्थितियां है- (क) मग्न परिवार (ख) माता-पिता का रूख (ग) अपराधी भाई बहनों का प्रभाव (घ) माता पिता का चरित्र व आचार।
  2. विद्यालय- परिवार के बाद बालक के व्यक्तित्व पर उसके स्कुल का प्रभाव पडता है। स्कूल से भाग जाना एक मुख्य किशोरापराध है। विलियमसन ने 1947 में अपने अध्ययन में यह देखा कि किशोरापराध में स्कूल से भागना, चोरियां तथा यौन अपराध सबसे मुख्य थे और इसमें भी स्कूल छोड कर भाग जाना और स्कूल के बाहर शहर में घूमना फिरना सबसे अधिक पाये गये। विलियमसन ने स्कूल से भागने के मुख्य कारण माता-पिता द्वारा उपेक्षा अपराधियों के गिरोह में शामिल होना अध्यापक द्वारा दण्ड विषय में कमजोरी तथा शिक्षा स्तर योग्यता से अधिक होना जाये है।
  3. अपराधी क्षेत्र- क्लिफोर्ड शॉ और मैक्के के अध्ययन के अनुसार कुछ क्षेत्र बालकों के स्वस्थ विकास के लिए उपयुक्त नही होते। यह एक सामान्य बात है कि पड़ोस और मुहल्लों का बालकों पर बड़ा उसर पडता है। सांख्यिकीय विधि का प्रयोग करके मालर ने यह निष्कर्ष निकाला है न्यूयार्क शहर में किशोरापराधी उस क्षेत्र में अधिक होते थे। मनोरंजन का कोई साधन नही था बस्ती अस्थिर थी। अस्थिर बस्तियों में कोई स्थायी सामाजिक नियम नहीं होता। उदाहरण के लिए धर्मशालाओं, सरायों तथा होटलों के आस-पास पाकिटमार अधिक पाये जाते है क्योंकि वहां आने जाने वाले का सिलसिला बराबर लगा रहता है क्लिफोर्ड शॉ और मैक्के ने लगभग 15 शहरों में किशोरापराध का अध्ययन करके यह देखा कि अपराध की दरें नगर के केन्द्रीय भाग में सबसे अधिक और आखिरी छोर पर सबसे कम थी।
  4. बुरी संगति- प्रमुख अपराधशास्त्री ए. एच. सदरलैण्ड के अनुसार अपराधी व्यवहार दूसरे व्यक्ति से अन्त: क्रिया के द्वारा सीखे जाते है। सदरलैण्ड के शब्दों में ‘कानून के उल्लंघन करने में सहायक परिभाषाओं की उपेक्षा अधिकता हो जाने के कारण एक व्यक्ति अपराधी हो जाता है।’ बालकों में किसी को बुरी और किसी को अच्छी संगती मिलती है। मनुष्य के व्यहवार पर उसके साथियों का काफी असर पडता है।
  5. मनोरंजन - बालकों के विकास के लिए मनोरंजन के साधनों का भी बडा महत्व है। स्कुल के बाद शेष समय में स्वस्थ क्रियाऐं करने की प्रेरणा उन्हे अच्छे वातावरण में ही मिल सकती है। खाली समय का सदुपयोग न होना भी अपराधी व्यवहार को प्रेरित करता है। बालकों के समाजीकरण और नैतिक प्रशिक्षण में खेल कूद प्रमुख तत्व है। अपर्याप्त और अनियंत्रित मनोरंजन नगर में किशोरापराध का महत्वपूर्ण कारण है। थस्र्टन के एक अध्ययन में 2507 किशोरोपराधियों के खाली समय का दुरूपयोग हुआ था।
  6. युद्ध- युद्धकाल और युद्धोतर काल में किशोरपराध की दरें बढी़ पायी गयी। युद्ध में सम्मिलित होने वाले देशों के बालकों की स्कूल की पढाई में बहुत सी बाधांए पडती है। अत: बच्चे की देखभाल ठीक से नहीं हो पाती। नियंत्रण के अभाव के कारण लडकें-लड़कियों को मिलने जुलने की बहुत स्वतंत्रता होती है जिसके कारण यौन अपराध बढतें है।
  7. स्थानान्तरण- स्थानान्तरण का भी किशोरापराध पर बुरा प्रभाव पडता है। स्टुअर्ट ने बर्कले नगर के अध्ययन देखा है कि किशोरापराधी ऐसे स्थान में अधिक रहते थे जहां स्थानातरण अधिक था किंतु अपने परिवार की अपेक्षा वे स्वंय बहुत कम गतिशील होते थें।
  8. सामाजिक विघटन- सामाजिक विघटन में व्यक्ति का विघटन होता है। समाज के विघटित होने पर अपराधियों की संख्या बढ जाती है। अत: सामाजिक विघटन भी किशोरापराध का एक कारण है। आधुनिक औद्योगिक समाज में समन्वय और समानता का बडा अभाव होता है इससे तनाव बढता है और युवक युवतियों अपराध की ओर बढाते है।

मनोवैज्ञानिक कारण

अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों में मुख्य कारण है:- 1. मानसिक रोग 2. बौद्धिक दुर्बलता 3. व्यक्तित्व के लक्षण एवं 4. संवेगात्मक अस्थिरता
  1. मानसिक रोग- कुछ अपराधशास्त्रियों ने मानसिक रोग और अपराध में घनिष्ठ संबंध बताये है। किशोरापराधियों पर किये गये कुछ अध्ययनों में विभिन्न मानसिक रोग के रोगी पाये गये है और उनको दण्ड की नही बल्कि इलाज कार्य जरूरत है। कुछ मानसिक चिकित्सक साइकोपैथिक व्यक्तित्व को अपराध का कारण मानते है। साइकोपैथिक बालक ऐसे परिवार में पैदा होता है जहाँ प्रेम नियंत्रण व स्नेह का पूर्ण अभाव होता है।
  2. बौद्धिक दुर्बलता- बौद्धिक दुर्बलता को अपराध का कारण मानने वाले मत के मुख्य प्रवर्तक गौडार्ड थे। डाक्टर गोरिंग ने लोम्ब्रोसों के मत का खण्डन करके यह मत उपस्थित किया कि अपराध का कारण बुद्धि दोष है। गौडार्ड लिखते है कि अपराध का सबसे बडा एकमात्र कारण बौद्धिक दुर्बलता है।
  3. व्यक्तित्व के लक्षण- व्यक्तित्व के लक्षणों और अपराध की प्रवृत्ति में भी बहुत निकट संबंध पाया गया है। व्यक्तित्व व्यक्ति के परिवेश से अनुकूलन करने का ढंग है। अपराधी बालक इस अनुकूलन में अपराधी कार्यो का प्रयोग करते है। अत: जिनसे किशोरापराध के कारणों पर प्रकाश पड़ता है ग्ल्यूक ने अपनी पुस्तक में किशोरापराधियों में सामान्य बालक की अपेक्षा स्वच्छन्दता विद्रोह, सन्देहशीलता दूसरो को दु:ख देने में सुख लेना संवेगात्मक व सामाजिक असमंजस, हिंसात्मक प्रवृत्ति असंयम बहिर्मुखी स्वभाव आदि कही अधिक पायें।
  4. स्वेगात्मक अस्थिरता- इसी प्रकार संवेगात्मक अस्थिरता अपराध के मनोवैज्ञानिक कारणों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। प्रेम और सहानुभूति की कमी संवेगात्मक असुरक्षा, कठोर अनुशासन, हीनता तथा अपर्याप्ता की भावना और विद्रोह की प्रतिक्रिया बालकों के व्यक्तित्व को असन्तुलित बना देती है जिससे बालक को अपराधी व्यवहारी की प्रेरणा मिलती है।

आर्थिक कारण

आर्थिक कारण एवं बाल अपराधों के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में विद्वानों में मतभेद है जार्ज बोल्ड तथा हीली का मत है कि अधिकांश दशाओं में आर्थिक परिस्थितियाँ बाल-अपचार का कारण होती है जब कि मैरिल ने अपनी पुस्तक ‘दि प्राब्लम् ऑफ डेलिनक्वेन्सी’ में यह सिद्ध किया है कि अधिकांश बाल अपराधी मध्यम तथा उच्च वर्ग के होते हुए भी अपराधी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं परन्तु यदि भारतीय सन्दर्भों में देखा जाए तो आर्थिक दशा और बाल अपचार में घनिष्ठ सम्बन्ध है।
  1. निर्धनता- गरीबी सभी बुराईयों की जननी है। बाल अपचार का एक प्रमुख कारण गरीबी होती है। गरीबी के कारण माता पिता अपने बच्चों की आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते परिणाम स्वरूप बच्चे चोरी, पॉकेटमारी राहजनी और हेराफेरी आदि असामाजिक कार्य करने लगते है। रोडेस और सेलिन अपराध का कारण गरीबी मानते हैं निर्धनता के कारण बच्चों में भावना ग्रन्थियाँ बन जाती है उसका अचेतन मन उन सभी सुविधाओं को पाने के लिये उत्प्रेरित रहता है जिन्हें सम्पन्न परिवारों के बच्चे भोग रहे हैं इसके लिये वह अवैध तरीके अपनाता है। अपराधी गिरोहों में फंस जाता है और अपराधी कार्य करने लगता है। भारत सरकार द्वारा बाल अपराधियों पर एक सर्वे किया गया उससे ज्ञात हुआ कि 48 प्रतिशत बाल अपराधी ऐसे परिवारों के सदस्य थे जिनकी मासिक आय 250 रूपये से भी कम थी। बर्ट महोदय क मतानुसार आधे से अधिक बाल अपराधी निर्धन परिवारों से होते है।
  2. भुखमरी- निर्धनता के कारण लोग अपना भरण पोषण उचित ढंग से नही कर पाते अत: भुखमरी का सामना करना पडता है भूखा व्यक्ति कोई भी पाप कर सकता है ऐसी स्थिति में भ्ूाखे-नंगे बालक चोरी, लूट, पाकेटमारी आदि करते है। इस संबंध में डॉ. हेकरवाल (भ्ंपजीमतनंस) ने लिखा है ‘‘क्षुधा तथा भुखमरी अपराध के सरल तथा कुटिल मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करती है।’’
  3. बच्चो का नौकरी करना- निर्धनता के कारण परिवार के छोटे बालकों को अपनी उदरपूर्ति के लिए छोटे-मोटे कामधंधे करने पडते है। निर्धन परिवारों के बच्चे होटलों, सिनेमाघरो, दुकानों और धनी परिवारो में काम करते है फलस्वरूप उनमें हीन भावनायें और मानसिक तनाव उत्पन्न होता है ऐसी स्थिति में रहने वाले बालकों में नशाखोरी, धुम्रपान, जुआ, चोरी और वैश्यावृति की बुरी आदतें पड जाती है। बडे-बडें शहरों में जब इन बालकों का साथ पुराने नौकरों से हो जाता है तो वे नौकर उन्हें विभिन्न प्रकार के अपराधी कार्य करने को प्रोत्साहित करते है।
  4. पारिवारिक संघर्ष- अध्ययनों से ज्ञान हुआ है कि बाल अपचारियों का पारिवारिक जीवन संगठित और शक्तिपूर्ण नही रहता है। इस संबंध में स्लोवसन तथा सी. बर्ट का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जाता है उन्होंने अपने अध्ययन में देखा कि ऐसे परिवार में बाल अपराधियों का पालन-पोषण हुआ था जो तलाक, बंटवारा, परित्याग एवं माता-पिता की मृत्यु के फलस्वरूप दूषित हो गया था ऐसे परिवार में भी बाल अपराधी पाये जाते है जिनमें पति-पत्नी या परिवार के सदस्य आपस में झगड़ते रहते है। ऐसे परिवारों में बच्चों का संवेगात्मक संतुलन बिंगड जाता है और उनका सामाजिक विकास नही हो पाता।

बाल अपराध के रोकथाम के उपाय 

  1. समुचित पालन पोषण:- किशोर अपराध के निरोध का मूलमंत्र उन कारणो की रोकथाम है जिनसे बालक अपराधी बनते है विभिन्न अध्ययनों से यह देखा गया है कि अपराध की ओर जाने का मूल कारण बालक का समुचित पालन पोषण न होना है। अत: किशोरापराध को रोकने के लिए सबसे प्रथम परिवारों का पुनसर्ंगठन करना होगा माता या पिता बनने से पहले प्रत्येक स्त्री और पुरूष को बाल मनोविज्ञान तथा बालकों के पालन पोषण संबंधी बातों का ज्ञान होना आवश्यक है। बालक का पालन पोषण एक कला एवं विज्ञान है इस कला की आवश्यक शर्ता माता-पिता का चरित्र एवं व्यवहार तथा घर का वातावरण है आवश्यकता से अधिक लाड़ प्यार से बालक बिगड़ते जाते है। आवश्यकता से कम स्नेह तथ्ज्ञा प्रूापर पाने से उनका भावात्मक विकास नही हो पाता। अत: प्यार का बालक के जीवन में बडा महत्व है। मारपीट और अपमान बहुधा बालक को अपराध की राह पर ले जाता है। घर में वातावरण प्रेमपूर्ण होना चाहिए दूसरे बालक की जिज्ञासाओं के समाधान में बडी सावधानी की आवश्यकता है कोई बात पूछने पर बालक को झिझक दिया जाए या उससे झूठ बोल देने पर प्रभाव बडा बुरा पडता है। बहुधा बालको से यौन जिज्ञासाओं के विषय में झूठ बोल दिया जाता है बालक जब अपने साथियों या घर के नौकरों से सही बात का पा जाता है तब उन पर माता-पिता का झूठ खुला जाता है। बहुधा स्त्री पुरूष के परस्पर प्रेम व्यवहार के समय बालक के आ जान पर वे अपराधी की सी मुद्रा बना लेते है या बालको को फटकार देते है इससे बालक में अपराध ग्रंथी बन जाती है। आवश्यक यौन शिक्षा के अभाव में अनेक बालक-बालिकाऐं बाल अपराध की राह पर अग्रसर हो जाते है। माता-पिता बालक के सामने आदर्श होते है। उनके आपस में झगड़ों का और उनके चरित्र को ठीक रखने के विषय में बालक के प्रति जिम्मेदारी महसूस करनी चाहिए वास्तव में बालक को अपराध से बचाने का तरीका उसकी बुरी आदतों को रोकना नही बल्कि उसमें अच्छी आदतें डालना है।
  2. स्वस्थ मनोरंजन:- मनोरंजन का व्यक्ति के जीवन में बडा महत्वपूर्ण स्थान होता है स्वस्थ मनोरंजन के अभाव में बालक की अपराधी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। अत: अपराधों को रोकने के लिए स्वस्थ तथा सुसंस्कृत मनोरंजन की सामग्रियों का उपलब्ध होना अत्यंत आवश्यक है।
  3. समुचित शिक्षा:- परिवार के बाद बालक पर विद्यालय का प्रभाव पडता है अत: किशोर अपराध को रोकने के लिए बालक की समुचित शिक्षा का प्रबंध होना जरूरी है। समुचित शिक्षा में शिक्षक का व्यक्तित्व विद्यालय का पाठ्यक्रम, शिक्षा की विविधता और पाठ्यक्रम के अलावा कार्यक्रमों का बडा महत्व होता है। शिक्षकों को बाल मनोविज्ञान का विशेष ज्ञान होना चाहिए। ताकि वे अपने विषय को मनोरंजक ढंग से उपस्थिति कर सके और बालक में विषय के प्रति रूचि उत्पन्न कर सकें। शिक्षक का आचरण और व्यवहार बडा सुधरा हुआ होना चाहिए क्योंकि बालक को उसके उराहरण से शिक्षा देनी चाहिए बालक का अपमान बडा भी ही घातक सिद्ध होता है। शारीरिक दण्ड का यथासम्भव प्रयोग नही होना चाहिए। पढ़ने लिखने में कमजोर बालकों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि उनके अपराधी बनने की संभावना अधिक रहती है विद्यार्थियों को अपनी इच्छा अनुसार विषय चुनने तथा आपस के मामलों को स्वयं निपटाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। खेलकूद नाटक, वाद विवाद, स्काउटिंग तथा नाना प्रकार की प्रतयोगिताओं के द्वारा बालक की विभिन्न प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त होने का अवसर मिलने से उसकी अपराध की ओर जाने की संभावना कम हो जाती है सामान्य शिक्षा के साथ-साथ बालको को शारीरिक शिक्षा, औद्योगिक शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा की आवश्यकता है। स्कुल से भागना, अपराध की पहली सिढ़ी है स्कूल का वातावरण तथा शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि बालक विद्यालय से न भागें। 
  4. मनोवैज्ञानिक दोषो का उपचार:- मनोवैज्ञानिक दोष अपराध के महत्वपूर्ण कारण है अत: बालकों को अपराधों से रोकने के लिए उनके मनोवैज्ञानिक दोषो का उपचार अत्यंत आवश्यक है इसके लिए विद्यालयों में लगे हुए मनोवैज्ञानिक क्लिनिक होना चाहिए जो बालकों के विषय में उचित देखभाल कर सकें तथा परामर्श दे सकें।

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