योग का अर्थ, परिभाषा और प्रकार

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


योग शब्द का शाब्दिक अर्थ जोड़ना या मिलन कराना है । योग शब्द के इस अर्थ का भारतीय संस्कृति में बहुत अधिक प्रयोग किया गया है । जैसे गणित शास्त्र में दो या दो से अधिक संख्याओं के जोड़ का योग कहते है । चिकित्सा शास्त्र में विभिन्न औषधियों के मिश्रण को योग कहते है, ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की विभिन्न स्थितियों को योग कहते है । 

इस प्रकार से बहुत से अन्य क्षेत्रों में योग शब्द का विभिन्न अर्थों में प्रयोग किया गया है । किन्तु हम आध्यात्मिक क्षेत्रों में इस शब्द के अर्थ पर विचार करते है तो वहाँ उसका अर्थ अपने आप से युक्त होना अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिर हो जाना या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन योग कहा जाता है । 

योग दर्शन में कहा है - ‘‘तंद्रा द्रश्टु: स्वरूपेऽवस्थानम् ।’’ जब चित का क्लिश्ट और अक्लिश्ट उभय प्रकार की वृतियों का अभाव या निरोध हो जाता है तब दृश्टा-आत्मा का स्व स्वरुप यानि ब्रह्मस्वरुप में स्थित हो जाता है । 
योग शब्द को संस्कृत व्याकरण के ‘युज’ धातु से उत्पन्न हुआ मानते है । संस्कृत व्याकरण के पाणिनी के गण पाठ में युज धातु तीन प्रकार से प्रयोग में लायी गई है जो इस प्रकार है - ‘‘युज समाधौ’ - (दिवादिगणीय) ‘‘युजिर योगे’’ - (अधदिगणीय) ‘‘युज संयमने’ - (चुरादिगणीय) इनमें प्रथम धातु का अर्थ समाधि है, द्वितीय धातु का अर्थ मिलन या संयोग तथा तृतीय धातु का अर्थ संयम है । 

अधिकतर विद्वानों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में योग शब्द का अर्थ प्रथम ‘‘धातु’’ युज समाधौ से ही निश्पन्न हुआ माना है । महर्शि व्यास भी योग शब्द का अर्थ करते हुए कहा है कि समाधि को ही योग कहते है । ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के युजिर् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-’सम्मिलित होना’ या ‘एक होना’। इस एकीकरण का अर्थ जीवात्मा तथा परमात्मा का एकीकरण अथवा मनुष्य के व्यक्तित्व के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक पक्षों के एकीकरण से लिया जा सकता है। 

‘योग’ शब्द ‘युज’ धातु से बना है। संस्कृत व्याकरण में दो युज् धातुओं का उल्लेख है, जिनमें एक का अर्थ जोड़ना तथा दूसरे का मन: समाधि, अर्थात् मन की स्थिरता है। अर्थात् सामान्य रीति से योग का अर्थ सम्बन्ध करना तथा मानसिक स्थिरता करना है। इस प्रकार लक्ष्य तथा साधन के रूप में दोनों ही योग हैं। इस शब्द का उपयोग भारतीय योग दर्शन में दोनों अर्थों में हुआ है। योग शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न प्रकार से लिया गया है। 

‘पाणिनीयों धतु पाठ’ में योग का अर्थ- समाधि, संयोग एवं संयमन है। ‘अमर कोश’ में इसका अर्थ- कवच, साम-दाम आदि उपाय, ध्यान, संगति, युक्ति है।‘संस्कृत-हिन्दी कोश’ में इसका अर्थ- जोड़ना, मिलाना, मिलाप, संगम, मिश्रण, संपर्क, स्पर्श, संबंध है। ‘आकाशवाणी शब्द कोश’ में इसका अर्थ- जुआ, गुलामी, बोझ, दबाव, बन्धन, जोड़ना, नत्थी करना, बाँध देना, जकड़ देना, जोतना, जुआ डालना, गुलाम बनाना लिया गया है। 

‘मानक अंग्रेजी-हिन्दी कोश’ में योग का अर्थ- चिन्तन, आसन, बतलाया गया है। ‘शब्द कल्पद्रुम’ में योग का अर्थ- उपाय, ध्यान, संगति, है। ‘ए प्रक्टिकल वैदिक डिक्सनरी’ में योग शब्द का अर्थ- जोड़ना है। ‘उर्दू-हिन्दी शब्द कोश’ में योग शब्द का अर्थ- बैल की गर्दन पर रखा जाने वाला जुआ बतलाया गया है। ‘योग’ शब्द का सम्बन्ध ‘युग’ शब्द से भी है जिसका अर्थ ‘जोतना’ होता है, और जो अनेक स्थानों पर इसी अर्थ में वैदिक साहित्य में प्रयुक्त है। ‘युग’ शब्द प्राचीन आर्य-शब्दों का प्रतिनिधित्व करता है। यह जर्मन के जोक, (Jock) ऐंग्लो-सैक्सन (Anglo-Saxon) के गेओक (Geoc), इउक (Iuc), इओक (Ioc), लैटिन के इउगम (Iugum) तथा ग्रीक जुगोन (Zugon) की समकक्षता या समानार्थकता में देखा जा सकता है। गणितशास्त्र में दो या अधिक संख्याओं के जोड़ को योग कहा जाता है। 

पाणिनी ने ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘युजिर् योगे’ ,’युज समाधो’ तथा ‘युज् संयमने’ इन तीन धातुओ से मानी है। प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘योग’ शब्द का अनेक अर्थो में प्रयोग किया गया है।, जैसे - जोड़ना, मिलाना, मेल आदि। इसी आधार पर जीवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग की अवस्था को “समाधि” की संज्ञा दी जाती है जो कि जीवात्मा और परमात्मा की समता होती है। 

महर्षि पतंजलि ने योग शब्द को समाधि के अर्थ में प्रयुक्त किया है। व्यास जी ने ‘योग: समाधि:’ कहकर योग शब्द का अर्थ समाधि ही किया है। वाचस्पति का भी यही मत है। 

योग का अर्थ, परिभाषा और प्रकार

योग की परिभाषा 

योग की परिभाषा योग शब्द एक अति महत्त्वपूर्ण शब्द है जिसे अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है।

पातंजल योग दर्शन के अनुसार- योगष्चित्तवृत्ति निरोध: अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

महर्षि पतंजलि-‘योगष्चित्तवृत्तिनिरोध:’ यो.सू.1/2अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तात्पर्य, अन्त:करण से है। बाह्मकरण ज्ञानेन्द्रियां जब विषयों का ग्रहण करती है, मन उस ज्ञान को आत्मा तक पहुँचाता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है। बुद्धि व अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस सम्पूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिम्ब बनता है, वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। चित्त दर्पण के समान है। अत: विषय उसमें आकर प्रतिबिम्बत होता है अर्थात् चित्त विषयाकार हो जाता है। इस चित्त को विषयाकार होने से रोकना ही योग है। 

योग के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए महर्षि पतंजलि ने आगे कहा है-‘तदा द्रश्टु: स्वरूपेSवस्थानम्।। 1/3 अर्थात योग की स्थिति में साधक (पुरूष) की चित्तवृत्ति निरू़द्धकाल में कैवल्य अवस्था की भाँति चेतनमात्र (परमात्म ) स्वरूप रूप में स्थित होती है। इसीलिए यहाँ महर्षि पतंजलि ने योग को दो प्रकार से बताया है- 1. सम्प्रज्ञात योग 2.असम्प्रज्ञात योग सम्प्रज्ञात योग में तमोगुण गौणतम रूप से नाम रहता है। तथा पुरूष के चित्त में विवेक-ख्याति का अभ्यास रहता है। असम्प्रज्ञात योग में सत्त्व चित्त में बाहर से तीनों गुणों का परिणाम होना बन्द हो जाता है तथा पुरुष शुद्ध कैवल्य परमात्मस्वरूप में अवस्थित हो जाता है।

सांख्य दर्शन के अनुसार- पुरुशप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।

2. महर्षि याज्ञवल्क्य - ‘संयोग योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनो।’अर्थात जीवात्मा व परमात्मा के संयोग की अवस्था का नाम ही योग है। कठोशनिषद् में योग के विषय में कहा गया है-‘यदा पंचावतिश्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।बुद्धिष्च न विचेश्टति तामाहु: परमां गतिम्।।तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11 अर्थात् जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती है और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है, उस अवस्था को ‘परमगति’ कहते है। इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है, अर्थात् प्रमाद हीन हो जाता है। उसमें सुभ संस्कारो की उत्पत्ति और अषुभ संस्कारो का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग है।

3. मैत्रायण्युपनिषद् - एकत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च.।सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते।। 6/25 अर्थात प्राण, मन व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्रावस्था को प्राप्त कर लेना, बाह्म विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन आत्मा में लग जाना,प्राण का निष्चल हो जाना योग है।

4. योगषिखोपनिषद् - योSपानप्राणयोरैक्यं स्वरजोरेतसोस्तथा।सूर्याचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनो:।एवंतु़द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते।। 1/68-69 अर्थात् अपान और प्राण की एकता कर लेना, स्वरज रूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेत रूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्त करना, सूर्य अर्थात् पिंगला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करना तथा परमात्मा से जीवात्मा का मिलन योग है।
7. लिंड्ग पुराण के अनुसार - लिंग पुराण में महर्षि व्यास ने योग का लक्षण किया है कि -सर्वार्थ विषय प्राप्तिरात्मनो योग उच्यते।अर्थात् आत्मा को समस्त विषयों की प्राप्ति होना योग कहा जाता है। उक्त परिभाषा में भी पुराणकार का अभिप्राय योगसिद्ध का फल बताना ही है। समस्त विषयों को प्राप्त करने का सामथ्र्य योग की एक विभूति है। यह योग का लक्षण नहीं है। वृत्तिनिरोध के बिना यह सामर्थ्य प्राप्त नहीं हो सकता।

8. अग्नि पुराण के अनुसार - अग्नि पुराण में कहा गया है किआत्ममानसप्रत्यक्षा विशिष्टा या मनोगति:तस्या ब्रह्मणि संयोग योग इत्यभि धीयते।। अग्नि पुराण (379)25अर्थात् योग मन की एक विशिष्ठ अवस्था है जब मन मे आत्मा को और स्वंय मन को प्रत्यक्ष करने की योग्यता आ जाती है, तब उसका ब्रह्म के साथ संयोग हो जाता है। संयोग का अर्थ है कि ब्रह्म की समरूपता उसमे आ जाती है। यह कमरूपता की स्थिति की येग है। अग्निपुराण के इस योग लक्षण में पूवेक्ति याज्ञवल्क्य स्मृति के योग लक्षण से कोई भिन्नता नही है। मन का ब्रह्म के साथ संयोग वृत्तिनिरोध होने पर ही सम्भव है।

9. स्कन्द पुराण के अनुसार - स्कन्द पुराण भी उसी बात की पुष्टि कर रहा है जिसे अग्निपुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति कह रहे है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि-यव्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्म परमात्मनो:।सा नष्टसर्वसकल्प: समाधिरमिद्यीयते।।परमात्मात्मनोयोडयम विभाग: परन्तप।स एव तु परो योग: समासात्क थितस्तव।। यहां प्रथम “लोक में जीवात्मा और परमात्मा की समता को समाधि कहा गया है तथा दूसरे “लोक में परमात्मा और आत्मा की अभिन्नता को परम योग कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि समाधि ही योग है। वृत्तिनिरोध की ‘अवस्था में ही जीवात्मा और परमात्मा की यह समता और दोनो का अविभाग हो सकता है। यह वात नष्टसर्वसंकल्प: पद के द्वारा कही गयी है।

10. हठयोग प्रदीपिका के अनुसार - योग के विषय में हठयोग की मान्यता का विशेष महत्व है,वहां कहा गया है कि-सलिबे सैन्धवं यद्वत साम्यं भजति योगत:।तयात्ममनसोरैक्यं समाधिरभी घीयते।। (4/5) ह0 प्र0 अर्थात् जिस प्रकार नमक जल में मिलकर जल की समानता को प्राप्त हो जाता है ; उसी प्रकार जब मन वृत्तिशून्य होकर आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त कर लेता है तो मन की उस अवस्था का नाम समाधि है। यदि हम विचार करे तो यहां भी पूर्वोक्त परिभाषा से कोई अन्तर दृष्टिगत नही होता। आत्मा और मन की एकता भी समाधि का फल है। उसका लक्षण नही है। इसी प्रकार मन और आत्मा की एकता योग नही अपितु योग का फल है।

योग के उद्देश्य

  1. मानसिक शक्ति का विकास करना।
  2. रचनात्मकता का विकास करना।
  3. तनावों से मुक्ति पाना।
  4. प्रकृति विरोधी जीवनशैली में सुधार करना।
  5. वृहत-दृष्टिकोण का विकास करना।
  6. मानसिक शान्ति प्राप्त करना।
  7. उत्तम शारीरिक क्षमता का विकास करना।
  8. शारीरिक रोगों से मुक्ति पाना।
  9. मदिरापान तथा मादक द्रव्य व्यसन से मुक्ति पाना।
  10. मनुष्य का दिव्य रूपान्तरण।

योग के प्रकार

भारतीय योग शास्त्रियों ने योग को 8 प्रकार का बतलाया है-
  1. हठयोग
  2. लययोग
  3. राजयोग
  4. भक्तियोग
  5. ज्ञानयोग
  6. कर्मयोग
  7. जपयोग
  8. अष्टांगयोग

1. हठयोग -

प्राचीन समय में हठयोग में सिद्ध महात्मा घेरण्ड हुए हैं। इन्होंने अपने षिश्य चण्डकपालि को क्रियात्मक रुप से समझाने के लिए घेरण्ड संहिता नामक पुस्तक की रचना की जो आज भी उपलब्ध है। यह हठयोग का एक प्रमाणिक एवं सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें हठयोग के सात अंगों षट्कर्म आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि का विषद वर्णन है ।

हठयोग में विषेशत: शारीरिक क्रियाओं का समावेश है शरीर को शट्चक्र भेदन के लिए उपयुक्त करने के लिए गौरक्षनाथ जी ने कई मुद्राओं पर बल दिया है जैसे काकी मुद्रा (जिव्हा को कौऐ की चोंच के समान कर प्राणवायु पान करना) खेचरी मुद्रा (जीभ को जिव्हामूल की ओर पलटकर वायुपान करना) उसके पश्चात चौरासी आसनों का निष्पन्न करना। मूलबन्ध, उÏियान बन्ध जालन्धर बन्ध लगाना आदि ।

2. लययोग

योग के आचार्यों ने लय को भी ईश्वर प्राप्ति का एक साधन माना है इसका अर्थ है- ‘‘मन को आत्मा में लय कर देना, लीन कर देना।’’ ‘‘आनंद त: पष्यन्ति विद्वांसस्तेन लयेन पष्यन्ति।’’ ‘‘वे विद्वान पुरुष उसे आनन्द (आत्मा) स्वरुप देखते हुए उनमें लय हो जाते हैं और फिर उससे भिन्न उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई देता ‘‘ इस प्रकार ज्ञान द्वारा सत्य की खोज करते करते मनुष्य आत्मा तक पहुँच जाता है और वह देखता है कि केवल यह मेरा मन ही नहीं, सभी लोक लोकान्तर उसी में लीन हैं। यह आत्मा ही परमात्मा है दोनों में कोई भेद नहीं, यही लय योग है।

3. राजयोग

‘‘राजत्वात् सर्वयोगानां राजयोग इति स्मृत:’’ । स्मृतियों  में ऐसा कहा गया है कि सभी योग साधनों में श्रेष्ठ होने के कारण तथा सभी यागे प्रक्रियाओं का राजा हाने े के कारण इसे राजयोग कहा गया है।’’राजयोग का ध्यान ब्रह्म ध्यान, समाधि को निर्विकल्प समाधि तथा राजयोग में सिद्धमहात्मा, जीवनमुक्त कहलाता है राजयोग के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रमाणित ग्रन्थ महर्शिपतंजलि द्वारा रचित योगदर्शन है। ऐसा कहा जाता है कि चित्त की चंचलता को दूर कर, योग एवं सिद्धयोग का अवधारणात्मक पहलू मन को एकाग्र तथा बुद्धि को स्थिर करके जीवात्मा को परमात्मा में विलीन करने की जो साधना है वह स्वयं ब्रह्मा ने वेदों के द्वारा ऋशियों की बताई। 

कुछ योगषास्त्रों ने राजयोगको सोलह कलाओं से पूर्ण माना है अर्थात् 16 अंग माने हैं। सात ज्ञान की भूमिकाएं, दोप्रकार की धारणा - प्रकृति धारणा और ब्रह्मधारणा, तीन प्रकार का ध्यान - विराट ध्यान,ईष ध्यान और ब्रह्मध्यान, तथा चार प्रकार की समाधि - दो सविचार और दो निर्विचारअर्थात् वितर्कानुगत, विचारनुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत। इस क्रम से साधनाकरता हुआ राजयोगी अपने स्वरुप को प्राप्त करके इसी जीवन में मुक्त हो जाता है ।

4. भक्ति योग

निष्काम कर्म अर्थात कर्म करते हुए कर्मफलकी आकांक्षा नहीं रखते हैं। भक्ति मार्ग का पालन करने से साधक को ईश्वर की अनुभूतिस्वयं होने लगती है। गीता में कहा है- ‘‘पत्रं पुश्पं फलं तोयंयो में भक्तया प्रयच्छति ‘‘‘‘अर्थात पत्र, पुश्प, फल, जल इत्यादि को कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से अर्पण कर देता है उसे मैं अत्यन्त खुषी से स्वीकार करता हूँ।’’

5. ज्ञानयोग

संसार में ज्ञान से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं है। गीता-’’ नहि ज्ञानेन सदृषंपवित्रमिह विद्यते’’दो प्रकार का ज्ञान होते है - तार्किक ज्ञान- आध्यात्मिक ज्ञान-तार्किक ज्ञान को विज्ञान कहा जाता है यह वस्तु के आभास में सत्यता के निरुपद के लिए किया जाता है इसमें ज्ञाता और ज्ञेय का ज्ञान रहता है।-आध्यात्मिक ज्ञान को ‘‘ज्ञान’’ कहा जाता है इसमें ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है ऐसा व्यक्ति सब रूपों में ईश्वर देखता है।

6. कर्मयोग

यज्ञार्था कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:गीता-तक्ष्र्थ कर्म कौन्तेय मुक्तासंग: समाचार:।। योग एवं सिद्धयोग का अवधारणात्मक पहलू यह संसार कर्म की श्रृंखला से बंधा हुआ है इसलिए हे अर्जुन तू कर्म कर। स्वंययज्ञ की उत्पति कर्म से होती है खेतों में अन्न कर्म से ही पैदा होता है अर्जुन तू अनासक्तहोकर कर्म कर क्योंकि योगी लोग आत्म शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। प्रकृति के गुणों द्वारा विवश होकर हर एक को कर्म करने पड़ते हैं। कर्मों के फल से छुट्टी पाये बिना मुक्तिनहीं।

7. जप योग

जप एक दिव्य शक्ति का एक मंत्र या नाम है। स्वामी षिवानंद के अनुसार जप योग एक महत्वपूर्ण अंग है जप इस कलयुग व्यवहारमें अकेले शाश्वत शांति परमानंद व अमरता दे सकता है। जप अभ्यस्त हो जाना चाहिये और सात्विक भाव, पवित्रता, प्रेम और श्रद्धा के साथ लिया जाना चाहिये। जप योग से बड़ा कोई योग नहीं है। यह आपको सभी (जो आप चाहते हैं) सत् सिद्धी, भक्ति वमुिक्त प्रदान कर सकता है।

8. अष्टांग योग

महर्षि पतंजलि ने पातंजल योग दर्शन, “अथयोग अनुषासनम्ं” शब्द से प्रारम्भ कियाहै इससे स्पष्ट है कि उन्होंने जीवन के आदर्शों में अनुशासन को कितना महत्व दिया है। पंतजलि योग विकास, आठ क्रमों में होता है इसलिए इसे अष्टांग योग भी कहते हैं । अष्टांग योग के अंतर्गत आठ अंग बताये गये हैं।
  1. यम 
  2. नियम
  3. आसन 
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार 
  6. धारणा
  7. ध्यान 
  8. समाधि
उपरोक्त आठ अंगों का अभ्यास करने से पूर्व व्यक्तियों को षट्कर्म करना अतिआवश्यक होता है षट्कर्म निम्न प्रकार से बताये गये हैं -
  1. नेति 
  2. नौलि
  3. धौति 
  4. वस्ति
  5. कपाल भाति 
  6. त्राटक

योग के तत्व

योग के तत्व

योग का महत्व

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