योग का अर्थ, परिभाषा, महत्व और उद्देश्य

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ज्ञान का मूल वेदों में निहित है। दार्शनिक चिन्तन तथा वैदिक ज्ञान का निचोड आत्म तत्व की प्राप्ति है। आत्मतत्व की प्राप्ति का साधन योग विद्या के रूप में इनमें (वेद) उपलब्ध है। योगसाधना का लक्ष्य कैवल्य प्राप्ति है। वैदिक ग्रन्थ, उपनिषद्, पुराण और दर्शन आदि में यत्र-तत्र योग का वर्णन मिलता है। जिससे यह पुष्टि होती है कि योग वैदिक काल से सृष्टि में उपलब्ध है।

योग शब्द का अर्थ

पाणिनी ने ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘युजिर् योगे’ ,’युज समाधो’ तथा ‘युज् संयमने’ इन तीन धातुओ से मानी है। प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘योग’ शब्द का अनेक अर्थो में प्रयोग किया गया है।, जैसे - जोड़ना, मिलाना, मेल आदि। इसी आधार पर जीवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग की अवस्था को “समाधि” की संज्ञा दी जाती है जो कि जीवात्मा और परमात्मा की समता होती है। महर्षि पतंजलि ने योग शब्द को समाधि के अर्थ में प्रयुक्त किया है। व्यास जी ने ‘योग: समाधि:’ कहकर योग शब्द का अर्थ समाधि ही किया है। वाचस्पति का भी यही मत है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति निम्न प्रकार से की जा सकती है।
  1. “युज्यते एतद् इति योग: -इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मकारक में योग शब्द का अर्थ चित्त की वह अवस्था है जब चित्त की समस्त वृत्तियों में एकाग्रता आ जाती है। यहाँ पर ‘योग’ शब्द का उद्देश्य के अर्थ में प्रयोग हुआ है। 
  2. “युज्यते अनेन अति योग: -इस व्युत्पत्ति के अनुसार करण कारक में योग शब्द का अर्थ वह साधन है जिससे समस्त चित्तवृत्तियों में एकाग्रता लाई जाती है। यही ‘योग’ शब्द साधनार्थ प्रयुक्त हुआ है। इसी आधार पर योग के विभिन्न साधनो को जैसे हठ, मंत्र, भक्ति, ज्ञान, कर्म आदि को हठयोग, मंत्रयोग, भत्ति योग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि के नाम से पुकारा जाता है। 
  3. “युज्यतेsस्मिन् इति योग:” -इस व्युत्पत्ति के अनुसार योग शब्द का अर्थ वह स्थान है जहाँ चित्त की वृत्तियाँ की एकाग्रता उत्पन्न की जाती है। अत: यहाँ पर अधिकरण कारक की प्रधानता है। 

योग की परिभाषाएं 

भारतीय दर्शन में योग विद्या का स्थान सर्वोपरि एवं विशेष है। भारतीय ग्रन्थो में अनेक स्थानो पर योग विद्या से सम्बन्धित ज्ञान भरा पड़ा है। वेदो, उपनिषदो,गीता एंव पुराणों आदि प्राचीन ग्रन्थों में योग शब्द वर्णित है। दर्शन में योग शब्द एक अति महत्त्वपूर्ण शब्द है जिसे अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है।

1. योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है -

‘योगष्चित्तवृत्तिनिरोध:’ यो.सू.1/2

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तात्पर्य, अन्त:करण से है। बाह्मकरण ज्ञानेन्द्रियां जब विषयों का ग्रहण करती है, मन उस ज्ञान को आत्मा तक पहुँचाता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है। बुद्धि व अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस सम्पूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिम्ब बनता है, वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। चित्त दर्पण के समान है। अत: विषय उसमें आकर प्रतिबिम्बत होता है अर्थात् चित्त विषयाकार हो जाता है। इस चित्त को विषयाकार होने से रोकना ही योग है।

योग के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए महर्षि पतंजलि ने आगे कहा है-

‘तदा द्रश्टु: स्वरूपेSवस्थानम्।। 1/3 

अर्थात योग की स्थिति में साधक (पुरूष) की चित्तवृत्ति निरू़द्धकाल में कैवल्य अवस्था की भाँति चेतनमात्र (परमात्म ) स्वरूप रूप में स्थित होती है। इसीलिए यहाँ महर्षि पतंजलि ने योग को दो प्रकार से बताया है-
  1. सम्प्रज्ञात योग
  2. असम्प्रज्ञात योग 
सम्प्रज्ञात योग में तमोगुण गौणतम रूप से नाम रहता है। तथा पुरूष के चित्त में विवेक-ख्याति का अभ्यास रहता है। असम्प्रज्ञात योग में सत्त्व चित्त में बाहर से तीनों गुणों का परिणाम होना बन्द हो जाता है तथा पुरूष शुद्ध कैवल्य परमात्मस्वरूप में अवस्थित हो जाता है।

2. महर्षि याज्ञवल्क्य ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है-

 ‘संयोग योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनो।’ 

अर्थात जीवात्मा व परमात्मा के संयोग की अवस्था का नाम ही योग है।

कठोशनिषद् में योग के विषय में कहा गया है-


‘यदा पंचावतिश्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिष्च न विचेश्टति तामाहु: परमां गतिम्।। 
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्। 
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11 

अर्थात् जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती है और मन निष्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है, उस अवस्था को ‘परमगति’ कहते है। इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है, अर्थात् प्रमाद हीन हो जाता है। उसमें सुभ संस्कारो की उत्पत्ति और अषुभ संस्कारो का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग है।

3. मैत्रायण्युपनिषद् में कहा गया है -

 एकत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च.। 
 सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते।। 6/25 

अर्थात प्राण, मन व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्रावस्था को प्राप्त कर लेना, बाह्म विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन आत्मा में लग जाना,प्राण का निष्चल हो जाना योग है।

4. योगषिखोपनिषद् में कहा गया है-

 योSपानप्राणयोरैक्यं स्वरजोरेतसोस्तथा। 
 सूर्याचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनो:। 
 एवंतु़द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते।। 1/68-69 

अर्थात् अपान और प्राण की एकता कर लेना, स्वरज रूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेत रूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्त करना, सूर्य अर्थात् पिंगला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करना तथा परमात्मा से जीवात्मा का मिलन योग है।

5. श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुछ इस प्रकार से परिभाषित किया है।

योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय:। 
सिद्ध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। 2/48 

अर्थात् - हे धनंजय! तू आसक्ति त्यागकर समत्व भाव से कार्य कर।

सिद्धि और असिद्धि में समता-बुद्धि से कार्य करना ही योग हैं। सुख-दु:ख, जय -पराजय, शीतोष्ण आदि द्वन्द्वों में एकरस रहना योग है।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुश्कृतें। 
तस्माधोग युज्यस्व योग: कर्मसुकौशलम्।। 2/50 

 अर्थात् कर्मो में कुशलता में कुशलता ही योग है। कर्म इस कुशलता से किया जाए कि कर्म बन्धन न कर सके। अर्थात् अनासक्त भाव से कर्म करना ही योग है। क्योंकि अनासक्त भावं से किया गया कर्म संस्कार उत्पन्न न करने का कारण भावी जन्मादि का कारण नहीं बनता। कर्मो में कुशलता का अर्थ फल की इच्छा न रखते हुए कर्म का करना ही कर्मयोग है। 

पुराणो में भी योग के सम्बन्ध में अलग-अलग स्थानों पर परिभाषाएं मिलती है-

 ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैक चित्तता। 
 चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनी: पर:।। अग्निपुराण 183/1-2  

अर्थात् ब्रह्म में चित्त की एकाग्रता ही योग है। मदृयेकचित्तता योगो वृत्त्यन्तरनिरोधत:।। कूर्म पु.11 अर्थात् वृत्तिनिरोध से प्राप्त एकाग्रता ही योग है।

6. रांगेय राघव ने कहा है-’शिव और शक्ति का मिलन योग है।’

7. लिंड्ग पुराण के अनुसार - लिंग पुराण मे महर्षि व्यास ने योग का ल़क्षण किया है कि -

सर्वार्थ विषय प्राप्तिरात्मनो योग उच्यते। 

अर्थात् आत्मा को समस्त विषयो की प्राप्ति होना योग कहा जाता है। उक्त परिभाषा में भी पुराणकार का अभिप्राय योगसिद्धि का फल बताना ही है। समस्त विषयों को प्राप्त करने का सामथ्र्य योग की एक विभूति है। यह योग का लक्षण नही है। वृत्तिनिरोध के बिना यह सामथ्र्य प्राप्त नही हो सकता।

8. अग्नि पुराण के अनुसार - अग्नि पुराण में कहा गया है कि

आत्ममानसप्रत्यक्षा विशिष्टा या मनोगति:। 
तस्या ब्रह्मणि संयोग योग इत्यभि धीयते।। अग्नि पुराण (379)25 

 अर्थात् योग मन की एक विशिष्ठ अवस्था है जब मन मे आत्मा को और स्वंय मन को प्रत्यक्ष करने की योग्यता आ जाती है, तब उसका ब्रह्म के साथ संयोग हो जाता है। संयोग का अर्थ है कि ब्रह्म की समरूपता उसमे आ जाती है। यह कमरूपता की स्थिति की येग है। अग्निपुराण के इस योग लक्षण में पूवेक्ति याज्ञवल्क्य स्मृति के योग लक्षण से कोई भिन्नता नही है। मन का ब्रह्म के साथ संयोग वृत्तिनिरोध होने पर ही सम्भव है।

9. स्कन्द पुराण के अनुसार - स्कन्द पुराण भी उसी बात की पुष्टि कर रहा है जिसे अग्निपुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति कह रहे है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि-

यव्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्म परमात्मनो:। 
सा नष्टसर्वसकल्प: समाधिरमिद्यीयते।। 
परमात्मात्मनोयोडयम विभाग: परन्तप। 
स एव तु परो योग: समासात्क थितस्तव।। 

 यहां प्रथम “लोक में जीवात्मा और परमात्मा की समता को समाधि कहा गया है तथा दूसरे “लोक में परमात्मा और आत्मा की अभिन्नता को परम योग कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि समाधि ही योग है। वृत्तिनिरोध की ‘अवस्था में ही जीवात्मा और परमात्मा की यह समता और दोनो का अविभाग हो सकता है। यह वात नष्टसर्वसंकल्प: पद के द्वारा कही गयी है।

10. हठयोग प्रदीपिका के अनुसार - योग के विषय में हठयोग की मान्यता का विशेष महत्व है,वहां कहा गया है कि-

सलिबे सैन्धवं यद्वत साम्यं भजति योगत:। 
तयात्ममनसोरैक्यं समाधिरभी घीयते।। (4/5) ह0 प्र0 

 अर्थात् जिस प्रकार नमक जल में मिलकर जल की समानता को प्राप्त हो जाता है ; उसी प्रकार जब मन वृत्तिशून्य होकर आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त कर लेता है तो मन की उस अवस्था का नाम समाधि है। यदि हम विचार करे तो यहां भी पूर्वोक्त परिभाषा से कोई अन्तर दृष्टिगत नही होता। आत्मा और मन की एकता भी समाधि का फल है। उसका लक्षण नही है। इसी प्रकार मन और आत्मा की एकता योग नही अपितु योग का फल है।

योग का महत्व 

प्राचीन काल मे योग विद्या सन्यासियों या मोक्षमार्ग के साधको के लिए ही समझी जाती थी तथा योगाभ्यास के लिए साधक को घर को त्याग कर वन मे जाकर एकांत में वास करना होता था । इसी कारण योगसाधना को बहुत ही दुर्लभ माना जाता था। जिससे लोगो में यह धारणा बन गयी थी कि यह योग सामाजिक व्यक्तियों के लिए नही है। जिसके फलस्वरूप यह योगविद्या धीरे-धीरे लुप्त होती गयी। परन्तु पिछले कुछ वर्शो से समाज में बढते तनाव, चिन्ता, प्रतिस्पर्धा से ग्रस्त लोगों को इस गोपनीय योग से अनेको लाभ प्राप्त हुए और योग विद्या एकबार पुन: समाज मे लोकप्रिय होती गयी। आज भारत में ही नही बल्कि पूरे विश्वभर में योगविद्या पर अनेक शोध कार्य किये जा रहे है और इससे लाभ प्राप्त हो रहे है। योग के इस प्रचार-प्रसार में विशेष बात यह रही कि यहां यह योग जितना मोक्षमार्ग के पथिक के लिये उपयोगी था, उतना ही साधारण मनुष्य के लिए भी महत्व रखता है। आज के आधुनिक एंव विकास के इस युग में योग में अनेक क्षेत्रों में विशेष महत्व रखता है जिसका उल्लेख निम्नलिखित विवरण से किया जा रहा हैं-

स्वास्थ्य क्षेत्र में - 

वर्तमान समय में भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी योग का स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपयोग किया जा रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगाभ्यास पर हुए अनेक शोधो से आये सकारात्मक परिणामो से इस योग विद्या को पुन: एक नयी पहचान मिल चुकी है आज विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात को मान चुका है कि वर्तमान में तेजी से फैल रहे मनोदैहिक रोगो में योगाभ्यास विशेष रूप् से कारगर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि योग एक सुव्यवस्थित व वैज्ञानिक जीवन शैली है। जिसे अपना कर अनेक प्रकार के प्राणघातक रोगों से बचा जा सकता है।
योगाभ्यास के अन्तर्गत आने वाले शट्कर्मो से व्यक्ति के शरीर में संचित विशैले पदार्थो का आसानी से निष्कासन हो जाता है। वहीं योगासन के अभ्यास से शरीर मे लचीलापन बढता है व नस- नाड़ियो में रक्त का संचार सुचारू होता है। प्राणायामों के करने से व्यक्ति के शरीर में प्राणिक शक्ति की वृद्धि होती है, साथ -साथ शरीर से पूर्ण कार्बनडाई-अॅाक्साईड का निष्कासन होता है। इसके अतिरिक्त प्राणायाम के अभ्यास से मन की स्थिरता प्राप्त होती है जिससे साधक को ध्यान करने मे सहायता प्राप्त होती है और साधक स्वस्थ मन व तन को प्राप्त कर सकता है।

रोगोपचार के क्षेत्र में - 

नि:संदेह आज के इस प्रतिस्पर्धा व विलासिता के युग में अनेक रोगो का जन्म हुआ है जिन पर योगाभ्यास से विशेष लाभ देखने को मिला है। सम्भवत: रोगो पर योग के इस सकारात्मक प्रभाव के कारण ही योग को पुन: प्रचार -प्रसार मिला। रोगों की चिकित्सा में इस योगदान में विशेष बात यह है कि जहाँ एक ओर रोगों की एलौपैथी चिकित्सा में कई प्रकार के दुष्प्रभाव के लाभ प्राप्त करता है वहीं योग हानि रहित पद्धति है।

आज देश ही नही बल्कि विदेशों में अनेको स्वास्थ्य से सम्बन्धित संस्थाएं योग चिकित्सा पर तरह - तरह के शोध कार्य कर रही है। आज योग द्वारा दमा, उच्च व निम्नरक्तचाप, हृदय रोग, संधिवात, मधुमेह, मोटापा, चिन्ता, अवसाद आदि रोगों का प्रभावी रूप से उपचार किया जा रहा है। तथा अनेकों लोंग इससे लाभान्वित हो रहे है। 

खेलकूद के क्षेत्र में - 

योग अभ्यास का खेल कूद के क्षेत्र में भी अपना एक विशेष महत्त्व है। विभिन्न प्रकार के खेलो में खिलाड़ी अपनी कुशलता, क्षमता व योग्यता आदि बढाने के लिए योग अभ्यास की सहायता लेते है। योगाभ्यास से जहाँ खिलाड़ी में तनाव के स्तर, में कमी आती है, वहीं दूसरी ओर इससे खिलाड़ियों की एकाग्रता व बुद्धि तथा शारीरिक क्षमता भी बढती है। क्रिकेट के खिलाड़ी बल्लेबाजी में एकाग्रता लाने, शरीर में लचीलापन बढाने तथा शरीर की क्षमता बढाने के लिए रोजाना योगाभ्यास को समय देते है। यहाँ तक कि अब तो खिलाड़ियों के लिए सरकारी व्यय पर खेल-कूद में योग के प्रभावो पर भी अनेको शोध हो चुके हैं जो कि खेल-कूद के क्षेत्र में योग के महत्त्व को सिद्ध करते है।

शिक्षा के क्षेत्र में - 

शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों पर बढते तनाव को योगाभ्यास से कम किया जा रहा है। योगाभ्यास से बच्चों को शारीरिक ही नहीें बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूूत बनाया जा रहा है। स्कूल व महाविद्यालयों में शारीरिक शिक्षा विषय में योग पढ़ाया जा रहा है। वहीं योग-ध्यान के अभ्यास द्वारा विद्यार्थियों में बढ़ते मानसिक तनाव को कम किया जा रहा है। साथ ही साथ इस अभ्यास से विद्यार्थियों की एकाग्रता व स्मृति शक्ति पर भी विशेष सकारात्मक प्रभाव देखे जा रहे है। आज कम्प्यूटर, मनोविज्ञान, प्रबन्धन विज्ञान के छात्र भी योग द्वारा तनाव पर नियन्त्रण करते हुए देखे जा सकते है।

शिक्षा के क्षेत्र में योग के बढ़ते प्रचलन का अन्य कारण इसका नैतिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव है आजकल बच्चों में गिरते नैतिक मूल्यों को पुन: स्थापित करने के लिए योग का सहारा लिया जा रहा है। योग के अन्तर्गत आने वाले यम में दूसरों के साथ हमारे व्यवहार व कर्तव्य को सिखाया जाता है, वहीं नियम के अन्तर्गत बच्चों को स्वंय के अन्दर अनुशास्न स्थापित करना सिखाया जा रहा है। विश्वभर के विद्वानो ने इस बात को माना है कि योग के अभ्यास से शारीरिक व मानसिक ही नहीं बल्कि नैतिक विकास होता है। इसी कारण आज सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर स्कूलों में योग विषय को अनिवार्य कर दिया गया है।

पारिवारिक महत्व - 

व्यक्ति का परिवार समाज की एक महत्त्वपूर्ण इकाई होती है तथा पारिवारिक संस्था व्यक्ति के विकास की नींव होती है। योगाभ्यास से आये अनेकों सकारात्मक परिणामों से यह भी ज्ञात हुआ है कि यह विद्या व्यक्ति में पारिवारिक मुल्यों एंव मान्यताओ को भी जागृत करती है। योग के अभ्यास व इसके दर्शन से व्यक्ति में प्रेम, आत्मीयता, अपनत्व एंव सदाचार जैसे गुणों का विकास होता है और नि:संदेह ये गुण एक स्वस्थ परिवार की आधारशिला होते है।

 वर्तमान में घटती संयुक्त परिवार प्रथा व बढ़ती एकल परिवार प्रथा ने अनेकों प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया है आज परिवार का सदस्य संवेदनहीन, असहनशील, क्रोधी, स्वाथ्री होता जा रहा है जिससे परिवार की धुरी धीरे-धीरे कमजोर होती जो रही है। लेकिन योगाभ्यास से इस प्रकार की दुष्प्रवृत्तियां स्वत: ही समाप्त हो जाती है। भारतीय शास्त्रों में तो गुहस्थ जीवन को भी गृहस्थयोग की संज्ञा देकर जीवन में इसका विशेष महत्त्व बतलाया है। योग विद्या में निर्देशित अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान पारिवारिक वातावरण को सुसंस्कारित और समृद्ध बनाते है।

सामाजिक महत्व - 

इस बात में किसी प्रकार का संदेह नही है कि एक स्वस्थ नागरिक से स्वस्थ परिवार बनता है तथा एक स्वस्थ व संस्कारित परिवार से एक आदर्श समाज की स्थापना होती है। इसीलिए समाजोत्थान में योग अभ्यास का सीधा देखा जा सकता है। सामाजिक गतिविधयाँ व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक दोनों पक्षों को प्रभावित करती है। सामान्यत: आज प्रतिस्पर्धा के इस युग में व्यक्ति विशेष पर सामाजिक गतिविधियों का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। व्यक्ति धन कमाने, व विलासिता के साधनों को संजोने के लिए हिंसक, आतंकी, अविश्वास व भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बिना किसी हिचकिचाहट के अपना रहा है। ऐसे यौगिक अभ्यास जैसे- कर्मयोग, हठयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, अष्टांग योग आदि साधन समाज को नयी रचनात्मक व शान्तिदायक दिशा प्रदान कर रहे है। कर्मयोग का सिद्धान्त तो पूर्ण सामाजिकता का ही आधार है “सभी सुखी हो, सभी निरोगी हो” इसी उद्देश्य के साथ योग समाज को एक नयी दिशा प्रदान कर रहा है।

आर्थिक दृष्टि से महत्व - 

प्रत्यक्ष रूप से देखने पर योग का आर्थिक दृष्टि से महत्त्व गौण नजर आता हो लेकिन सूक्ष्म रूप से देखने पर ज्ञात होता है कि मानव जीवन में आर्थिक स्तर और योग विद्या का सीधा सम्बन्ध है। शास्त्रों में वर्णित “पहला सुख निरोगी काया, बाद में इसके धन और माया” के आधार पर योग विशेषज्ञों ने पहला धन निरोगी शरीर को माना है। एक स्वस्थ्य व्यक्ति जहाँ अपने आय के साधनों का विकास कर सकता है, वहीं अधिक परिश्रम से व्यक्ति अपनी प्रतिव्यक्ति आय को भी बढ़ा सकता है। जबकि दूसरी तरफ शरीर में किसी प्रकार का रोग न होने के कारण व्यक्ति का औशधियों व उपचार पर होने वाला व्यय भी नहीं होता है। योगाभ्यास से व्यक्ति में एकाग्रता की वृद्धि होने के साथ -साथ उसकी कार्यक्षमता का भी विकास होता है। आजकल तो योगाभ्यास के अन्तर्गत आने वाले साधन आसन, प्रणायाम, ध्यान द्वारा बड़े-बड़े उद्योगपति व फिल्म जगत के प्रसिद्ध लोग अपनी कार्य क्षमता को बढ़ाते हुए देखे जा सकते है। योग जहाँ एक ओर इस प्रकार से आर्थिक दृष्टि से अपना एक विशेष महत्त्व रखता है, वहीं दूसरी ओर योग क्षेत्र में काम करने वाले योग प्रशिक्षक भी योग विद्या से धन लाभ अर्जित कर रहे है। आज देश ही नहीं विदेशों में भी अनेको योगकेन्द्र चल रहे है जिनमे “ाुल्क लेकर योग सिखाया जा रहा है। साथ ही साथ प्रत्येक वर्ष विदेशो से सैकड़ों सैलानी भारत आकर योग प्रषिक्षण प्राप्त करते है जिससे आर्थिक जगत् को विशेष लाभ पहुँच रहा है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में - 

प्राचीन काल से ही योग विद्या का प्रयोग आध्यात्मिक विकास के लिए किया जाता रहा है। योग का एकमात्र उद्देश्य आत्मा-परमात्मा के मिलन द्वारा समाधि की अवस्था को प्राप्त करना है। इसी अर्थ को जानकर कई साधक योगसाधना द्वारा मोक्ष, मुक्ति के मार्ग को प्राप्त करते है। योग के अन्तर्ग्ात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि को साधक चरणबद्ध तरीके से पार करता हुआ कैवल्य को प्राप्त कर जाता है। योग के विभिन्न महत्त्वो देखने से स्पष्ट हो जाता है कि योग वास्तव में वैज्ञानिक जीवन शैली है, जिसका हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष पर गहराई से प्रभाव पड़ता है। इसी कारण से योग विद्या सीमित तौर पर संन्यासियों की या योगियों की विद्या न रह कर, पूरे समाज तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श पद्धति बन चुकी है। आज योग एक सुव्यवस्थित व वैज्ञानिक जीवन शैली के रूप् में प्रमाणित हो चुका है। प्रत्येक मनुष्य अपने स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए,रोगो के उपचार हेतु, अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाने, तनाव - प्रबन्ध, मनोदैहिक रोगो के उपचार आदि में योग पद्धति को अपनाते हुए देखा जा रहा है। प्रतिदिन टेलीविजन कार्यक्रमो में बढ़ती योग की मांग इस बात को प्रमाणित करती है कि योग वर्तमान जीवन में एक अभिन्न अंग बन चुका है। जिसका कोई दूसरा पर्याय नहीं हैं। योग की लोकप्रियता और महत्त्व के विषय में हजारो वर्ष पूर्व ही योगशिखोपनिषद् में कहा गया है- 

योगात्परतंरपुण्यं यागात्परतरं शित्रम्। 
योगात्परपरंशक्तिं योगात्परतरं न हि।। 

 अर्थात् योग के समान कोई पुण्य नहीं, योग के समान कोई कल्याणकारी नही, योग के समान कोई शक्ति नही और योग से बढ़कर कुछ भी नही है। वास्तव में योग ही जीवन का सबसे बड़ा आश्रम है।

योग का उद्देश्य 

योग जीवन जीने की कला है, साधना विज्ञान है। मानव जीवन में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी साधना व सिद्धान्तो में ज्ञान का महत्व दिया है। इसके द्वारा आध्यात्मिक और भौतिक विकास सम्भव है। वेदो, पुराणो में भी योग की चर्चा की गयी है। यह सिद्ध है।, कि यह विद्या प्राचीन काल से ही बहुत विशेष समझी गयी है।, उसे जानने के लिए सभी ने श्रेष्ठ स्तर पर प्रयास किये है और गुरूओ के शरण मे जाकर जिज्ञासा प्रकट की व गुरूओं ने शिष्य की पात्रता के अनुरूप योग विद्या उन्हे प्रदान की; अत: आज के विद्यार्थियो का यह कर्तव्य है, कि वह इन महत्माओ विद्वानो द्वारा प्रदत्त विद्या को जाने और चन्द सुख व भौतिक लाभ को ही प्रधानता न देते हुए यह समझे कि यह श्रेष्ठ विद्या इन योगियों ने किस उद्देश्य से प्रदान की।आज का मानव जीवन कितना जटिल है, उसमें कितनी उलझने और अषंति है,वह कितना तनावमुक्त और अवद्रुय हो चला है। यदि किसी को दिव्य दृष्टि मिल सकती होती तो वह देख पाता कि मनुष्य का हर कदम पीड़ा की कैसी अकुलाहट से भरा है,उसमे कितनी निराषा, भय, व्याकुलता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि हमारा हर पग प्रसन्नता का प्रतीक बन जाए, उसमे पीड़ा का अंष - अवषेश न बचे। इसके लिए हमे वह विद्या समझनी होगी कि अपने प्रत्येक कदम पर चिंतामुक्त और तनावरहित कैसे बनते चले और दिव्य शांति एंव समरसता को किस भांति प्राप्त करे। इसी रहस्य को अजागर करना ही योग अध्ययन का मुख्य उद्देश्य है।

योग अध्ययन का मुख्य उद्देश्य ऐसे व्यक्तियो का निर्माण करना है जिनका भावनात्मक स्तर दिव्य मान्यताओ से, आकांक्षाओ से दिव्य योजनाओ से जगमगाता रहे। जिससे उनका चिन्तन और क्रियाकलाप ऐसा हो जैसा कि ईश्वर भक्तों का, योगियों का होता है। क्योंकि ऐसे व्यक्तियो में क्षमता एवं विभूतियां भी उच्च स्तरीय होती है। वे सामान्य पुरुषो की तुलना में निस्थित ही समर्थ और उत्कृष्ट होते है, और उस बचे हुए प्राण-प्रवाह को अचेतन के विकास करने में नियोजित करना हैं। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ,समाधि जैसी साधनाओ के माध्यम से चेतन मास्तिष्क को शून्य स्थिति में जाने की सफलता प्राप्त होती है।

योग विद्या के यदि अलग-अलग विषयों पर दृष्टिपात करते है तो पाते है कि हठयोग साधना का उद्देश्य स्थूल शरीर द्वारा होने वाले विक्षेप को जो कि मन को क्षुब्ध करते है, पूर्णतया वष में करना है। स्नायुविक धाराओ एंव संवेगो को वष में करके एक स्वस्थ शरीर का गठन करना है। यदि हम अष्टांग योग के अन्तर्गत आते है तो पाते है कि राग द्वेश, काम, लोभ, मोहादि चिन्ता को विक्षिप्त करने वाले कारको को दूर करना यम, नियम का मूल उद्देश्य है। 

स्थूल शरीर से होने वाले विकर्शणों को दूर करना आसन, प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य है। चित्त को विषयो से हटाकर आत्म-दर्शन के प्रति उन्मुख करना प्रत्याहार का उद्देश्य है। धारणा का उद्देश्य चित्त को समस्त विषयों से हटाकर स्थान विशेष में उसके ध्यान को लगाना है। धारणा स्थिर होने पर क्रमश: वही ध्यान कही जाती है, और ध्यान की पराकाष्टा समाधि है। समाधि का उच्चतम अवस्था में ही परमात्मा के यथार्थ स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन होता है, जो कि पूर्व विद्वानो के अनुसार मनुष्य मात्र का परम लक्ष्य, परम उद्देश्य है।

कुछ ग्रन्थो मे भी योग अध्ययन के उद्देश्य को समझाते हुए मनीशियों ने कहा है, कि

द्विज सेतिल शारवस्य श्रुलि कल्पतरो: फलम्। 
शमन भव तापस्य योगं भजत सत्तमा:।। गोरखसंहिता 

अर्थात् वेद रूपी कल्प वृक्ष के फल इस योग शास्त्र का सेवन करो, जिसकी शाख मुनिजनो से सेवित है, और यह संसार के तीन प्रकार के ताप को शमन करता है।

यस्मिन् ज्ञाते सर्वभिंद ज्ञातं भवति निष्यितम्। 
तस्मिन् परिप्रम: कार्य: किमन्यच्छास प्रस्य माशितम्।।(शिव संहिता) 

जिसके जानने से सब संसार जाना जाता है ऐसे योग शास्त्र को जानने के लिए परिश्रम करना अवश्य उचित है, फिर जो अन्य शास्त्र है, उनका क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नही है।

 योगात्सम्प्राप्यते ज्ञाने योगाद्धर्मस्य लक्षणम् । 
 योग: परं तपोज्ञेयसमाधुक्त: समभ्यसेत्।। 

योग साधना से ही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है, योग ही धर्म का लक्षण है, योग ही परमतप है। इसलिए योग का सदा अभ्यास करना चाहिए संक्षेप में कहा जाए तो जीवात्मा का विराट चेतन से सम्पर्क जोड़कर दिव्य आदान प्रदान का मार्ग खोल देना ही योग अध्ययन का मुख्य उद्देश्य हैं।

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