अरविन्द घोष अरविन्द के राजनीतिक विचार

अनुक्रम [छुपाएँ]


अरबिन्द घोष एक सच्चे राष्ट्रवादी थे। उनकी इच्छा थी कि भारत को अतिशीघ्र ही स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। उनके चिन्तन का मुख्य ध्येय अधिक व्यक्तियों के सुख की बजाय सभी का अधिकतम हित था। उन्होंने गीता, वेदों, उपनिषदों से ज्ञान प्राप्त करके ऐसी विधियों की खोज की जो भारत को स्वतन्त्रत कराने में अहम् भूमिका निभा सकती थी। इसलिए उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा आध्यात्मवाद पर आधारित थी। उन्होंने पांडिचेरी में आश्रम की स्थापना करने के बाद अपने राजनीतिक जीवन से संन्यास लेकर, वहां पर आध्यात्मवाद व योग की शक्ति के द्वारा भारत की आजादी के प्रयास जारी रखे। इसी कारण से उनके राजनीतिक विचारों में आध्यात्मवाद का पुट मिल गया और साधारण व्यक्ति के लिए उनके राजनीतिक विचारों को समझना कठिन हो गया। आध्यात्मवाद की ओर झुकाव होने के कारण उनकी क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की भावना इतनी अधिक बदल गई कि उनका हर कार्य आध्यात्मवाद पर ही आधारित हो गया। उन्होंने जो कुछ भी कहा या लिखा, उसमें हमें आध्यात्मवाद के दर्शन अधिक होते हैं। अरबिन्द घोष का जीवन अनेक पड़ावों से होकर गुजरा है जिसके आधार पर उनके राजनीतिक विचारों को समझा जा सकता है। उनके जीवन के तीन पड़ाव हैं-

  1. बड़ौदा नरेश की सेवा में रहना (1893 - 1905 तक)
  2. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादी के रूप में सक्रिय रहना (1906 . 1910 तक)
  3. पाण्डिचेरी में आध्यात्मवाद का ज्ञान प्राप्त करना (1911 . 1950 तक)

1893 में इंग्लैण्ड से वापिस आकर अरबिन्द ने बड़ौदा नरेश की सेवा की और गुप्त लेखों का प्रकाशन कराके राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए उग्र-विचारक के रूप में काय्र किया, इसी दौरान उन्होंने भारतीय कांग्रेस की उदारवादी नीतियों की आलोचना की और उनके द्वारा अपनाई जाने वाली विनय-पत्र, प्रार्थना, ज्ञान आदि विधियों की भी आलोचना की। उन्होंने उदारवादियों को कहा कि उन्हें अपने आत्मविश्वास और निडरता के बल पर भारत को स्वतन्त्र कराने के प्रयास करने चाहिए। उन्होंने बड़ौदा नरेश की सेवा में रहते हुए जतिन बैनर्जी के साथ मिलकर क्रान्तिकारी संगठन बनाने के प्रयास आरम्भ कर दिए और बंगाल की तरफ से राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय योगदान दिया। उन्होंने उग्र विचारधारा रखने वाले युवाओं को संगठित किया ताकि भारत को स्वतन्त्रता दिलाई जा सके। लेकिन अंग्रेजों की दमनकारी नीति के शिकार होने के कारण उनका स्वप्न अधूरा रह गया। इसके बाद वे आध्यात्मवाद के विकास व उसके द्वारा भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए प्रयास करने लगे। उन्होंने पांडिचेरी में आश्रम की स्थापना की, अब स्वदेशी बहिष्कार, निष्क्रिय प्रतिरोध का स्थान, उनके आध्यात्मवाद ने ले लिया और उन्होंने भौतिकवाद को आध्यात्मवाद से मिला दिया। इस तरह विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए उन्होंने अपने चिन्तन का विकास किया। उनके राजनीतिक विचारों की निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आलोचक के रूप में –
अरबिन्द कांग्रेस की उदारवादी नीतियों के कटु आलोचक थे। जब वे इंग्लैण्ड से वापिस आए तो उस समय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओं का कब्जा था। उनका मुख्य काम अंग्रेजों को ज्ञापन सौंपने तक ही सीमित था। अंग्रेज सरकार उनकी तनिक भी परवाह नहीं करती थी। इसलिए अरबिन्द ने उनकी कार्य प्रणाली अच्छी नहीं लगी और अपने आलोचनात्मक विचारों को ‘इन्दु प्रकाश’ पत्रिका में ‘New Lamps of Old’ नाम से प्रकाशित कराया। उन्होंने कांग्रेस की नीति, कार्यपद्धति और नेताओं की आलोचना करते हुए लिखा है-’’कांग्रेस के बारे में मैं यह कहता हूं कि उसके उद्देश्य भ्रमपूर्ण हैं। जिस भावना से यह संस्था इन उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहती है, वह भावना सच्चाई तथा पूर्ण लगन की भावना नहीं है और जो साधन इसने चुने हैं, वे दोषपूर्ण हैं। जिन नेताओं पर यह संस्था विश्वास करती है, वे व्यक्ति नेता बनने लायक नहीं हैं।’’ उन्होंने कांग्रेस पर चार आरोप लगाए-
  1. कांग्रेस के उद्देश्य दोषपूर्ण हैं – अरबिन्द का मानना था कि कांग्रेस के पास स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है। वह तुच्छ व सारहीन बातों में अपना समय बर्बाद कर रही है। वह अपनी स्थापना के बाद नाममात्र के प्रशासनिक सुधार करवाने में ही सफल रही है। अरबिन्द ने कहा है कि कुछ ही प्रशासनिक सुधार करने से या कुछ ही पदों पर भारतीयों की नियुक्ति से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का विकास नहीं हो सकता, इसलिए भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए किसी निश्चित लक्ष्य के अभाव में स्वतन्त्रता की प्राप्ति नहीं हो सकती।
  2. कांग्रेस द्वारा अपनाए गए साधन और सिद्धान्त गलत हैं – कांग्रेस नेताओं का मानना था कि भारत क्रमिक विकास द्वारा भविष्य में अवश्य स्वतन्त्रता का ध्येय प्रस्तुत करेगा। इससे अधिक जल्दबाजी करने से काम ठप्प हो सकता है। कांग्रेस के अनुसार राजनीतिक विकास एक शाश्वत् और सार्वभौमिक नियम है अर्थात् प्रगति धीरे-धीरे होती है और इसी नियम का पालन भारत को करना चाहिए। लेकिन घोष ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि फ्रांस व आयरलैण्ड में पीड़ित लोगों ने अल्पकाल में ही अत्याचारी शासन की जड़ें उखाड़ दी थी, इसी तरह कांग्रेस द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपनाए गए तरीके-मौखिक प्रार्थना, याचना व विरोध अव्यावहारिक थे। अरबिन्द का मानना था कि शासक और शासित के हित कभी समान नहीं हो सकते। संवैधानिक साधनों से कभी स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए क्रांतिकारी साधनों से ही भारत को आजादी दिलाई जा सकती है।
  3. कांग्रेस द्वारा साधारण जनता की उपेक्षा – घोष का मानना था कि कांग्रेस साधारण लोगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है। यह सभी धर्मों व जातियों के लोगों को साथ लेकर नहीं चल रही है। इसका दायरा सीमित होने के कारण साधारण वर्ग के हितों की घोर उपेक्षा हुई है। साधारण जनता तो बहुत बड़ी ताकत होती है। इसकी उपेक्षा करने से गम्भीर परिणाम जन्म लेते हैं। कांग्रेस को पढ़े-लिखे लोगों की जमात बनाने की बजाय इसमें जनसाधारण को प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए ताकि इसका स्वरूप सार्वभौम हो सके और साधारण जनता के हितों की कोई उपेक्षा न कर सके। घोष का बंगाल में प्रसिद्ध होने का कारण उनके द्वारा जनसाधारण को महत्व देना ही था।
  4. कांग्रेसी नेताओं में निष्कपटता की कमी – घोष का मानना था कि कांग्रेस के नेता संकीर्ण प्रवृत्ति के कारण देश की आजादी के लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। वे अपनी छोटी से छोटी बात मनवाने के लिए भी भिखारी की तरह ब्रिटिश नेताओं के सामने हाथ फैलाए रहते हें। वे आत्मविश्वास और निडरता की बजाय उनकी चमचागिरी करने में लगे हुए हैं। उनमें न तो राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के प्रति कोई लगन है और न ही उनकी भावना में निष्कपटता है, वे किसी भारतीय को उच्च पद प्राप्त करने पर ब्रिटिश सरकार को बधाई का पात्र मानते हैं वे ब्रिटिश सरकार को भारत के कल्याण का साधन मानते हैं। इसलिए अरबिन्द ने उदारवादियों की गलत नीतियों की आलोचना की। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘गीता रहस्य’ में लिखा है कि राष्ट्रीय शत्रु की धर्म युद्ध में हत्या करना पाप नहीं है बल्कि धर्म का एक हिस्सा है।
ब्रिटिश सरकार की आलोचना – अरबिन्द ने कांग्रेस की तरह ब्रिटिश सरकार की भी कड़ी आलोचना की। रानाडे ने ‘इन्दु प्रकाश’ के मालिक को चेतावनी दी थी कि यदि ‘New Lamps for Old’ के लेखक ने अपनी ब्रिटिश सरकार विरोधी नीति नहीं बदली तो ‘इन्दु प्रकाश’ पत्रिका को तो बन्द कर दिया जाएगा और लेखक पर राजद्रोह का मुकद्दमा चलाया जाएगा। यद्यपि उन्होंने इस लेख माला के माध्यम से ब्रिटिश सरकार व कांग्रेस की परोक्ष आलोचना ही की थी, लेकिन रानाडे की चेतावनी के बाद उन्हांने अपना रवैया बदला। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की बजाय फ्रांसीसी सरकार की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि अंग्रजों द्वारा स्थापित शासन प्रणाली हमारे देश के हितों के अनुकूल नहीं है। उन्होंने अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली की भी आलोचना करते हुए कहा कि अंग्रेजी शिक्षा ने हमारी आत्मा की हत्या की है। उन्होंने हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करके ग्रामीणों को आर्थिक रूप से कंगाल बना दिया है। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के व्यवहार पर कटाक्ष करते हुए लिखा है-’’वे अशिष्ट और धूर्त हैं, उनमें किसी भी तरह की उदात भावना नहीं है। उनका व्यवहार गुलामों पर हुक्म चलाने वाले जमींदारों जैसा है।’’ उनका मानना था कि पश्चिम के लोगों में भारतीयों से ज्यादा गुण नहीं है। भारतीय स्वयं अपनी सरकार चला सकते हैं। केवल परिस्थितियों वश भारतीय गुलामी के शिकार हैं। इन गुलामी की बेडियों को तोड़ना कोई कठिन काम नहीं है। यदि सभी भारतवासी संगठित होकर इन ब्रिटिश सत्ता के व्यापारियों को यहां से निकालने का प्रयास करें तो वे अपश्य सफल होंगे।

पूंजीवाद की आलोचना – अरबिन्द आधुनिक पूंजीवाद के कटु आलोचक थे। उन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्यवादी शोषण की खुलकर निन्दा की है। उनका कहना है कि भारतीय श्रमिकों का शोषण ब्रिटिश पूंजीपति करते हैं। इसलिए भारतीय श्रमिकों का शोषण ब्रिटिश पूंजीपति करते हैं। इसलिए भारतीय श्रमिकों की स्थिति बिगड़ रही है। भारत की पूंजी को इंग्लैण्ड ले जाया जा रहा है। कांग्रेस अंग्रेजों की इस नीति के विरुद्ध कुछ बोलने को तैयार नहीं है। इसलिए उन्होंने आधुनिक पूंजीवाद के केन्द्रीयकरण की तीव्र आलोचना की है। उन्होंने बंगाल की जनता में इसके विरुद्ध जागृति पैदा की और उन्हें क्रांतिकारी कदम उठाने के लिए संगठित भी किया। लेकिन उन्होंने पूंजीवाद की आलोचना करके साम्यवाद का पक्ष नहीं लिया। उनका कहना था कि साम्यवाद वर्ग-संघर्ष और अराजकता को जन्म देता है। उन्होंने कहा है कि जब तक श्रमिकों का शोषण होता रहेगा तब तक राष्ट्र की प्रगति व विकास नहीं हो सकता। इसलिए श्रमिकों को राजनैतिक शिक्षा देकर ही भारत की स्वतन्त्रता का ध्येय पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार उन्होंने पूंजीवाद की आलोचना अवश्य की है, लेकिन साम्यवाद को भी गले नहीं लगाया है। उनका ध्येय तो समानता, स्वतन्त्रता और भाई-चारे के आदर्श को प्राप्त करने का था।

समाजवाद सम्बन्धी विचार – अरबिन्द घोष ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘War and Self - determination’ में 1857 में स्पष्ट शब्दों में लिखा है-’’युद्ध ने दो प्रमुख प्रश्नों को जटिल बना दिया है-एक तो पूंजी और श्रम में बढ़ता हुआ संघर्ष और इनका एशियाई मामले। यूरोप में समाजवाद और पूंजीवाद खड़े हुए एक-दूसरे का मुंंह ताक रहे हैं। समाजवादी विचारधारा लोकप्रिय हो रही है। यह विचारधारा पश्चिम की तरफ मुड़ने में काफी समय ले सकती है तथा इसमें बहुत सुधार भी हो सकते हैं। श्रम आन्दोलन हर स्थान पर सुधारवादी रूप में समाजवादी बन रहा है। वर्तमान यूरोपीय सभ्यता जिसका आधार पूंजीवादी उद्योगवाद है, अपने राक्षसी रूप की चरम सीमा पर पहुंच चुकी है और यह ध्वस्त हो जाएगी। हमारा भविष्य तो समाजवादी समाज में सुरक्षित है।’’ अरबिन्द जी के इन विचारों से उनके समाजवादी दृष्टिकोण का पता चलता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे पूंजीवाद के विरोधी तथा समाजवाद के प्रबल समर्थक थे। उनका कहना था कि समाजवाद में प्रजातन्त्रीय सिद्धान्तों का ही पोषण होता है और व्यक्ति को विकास के भरपूर अवसर प्राप्त होते हैं।

स्वराज सम्बन्धी विचार – घोष का कहना था कि कांग्रेस पूर्ण स्वतन्त्रता की बजाय अंग्रेजी की न्यायप्रियता में ही विश्वास रखकर अपूर्ण स्वतन्त्रता की मांग की समर्थक है। वह अपना स्वतन्त्रता का लक्ष्य भूल चुकी है। वह भारत के लिए अधिराज्य (Dominion State) की मांग करती है। घोष ने इसका विरोध करते हुए भारत के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग की, उन्होंने कहा कि ब्रिटिश नीतियां भारत के लिए कभी लाभकारी नहीं हो सकती। भारत का फायदा तो स्वयं की सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों से ही हो सकता है। इसलिए स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा करना आवश्यक है। स्वतन्त्र भारत ही विश्व का आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। इसलिए स्वराज्य ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने स्वराज्य की व्याख्या करते हुए लिखा है-’’स्वराज्य का हमारा विचार विदेशी नियन्त्रण से पूर्ण स्वतन्त्रता है। हम दावा करते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र को अपने स्वरूप तथा आदर्शों के अनुसार अपने सामथ्र्य द्वारा अपने जीवन को जीने का अधिकार हो। अपनी श्रेष्ठता के आधार पर हमें अपनी विरासत से वंचित रखने या हमारी सभ्यता से घटिया सभ्यता हमारे ऊपर थोपने के विदेशी दावे को हम अस्वीकार करते हैं।’’ उन्होंने स्वराज्य की धारणा को आध्यात्मिक आवश्यकता बताते हुए आगे कहा है कि यदि भारत स्वतन्त्र न हो पाया तो विश्व भारत के आध्यात्मिक प्रकाश से वंचित रह जाएगा, इसलिए स्वराज्य ही हमारा प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए।

स्वराज्य प्राप्ति के साधन – घोष को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए कांग्रेस के उदारवादी कार्यक्रम में विश्वास नहीं था। उनका कहना था कि जब भारतीयों का अपना संविधान ही नहीं है तो संवैधानिक साधनों की चर्चा करना ही व्यर्थ है। इसलिए उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के लिए इन साधनों का समर्थन किया-

  1. सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion)
  2. निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance)

अरबिन्द घोष अपने स्कूली जीवन में ही एक गुप्त क्रान्तिकारी संगठन के सदस्य बन गए थे। उन्होंने बड़ौदा नरेश की सेवा के दौरान भी क्रान्तिकारियों से सम्पर्क बनाया। इस दौरान उनका विश्वास था कि भारत की स्वतन्त्रता सशस्त्र विद्रोह करके ही प्राप्त की जा सकती है। लेकिन जब वे बड़ौदा रियासत को त्यागकर बंगाल में गए और वहां पर राष्ट्रवादियों का नेतृत्व किया तो उन्होंने विद्रोह के स्थान पर निष्क्रिय प्रतिरोध को स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए उत्तम साधन बनाया। कुछ विद्वानों का विचार है कि अरबिन्द का झुकाव बंगाल में ही आध्यात्मवाद की ओर हो गया था और उन्होंने सभी क्रान्ति पूर्ण हिंसक साधनों के स्थान पर आध्यात्म व योग के साधनों से भारत की स्वतन्त्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने का सुझाव दिया था। उन्होंने 1903 में अपनी पत्नी को लिखे पत्र में कहा था-’’इस गिरी हुई प्रजाति का उद्धार करने के लिए मेरे पास शक्ति है। यह शक्ति शारीरिक या तलवार व बन्दूक की शक्ति नहीं है अपितु ज्ञान की शक्ति है।’’ लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि यदि स्वतन्त्रता प्राप्ति के अन्य साधन न हों तो हिंसात्मक साधनों से कोई परहेज नहीं करना चाहिए। उन्होंने स्वतन्त्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संगठित प्रतिरोध तथा स्वावलम्बन की भावना को सर्वोत्तम साधन माना है। उनका मानना था कि प्रार्थना सभाएं करने व ज्ञापन देने से स्वराज्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि हिंसा का सामना हिंसा से ही करके विरोधी को दबाया जा सकता है।

घोष ने निष्क्रिय प्रतिरोध का प्रयोग 1906 के बाद शुरू किया। अंग्रेजों के कोप का भाजन बनने से बचने के लिए उन्होंने अंग्रेजों की आलोचना में कुछ नरमी बरती और उसके स्थान पर निष्क्रिय प्रतिरोध का साधन अपनाया। इसके तहत उसने ब्रिटिश न्यायालयों का बहिष्कार, सरकारी पदों का बहिष्कार तथा सामाजिक बहिष्कार को शामिल किया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अंग्रेज सरकार निष्क्रिय प्रतिरोध को कुचलने के लिए किसी हिंसक साधन का प्रयोग करती है तो निष्क्रिय प्रतिरोध के समर्थकों को भी उसी साधन का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार उन्होंने गांधी से अलग दृष्टिकोण का परिचय देते हुए निष्क्रिय प्रतिरोध को सत्याग्रह से श्रेष्ठ बताया।

राज्य सम्बन्धी विचार – घोष का मानना है कि राज्य एक यान्त्रिक इकाई है। यह देखने में तो लोगों के हितों का संरक्षक लगता है लेकिन फिर भी साध्य नहीं है। यह लोगों के कल्याण का एक साधन है। इस साधन के द्वारा अल्पसंख्यकों के विचारों को ‘सामूहिक हित’ के नाम पर बहुसंख्यकों पर थोप दिया जाता है। राज्य सत्तारुढ़ स्वाथ्र्ाी लोगों का ही संगठन है जिसका सामान्य हित से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने राज्य के सावयव सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा है कि राज्य को जीवित शरीर के समान नहीं माना जा सकता क्योंकि राज्य का स्वरूप मशीनीकृत है। उनका कहना है-’’राज्य एक सुविधा है और अपेक्षाकृत हमारी सामूहिक उन्नति की एक भद्दी सुविधा है, इसे कभी भी स्वयं में साध्य नहीं बनाना चाहिए।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि राज्य के ऊपर एक ओर श्रेष्ठ व्यवस्था होनी चाहिए। इस व्यवस्था में सर्वाधिक महत्व सत्य, आत्मा और ईश्वर को दिया जाना चाहिए। व्यक्ति को रज्य से पृथक ऐसा अस्तित्व प्रदान करना चाहिए ताकि वह राज्य द्वारा दी गई सुविधाओं से अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सके। इस प्रकार व्यक्ति सत्य, आत्मा और ईश्वर के प्रति निष्ठावान रहना अपने जीवन का चरम लक्ष्य भी प्राप्त कर सकता है। उन्होंने राज्य का उद्देश्य भी सभी व्यक्तियों का अधिकतम कल्याण (Greatest good will of all) बताया है। इस दृष्टि से उन्होंने बैन्थम के उपयोगितावादी सिद्धान्त की भी आलोचना कर डाली है। इसका कारण उनका भारतीय संस्कृति के प्रति अथाह लगाव का होना है। ‘सर्वभूतहिताय’ गीता का सिद्धान्त है जिसे घोष ने अपने चिन्तन का आधार बनाय है। इस प्रकार उन्होंने राज्य को साधन और व्यक्ति को एक साध्य बताया है।

अरबिन्द घोष का राजनीतिक रचनात्मक कार्यक्रम – अधिकांश विद्वानों का मानना है कि अरबिन्द घोष ने कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना करके विध्वंसात्मक पक्ष का ही पोषण किया है। लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं हे। घोष ने अपने बड़ौदा नरेश के सेवाकाल के दौरान ही अपने रचनात्म्क पक्ष का प्रतिपादन किया था। डॉ0 कर्ण सिंह ने उनके रचनात्मक पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा है-’’भारत का लक्ष्य ब्रिटिश आधिपत्य से पूर्ण मुक्ति पाने का होना चाहिए। इस मुक्ति के लिए उसे अपने विदेशी शासकों की कृपा और दया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी आन्तरिक शक्ति और बल के असीम भण्डार का ही सहारा लेना चाहिए।’’ अरबिन्द घोष ने माना कि स्वतन्त्रता का लक्ष्य तभी प्राप्त होगा, जब हम अपने निजी स्वार्थ का त्याग कर सच्चे देश प्रेम की लगन से कार्य करेंगे और अंग्रेजों के फैंके हुए टुकड़ों के लिए तरसना छोड़ देंगे। उनके रचनात्मक राजनीतिक कार्यक्रम के मुख्य पहलू हैं-

  1. जनसाधारण में आजादी के प्रति जागृति पैदा करना।
  2. असहयोग और सत्याग्रह से जनता को संगठित करना।
  3. स्वदेशी के आधार पर समानान्तर भारतीय उद्योगों का विकास करना।
  4. ब्रिटिश आर्थिक ढांचे को छिन्न-भिन्न करना।
  5. ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र क्रान्तिकारियों को संगठित करना।
  6. ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्ण मुक्ति पाना।

अपने इस रचनात्मक कार्यों को कार्यरूप देने के लिए उन्होंने यतीन बैनर्जी, पी0 मितर और विभूति भूषण भट्टाचार्य से मिलकर बंगाल में क्रान्ति दल का गठन किया। उन्होंने इसी तरह के अन्य क्रान्तिकारी संगठनों से भी सम्पर्क साधा। उनका मानना था कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को फैलाकर ही देश को स्वाधीनता दिलाई जा सकती है। उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार को भी अपने रचनात्मक कार्यक्रम का घटक बनाया ताकि अंग्रेजी उद्योग का आधिपत्य समाप्त हो सके। उन्होंने अपना मत व्यक्त किया कि यदि अंग्रेजों के आर्थिक बन्धन तोड़ दिए जाए और उसके समानान्तर भारतीय व्यवसाय तथा उद्योग को खड़ा किया जाए तो देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए चलने वाले क्रान्तिकारी प्रयासों को अवश्य सफलता मिलेगी। आगे चलकर यही स्वदेशी का मुद्दा राष्ट्रवादी दल का कार्यक्रम बना। इस प्रकार अरबिन्द द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करना एक महत्वपूर्ण कदम था।

अरबिन्द के स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार – उनके स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों में भी आध्यात्मिकता का पुट मिलता है। उन्होंने स्वतन्त्रता को परिभाषित करते हुए कहा है-’’स्वतन्त्रता अपने जीवन के नियमों का पालन करना है, अपनी स्वाभाविक आत्मपूर्णता के लिए आगे बढ़ना तथा प्राकृतिक एवं स्वतन्त्र रूप से वातावरण के साथ एकरूपता की खोज करना ही स्वतन्त्रता है।’’ इस प्रकार अरबिन्द ने मानवीय स्वतन्त्रता को मानव द्वारा अपने अस्तित्व के लिए स्वीकृत कानूनों का पालन माना है। उन्होंने मानवीय स्वतन्त्रता के दो प्रकार-प्ण् आंतरिक स्वतन्त्रता, प्प्ण् बाह्य स्वतन्त्रता बताए हैं। आन्तरिक स्वतन्त्रता से उनका तात्पर्य अपनी आत्मा की आवाज के अनुसार स्वतन्त्र रूप में अपने स्वाभाविक गुणों को विकसित करना तथा बाह्य वातावरण में सामंजस्य स्थापित करना है। उसकी मान्यता थी कि आन्तरिक स्वतन्त्रता की अनुभूति किए बिना बाहरी स्वतन्त्रता निरर्थक है। यदि कोई व्यक्ति आन्तरिक शक्तियों की बजाय बहारी दबावों से कार्य करता है तो वह स्वतन्त्र नहीं कहला सकता। वास्तविक स्वतन्त्रता तो स्व नियन्त्रित आन्तरिक स्वतन्त्रता है। आन्तरिक एवं आत्मिक स्वतन्त्रता जीवन का सार है। कानून कभी स्वतन्त्रता को नष्ट नहीं करते बल्कि स्वतन्त्रता का विकास करते हैं। इसलिए व्यक्ति को बाह्य स्वतन्त्रता की बजाय आन्तरिक स्वतन्त्रता को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए ताकि राजनीतिक स्वतन्त्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सुविधा हो।

आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धान्त – अरबिन्द घोष का राष्ट्रवाद का सिद्धान्त बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। प्रारम्भ में वे उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा के व्यक्ति थे, लेकिन पांडिचेरी में प्रस्थान करने के बाद वे पूरी तरह आध्यात्मिक व्यक्ति बन गए और उनको राष्ट्रवाद का स्वराज्य भी आध्यात्मिक हो गया। उन्होंने राष्ट्रवाद सम्बन्धी धारणा का प्रतिपादन ऐसे समय में किया जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। अरबिन्द ने राष्ट्रवाद को प्राचीन संस्कृति और परम्परा के अनुरूप ढालकर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। यद्यपि अरबिन्द के समकालीन विचारकों व नेताओं का रुझान भी राष्ट्रवाद की तरफ था, लेकिन उन्होंने आत्म-चेतना की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। अरबिन्द ने बहुत ऊंचे राष्ट्रवाद की नींव रखी, देशवासियों में स्वाभिमान को जगाया और उनके सामने आत्मा का चित्र स्पष्ट किया।

उनके लिए राष्ट्र केवल एक भौगोलिक सत्ता या प्राकृतिक भूखण्ड मात्र नहीं था, बल्कि एक मां के समान था। उन्होंने राष्ट्र को एक जीवित रूप में देखा और उसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर खड़ा किया। उनके लिए राष्ट्र एक मां की तरह था। वे कहते थे कि मां बेड़ियों में है तथा इसे मुक्त कराने के लिए इस मां को मुक्त कराने के लिए भारत मां के सपूतों को हर कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। अरबिन्द ने लिखा है-’’राष्ट्र क्या है, हमारी मातृभूमि क्या है? यह भूखण्ड नहीं है, वाक्विलास नहीं है और न ही मन की कोरी कल्पना है। यह महाशक्ति है, जो राष्ट्र का निर्माण करने वाले कोटि-कोटि जनता की सामूहिक शक्तियों का समाविष्ट रूप है।’’ उन्होंने राष्ट्रवाद को एक धर्म बताया जो ईश्वर द्वारा प्रदत्त है और जिसके लिए हमें जीवित रहना है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रवाद को दबाया नहीं जा सकता, यह तो दैवी इच्छा का परिणाम है और उसी की शक्ति से आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा है-’’राष्ट्रवाद एक धर्म है जो ईश्वर की ओर से आया है। राष्ट्रवाद एक ऐसा धर्म है जिसका तुम्हें जीवन में पालन करना है।’’ उन्होंने आगे कहा है कि बंगाली व भारतीय एक ऐसी जाति है जिन्हें राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करके व राष्ट्र का निर्माण करके ईश्वरीय आदर्श को प्राप्त करना है। उनका ध्येय भारत को विश्व का आध्यात्मिक गुरु बनाने का था। इसके लिए भारत माता को पराधीनता से छुटकारा दिलाना जरूरी है। इसके लिए हमें धार्मिक भावना का पालन करना जरूरी है, अन्यथा हम सदा के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति, आत्म-पुनरुद्धार व अपना बौद्धिक बल खो देंगे। उन्होंने कहा कि एकता में महान शक्ति है, इसलिए हमें स्वाधीनता के लिए संगठित प्रयास करने चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद किसी एक भाषा, एक जाति या धर्म के लोगों का राष्ट्रवाद नहीं है। उनका राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद नहीं है। उनकी राष्ट्रभक्ति मानव प्रेम व विश्व-बन्धुत्व पर आधारित है। उन्होंने कहा है-’’राष्ट्रवाद मानव के सामाजिक तथा राजनीतिक विकास के लिए जरूरी है। अन्ततोगोत्वा एक विश्व संघ के द्वारा मानव की एकता स्थापित होनी चाहिए और इस आदर्श की प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक नींव का का निर्माण मानव धर्म और आन्तरिक एकता की भावना के द्वारा ही किया जा सकता है।’’ उनका कहना था कि हिन्दू धर्म एक शाश्वत् कार्य है जो सबको अपने में समेटता है। इसमें किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं है। यह ईश्वर के स्वामित्व पर बल देता है। इसलिए हमें अपने शाश्वत् धर्म का पालन करते हुए सभी धर्म व जातियों के लोगों को िमाकर स्वाधीनता प्राप्ति के प्रयास करने चाहिए ताकि भारत को आध्यातिमक गुरु बनाया जा सके।

मानवीय एकता का आदर्श –’मानवीय एकता का आदर्श’ अरबिन्द एक ऐसा विचार है, जिसके कारण उन्हें आध्यात्मिकता का पैगम्बर कहा जाता है। उन्होंने मानवीय एकता को स्थापित करने के लिए लोगों को आदर्शवादी होने पर जोर दिया है। उन्होंने महसूस किया प्रथम विश्व युद्ध ने माव जाति के अस्तित्व को जो खतरा उत्पन्न किया है, वह विचारणीय है। यदि समय रहते युद्ध की विभीषिका से लोगों को परिचित नहीं कराया गया तो भारत का आध्यात्मिक गुरु बनने का स्वप्न टूट कर बिखर जाएगा। इसलिए उन्होंने 1947 में ‘मानव एकता का आदर्श’ नामक पुस्तक की रचना की। उन्होंने इस पुस्तक में मानव की एकता के आदर्श को एक स्वाभाविक प्रक्रिया बताया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में यह स्वप्न अवश्य पूरा होगा। सम्पूर्ण मानव जाति एक विश्व संघ के रूप में एक झण्डे के नीचे आ जाएगी। ऐसा विभिन्न कारणों-I. प्राकृतिक कारणों, II. निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियों के दबाव से, III. मानव मात्र की वर्तमान और भविष्य की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूर्ण करने की इच्छा से प्रेरित होने से होगा। उन्होंने लिखा है-’’हम सब एक-दूसरे के घटक हैं और एक यान्त्रिक तथा बाह्य आवश्यकता हमें एक-दूसरे के प्रति इतना आकर्षित करती है कि हम स्वयं को क्रमश: परिवार, कबीले तथा ग्राम जैसे उत्तरोत्तर समूहों में संगठित करने को मजबूर हो जाते हैं।’’

उन्होंने आगे कहा है कि विश्व एकता का आदर्श इस बात में महत्वपूर्ण है कि हीगल, अरस्तु आदि विचारकों द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय राज्यों की अवधारणा अन्तिम अवस्था नहीं थी। आगे चलकर कई राज्यों को मिलाकर संगठित होने की जो प्रवृत्ति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चली, उसने अरस्तु और हीगल की राष्ट्रीय राज्य की धारणा को धराशायी कर दिया है। आज कई राज्यों को मिलाकर संघ बन चुके हैं। SAARC, WTO, OAS आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं। आज आर्थिक तथा राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया जोरों पर चल रही है। इसलिए भविष्य में अरबिन्द के ‘मानव एकता के आदर्श’ का स्वप्न यथार्थ में बदलने की पूरी सम्भावना है। हमे अरबिन्द के इन विचारों को स्वीकार करना होगा कि यदि हम विश्व संघ के रूप में ‘मानव एकता का आदर्श’ स्थापित करना चाहते हैं तो हमें संकीर्ण राष्ट्रवाद की सीमाएं तोड़नी होंगी। चूंकि विश्व संघ का निर्माण राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के सिद्धान्त के अनुसार होगा, लेकिन इसमें मनुष्य को स्थान, जाति, संस्कृति तथा आर्थिक सुविधा के अनुसार अपने अपने समूह बनाने का अधिकार होगा। परन्तु ये समूह संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानव जाति के उत्थान के लिए कार्य करेंगे।

इस प्रकार अरबिन्द ने ‘मानव एकता के आदर्श’ को स्थापित करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं संकीर्ण स्वार्थ, संकीर्ण राष्ट्रवाद आदि की तरफ भी ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि यदि हम मानवता के समक्ष मानवता का आध्यात्मिक धर्म रखें तो सामूहिक स्वार्थ या संकीर्ण राष्ट्रवाद पर काबू पाया जा सकता है। हम यह महसूस करें कि हम सभी में एक गुप्त आत्मा या ईश्वरीय सत्ता है और मानवता इस भूमि पर उस ईश्वरीय सत्ता का ही सर्वोच्च प्रतीक है तो ‘मानव एकता का आदर्श’ आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इसी मनोवैज्ञानिक एकता के कारण अन्तोगतत्वा विश्व संघ की स्थापना हो सकेगी और उसकी स्थापना में भारत की भूमिका एक आध्यात्मिक गुरु की होगी।

हिंसा सम्बन्धी विचार – इस बारे में अनेक विचारकों की राय अलग-अलग है। कुछ उन्हें अहिंसावादी मानते हैं और कुछ हिंसावादी। सत्य तो यह है कि वे अहिंसा और हिंसा दोनों के समर्थक थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के सशस्त्र क्रान्ति पर जोर देकर हिंसावादी होने का ही परिचय दिया। लेकिन राजनीति से संन्यास लेने के बाद पांडिचेरी प्रवास के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक रास्ता ग्रहण करने पर भी हिंसा को पूर्ण रूप से त्याज्य नहीं माना। उनका कहना था कि राष्ट्र की रक्षा के लिए हिंसा की आवश्यकता पड़े तो उसमें परहेज नहीं होना चाहिए। इसलिए उन्होंने आवश्यकतानुसार सशस्त्र क्रान्ति और हिंसा का ही समर्थन किया है। यदि अहिंसात्मक साधनों से राष्ट्रवाद का पोषण होता हो तो हिंसा का प्रयोग वर्जित है। उन्होंने हिंसा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए ‘गीता रहस्य’ नामक पुस्तक में लिखा है-’’धर्मयुद्ध में राष्ट्र के शत्रुओं को मारना भी धर्म का ही एक अंग है। इससे स्पष्ट है कि वे मूलत: एक अहिंसावादी थे, लेकिन आवश्यकतानुसार हिंसा को भी जरूरी मानते थे। वे अहिंसा के विरोधी नहीं थे, लेकिन उसे एकमात्र मापदण्ड मानकर सिद्धान्त रूप में ग्रहण करने को तैयार नहीं थे, आवश्यकता पड़ने पर वे अहिंसा की अपेक्षा हिंसा को ही अधिक महत्व देते थे। इसलिए उन्होंने हिंसा के साथ-साथ अहिंसा का भी समर्थन किया है।

कानून के सिद्धान्त सम्बन्धी विचार – अरबिन्द घोष का मानना था कि कानून लोक इच्छा की अभिव्यक्ति मात्र है। अच्छे कानून अच्छी राजनीतिक व्यवस्था के द्योतक हैं। कानूनों का पालन होना चाहिए। कानूनों का पालन ही सामाजिक जीवन व राजनीतिक संगठन की नींव है। लेकिन कानून का पालन भय या दण्ड शक्ति के आधार पर नहीं होना चाहिए। कानून जनता द्वारा स्वयं बनाए जाने चाहिएं। जो कानून जनता पर थोपे जाते हैं, उनके पीछे नैतिक बल का अभाव होता है और जनता द्वारा वे अधिक देर तक मान्य नहीं होते, क्योंकि इनके पीछे पशु बल काम कर रहा होता है। कानूनों का पालन इनके उपयोगी होने के कारण होता है। यदि कानून निष्ठुर और अन्यायपूर्ण होते हैं तो उनकी अवहेलना शुरू हो जाती है। इस प्रकार अरबिन्द जी का मानना था कि जनता को न्याय-संगत व उपयोगी कानूनों का ही पालन करना चाहिए। जनता को यह अधिकार है कि वह उन कानूनों का पालन न करे जो उसकी आत्मा को ठेस पहुंचाने वाले हों। यदि अवज्ञा करने पर उसे दण्ड मिले तो भी अन्यायपूर्ण कानूनों का पालन नहीं करना चाहिए।

सामाजिक सुधारों के सम्बन्ध में विचार – अरबिन्द जी सामाजिक सुधारों के बारे में अधिक व्याकुल नहीं थे। उनका ध्येय तो राजनीतिक स्वतन्त्रता को प्राप्त करने तक ही सीमित था। उनका विचार था कि जब भारतीयों को राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति हो जाएगी तो सामाजिक सुधार भी धीरे-धीरे होते जाएंगे। उनका मानना था कि राजनीतिक पराधीनता के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के सामाजिक सुधारों की बात करना काल्पनिक व निराधार है। उन्होंने कहा है-’’राजनीतिक स्वतन्त्रता राष्ट्र की जान हैं राजनीतिक स्वतन्त्रता को प्राप्त किए बिना सामाजिक सुधारों के लिए प्रयास करना अज्ञानता व व्यर्थता है।’’ इस प्रकार अरबिन्द ने सामाजिक सुधारों की तरफ अधिक ध्यान नहीं दिया।

इस प्रकार उपरोक्त राजनीतिक विचारों का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि अरबिन्द ने राजनीतिक चिन्तन के कुछ विषयों-राष्ट्रवाद, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा मानव की एकता को आध्यात्मिक आधार प्रदान किया। उन्होंने राष्ट्रवाद को दैवीय आधार पर प्रतिपादित किया और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में एक नई जान फूंकी। उन्होंने मानव एकता के आदर्श द्वारा विश्व बन्धुत्व की जो कल्पना की है, वह आधुनिक समय में व्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों के समाधान का उचित उपाय है। इस दृष्टि से उनका चिन्तन सर्वव्यापी तथा सार्वभौमिक है। उन्होंने पश्चिम और पूर्व के विचारों का जो समन्वय किया है, वह उनकी राजनीतिक दर्शन को सबसे महान देन है।

आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धान्त

अरबिन्द घोष की राजनीतिक चिन्तन को सबसे बड़ी देन उनका आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धान्त है, लम्बे समय तक इंग्लैण्ड में रहकर जब वे भारत वापस आए तो उन्होंने भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े हुए हुए अनेक सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं से ग्रस्त पाया, तत्कालीन भारतीय कांग्रेसी नेता अंग्रेजों पर इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई दबाव बनाने में असफल सिद्ध हो रहे थे। उनकी कार्यप्रणाली ज्ञापन देने या प्रार्थना करने तक ही सीमित थी, इस अवस्था में अरबिन्द जैसे सच्चे देश भक्त का सन्तुष्ट व चुप रहना असम्भव था। इसलिए उन्होंने भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से छुटकारा दिलाने के प्रयास शुरू किए। उन्होंने प्रारम्भ में तो उग्र-राष्ट्रवाद का समर्थन किया, उन्होंने तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्र पाल जैसे क्रान्तिकारियों की देश के प्रति भावना को सराहा तथा उन्होंने उदारवादी नेताओं की आलोचना की। लेकिन अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीति के शिकार गर्म दल के नेताओं की दुर्दशा देखकर उन्होंने अपना इरादा बदल लिया और पांडिचेरी में जाकर एक आश्रम की स्थापना की। यहीं से उनके आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की नींव पड़ी। उन्होंने राष्ट्रवाद को एक नए रूप में पेश किया, उन्होंने पश्चिम तथा भारतीय संस्कृति के तत्व जोड़कर आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

राष्ट्रवाद की व्याख्या

अरबिन्द का राष्ट्रवाद संकुचित न होकर एक विस्तृत धारणा है। उनके अनुसार उनका राष्ट्र केवल एक भौगोलिक सत्ता या प्राकृतिक भूखण्ड नहीं है। यह एक भौगोलिक इकाई मात्र न होकर इससे भी अधिक है। डॉ0 कर्ण सिंह का कहना है कि अरबिन्द जी राष्ट्र को ईश्वरीय शक्ति मानते थे और उनकी राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक आवश्यकता थी। उनकी राष्ट्रवाद की धारणा विस्तृत और गहरी है। उन्होंने राष्ट्रवाद को एक सनातन धर्म माना है। उन्होंने कहा है कि यदि सनातन धर्म न होता तो हिन्दू राष्ट्र भी नहीं होता। राष्ट्र एक दैवी पुकार है। यह भगवान का अवतार है। उन्होंने राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए लिखा है-’’राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, राष्ट्रवाद तो एक धर्म है जो ईश्वर के पास से आया है जिसे लेकर आपको रहना है। हम सभी लोग ईश्वरीय अंश के साधन है। अत: हमें धार्मिक दृष्टि से राष्ट्रवाद का मूल्यांकन करना है। यह धर्म दैवी और सात्विक है। राष्ट्रीयता को हम दबा नहीं सकते। यह तो ईश्वरीय शक्ति की सहायता से और बढ़ती है। राष्ट्रीयता अजर- अमर है, यह कोई मानवीय वस्तु नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष ईश्वर है। ईश्वर को न तो मारा जा सकता है और न ही जेल में ठूंसा जा सकता है। यह महान राष्ट्र फिर से उन्नति करेगा तथा उतना ही महान् हो जाएगा जितना कि यह अपनी आध्यात्मिक महानता के समय में था।’’

इससे स्पष्ट हो जाता है कि अरबिन्द का राष्ट्रवाद आध्यात्मिक विचारधारा है। उनका आध्यात्मिक राष्ट्रवाद एक ऐसी विचारधारा है जिससे भारत की अतीत की महान संस्कृति का गुणगान करके भारत की पराधीन जनता में नया जोश व उमंग भरकर स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए प्रेरित किया। उनके आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की मुख्य बातें हैं-

  1. राष्ट्रवाद एक दैवी पुकार है – उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन को ईश्वरीय वरदान मानते थे। जबकि अरबिन्द राष्ट्रवाद को ईश्वरीय आदेश समझते थे। वे राष्ट्रवाद को राजनीति का अंग न समझकर धर्म का अंग मानते थे। उनके लिए राष्ट्रवाद एक दैवीय आदेश था और उसकी रक्षा के लिए वे दृढ़ संकल्प थे। उन्होंने राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हुए लिखा है-’’राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। यह देश में दैवी एकता को पापत करने की एक प्रबल महत्वाकांक्षा है। वह एक ऐसी एकता है जिसमें विधिवत् बहुत से व्यक्तियों की राजनीति, सामाजिक और आर्थिक विचारवाली, कार्य विभिन्न होते हुए भी मौलिक रूप से एक है। जो राष्ट्रीयता का आदर्श भारत विश्व के समक्ष उपस्थित करेगा उस मानव में समानता होगी, जांति-पांति, वर्ग-वर्ग में समानता होगी।’’ इससे स्पष्ट है कि उनकी विचारधारा में राष्ट्रवाद एक सनातन धर्म है। उन्होंने जनसाधारण को राष्ट्रवाद का आध्यात्मिक रूप समझकर स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करने की दिशा में प्रेरित किया है। उन्होंने जनता में स्वाधीनता के प्रति जो नया उत्साह जागृत किया है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रवाद ईश्वर प्रदत्त होने के कारण अमर है, यह सनातन धर्म होने के कारण एक विश्वास है और विश्वासी व्यक्ति को सनातन धर्म की रक्षा करने और अपना विश्वास बनाए रखने के लिए स्वाधीनता के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
  2. अरबिन्द का राष्ट्रवाद मानवता पर आधारित है – अरबिन्द का राष्ट्रवाद संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि विस्तृत है। यह सर्वव्यापक और सार्वभौमिक है। देश-काल की सीमाएं इसे बांधकर नहीं रख सकती। यह किसी विशेष जाति की श्रेष्ठता से सम्बन्धित न होकर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण पर आधारित है। उनका मानना था कि हिन्दू धर्म शाश्वत् धर्म है और सार्वभौमिक भी है। भारत का अस्तित्व ही इस धर्म के लिए है। सम्पूर्ण विश्व की मानवता का कल्याण हिन्दू धर्म का ध्येय है। इसलिए हमें एक विश्व-संघ या विश्व-राज्य की बात सोचनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा है कि इसके अन्तर्गत सभी राज्यों को स्वतन्त्रता आत्मनिर्णय के अधिकार द्वारा प्राप्त होगी और सभी देशों के हितों की समान रूप से रक्षा होगी। डॉ0 कर्ण सिंह ने कहा है-’’अरबिन्द का राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का है क्योंकि उसका उद्देश्य मानव कल्याण और मानव एकता है।’’ अरबिन्द ने अपनी रचनाओं में यह बात स्पष्ट रूप से कही है कि भारत का उत्थान मानवता के लिए होगा। इसलिए उनका राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है जो मानवता के कल्याण के लक्ष्य पर आधारित है।
  3. अरबिन्द का राष्ट्रवाद शक्ति का प्रतीक है – अरबिन्द राष्ट्रवाद को शक्ति का प्रतीक मानते थे। उन्होंने बंकिम चन्द्र चटर्जी के राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण करके इसे नया रूप दिया है। उन्होंने कहा है-’’तुम शास्त्र के संकटों से मत डरो। तुम्हारे मार्ग में रूकावट डालने वाली शक्ति कितनी ही बड़ी क्यों न हो, तुम चिन्ता मत करो। तुम स्वतन्त्र हो, यह ईश्वर का आदेश है और तुम्हें स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। यदि तुमने आत्म-स्वरूप को पहचान लिया है, तो तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। संसार में सत्य, प्रेम और श्रद्धा के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। दोगली भाषा मत बोलो, दुर्बलता को पास मत आने दो, हम से बढ़कर एक प्रचण्ड शक्ति हमें प्रेरत कर रही है कि सारे बन्धन तोड़ दो और एक आदर्श बन जाओ।’’ अरबिन्द ने जिस शक्ति की बात की है वह भौतिक शक्ति से अधिक तेज है। उन्होंने आध्यात्मिक उत्थान द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करने की बात कही है। उन्होंने भारत को एक भौगोलिक सत्ता की बजाय एक आध्यात्मिक सत्ता माना है।
  4. अरबिन्द का राष्ट्रवाद व्यापक है, संकुचित नहीं – अरबिन्द ने राष्ट्रवाद को भौतिक दृष्टि से न देखकर आध्यात्मिक दृष्टि से परखा है। उन्होंने संकीर्णता व स्वार्थों की परिधि से निकलकर अपने राष्ट्रवाद को प्रत्येक धर्म, जाति, समुदाय या वर्ग तक विकसित किया है। यद्यपि उनके राष्ट्रवाद का स्रोत हिन्दू संस्कृति है, लेकिन फिर भी उन्होंने मुस्लिम विरोधी भावना नहीं दर्शाई है। यह प्रत्येक धर्म को अपने में समेटे हुए है। अरबिन्द जैसा योगी व आध्यात्मिक का पैगम्बर अपने राष्ट्रवाद को हिन्दू धर्म की सीमाओं में नहीं बांध सकता था। उनका ध्येय राष्ट्रीयता का विकास करने का था। सभी धर्मों, जातियों व समुदायों को साथ लेकर चले बिना इस ध्येय की प्राप्ति नहीं हो सकती थी। उनकी दृष्टि प्रत्येक भारतीय के कल्याण की तरफ थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अरबिन्द का राष्ट्रवाद व्यापक था, संकीर्ण नहीं।
  5. अरबिन्द का राष्ट्रवाद प्राचीनता व आधुनिकता का मिश्रण है – अरबिन्द लम्बे समय तक इंग्लैण्ड में रहने के कारण पाश्चात्य सभ्यता से परिचित हुए जब वे 1893 ई0 में भारत वापिस आए तो उन पर पश्चिमी संस्कृति का पूरा रंग चढ़ा हुआ था। परन्तु भारत में रकर उन्हें अपनी गौरवमयी संस्कृति का आभास हुआ। उन्होंने गीता, वेदों व उपनिषदों से काफी ज्ञान प्राप्त हुआ। इस तरह उनका चिन्तन पाश्चात्य तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता का मिला जुला रूप बन गया। उन्होंने प्राचीनता व आधुनिकता में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रवाद से घृणा न करके उसे सम्मान दिया। उन्होंने लिखा है-’’हमें पश्चिमी राष्ट्रवाद से इसलिए घृणा नहीं करनी चाहिए कि उनकी उत्पत्ति भारत भूमि पर नहीं हुई। यदि हमें कोई अच्छी बात पश्चिम से मिले तो इसे अपनी परम्परा और परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार करने में कोई हानि नहीं है।’’
  6. अरबिन्द के राष्ट्रवाद का लक्ष्य पूर्ण-स्वराज है – अरबिन्द का मानना है कि मानव जाति के आध्यात्मिक जागरण में भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। ऐसा तभी सम्भव है तब उसे स्वाधीनता प्राप्त हो जाएगी। पूर्ण स्वराज्य ही सच्चे भारतीय राष्ट्रवाद का लक्ष्य हो सकता है, उससे कम कुछ नहीं। उनके लिए रष्ट्रवाद एक दिव्य सन्देश था जिसका प्रचार उसने विश्व स्तर पर करने की बात की है ताकि सम्पूर्ण मानव जाति को फायदा हो। इसलिए उन्हें सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का बेड़ा उठाने के लिए सबसे पहले स्वतन्त्रता का लक्ष्य प्राप्त करने पर जोर दिया है। उन्होंने अंग्रेजों के अधीन रहकर स्वतन्त्र रहने को निराधार बताया।
इस प्रकार उपरोक्त विचारों का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि अरबिन्द का राष्ट्रवाद आध्यात्मिक स्वरूप का था। उनके लिए राष्ट्रवाद एक दैवीय पुकार थी, जिसको प्राप्त करने के लिए भारत को हर कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने विश्व में मानवता का आदर्श स्थापित करने का विचार देकर मानवता की जो सेवा की है, उसे भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सार्वभौमिक व सर्वव्यापक रूप में राष्ट्रवाद को परिभाषित करके उसमें जो नयापन ला दिया है, वह अन्य राष्ट्रवादी विचारकों के विचारों में दिखाई नहीं देता, उन्होंने कहा था कि भारत को विश्व के आध्यात्मिक गुरु की भूमिका अदा करनी है। आज आध्यात्मिक दृष्टि से अरबिन्द का कथन सत्य साबित हो रहा है। आज धार्मिक सहिष्णुता और उदार राष्ट्रवाद का जो रूप भारत में है, वह अन्य देशों में कम ही देखने को मिलता है। लेकिन मानव एकता के आदर्श और आध्यात्मिक नेतृत्व का स्वप्न शीघ्र साकार होता नहीं लगता, यदि आज अरबिन्द के चिन्तन के गत्यात्मक पहलूओं पर विचार किया जाए तो उनके राष्ट्रवाद सम्बन्धी विचार शाश्वत् महत्व के हैं। उनके अनुसार आचरण करने में आज सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का मन्त्र निहित है। लेकिन दुर्भाग्यवश उनके विचारों को अमली जामा पहनाना नजदीक भविष्य में असम्भव व कठिन है।

मानव एकता का आदर्श

मानव एकता को आदर्श का सिद्धान्त अरबिन्द के राष्ट्रवाद से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण विचार है। राजनीति से संन्यास लेने के पश्चात् अरबिन्द ने अनेक रचनाएं लिखीं, उनमें से एक प्रसिद्ध पुस्तक है-’’मानव एकता का आदर्श’ (The Ideal of Human Unity)। अरबिन्द ने अपनी इस पुस्तक में मानव एकता का आदर्श प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली बाधाएं व उन्हें दूर करके इस आदर्श को प्राप्त करने के उपायों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है। उन्होंने इस पुस्तक में मानव की एकता और आदर्शों के प्रति जो मूल्यवान विचार प्रस्तुत किए, उससे वे मानवता के पैगम्बर व मसीहा बन गए हैं। मानव एकता के आदर्श में उन्हें आध्यात्मिकता का पैगम्बर बना दिया है। उन्होंने मानव एकता के आदर्श की जो कल्पना की है, वह सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकती है। उनका मानव एकता का सिद्धान्त उनकी दूरदर्शी सोच का परिणाम है। इससे अरबिन्द की मानसिक परिपक्वता का पता चलता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अरबिन्द जी मानवता व आध्यात्मिकता के बहुत बड़े मसीहा हैं।

अरबिन्द के मानव एकता के आदर्श के आधार

पांडिचेरी में रहते हुए अरबिन्द जी मानसिक रूप से इतने परिपक्व हो चुके थे कि उन्हें सम्पूर्ण विश्व में मानव जाति के उत्थान की कल्पना करनी शुरू कर दी थी। उनके जीवन का एक ही ध्येय बन गया-विश्व में मानवता का विकास, उन्होंने अपने इस ध्येय की प्राप्ति के लिए मानव एकता के आदर्श का सिद्धान्त प्रस्तुत किया ताकि प्रत्येक देश व प्रत्येक व्यक्ति भारत के आध्यातिमक उत्थान के महत्व को समझ सके। उनके मानव एकता के आदर्श के प्रमुख आधार हैं-

  1. प्रथम विश्व युद्ध – प्रथम महायुद्ध से उत्पन्न संकटों और परिस्थितियों ने विश्व के दार्शनिकों का ध्यान शांति स्थापना के प्रयासों की तरफ खींचा। इस युद्ध से हुई व्यापक जान-माल की हानि ने अरबिन्द घोष को इतना अधिक प्रभावित किया कि उन्होंने ‘मानव एकता का आदर्श’ पुस्तक की रचना कर डाली। उन्होंने स्वीकार किया है कि विभिन्न प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्रों के पारस्परिक द्वेष और स्वार्थी हित युद्ध को जन्म देते हैं। विभिन्न राष्ट्रों के हितों में टकराव के कारण मानव एकता का आदर्श प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि मानव एकता का आदर्श प्राप्त करना है तो हमें विश्व संघ की तरफ प्रस्थान करना चाहिए।
  2. इतिहास का दर्शन – अरबिन्द जी ने मानव एकता के आदर्श से प्रकृति की योजना का अंग मानते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यह स्वप्न अवश्य साकार होगा। उन्होंने इस आदर्श को प्रकृति की योजना का अंग मानते हुए आगे कहा कि हम एक-दूसरे के घटक हैं और एक यान्त्रिक तथा बाह्य आवश्यकता हमें एक-दूसरे के प्रति इतना अधिक आकर्षित करती है कि हम स्वयं को क्रमश: कबीले और ग्राम जैसे उत्तरोत्तर समूहों में संगठित करने लगते हैं। उन्होंने लिखा है-’’इतिहास बताता है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सदैव उत्तरोत्तर बड़ी इकाइयों का निर्माण करने की रही है। गांव अपने आप को राज्यों और राज्य अपने को साम्राज्य में संगठित करते रहे हैं।’’ इस प्रकार अरबिन्द जी ने अपने मानव एकता के आदर्श की पुष्टि इतिहास के आधार पर भी की है। उनका विश्वास था कि ऐतिहासिक विकास क्रम की प्रक्रिया के तहत एक दिन मानव की एकता का आदर्श इस धरती पर अवश्य प्राप्त होगा। 
  3. राज्य सामाजिक संगठन का सर्वोच्च रूप नहीं है – अरबिन्द का कहना है कि प्लेटो का आदर्श राज्य नगर राज्य तक ही सीमित था। अरस्तु ने भी नगर राज्य को ही सामाजिक व राजनीतिक संगठन का सर्वोच्च रूप मान लिया जबकि अरस्तु के शिष्य सिकन्दर महान ने विश्व-साम्राज्य की स्थापना करने का प्रयास किया था और उसे कुछ सफलता भी हाथ लगी। इसी तरह हीगल ने भी जर्मन राष्ट्रवाद का नारा देकर राष्ट्रीय राज्य की कल्पना का ही पोषण किया। इन सबको नकारते हुए अरबिन्द जी ने लिखा है-’’मेरी दृष्टि में राज्य की धारणा अपूर्ण है। राष्ट्रीय राज्य विकास क्रम का अन्तिम स्तर नहीं है। विकास क्रम का अन्तिम लक्ष्य तो मानव एकता का आदर्श है।’’ इससे स्पष्ट हो जाता है कि अरबिन्द ने राज्य के विचार का अतिक्रमण करके सम्पूर्ण मानव जाति को एक इकाई माना है। उन्होंने लिखा है-’’इस महान आदर्श को हम विश्व-राज्य के निर्माण द्वारा प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् राष्ट्र राज्यों को एक प्रकार के संघ में संगठित करके हम इस आदर्श को प्राप्त कर सकते हैं।’’ अत: अरबिन्द जी ने राज्य को सामाजिक संगठन का सर्वोच्च रूप मानने से स्पष्ट इंकार किया है।
  4. राज्य लोगों के सामूहिक स्वार्थवाद का प्रतिनिधि है – अरबिन्द घोष का मानना है कि राज्य लोगों के सामूहिक स्वार्थवाद का प्रतिनिधि है। सिद्धान्त रूप में तो राज्य का आदर्श अलग हो सकता है, लेकिन व्यवहार में राज्य एक साधन है जो व्यक्तियों के हितों का सामूहिक पोषण करता है। व्यवहार में गिने-चुने सत्तासीन लोग अपने स्वार्थों को बहुमत पर थोपते हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है कि व्यक्ति को उसके हित में राज्य को सौंप दिया जाए। लेकिन गलत बात तो यह है कि देश का शासन चलाने वाले भ्रष्ट और अनैतिक व्यक्ति हों। व्यवहार में प्राय: देखा जाता है कि भ्रष्ट, कपटी, बेईमान, धूर्त, फरेबी व्यक्ति ही सत्ता में आते हैं और सत्ता का दुरुपयोग करते हैं। इसलिए राज्य सामूहिक स्वार्थवाद के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने आगे लिखा है-’’व्यक्ति का स्वतन्त्र अस्तित्व है, उसकी अपनी आत्मा है जो स्वार्थ रहित दैनिक कार्य करने के योग्य हैं। परन्तु राज्य की कोई आत्मा नहीं होती और न ही राज्य नैतिक बन्धनों को मानता है।’’ इसलिए सामूहिक स्वार्थवाद की प्रवृत्ति को केवल मानव एकता के आदर्श को प्राप्त करके ही समाप्त किया जा सकता है।

मानव एकता के आदर्श की विशेषताएं


  1. मानव एकता का आदर्श प्राकृतिक विकास क्रम की योजना का एक भाग है – अरबिन्द का यह विश्वास था कि मानव एकता का आदर्श प्रकृति की योजना का ही एक भाग है। उनके अनुसार मानव एकता का आदर्श मानवीय अस्वीकार न होकर प्राकृतिक विकास क्रम का एक महत्वपूर्ण स्तर है। उसके विचारानुसार सभी मनुष्य एक दूसरे से सम्बन्धित है और ये सम्बन्ध आन्तरिक भावनाओं तथा बाहरी आवश्यकताओं के कारण हैं। प्राकृतिक प्रेरणा के कारण ही व्यक्ति परिवार में रहता है। इस प्रेरणा के कारण ही परिवार से गांव, गांव से नगर, नगरों से राज्य का विकास हुआ है। इसी भावना से मानव एकता का आदर्श भी प्राप्त किया जा सकेगा। अत: मानव एकता का आदर्श प्राकृतिक विकास क्रम की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  2. प्रत्येक व्यक्ति में गुप्त आत्मा का वास है – अरबिन्द का विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति में गुप्त आत्मा निवास करती है। अरबिन्द ने इसे दैवी सत्यता ;क्पअपदम त्मंसपजलद्ध का नाम दिया है। उनकी दृष्टि में यह मानवता दैवी सत्यता का ही प्रतीक है। इस गुप्ता आत्मा का अनुभव करना जरूरी है। इसके अभाव में आध्यात्मिक एकता की स्थापना नहीं हो सकती। यही आध्यात्मिक एकता मानव की एकता का आधार होगी। अरबिन्द ने आगे कहा है-’’मनुष्य की आत्मा में अन्य मनुष्यों के साथ सहयोग करने की भावना पाई जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि इस भावना को दृष्टिगोचर किया जाए और इसका विकास करने के प्रयास किए जाएं।’’
  3. मानव एकता के आदर्श की प्राप्ति अरबिन्द के राष्ट्रवाद का लक्ष्य है – अरबिन्द घोष ने मानव एकता के आदर्श को अपने राष्ट्रवाद का उद्देश्य बताया हैं उनके अनुसार राष्ट्रवाद राष्ट्र में दैवी एकता प्राप्त करने की एक तीव्र लगन है। यह एक ऐसी एकता है जिसमें व्यक्ति राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक आधारों के कारण भिन्न-भिन्न होते हुए भी मौलिक रूप से समान होंगे। राष्ट्रवाद का जो आदर्श भारत विश्व में प्रस्तुत करेगा उसमें हर मनुष्य, जाति और वर्ग में आपसी समानता होगी। इससे स्पष्ट है कि अरबिन्द की राष्ट्रवाद की भावना किसी जाति व वर्ग में एक-दूसरे के प्रति घृणा उतपन्न न करना होकर केवल मानवता की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करना था। उन्होंने भारत की स्वाधीनता पर जोर दिया ताकि भारत विश्व का आध्यात्मिक गुरु बन सके। उनका दृढ़ विश्वास था कि आध्यात्मिक शिक्षा के द्वारा ही मानव एकता के आदर्श को प्राप्त किया जा सकता है। उनका राष्ट्रवाद भौतिक सीमाओं से परे है अर्थात् सार्वभौमिक है। वह सब के कल्याण की चिन्ता पर आधारित है। उनका कहना था कि विश्व के कल्याण के लिए भारत को स्वाधीनता प्राप्त करना आवश्यक है ताकि मानवता की सच्ची सेवा के साथ-साथ विश्व को आध्यात्मिक नेतृत्व भी प्रदान किया जा सके।
  4. मानव एकता के आदर्श को प्रापत करने के साधन – अरबिन्द का मानव एकता का आदर्श विश्व संघ के रूप में सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का साक्षात रूप होगा यह संघ आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर आधारित विविधताओं पर आधारित होगा। इसमें सामूहिक व सामंजस्यपूर्ण जीवन को प्राथमिकता दी जाएगी। एकीकरण की इस प्रक्रिया में सभी व्यक्तियों को स्थान जाति, संस्कृति व आर्थिक सुविधा आदि के आधार पर अपने-अपने समूह बनाने की स्वतन्त्रता होगी। लेकिन ये समूह स्वार्थों की बजाय सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण की बात सोचेंगे और प्राथमिकता भी देंगे। शक्ति पर आधारित समूहों का विश्व संघ में कोई स्थान हीं होगा। स्वाभाविक समूहों के सिद्धान्त को स्वीकार कर लेने पर आदर्श एकीकरण का कार्य पूरा हो जाएगा और आंतरिक संघर्षों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं होगा। सम्पूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध मानवीय आधार पर पुष्ट होंगे और वर्तमान कटुता का वातावरण समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार अरबिन्द ने मानव की मनोवैज्ञानिक एकता को सिद्धान्त को लागू करके मानव जाति के आदर्श एकीकरण को सम्भव बनाया है। यदि यह मनोवैज्ञानिक एकता स्थापित हो जाए तो मानव एकता का आदर्श प्राप्त किया जा सकता है।
  5. मानव एकता के आदर्श के मार्ग में बाधाएं – अरबिन्द ने केवल मानव एकता के आदर्श को प्रतिपादित ही नहीं किया, बल्कि इसको प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं का भी वर्णन किया है। उनके मतानुसार सम्पूर्ण मानव जाति एक इकाई है और इस मानव एकता के आदर्श को प्राप्त करने में राष्ट्रीय राज्यों के स्वार्थवाद की भावना सबसे बड़ी बाधा है। अरबिन्द का मानना था कि स्वार्थी हितों से दूर रहकर ही मानव एकता का आदर्श प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने राज्य को सामूहिक स्वार्थवाद का नाम दिया और कहा कि इस सामूहिक स्वार्थवाद को मानवता के समक्ष मानवता का धर्म प्रस्तुत किए बिना समाप्त नहीं किया जा सकता। अरबिन्द के अनुसार-’’यदि हमें स्वतन्त्र विश्व संघ की स्थापना करनी है तो इस सामूहिक अहमवाद या स्वार्थवाद में आवश्यक संशोधन करना होगा और मानवता का आध्यात्मिक धर्म अपनाना होगा। यदि एक बार मानव जाति को इसकी अनुभूति हो गई तो एक ऐसी प्रबल मनोवैज्ञानिक एकता का उदय होगा जो मानव जाति के आदर्श एकीकरण को आसानी से प्राप्त कर लेगी।’’ 
उपरोक्त विचारों का अध्ययन कर लेने के बाद यह कहा जा सकता है कि अरबिन्द जी का समग्र चिन्तन आध्यात्मवाद पर आधारित है। उनका मानव एकता का आदर्श भी उनके आध्यात्मवाद पर ही आधरित है। उन्होंने निष्कर्ष तौर पर यह बात स्वीकार की है कि मानव एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सामूहिक स्वार्थवाद है। राज्य सामूहिक का प्रतिनिधि है। इसे समाप्त किए बिना मानव एकता का आदर्श प्राप्त नहीं किया जा सकता। राज्यों के संकीर्ण स्वार्थों ने विश्व को अनेक गुटों में बांट रखा है। आज अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध नैतिक मूल्यों से दूर हैं। आज सारा विश्व परमाणु युद्ध के आंतक में जी रहा है। मानव एकता के आदर्श को प्राप्त किए बिना विश्व की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। यदि हमें मानव जाति को विनाश से बचाना है तो अरबिन्द जी को मानव एकता के आदर्श को प्राप्त करने के प्रयास करने होंगे। ताकि सह अस्तित्व पर आधारित मानव समाज प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सके।

अरबिन्द का मूल्यांकन

अरबिन्द के चिन्तन का अध्ययन करने से यह बात साबित होती है कि वे एक आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के निर्माता पुरुष थे। वे एक महान योगी, सन्त, मानवता के पुजारी और मानवतावाद के पैगम्बर थे। उन्होंने सम्पूर्ण स्वाधीनता का आदर्श भारतवासियों के सामने रखा, राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन बनाया, आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया तथा मानव एकता का आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत किया। उनका ध्येय मानव जाति के कल्याण में निहित था। उनके चिन्तन का व्यापक अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि अरबिन्द एक विचारक ही नहीं थे बल्कि एक ऋषि थे जो कि हमको आत्म-ज्ञान प्रदान कर सकते थे। हरिदास चौधरी के अनुसार-’’अरबिन्द जी वास्तव में एक सृजनशील व्यक्ति हैं जिनका भूत, वर्तमान, भविष्य पर पूरा अधिकार है और उनकी दृष्टि पैगम्बरों जैसी है।’’ रोमन रोलैड ने उन्हें भारतीय विचारकों का राजकुमार कहा है। डॉ0 वर्मा ने कहा है कि अरबिन्द जी आधुनिक भारत के नवजागरण और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में एक महान विभूति हुए हैं और उनका चिन्तन अत्यन्त क्रमबद्ध और सुविस्तृत है।’’ उनका चिन्तन सार्वभौमिक, सार्वकालिक व सर्वदेशीय है। उनका चिन्तन भारत के लिए न होकर सम्पूर्ण विश्व और समस्त मानव जाति के लिए है। वे वर्तमान समय के सबसे बड़े राष्ट्रवादी और मानवतावाद हैं, निष्कर्ष तौर पर पर कहा जा सकता है कि उनका आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का सिद्धान्त और मानव एकता का विचार राजनीतिक चिन्तन के इतिहास मं एक महत्वपूर्ण देन है।

Comments