पाठ्यक्रम का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकृति

अनुक्रम
‘पाठ्यक्रम’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘करीक्यूलम’ (Curriculum) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। ‘करीक्यूलम’ शब्द लैटिन भाषा से अंग्रेजी में लिया गया है तथा यह लैटिन शब्द ‘कुर्रेर’ से बना है। ‘कुर्रेर’ का अर्थ है ‘दौड़ का मैदान’। दूसरे शब्दों में, ‘करीक्यूलम’ वह क्रम है जिसे किसी व्यक्ति को अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के लिए पार करना होता है। अत: पाठ्यक्रम वह साधन है, जिसके द्वारा शिक्षा व जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति होती है। यह अध्ययन का निश्चित एवं तर्कपूर्ण क्रम है, जिसके माध्यम से शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा वह नवीन ज्ञान एवं अनुभव को ग्रहण करता है। शिक्षा के अर्थ के बारे में दो धारणायें है - पहली, प्रचलित अथवा संकुचित अर्थ और दूसरी, वास्तविक या व्यापक अर्थ। संकुचित अर्थ में शिक्षा केवल स्कूली शिक्षा या पुस्तकीय ज्ञान तक ही सीमित होती है, परन्तु विस्तृत अर्थ में पाठ्यक्रम के अन्तर्गत वह सभी अनुभव आ जाते है जिन्हें एक नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ियों से प्राप्त करती है। साथ ही विद्यालय में रहते हुए शिक्षक के संरक्षण में विद्यार्थी जो भी क्रियायें करता है, वह सभी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत आती है तथा इसके अतिरिक्त विभिन्न पाठ्यक्रम सहगामी क्रियायें भी पाठ्यक्रम का अंग होती है। अत: वर्तमान समय में ‘पाठ्यक्रम’ से तात्पर्य उसके विस्तृत स्वरूप से ही है।

पाठ्यक्रम के अर्थ को और अच्छी तरह समझने के लिए हमें शिक्षा के विकास पर भी एक दृष्टि डालनी आवश्यक है। आदिकाल में शिक्षा का स्वरूप पूर्णतया अनौपचारिक होता था अर्थात् शिक्षा किसी विधि एवं क्रम से बँधी हुई नहीं थी। उस समय बालकों की शिक्षा उनके परिवार एवं समाज की जीवनचर्या के मध्य चलती रहती थी तथा बालक उसमें भागीदारी बनकर प्रत्यक्ष अनुभव एंव निरीक्षण के माध्यम से तथा अपने बड़ों एंव पूर्वजों के अनुभव सुनकर शिक्षा प्राप्त करता था, किन्तु सभ्यता के विकास के साथ - साथ मानव के ज्ञानराशि के संचित कोष में निरन्तर वृद्धि होती गयी तथा मनुष्य के जीवन में जटिलतायें एवं विविधतायें आती गयीं। परिणामस्वरूप व्यक्ति के पास समय और साधन का अभाव होने लगा तथा उसकी शिक्षा अपूर्ण रहने लगी। अत: प्रत्येक विकासशील समाज ने अपने बालकों को समुचित शिक्षा प्र्रदान करने के उद्देश्य से इसे विधिवत् एवं क्रमबद्ध बनाने के प्रयास प्रारम्भ किये। विद्यालयों का उद्भव तथा उनकी स्थापना इन्हीं प्रयासों का परिणाम है। इस उसने समाज को उपयोगी एवं महत्वपूर्ण ज्ञान अपने बालकों को समुचित ढंग से नहीं दे पा रहा था। उसने उसकी जिम्मेदारी अनुभवी विद्वानों को सौंप दी। इन विद्यालयों द्वारा बालकों को जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने तथा उन्हें समुचित ढंग से शिक्षा प्रदान करने हेतु जो ज्ञानराशि निश्चित एवं निर्धारित की गयी तथा की जाती है उसे ही ‘पाठ्यक्रम’ का नाम दिया गया है। इस प्रकार हम यह कह सकते है। कि पाठ्यक्रम अध्ययन का ही एक क्रम है, जिसके अनुसार चलकर विद्यार्थी अपना विकास करता है। अत: यदि शिक्षा की तुलना दौड़ से की जाये तो पाठ्यक्रम उस दौड के मैदान के समान है जिसे पार करके दौड़ने वाले अपने निश्चित लक्ष्य तक पहुँच जाते है।

पाठ्यक्रम की परिभाषा

विद्यालयों का प्रमुख कार्य बालकों को शिक्षा प्रदान करना होता है और इसको पूर्ण करने के लिए वहाँ पर जो कुछ किया जाता है उसे ‘पाठ्यक्रम’ का नाम दिया गया है। इसीलिए ‘पाठ्यक्रम’ को परिभाषित करते हुए एक विद्वान ने इसे हृाट ऑफ एजूकेशन (What of Education) कहा है। प्रथम दृष्टि में यह परिभाषा बहुत अधिक सरल एंव स्पष्ट प्रतीत होती है, परन्तु इस ‘हृाट’ की व्याख्या करना तथा कोई निश्चित उत्तर प्राप्त करना बहुत कठिन कार्य है। इस सम्बन्ध में अमेरिका के ‘नेशनल एजूकेशन एसोसिएशन’ ने अपनी टिप्पणी इस प्रकार की है - ‘‘विद्यालयों का कार्य क्या है ? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर कई बार अनेक ढंग से दिया जा चुका है, फिर भी बार - बार उठाया जाता है। कारण स्पष्ट है, यह एक ऐसा शाश्वत प्रश्न है जिसका उत्तर अन्तिम रूप से कभी दिया भी नहीं जा सकता है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर प्रत्येक समाज एवं प्रत्येक पीढ़ी की बदलती हुई प्रकृति एंव आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहता है।’’

इसी प्रकार शिक्षा के इतिहास से भी इस बात की पुष्टि होती है कि समय के साथ - साथ पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन होते रहे हैं तथा इसमें कभी व्यापकता और कभी संकीर्णता आती रही है, परन्तु शिक्षाविदों को जब इस बात का आभास मिला कि विद्यालयों में शिक्षित युवक सदैव अपने भावी जीवन में सफल नहीं हो पाते हैं तब यह निष्कर्ष निकाला गया कि जीवन की तैयारी के लिए पढ़ना-लिखना ही सब कुछ नहीं है। मनोविज्ञान के विकास ने भी इस धारणा को बल प्रदान किया कि मात्र अध्ययन-अध्यापन पर ही पूरा दबाव रखना बालकों के विकास की दृष्टि से न केवल एकांगी है, बल्कि अन्य प्रवृत्तियों के समुचित विकास के अभाव में हानिप्रद भी हो सकता है। इस दृष्टिकोण का प्रभाव विद्यालयों के कार्यक्रमों पर पड़ा और उनमें व्यापकता आनी प्रारम्भ हुई। अत: विद्यालयों में पाठ्य-विषयों के साथ-साथ ऐसी प्रवृत्तियों का समावेश भी किया जाने लगा, जिनसे बालकों में बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ स्वास्थ्य, सौन्दर्य-बोध, सृजनात्मकता तथा अन्य मानवीय एवं सामाजिक गुणों का समुचित विकास भी हो सके। इस प्रकार विभिन्न उतार-चढ़ाव के पश्चात् वर्तमान शताब्दी में पाठ्यक्रम की व्यापकता की दृष्टि से अनेक विद्वानों ने इसको अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है।

बबिट महोदय के अनुसार - ‘‘उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चौबीस घण्टे की जा रही समस्त क्रियायें पाठ्यक्रम के अन्तर्गत आ जाती है।’’

एक अन्य विद्वान ले के अनुसार - ‘‘पाठ्यक्रम का विस्तार वहाँ तक है, जहाँ तक जीवन का।’’

परन्तु इन विचारों को पाठ्यक्रम की समुचित परिभाषा मानना तर्कसंगत नहीं लगता है, क्योंकि पाठ्यक्रम का सम्बन्ध शिक्षा के औपचारिक अभिकरण विद्यालय से है तथा विद्यालय ही पाठ्यक्रम की सीमा भी है। इस दृष्टि से पाठ्यक्रम को विद्यालय के घेरे में ही परिभाषित करना उचित लगता है।

वाल्टर एस. मनरो के शब्दकोष के अनुसार - ‘‘पाठ्यक्रम को किसी विद्यार्थी द्वारा लिये जाने वाले विषयों के रूप में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम की कार्यात्मक संकल्पना के अनुसार इसके अन्तर्गत वह सब अनुभव आ जाते है जो विद्यालय में शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त किये जाते है।’’
इस संकल्पना के अनुसार पाठ्यक्रम विकास के अन्तर्गत प्रयुक्त किये जाने वाले अनुभवों के आयोजन में पाठ्यक्रम को व्यवस्थित करने, उसे क्रियान्वित करने तथा उसका मूल्यांकन करने सम्बन्धी पक्ष सम्मिलित होते है।

ब्लांडस के शिक्षा कोष के अनुसार - ‘‘पाठ्यक्रम को क्रिया एवं अनुभव के परिणाम के रूप में समझा जाना चाहिए न कि अर्जित किये जाने वाले ज्ञान और संकलित किये जाने वाले तथ्यों के रूप में। विद्यालय जीवन के अन्तर्गत विविध प्रकार के कलात्मक, शारीरिक एवं बौद्धिक अनुभव तथा प्रयोग सम्मिलित रहते है।’’

राबर्ट एम. डब्ल्यू. ट्रेवर्स से अपनी पुस्तक ‘इण्ट्रोक्शन टू रिसर्स’ में पाठ्यक्रम की गत्यात्मकता पर बल देते हुए लिखा है- ‘‘एक शताब्दी पूर्व पाठ्यक्रम की संकल्पना उस पाठ्य-सामग्री का बोध कराती थी जो छात्रों के लिए निर्धारित की जाती थी, परन्तु वर्तमान समय में पाठ्यक्रम की संकल्पना में परिवर्तन आ गया है। यद्यपि प्राचीन संकल्पना अभी भी पूर्णरूपेण लुप्त नहीं हुई है, लेकिन अब माना जाने लगा है कि पाठ्यक्रम की संकल्पना में छात्रों की ज्ञान - वृद्धि के लिए नियोजित सभी स्थितियाँ, घटनायें तथा उन्हें उचित रूप में क्रमबद्ध करने वाले सैद्धांतिक आधार समाहित रहते है।’’

सी.वी. गुड द्वारा सम्पादित शिक्षा कोष में पाठ्यक्रम की तीन परिभाषायें दी गई है, जो इस प्रकार है -
  1. ‘‘अध्ययन के किसी प्रमुख क्षेत्र में उपाधि प्राप्त करने के लिए निर्धारित किये गये क्रमबद्ध विषयों अथवा व्यवस्थित विषय-समूह को पाठ्यक्रम के नाम से अभिहित किया जाता है।’’
  2. ‘‘किसी परीक्षा को उत्तीर्ण करने अथवा किसी व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए किसी शिक्षालय द्वारा छात्रों के लिए प्रस्तुत विषय-सामग्री की समग्र योजना को पाठ्यक्रम कहते है।’’
  3. ‘‘व्यक्ति को समाज में समायोजित करने के उद्देश्य से विद्यालय के निर्देशन में निर्धाति शैक्षिक अनुभवों का समूह पाठ्यक्रम कहलाता है।
कनिंघम के अनुसार ‘‘पाठ्यक्रम कलाकार (शिक्षक) के हाथ में एक साधन है जिससे वह अपनी सामग्री (शिक्षार्थी) को अपने आदर्श (उद्देश्य) के अनुसार अपनी चित्रशाला (विद्यालय) में ढाल सके।’’

डीवी के अनुसार-’’सीखने का विषय या पाठ्यक्रम, पदार्थो, विचारों और सिद्धांतों का चित्रण है जो निरंतर उद्देश्यपूर्ण क्रियान्वेषण से साधन या बाधा के रूप में आ जाते हैं।’’

सैमुअल के अनुसार -’’पाठ्यक्रम में शिक्षार्थी के वे समस्त अनुभव समाहित होते हैं जिन्हें वह कक्षाकक्ष मे, प्रयोगशाला में, पुस्तकालय में, खेल में मैदान में, विद्यालय में सम्पन्न होने वाली अन्य पाठ्येतर क्रियाओं द्वारा तथा अपने अध्यापकों एवं साथियों के साथ विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से प्राप्त करता है।’’

होर्नी के शब्दों में -’’पाठ्यक्रम वह है जो शिक्षार्थी को पढ़ाया जाता ह। यह सीखने की क्रियाओं तथा शान्तिपूर्वक अध्ययन करने से कहीं अधिक है। इसमें उद्योग, व्यवसाय, ज्ञानोपार्जन, अभ्यास तथा क्रियायें सम्मिलित होती है। इस प्रकार यह विक्षार्थी के स्नायुमण्डल में होने वाले गतिवादी एवं संवेदनात्मक तत्वों को व्यक्त करता हैं समाज के क्षेत्र में यह उन सब की अभिव्यक्ति करता है जो कुछ जाति ने संसार के सम्पर्क में आने से किये हैं।’’

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार -’’पाठ्यक्रम का अर्थ केवल उन सैद्धान्तिक विषयों से नहीं है जो विद्यालयों में परम्परागत रूप से पढ़ाये जाते हैं, बल्कि इसमें अनुभवों की वह सम्पूर्णता भी सम्मिलित होती है, जिनको विद्यार्थी विद्यालय, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कार्यशाला, खेल के मैदान तथा शिक्षक एवं छात्रों के अनेक अनौपचारिक सम्पर्को से प्राप्त करता है। इस प्रकार विद्यालय का सम्पूर्ण जीवन पाठ्यक्रम हो जाता है जो छात्रों के जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करता है और उनके संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता देता है।

वेण्ट और क्रोनोबर्ग के अनुसार -’’पाठ्यक्रम का पाठ्यवस्तु का सुव्यवस्थित रूप है जो बालकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तैयार किया जाता है।’’

फ्रोबेल के मतानुसार -’’पाठ्यक्रम सम्पूर्ण मानव जाति के ज्ञान एवं अनुभव का प्रतिरूप होना चाहिए।’’

पाठ्यक्रम की प्रकृति

शिक्षा जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में निरंतर परिवर्तन एवं परिमार्जन होता है। व्यक्ति के व्यवहार में यह परिवर्तन अनेक माध्यमों से होते हैं, किन्तु मुख्य रूप से इन माध्यमो को दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है - औपचारिक एवं अनौपचारिक। औपचाारिक रूप के अंतर्गत वे माध्यम आते हैं जिनका नियोजन कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व्यवस्थित ढंग से संस्थापित संस्थाओं में किया जाता है। इस प्रकार की संस्थाओं को विद्यालय कहा जाता है, किन्तु व्यक्ति के परिवर्तन की प्रक्रिया विद्यालय एवं विद्यालयी जीवन में ही पूर्ण नहीं हो पाती है, बल्कि वह विद्यालय से बाहर तथा जीवन भर चलती रहती है। अत: व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले अनेक परिवर्तन विद्यालय की सीमा से बाहर की परिस्थितियों के परिणामस्वरूप होते हैं। चूँकि ऐसी परिस्थितियाँ सुनियोजित ढंग से प्रस्तुत नहीं की जाती हैं, अत: वे अनौपचारिक माध्यम के अंतर्गत आती हैं। विद्यालय में विद्यार्थियों को जो कुछ भी कक्षा एवं कक्षा के बाहर प्रदान किया जाता है, उसका निश्चित उद्देश्य होता है एवं उसे किसी विशेष माध्यम से ही पूरा किया जाता है। हमारी कुछ संकल्पनायें होती हैं कि एक विशेष कक्षा उत्तीर्ण 10 करने के बाद विद्यार्थी के व्यवहार में अमुक परिवर्तन आ जायेगा, परन्तु यह परिवर्तन किस प्रकार लाया जायेगा? किसके द्वारा लाया जायेगा? और कितना लाया जायेगा? आदि ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिनका समाधान पाठ्यक्रम जैसे साधन से प्राप्त होता है। अत: पाठ्यक्रम का संबंध शिक्षा के अनौपचारिक माध्यम से है।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र

सामान्य बोलचाल की भाषा, में विद्यालयों में विद्यार्थियों को शिक्षित करने हेतु जो कुछ कियाजाता है, उसे पाठ्यक्रम के नाम से जाना जाता है। विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने पाठ्क्रम को कुछ निश्चित शब्दों में बाँधने अथवा परिभाषित करने का प्रयास भी किया है, किन्तु पाठ्यक्रम के विस्तार क्षे? की सीमायें सुनिश्चित कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य है। फिर भी कतिपय मानवीय शैक्षिक एवं सामाजिक प्रवृत्तियों के आधार पर पाठ्यक्रम के विस्तार क्षेत्र की सीमाओं को चिन्हांकित करने का प्रयास किया गया है।

यदि हम पाठ्यक्रम के इतिहास पर एक दृष्टि डालें तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि पाठ्यक्र के अंतर्गत सम्मिलित किये जाने वाले ज्ञान का स्वरूप एवं विस्तार अनिवार्य रूप से संबन्धित समाज द्वारा मान्य शैक्षिक उद्देश्यों पर निर्भर करता है। इसीलिए देश और काल की भिन्नतार के अनुसार वहाँ के पाठ्यक्रमों में भिन्नता भी पायी जाती है। भारतीय संदर्भ में यदि हम वैदिक काल की शिक्षा पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि वैदिक काल में भारतीय शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य ईश्वर भक्ति एवं धार्मिक भावना को दृढ़ करना, बालकों का चरित्र निर्माण एवं उनके व्यक्तित्व का विकास करना तथा सामाजिक कुशलता में वृद्धि करना था। इस दृष्टि से उस समय का पाठ्यक्र भी अत्यन्त विस्तृत था। उसमें परा विद्या अर्थात् धार्मिक साहित्य का अध्ययन तथा अपरा विद्य अर्थात् लौकिक एवं सांसारिक ज्ञान दोनों का ही समावेश था। उस समय शिक्षा कार्य गुरूकुलों में होता था तथा शिक्षार्थी पूरे शिक्षाकाल में गुरूकुल या गुरू-परिवार के समस्य के रूप में रहता था। वह गुरू से ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ गुरू एवं गुरू-पत्नी की सेवा, आश्रम की सफाई, पशुओं की देखभाल तथा भिक्षाटन के माध्यम से कर्त्तव्यपालन, सेवाभाव, विनयशीलता तथा अन्य चारित्रिक गुणों की शिक्षा भी प्राप्त करता था। कभी-कभी शिक्षा प्राप्त करने हेतु शिष्यों को देशाटन पर भी जाना पड़ता था। इस प्रकार वैदिककालीन पाठ्यक्र में पठन-पाठन के साथ-साथ विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के समुचित अवसर भी प्राप्त होते थे तथा उसका सम्पादन भी अध्ययन कक्षों और समय के घण्टों में सीमित नहीं था।

इसी प्रकार यदि हम यूरोप के इतिहास का अध्ययन करें तो वहाँ के पाठ्यक्र के सीमा क्षेत्र का आभास मिलता है। प्राचीन यूनान के नगर राज्य स्पार्टा को प्राय: युद्धरत हरना पड़ता था, अत: वहाँ पर बालकों के शारीरिक विकास एवं शस्त्र विद्या पर अधिक ध्यान दिया जाता रहा, जबकि एथेन्स नगर राज्य में शान्ति एवं स्थायित्व होने वे वहाँ पर साहित्य, दर्शन एवं ललित कलाओं को अधिक महत्त्व दिया जाता था। प्रारंभ में यूरोप और अमेरिका में भी शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को पढ़ाने, लिखने एवं सामान्य गणना कर सकने के योग्य बना देना मात्र था। अत: उस समय पाठ्यक्रम भी 3 R's तक सीमित था। यह स्थिति एक लम्बी अवधि तक बनी भी रही, क्योंकि पाश्चात्य देशों में भी पाठ्यक्रम के अंतर्गत उन्हीं प्रवृत्तियों का समावेश किया जाता रहा जो कक्षा के अंदर पाठ पढ़ाते समय आयोजित की जाती थी। कालान्तर में भारत में भी अनेक राजनीतिक कारणों से पाठ्यक्रम का रूप पश्चिमी देशों जैसा ही हो गया तथा गुरूकुलों एवं आश्रमों के स्थान पर पाठशालाओं का उदय हुआ जिनका कार्य केवल पाठ पढ़ने-पढ़ाने तक ही सीमित रह गया। इस प्रकार पठन-पाठन से इतर प्रवृत्तियों को पाठशाला के क्षेत्र से बाहर की चीज माना जाने लगा।

शिक्षा के इतिहास से भी इस बात का पता चलता है कि समय के साथ-साथ पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन होते रहे हैं तथा इसमें कभी व्यापकता और कभी संकीर्णता भी आती रही है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण खेलकूद प्रवृत्ति की धारणा है। हमारे देश में अभी कुछ समय पहले तक अध्ययन एवं खेलकूद खेलकूद प्रवृत्ति को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता था, किन्तु बाद में जब इसका आभास हुआ कि विद्यालयों से निकले हुए युवक वास्तविक जीवन में असफल भी हो रहे हैं तब यह धारणा विकसित हुई कि जीवन की तैयारी के लिए पढ़ना-लिखना ही सब कुछ नहीं है।

मनोविज्ञान के विकास से भी बालकों की अन्य प्रवृत्तियों के समुचित विकास को महत्त्व मिला तथा यह माना जाने लगा कि केवल पठन-पाठन पर ही ध्यान देना बालकों के विकास की दृष्टि से एकांगी है। इस नवीन दृष्टिकोण का प्रभाव विद्यालयों के कार्यक्रमों पर पड़ा और उनमें व्यापकता विकसित हुई। अत: विद्यालयों में पाठ्य-विषयों के साथ-साथ ऐसी प्रवृत्तियों का समावेश भी किया जाने लगा जिनसे बालकों में बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ ऐसी प्रवृत्तियों का समावेश भी किया जाने लगा जिनसे बालकों में बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ स्वास्थ्य, सौन्दर्य-बोध, सृजनात्मकता तथा अन्य महत्त्वपूर्ण गुणों का विकास भी हो सके।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पूर्व में पाठ्यक्रम की संकल्पना में परिवर्तन आते रहे हैं, किन्तु बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से पाठ्यक्रम का क्षेत्र निरंतर व्यापकता की ओर बढ़ रहा है तथा इसके अंतर्गत विविध प्रवृत्तियों का समावेश होता चला जा रहा है। इसके क्षेत्र के विस्तार की गति वर्तमान समय में इतनी तेज है कि उसकी सीमा को चिन्हांकित करते ही उसमें कई अन्य प्रवृत्तियों का समावेश हो जाता है। इसी स्थिति को देखकर बबिट महोदय ने कहा भी है- ‘‘उच्चतर जीवन के लिए प्रतिदिन और चौबीसों घण्टे की जा रही समस्त क्रियायें पाठ्यक्रम के अंतर्गत आ जाती हैं।’’

प्रारंभ में पाठ्यक्रम का सीमा-क्षत्र विषयों की निर्धारित पाठ्यवस्तु तक ही सीमित था तथा शिक्षा का उद्देश्य सूचनात्मक ज्ञान प्राप्त करना होता था, किन्तु बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में शैक्षिक मनोविज्ञान, शैक्षिक समाजशास्त्र एवं शैक्षिक दर्शनशास्त्र आदि व्यवहार संबंधी विज्ञानों का तीव्र गति से विकास हुआ जिसका प्रभाव पाठ्यक्रम निर्माण पर भी पड़ा। साथ ही शिक्षण अधिगम के क्षेत्र में किये गये अनुसंधानों का भी पाठ्यक्रम के विकास पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। पूर्व में यह धारणा महत्त्वपूर्ण थी कि यदि शिक्षक अपने विषय ज्ञान का अच्छा ज्ञाता है तथा विषयवस्तु पर उसका स्वामित्व है तो वह सफल शिक्षण भी कर सकता है तथा वह ज्ञान बालकों को भी प्रदान कर सकता है, किन्तु यह धारणा प्राय: गलत सिद्ध होती हुई देखी गयी। मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों से इस तथ्य की पुष्टि हो गयी है कि जब तक शिक्षार्थी नवीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो, उसे कुछ भी सिखाया नही जा सकता है। साथ ही किसी नवीन ज्ञान को प्राप्त कर लेना ही बालक के लिए पर्याप्त नहीं होता। जब तक बालक उस नवीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो, उसे कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता है। साथ ही किसी नवीन ज्ञान को प्राप्त कर लेना ही बालक के लिए पर्याप्त नहीं होता । जब तक बालक उस नवीन ज्ञान को आत्मसात् नहीं कर लेता तब तक व्यावहारिक दृष्टि से उसकी कोई उपयोगीता नहीं होती है। इस प्रकार विभिन्न शोधों के द्वारा इस तथ्य की पुष्टि हो गयी कि अधिगम का परिपक्वता से संबंध होता है तथा अधिगम में व्यक्तिगत भेदों एवं प्रत्यक्ष अनुभव की विशेष भूमिका होती है। इस दृष्टिकोण ने विद्यालयों के कार्यो में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया। अब विद्यालयों का कार्य बालको को ज्ञान देने के स्थान पर ऐसी स्थितियाँ प्रस्तुत करना माना जाने लगा है जो बालकों को स्वानुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकें। इस धारणा के फलस्वरूप क्रिया आधारित पाठ्यक्रम की सफल्पना प्रस्तुत की गयी, जिसमें पाठ्यवस्तु के महत्व को बनाये रखते हुए उसके चयन एवं क्रियान्वयन के आधार को परिवर्तित कर दिया गया।

अनुभव एवं क्रिया आधारित पाठ्यक्रम को साकार रूप देने की दिशा में सर्वप्रथम प्रयास करने का श्रेय संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्जीनिया राज्य को है, जहाँ पर शिक्षाविदों ने शिक्षा के लक्ष्य को सूचनात्मक ज्ञान से हटाकर ‘सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण’ की और निर्देशित किया। इन शिक्षाविदों ने दो प्रमुख प्रश्नों-बालक को किस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहिए ? तथा उसे सामाजिक प्राणी होने के कारण किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए ? के विस्तृत उत्तरो के आधार पर शिक्षा के लक्ष्यों को निर्धारित किया। इन शिक्षाविदों ने यह अनुभव किया कि शिक्षा के निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु समुचित परिवेश सामाजिक जीवन के स्वाभाविक कार्यो को पूरा करने में ही मिल सकता हैं अत: पाठ्यक्रम को ऐसे कार्यो पर आधारित करने का निश्चय किया गया, जिसके फलस्वरूप विषयवस्तु के रूप में प्रतिष्ठित पाठ्यक्रम का स्थान ऐसी अभिवृत्तियों, अवबोधनों, योग्यताओं एवं क्षमताओं आदि ने ले लिया जो सामान्य सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकें। इस प्रकार पाठ्यक्रम ‘पाठ्य-सामग्री की सूची के स्थान पर अधिगमानुभवों के रूप में परिभाषित किया जाने लगा और उसे इस संकल्पना के रूप में प्रतिष्ठा भी प्राप्त हुई।

इस प्रकार वर्तमान समय में विद्यालय का कार्यक्षेत्र समयबद्ध पठन-पाठन के सीमित घेरे से निकलकर एक व्यापक रूप धारण कर चुका है तथा इसमें निरंतर वृद्धि भी होती जा रही है, जिसके कारण इसकी सीमायें निश्चित कर पाना बहुत कठिन होता जा रहा है। चँूकि विद्यालयों में आयोजित की जाने वाली सभी प्रवृत्तियाँ पाठ्यक्रम का ही अंग होती है। अत: पाठ्यक्रम के विस्तार क्षेत्र का निर्धारण करना भी उतना ही कठिन कार्य है। फिर भी शिक्षाविदों ने पाठ्यक्रम को उसके अन्तर्गत सम्पादित किये जाने वाले कार्यो के आधार पर सीमांकित करने का प्रयास किया है।

माइकेल पेलार्डी के अनुसार-’’सामान्यतया पाठ्यक्रम को विद्यार्थी के उन समस्त अनुभवों के रूप मे परिभाषित किया जाता है। जिनका दायित्व विद्यालय अपने उपर लेता है। इस रूप में पाठ्यक्रम का तात्पर्य प्राय: उन क्रमिक कार्यो से है जो इन अनुभवों से पूर्व इनके होने के साथ-साथ तथा इन अनुभवों के बाद आयोजित किये जाते है।’’ इन कार्यो को आठ वर्गो में समाहित किया जा सकता है-
  1. लक्ष्यों एवं उददेश्यों का निर्धारण,
  2. बालकों के संज्ञानात्मक विकास का पोषण,
  3. बालकों के मनोवैज्ञानिकों एवं सामाजिक स्वास्थ्य का संवर्धन,
  4. अधिगम हेतु व्यवस्था,
  5. शैक्षणिक स्त्रोतों का उपयोग,
  6. छात्रों का व्यक्तिगत बोध तथा उनके अनुरूप शिक्षण व्यवस्था,
  7. समस्त कार्यक्रमों एवं बालकों के कार्यो का मूल्यांकन,
  8. नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य
इन उपर्युक्त कार्यो को सम्पादित करने के लिए विद्यालयों में जिन प्र्रवृत्तियों का आयोजन किया जाता है। उनके प्रकार एवं संख्या में बहुत विविधता पायी जाती है किन्तु व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर इन्हे तीन प्रमुख वर्गो में वर्गीकृत किया जाता है-
  1. शैक्षिण क्रियायें,
  2. पाठ्य-सहगामी क्रियायें,
  3. रूचि कार्य।

शैक्षिण प्रवृत्तियाँ अथवा क्रियायें - 

यद्यपि विद्यालयों के समस्त क्रियाकलापों के साथ-साथ शिक्षा -क्षेत्र की सभी प्रवृत्तियाँ वे जहाँ भी, जिस रूप में भी चाहे जब भी आयोजित की जाती हों, शैक्षिण ही होती है किन्तु सामान्य रूप से उन्हीं प्रवृत्तियों को शैक्षिण कहा जाता है। जिनका नियोजन कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निर्धारित पाठ्य-विषयों के पठन-पाठन की दृष्टि से किया जाता है। इन प्रवृत्तियों का आयोजन मुख्य रूप से व्यावहारिक ज्ञान अर्थात् प्रायोगिक कार्यो का पाठ्यक्रम में समावेश होने तथा नवीन शिक्षण विधियों द्वारा बालकों की सक्रियता पर अधिक बल देने के फलस्वरूप प्रयोगशालायें, कार्यशालायें तथा पुस्तकालय आदि शैक्षिण प्रवृत्तियों के कार्यस्थल बन गये है। इसके साथ ही अब अधिगम अनुभवों अर्थात् विद्यार्थियों द्वारा वास्तविक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त करने पर भी अधिक बल दिया जाने लगा है। इस उददेश्य की पूर्ति हेतु विभिन्न भौगोलिक,वैज्ञानिक,औद्योगिक,धार्मिक,ऐतिहासिक,व्यावसायिक एवं सांस्कृतिक महत्व के स्थानों के भ्रमण एवं सर्वेक्षण आदि भी आयोजित किये जाते है। जहाँ पर छात्र जाकर वास्तविक स्थितियों का प्रत्यक्ष अनुभव करते है। अत: इन्हें भी शैक्षिक प्रवृत्तियों में ही सम्मिलित किया जाता है।

पाठ्य-सहगामी क्रियायें

प्रारम्भ में पाठ्यक्रम का क्षेत्र विभिन्न विषयों की पाठ्य-वास्तुओं के अध्ययन-अध्यापान तक ही सीमित माना जाता था। विद्यालयों में आयोजित होने वाली अन्य प्रवृत्तियों जैसे- खेलकूद, व्यायाम, सांस्कृतिक क्रियाकलाप आदि को पाठ्येतर क्रियायें माना जाता था परन्तु पाठ्यक्रम के व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर अब इन प्रवृत्तियों को पाठ्य-सहगामी क्रियाओं के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में विद्यालयों में शिक्षकों के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की पाठ्य-सहगामी क्रियायें आयोजित की जाती है जिन्हें कुछ प्रमुख वर्गो में निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-
  1. शारीरिक विकास संबंधी क्रियायें- इसके अन्तर्गेत शारीरिक प्रशिक्षण (पी.टी.) व्यायाम, खेलकूद, टे्रकिंग, पर्वतारोहण, हाइकिंग, तैराकी, नौकायन आदि क्रियाओं के साथ-साथ स्वास्थ्य परीक्षण रोगों से बचने के उपाय, शुद्धता एवं स्वच्छता का ध्यान, शुद्ध एवं पौष्टिक आहार (मध्यान्ह भोजन) आदि बातों को समाहित किया जाता है।
  2. साहित्यिक क्रियायें- इसके अन्तर्गत भाषण कला, वाद-विवाद, विचार-गोष्ठी, कार्य-संगोष्ठी, कविता-पाठ, अन्त्याक्षरी, परिचर्चा, वार्ता, आशुभाषण, पत्रिका प्रकाशन, लेखन, समाचार एवं पत्रवाचन तथा पुस्तकालय एवं वाचनालय के उपयोग आदि से संबंधित प्रवृत्तियों का समावेश किया जाता है।
  3. सांस्कृतिक क्रियायों- इसके अन्तर्गत एकल अभिनय, मूल अभिनय, नाटक प्रहसन, संगीत, नृत्य एवं अन्य मनोरंजनात्मक क्रियायें सम्मिलित होती है।
  4. सृजनात्मक क्रियायें- इस वर्ग में बालकों की रचना संबंधी प्रवृत्तियों जैसे चित्रकारी, पच्चीकारी, दस्तकारी, बागवानी, उपयोगी वस्तुओं का निर्माण एवं नवीनता की खोज आदि को समाहित किया जाता है।
  5. सामाजिक क्रियायें- विद्यालयों द्वारा बालकों के माध्यम से सफाई अभियान साक्षरता का प्रसार स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों का प्रचार सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने के लिए प्रचार अभियान आदि को संचालित करना इसके अन्तर्गत आता है।
  6. राष्ट्रीय क्रियाकलाप- इसके अन्तर्गत दिवसों एवं राष्ट्रीय नेताओं की जंयतियों को मनाना, राष्ट्रीय कैडेट कोर (एन.सी.सी.) स्काउटिंग, रेडक्रॉस, राष्ट्रीय सेवा योजना (एन.एस.एस.) आपातकाल में देश एवं समाज सेवा तथा आन्तरिक सुरक्षा में सहयोग, साम्प्रदायिक सद्भव में सहयोग तथा राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में सहयोग आदि प्रवत्तियाँ आती हैं।

रूचि कार्य 

इसके अन्तर्गत वे प्रवृत्तियाँ आती है जिनका आयोजन विद्यालयों द्वारा बालकों की रूचियों का समुचित विकास करने के उददेश्य से किया जाता है। इस प्रकार की प्रवृत्तियों में विभिन्न वस्तुओं जैसे-टिकट, सिक्के, पत्थर आदि का संग्रह करना, चित्र एवं कार्टून बनाना, फोटोग्राफी करना, बेकार पड़ी चीजों से उपयोगी वस्तुयें बनाना, विभिन्न प्रकार के चित्रों के एलबम तैयार करना आदि शामिल है। यद्यपि विद्यालयों में आयोजित की जाने वाली प्रवृत्तियों को उपर्युक्त तीन वर्गो में विभाजित करने का प्रयास किया गया है। किन्तु सही मायने में न तो इन प्रवृत्तियों की पूर्ण सूची तैयार की जा सकती है और न ही उन्हें निश्चित रूप से किसी एक वर्ग में रखा ही जा सकता है।

उदाहरणार्थ- वाद-विवाद, परिचर्चा, पैनल चर्चा आदि प्रवृत्तियों को पाठ्य-सहगामी प्रवृत्तियों के अन्तर्गत साहित्यिक प्रवृत्तियों में सम्मिलित किया जाता है किन्तु यदि इन्हीं प्रवृत्तियों को निर्धारित पाठ्यक्रम के किसी प्रकरण के अध्ययन-अध्यापन की विधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। तब यही शैक्षिक प्रवृत्तियाँ हो जाती है। इसी प्रकार व्यवस्था परिवर्तन के फलस्वरूप भी इनमें परिवर्तन होता रहता है। उदाहरणार्थ- खेल पाठ्य-सहगामी प्रवृत्तियों के अन्तर्गत आता है, किन्तु कुछ राज्यों ने इसे अब एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में एक निश्चित स्थान प्रदान किया है। अत: अब यह शैक्षिक प्रवृत्तियों में सम्मिलित हो गया है।

वास्तव में पाठ्यक्रम के विकास का इतिहास मानव जीवन के विकास की प्रक्रिया का ही परिणाम है। मानव द्वारा प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का अभियान, नवीन खोज एवं आविष्कार, निरन्तर परिवर्तित होने वाली सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, ज्ञान का विस्फोट तथा विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं आदि के द्वारा मानव को सदैव नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान निकालने के लिए मानव को अपनी वर्तमान अवस्था में यथोचित परिवर्तन-परिवर्द्धन करते रहना पड़ता है। समाज का भी यह प्रयास रहता है। कि वह बालकों को जीवन में ठीक प्रकार से समायोजित हो सकने हेतु उपयुक्त शिक्षा की व्यवस्था कर सके। अत: तदनुसार शिक्षा के उद्देश्यों एवं पाठ्यक्रम में उपयुक्त परिवर्तन एवं परिवर्द्धन की प्रक्रिया चलती रहती है। उदाहरणार्थ, प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली की स्थापना के परिणामस्वरूप विभिन्न देशों में नागरिकता की शिक्षा की आवश्यकता उत्पन्न हुई। औद्योगिक प्रगति के कारण बढ़ती हुई दुर्घटनाओं से बचाव हेतु पाठ्यक्रम में सुरक्षा शिक्षा तथा मालिक-मजदूर के झगड़ों के निराकरण हेतु पाठ्यक्रमों में समाजवादी दृष्टिकोण का समावेश किया गया। वैज्ञानिक प्रगति तथा आवागमन के साधनों के विकास के फलस्वरूप विभिन्न देशों को एक दूसरे के नजदीक जाने का अवसर प्राप्त हुआ, उन्हें एक-दूसरे के भूभागों एवं वैभव-सम्पन्नता की जानकारी प्राप्त हुई। अत: विकसित देशों ने दूसरे छोटे देशों एवं राज्यों को अपने अधिकार में करने तथा उपनिवेश स्थापित करने प्रारम्भ किये, जिसके कारण छोटी-छोटी लडाइयों के साथ-साथ दो विश्वयुद्धों से भी विश्व मानव जाति को गुजरना पड़ा। इसके समाधान हेतु अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव एवं विश्व शांति स्थापित करने के प्रयास किये जाने लगे। परिणामस्वरूप पाठ्यक्रमों में राष्ट्रीय एवं भावात्मक एकता तथा नागरिकता की शिक्षा के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव एवं विश्व-बन्धुत्व की शिक्षा का भी समावेश किया गया।

पाठयक्रम के क्षेत्र विस्तार के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रारम्भ में शिक्षा समाज के अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित थी। इस वर्ग को जीविकोपार्जन की कोई चिंता नहीं होती थी तथा वह अपने बालकों को अपने वर्गीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करता रहा। इसके फलस्वरूप पाठ्यक्रम भाषा, साहित्य, इतिहास, ललित कलाओं तथा सामान्य शिष्टाचार तक ही सीमित था किन्तु शिक्षा का प्रसार धीरे-धीरे मध्यम एवं निम्न वर्ग तक हो गया। इस मध्यम वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमाने हेतु व्यवसाय की अधिक चिन्ता रहती थी। अत: पाठ्यक्रम में बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावसायिक विषयों का समावेश भी कर दिया गया। अठारहवीं शताब्दी में यूरोप की औद्योगिक क्रांति ने पाठ्यक्रम मे अधिक से अधिक वैज्ञानिक एवं औद्योगिक विषयों को सम्मिलित करने के लिए सभी को बाध्य कर दिया। बाद में व्यवसायों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण व्यवसाय विशेष में विशिष्टता प्राप्त करने की होड़ में अनुकूल विषय के चयन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु पाठ्यक्रम में विभिन्न विकल्पों एवं धाराओं की व्यवस्था की गयी। छात्र अपनी योग्यताओं,क्षमताओं एवं अभिरूचियों के अनुसार सही विषय को चुन सकें, इसके लिए निर्देशन एवं परामर्श कार्यक्रम को भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। चूँकि बालक को व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ पारिवारिक, सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवन में भी समुचित समायोजन की आवश्यकता होती है। अत: निर्देशन एवं परामर्श का कार्यक्षेत्र व्यावसायिक के साथ साथ वैयक्तिक क्षेत्र तक फैल गया। तथा इससे सम्बन्धित विषयों जैसे-अवकाश के शिक्षा यौन शिक्षा आदि को पाठ्यक्रम का अंग माना जानो लगा। इसी प्रकार वर्तमान युग में जनसंख्या वृद्धि,महानगरों को घनी आबादी एवं गन्दी बस्तियों आदि के कारण मानव को विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के खतरे का सामना करना पड़ रहा है जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो रही है। अत: अब पाठ्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा, स्वास्थ शिक्षा एवं पर्यावरण शिक्षा को स्थान देना अनिवार्य होता जा रहा है। इसके साथ ही आधुनिक युग अन्तरिक्ष युग एवं कम्प्यूटर युग के रूप में विकसित हो रहा है। अत: अब पाठ्यक्रम में अन्तरिक्ष सम्बन्धी ज्ञान तथा कम्प्यूटर सम्बन्धी ज्ञान का अधिक से अधिक समावेश करने में काफी तत्परता से प्रयास किये जा रहे है। परिणामस्वरूप नित्य नये विषयों के नाम सुनने में आ रहे है। इस प्रकार हम देखते है कि मानव जीवन से सम्बन्धित हर एक पक्ष का पाठ्यक्रम पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है अर्थात पाठ्यक्रम में संशोधन एवं संवर्धन की प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक मानव का अस्तित्व है।

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