परामर्शदाता के गुण और कार्य

अनुक्रम
विशिष्ट एवं सुनिश्चित परिस्थितियों में ही परामर्श प्रदान किया जाता है तथा इसके लिए परामर्श देने वाले व्यक्ति में विभिन्न प्रकार की योग्यताओं एवं कौशलों का होना आवश्यक होता है। पूर्णतया प्रशिक्षित, व्यवसाय के प्रति निष्ठावान व्यक्ति ही इस प्रक्रिया को सम्पन्न कर सकता है उपबोधय में अपना विश्वास उत्पन्न करके उसे सहज और नि:संकोच रूप में अपनी बात कह देने के लिए प्रेरित कर देना ही स्वयं में एक ऐसी योग्यता है जिसका विकास सहज ही सम्भव नहीं है।

परामर्शदाता के गुण

एक कुशल परामर्शदाता में ये गुणों का होना आवश्यक है -
  1. परामर्शदाता में अच्छे पारस्परिक सम्बन्धों को विकसित करने का गुण होना आवश्यक है-दूसरों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना, अपनी विचारधारा की अपेक्षा दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति सहिष्णुता रखना, व्यक्तियों के अपने पर ध्यान  रखना, व्यक्तियों को समझना एवं स्वीकार करना, सामाजिक संवेदनशीलता, ईमानदारी, निष्ठा, व्यक्तियों से मिलने-जुलने की योग्यता व्यक्तियों में रूचि रखना, मौर्य, पारस्परिक सम्बन्धों में सौहार्द्र इत्यादि। 
  2. दूसरे व्यक्तियों को प्रभावित करने तथा नेतृत्व करने की योग्यता। अन्य व्यक्तियों की सहायता करना तथा सहयोग देना। ;
  3. स्वास्थ्य जीवन-दर्शन नागरिकता का भाव समावेश तथा मान्य मूल्य व्यवस्था, उत्तम आचरण, रूचिया एवं सौन्दर्य बोध, तथा मानव प्रकृति में आस्था होनी चाहिए।
  4. स्वास्थ्य, मृदुभाषी, आकर्षक रूपरेखा, स्वच्छता, इसके अलावा, उपबोध का ऐसा व्यवहार नहीं हो जिसका अन्य व्यक्ति हसी उड़ाये। 
  5. उच्च परिसकृत सामाजिक अभिरूचिया, बुद्धि, कार्यक्षमता, अभिक्षमताओं के प्रति झुकाव, तथ्यों का आदर, सामाजिक संस्कृति, व्यावहारिक निर्णय, सामान्य बुद्धि गुण का उपबोधक में होना आवश्यक है। 
  6. स्वयं की न्यूनताओं की जानकारी, नमनीयता, अनुवूफलन क्षमता के महत्व का भाव, आमोद-प्रमोद पूर्वानुभवों से लाभ उठाने की योग्यता, आत्म-विश्वास, स्वयं की समस्याओं के निराकरण हेतु विवेकयुक्त दर्शन, स्वयं के बारे में ज्ञान। यदि कोई सेवार्थी उपबोधक की बात का अन्य अर्थ लगा ले तो उसे सहिष्णुता के साथ स्पष्ट कर सकने की योग्यता, वैयक्तिक समायोजन के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती है। 
  7. वृत्तिक दृष्टिकोण, प्रेरणा-भाव शिक्षा के कार्य हेतु निष्ठा व उत्साह, वृत्तिक नैतिकता के प्रति गहन भावना, वृत्तिक विकास, कर्नव्य के निर्धारित समय के अलावा भी कार्य करने की इच्छा, निर्देशन कार्य में रूचि लेना, तथा उपबोधन को सहायता प्रदान करने वाले सम्बन्ध के रूप में कार्य करना। 
  8. उपबोधक में इतना कौशल होना चाहिए कि वह अनुभव या औपचारिक शिक्षण द्वारा अर्जित ज्ञान का उपयोग कर सकने में समर्थ हो सके। इसलिए उपबोधक को बौद्धिक रूप से जाग्रत रहना आवश्यक है। 
  9. उपबोधक का व्यवसाय का क्षेत्र विशिष्ट क्षेत्र होता है। अत: उपबोधक को इस विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित विशेष जानकारी प्राप्त करने हेतु प्रयत्न करने चाहिए। उपबोधक को भविष्य में पैदा होने वाली रोजगारों की सम्भावनाओं की जानकारी के साथ-साथ यह भी ज्ञात होना चाहिए कि उन विभिन्न व्यवसायों हेतु कौन-कौन सी योग्यताए एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त परामर्शदाता को व्यक्तियों की मनोवैज्ञानिक न्यूनताओं उनके संस्कारों एवं स्वभाव के बारे में भी गहन जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। 
  10. परामर्शदाता को विशिष्ट तकनीकों को प्रयुक्त करने में कुशल होना चाहिए जैसे-साक्षात्कार की तकनीक, नियोजन या स्थानापन की तकनीक। इन तकनीकों के अलावा उपबोधक को व्यावसायिक सूचनायें संग्रहीत करने तथा उनके विवरण व मापन परीक्षण की जानकारी होनी भी आवश्यक है। 
  11. उपबोध में सामान्य गुणों के अतिरिक्त, विशिष्ट गुणों को होना भी आवश्यक है जैसे-सन्तुलित व्यक्तित्व व्यवसाय के प्रति निष्ठा, सहानुभूति, सहयोग, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठता इत्यादि। इसके अतिरिक्त, उपबोधक को विवेकशील, दूसरे व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील एवं उत्साही भी होना चाहिए। 
  12. परामर्शदाता को अपने निकटस्थ के आर्थिक एवं सांस्कृतिक जगत को सामान्य जानकारी होनी चाहिए। विशेषत: व्यावसायिक जगत की विस्तृत जानकारी भी उसे होनी चाहिए। सारांश में उपबोध का सामान्य ज्ञान जीवन की विधि क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा समृण् होना चाहिए। रोयवबर के अनुसार-एक आदर्श उपबोधन की विशेषताओं का यह विस्तार उस व्यक्ति को प्रोत्साहित कर सकता है जो शोमा कार्यो हेतु चयनित क्षेत्र का विचार रखता है। 

परामर्शदाता के कार्य

  1. परामर्शदाता को अपने क्षेत्र अथवा सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए। 
  2. उसे सेवार्थी पर कोई समस्या थोपनी नहीं चाहिए। 
  3. परामर्शदाता का लक्ष्य सेवार्थी को समस्या से परिचित कराना है। 
  4. परामर्शदाता को किसी वस्तु को सही करने वाले के रूप में कार्य करना चाहिए। 
  5. परामर्शदाता को सेवार्थी के समक्ष समस्त सम्भावनाओं को प्रस्तुत कर देना चाहिए। 
  6. अन्तिम निर्णय सेवार्थी को ही लेना है। 
  7. परामर्शदाता को सेवार्थी की समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए। 
  8. परामर्शदाता को शिक्षा व व्यवसाय के मार्ग बन्द करने से पहले अन्य मार्ग खोल देना चाहिए। 
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान  में रखकर ही उपबोधक को कार्यो को करना चाहिए-
  1. सेवार्थी के बारे में आकड़े संकलित करना। 
  2. विभिन्न व्यवसायों से सम्बद्ध सूचनाओं को एकत्रित करना। 
  3. अनेक प्रकार की शिक्षा, शैक्षिक संस्था तथा प्रशिक्षण सुविधाओं से सम्बन्धित विभिन्न सूचनायें संकलित करना।
  4. साक्षात्कारों की समुचित व्यवस्था करना। 
  5. सामाजिक सम्बन्ध बनाना। 
  6. अनुगामी कार्य करना। 
  7. समुचित भौतिक परिस्थितिया तथा सेवाए उपलब्ध कराना। 
  8. उचित अनुमोदन तथा प्रक्रिया का अनुसरण करना। 

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