भारतीय संगीत का इतिहास

वस्तुत: सम्पूर्ण जगत संगीतमय है। अनादि काल से ही झरनों की झर-झर, वनों की सर-सर, नदियों की कल-कल, पक्षियों की चहचहाहट, भ्रमरों की गुनगुनाहट, सारंग की तरंग ध्वनि, विभिन्न पशुओं की भिन्न-भिन्न बोली इत्यादि में अर्थात् कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व की प्रत्येक गति या प्रवाह में संगीत निरंतर गुंजायमान है। ‘‘यद्यपि संगीत मानव के लिए नैसर्गिक है तथा संगीत ने किस प्रकार एक सुव्यवस्थित कला का रूप धारण किया है, उसका एक इतिहास है। 

भारतीय संगीत की उत्पत्ति के विषय में जितने ऐतिहासिक तथ्य हमें प्राप्त होते हैं उनका विवरण इस प्रकार है- ‘‘इतिहास शब्द इति+ह+आस से बना है। ‘इति’ का अर्थ है ‘ऐसा’ ‘ह’ का अर्थ है निश्चयपूर्वक ‘आस’ का अर्थ है ‘था’। इतिहास का अर्थ है ‘निश्चय पूर्वक ऐसा था’। इसीलिए अपने शास्त्रों में घटनाओं के क्रम-मात्र को इतिहास नहीं कहते, जो परम्परागत बातें चली आई हैं वे भी इतिहास में सम्मिलित हैं। हमारे जितने संगीत शास्त्र है वे सभी यह मानते चले आये हैं कि हमारी संगीत कला के आदि प्रेरक और उपदेशक देव-देवी रहे हैं।

भारतीय संगीत का इतिहास

हमारे आचार्यों का ऐसा विश्वास है कि शिव, ब्रह्मा, सरस्वती, गन्धर्व किन्नरादि संगीत के आदि प्रेरक हैं। ऐसा माना जाता है कि शंकर जी के डमरु से वर्ण और स्वर दोनों उत्पन्न हुए हैं। शंकर की शक्ति पार्वती, शिवा, दुर्गा भी संगीत की प्रेरक मानी गई है।

एक मतानुसार नारद जी ने कई वर्ष योग साधना की और महादेव जी ने उनकी भक्ति प्रसन्न होकर संगीत विद्या प्रदान की। नारद जी ने इसका भूलोक में प्रचार किया। पार्वती जी के शयन मुद्रा को देखकर महादेव जी ने उनके अंग-प्रत्यंगों के आधार पर ‘रुद्रवीणा’ बनाई और अपने पाँचों मुखों से पाँच रागों- भैरव, हिन्डोल, मेघ, दीपक और श्री को उत्पन्न किया तथा कौषिकी राग पार्वती जी द्वारा उत्पन्न किया गया। भारतीय संगीत पद्धति में मध्यकाल से वर्तमान काल तक मुख्य छ: राग ही स्वीकार किये जाते रहे है। ‘षिव-प्रदोश’ स्रोत में लिख है कि त्रिजगत जननी गौरी को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाकर शिव जी ने नृत्य प्रकट करने की इच्छा प्रकट की। सरस्वती ने वीणा, इन्द्र ने वेणु, ब्रह्मा जी ने करताल और लक्ष्मी जी गाने लगीं तथा भगवान् विष्णु मृदंग बजाने लगे। इस नृत्यमय संगीतोत्सव को देखने के लिए यक्ष, गंधर्व, सिद्ध, देवता, अप्सराऐं आदि भी वहाँ उपस्थित हो गये।

संगीत के प्रेरक के रूप में ब्रह्मा जी का नाम भी लिया जाता है। ब्रह्मा शब्द ‘बृह्’ अथवा ‘बृंह्’ धातु से बना है। इस धातु का अर्थ है आत्मविस्तार, ध्वनि होना, ध्वनि के भावों द्वारा हृदय को अभिव्यक्त करना। ब्रह्मा के मूल में ही शब्द या नाद है। अत: इन्हें संगीत का प्रेरक मानना सर्वथा उपयुक्त है।

‘‘संगीत की उत्पत्ति वेदों से हुई है। वेदों के रचयिता ब्रह्मा जी इस विद्या के धारणी थे। उन्होंने यह विद्या षिव जीे को और शिव जी द्वारा सरस्वती को और सरस्वती द्वारा नारद को प्राप्त हुई। नारद जी ने स्वर्ग में देव, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराओं को यह विद्या प्रदान की। वहाँ से भरत आदि ऋषि भू-लोक पर इस विद्या का प्रचार करने हेतु अवतरित हुए।’’

अनेक विद्वानों का मत है कि वीणा की देवी सरस्वती द्वारा ही संगीत की उत्पत्ति हुई है इसीलिए इन्हें ‘वीणा पुस्तक धारिणी’ भी कहा जाता है।

‘‘सरस्+वती’ शब्द सृ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘सरकना, गतिशील होना। सरस्वती ब्रह्मा की वह शक्ति हैं जिनके द्वारा ब्रह्मा में गतिषीलता आती है। इस शक्ति का पर्याय है शब्द या नाद। अत: माँ सरस्वती काव्य, संगीत इत्यादि ललित कलाओं की जननी हैं।’’ इन दिव्य शक्तियों के अतिरिक्त गन्धर्व स्वर्ग के संगीतकार माने गये हैं। इनसे भी मानव को संगीत की प्रेरणा मिली हे। संगीत-शास्त्र में नारद जी गन्धर्वों में से स्मरण किये गये हैं। यह वीणा के अविश्कारक माने गये हैं और नर और देव के बीच के दूत।

कहीं-कहीं ऐसा प्रसंग भी है कि शिव जी, ब्रह्मा जी तथा सरस्वती जी से भी पहले नारद जी को संगीत का ज्ञान था तथा उन्होंने ने ही पृथ्वी पर इस विद्या का प्रचार-प्रसार किया। गन्धर्वों के साथ किन्नरों का वर्णन भी मिलता है।

किन्नर की व्युत्पत्ति है- ‘किम् नर:’ अर्थात् क्या वह नर है अथवा कैसा नर है। किन्नर का पर्यायवाची शब्द है ‘किम्पुरुश’ जो कि उपर्युक्त मनुष्य से मिलता है और शरीर अश्व से किन्नर और गन्धर्व मानव और देव के बीच के कोई प्राणी माने गये हैं। गान्धर्व को युनानी भाषा में ‘केन्टार’ कहते हैं। जिसका वर्ण विन्यास लैटिन भाषा Centaur में हो गया है। अवेस्ता और प्राचीन ईरानी भाषा में इन्हें ‘गन्दरव’ और तामिल में ‘कुदिराइ’ कहते है। तामिल में कुदिराई का अर्थ होता है ‘अश्व’।’’ पुराणों में कहा गया है कि विश्व-सृष्टि से पूर्व अन्तरिक्ष का समय वायुमण्डल एक आश्चर्यजनक ध्वनि से गुंजायमान था। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, रक्षाकर्ता, एवं संहारकर्ता महादेव इन त्रयी शक्तियों का क्रमष: अभ्युदय हुआ। इन त्रयी शक्तियों ने मिलकर समग्र ब्रह्माण्ड की सृष्टि की ये त्रयी अत्यन्त संगीत प्रेमी थे। वेद चतुश्टय के स्रश्टा ब्रह्मा जी ने संगीत विद्या की सृष्टि करके उसे महादेव को एवं महादेव ने सरस्वती को प्रदान किया। ऋग्वेद में उल्लिखित नटराज का डमरू विश्व के प्राचीनतम वाद्ययन्त्र के रूप में स्वीकृत है। डमरू व पिनाक उद्भावक स्वयं महादेव एवं शंख के अविश्कारक विष्णु थे। शंख गहरे समुद्र से प्राप्त होता है, जिसकी ध्वनि पवित्रमय एवं मंगलमय मानी जाती है।

भारतीय परम्परा जिन लोगों ने संगीत कला को आत्मसात किया वह सभी भी गन्धर्व कहलाते थे। सम्भवत: इसी कारण इस विद्या को ‘गान्धर्व-वेद’ तथा इस कला को गान्धर्व कहा जाने लगा।

गान्धर्व कला में गीत सबसे प्रधान रहा है। आदि में गान था। वाद्य का निर्माण पीछे हुआ। यही कारण है कि चाहे गीत हो चाहे वाद्य सबका नाम ‘संगीत’ पड़ गया। बाद में नृत्य भी इसमें अन्तर्भाव हो गया।

नारद में भी अपने शिक्षा-ग्रन्थ ‘नारदीय-शिक्षा’ में ना सिर्फ शरीर के विभिन्न भागों द्वारा संगीत के सप्तस्वरों की उत्पत्ति को माना है अपितु इन स्वरों के वर्ण, जाति, पशु, पक्षी, देवता आदि का भी विषेश वर्णन किया है। यथा-

‘‘कण्ठादुत्तिश्ठते शड्ज: षिरसस् ठादुुित्तिश्ठते ज्त्वृश्ृशभ: स्मृतृत:।
गान्धारस त्वनुनुनासिक्य उरसो मध्यम: स्वर:।।5।।
उरस: षिरस: कण्ठादुुित्थित: पंचंचम: स्वर:।
ललाटाद् धैवैवतं विद्यान् निशादं सर्वर्ससन्धिजम्।।6।।

अर्थात् शड्ज स्वर कण्ठ से उत्पन्न होता है, ऋशभ स्वर षिर से उत्पन्न माना जाता हैं, गांधार स्वर नासिका के समीपस्थ स्थान से उत्पन्न माना जाता है, मध्यम स्वर वक्ष:स्थल से उत्पन्न माना जाता है, पंचम स्वर वक्ष:स्थल, षिर और कण्ठ इन तीनों ही स्थानों से उत्पन्न माना जाता है, धैवत स्वर को ललाट से उत्पन्न जाने, निशाद स्वर को कण्ठादि सभी सन्धिस्थानों से उत्पन्न जानें।।

‘‘अन्य परम्परा के अनुसार संगीत का उद्गम पषु-पक्षियों की ध्वनियों से हुआ है। मतंग की बृहद्देषी में कोहल के नाम से निम्न “लोक उपलब्ध है’’-
‘‘शड्ज्जं वदति मयरूरू ऋशभं चातको वदेतेत।
अजा वदति गांध्ंधारं क्रौंचों वदति मध्यम्।।
पुश्पसाधारणे काले कोकिल: पंचमो वदेतेत्।
प्रा्रावृटृट्क्काले तु सम्प्रा्राप्ते धैवैवतं दर्रूरो वतेत्।।

अर्थात् मोर शड्ज में बोलता है, चातक ऋशभ में बोलता है। बकरी गांधार में बोलती है, कौंच मध्यम में बोलता है। बसन्त में कोयल पंचम (स्वर) में बोलती है। वर्षाकाल में मेढ़क धैवत में बोलता है तथा हाथी निशाद में बोलता है।

पुराणों में कहा गया है कि विश्व सृष्टि से पूर्व अन्तरिक्ष का समय वायुमण्डल एक आश्चर्यजनक ध्वनि से गुंजायमान था। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, रक्षाकर्ता विष्णु एवं संहारकर्ता महादेव इन त्रयीशक्तियों का क्रमश: अभ्युदय हुआ। इन त्रयि शक्तियों ने मिलकर समस्त ब्रह्माण्ड की सृष्टि की। यह त्रयी अत्यंत संगीतप्रेमी थे। वेद चतुष्ट्य के सृष्टा ब्रह्मा जी ने संगीत विद्या की सृष्टि करके उसे महादेव को एवं महादेव ने सरस्वती को प्रदान किया। ऋग्वेद में उल्लिखित नटराज का डमरू विश्व के प्राचीनतम वाद्ययन्त्र के रूप में स्वीकृत है। डमरू व पिनाक उद्भावक स्वयं महादेव एवं शंख के अविष्कारक विष्णु थे। शंख गहरे समुद्र से प्राप्त होता है, जिसकी ध्वनि पवित्रतम् एवं मंगलमय मानी जाती है।

‘‘अपने पाष्र्वस्थ पशु तथा प्रकृति की विभिन्न ध्वनियों को सनुकर तथा उनकी मंजुमंजुलता को अनुभूत कर स्वयं ऐसी ही ध्वनियों को गाने की प्रेरणा आदिम मानव को हुई हो, तो कोई आश्चर्य नहीं है। वंश अथवा वेणु की कल्पना उनसे सछिद्र वंषवृक्षों से उद्भूत होने वाली ध्वनि को सुनकर की हो, इसमें सन्देहावकाष नहीं है। उसी प्रकार मृगया तथा युद्ध के समय पर धनुष की प्रत्यंचा से उद्भुत होने वाली टंकार को सुनकर तन्तुवाद्य की कल्पना की हो, ऐसी यथार्थ कल्पना की जा सकती है। इसके समर्थन में वैदिक तथा रामायणकालीन वाड़्मय में वीणा के लिए प्रयुक्त होने वाले ‘ज्या’ शब्द का तथा प्राचीन तामिल साहित्य में इसी के समानार्थक ‘याझ’ शब्द का उल्लेख किया जा सकता है। नाट्यषास्त्र के अनुसार मृदंग वाद्य की परिकल्पना पत्तों पर गिरने वाले जल बिन्दुओं के आघात शब्दों से हुई है।

मात्र हमारे देष में ऐसी धारणा नहीं है कि देवी-देवताओं द्वारा संगीत की उत्पत्ति हुई है अपितु अरब, फारस, युनानादि पाश्चात्य देशों में भी विद्वान ऐसा ही विश्वास प्रकट करते हैं।

‘‘संगीत के लिए यूनानी भाषा में शब्द है ‘मौसिकी’ ;डवनेपामद्ध लैटिन में ‘मुसिका’ (Musica) फ्रॉसीसी में ‘मुसीक’ (Musique), पोर्तुगी में ‘मुसीका’ (Musica), जर्मन में ‘मूसिका’ (Musik). अंग्रेजी में ‘म्युजिक’ (Music) इब्रानी, अरबी एवं फारसी में ‘मोसीकी’ यह सभी शब्द युनान भाषा के ‘म्यूज’ शब्द से बने हैं। ‘म्यूज’ यूनानी परम्परा में काव्य एवं संगीत की देवी मानी गई है। कोष में म्यूज शब्द का अर्थ दिया है ‘‘दि इन्सपायरिंग गॉडेस ऑफ साँग’’ अर्थात् गान की प्रेरिका देवी। म्यूज ज्यौंस की कन्या मानी गई है। ‘ज्यौंस’ शब्द संस्कृत के ‘द्यौस्’ का ही रूपान्तर है जिसका अर्थ है ‘स्वर्ण’।।’’ ज्यौंस तथा म्यूज की यह धारणा हमारे देव-देवी ब्रह्मा जी व सरस्वती जी से साम्यता रखती है।

इस प्रकार विभिन्न देशों, धर्मों, सभ्यताओं आदि में संगीतोत्पत्ति की विविध कथाऐं व्याप्त हैं। इस फारसी कथा के अनुसार- ‘‘हजरत मूसा पहाड़ों पर घूमते-फिरते कुदरत के नज़ारे देख रहे थे। आकाशवाणी हुई ‘‘या मूसा हकीकी, तू अपना कासा इस पत्थर पर मार’’ हजरत मूसा ने वैसा ही किया। पत्थर के सात टुकड़े हो गये और प्रत्येक टुकड़े से जलधारा बहने लगी। सात जलधाराओं में सात भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ उत्पन्न हुई जो स, रे, ग, म, प, ध, नि कहलाई।’’

फारस में यही कथा विभिन्न प्रकार से जन मानस में व्याप्त है। कुछ के अनुसार- नाव से सैर करते समय हजरत मूसा को एक पत्थर दिखा तभी जेबुरायल नामक फरिश्ता आया और बोला ‘‘इस पत्थर को तुम सदा अपने पास रखना’’। एक दिन जंगल में घुमते समय इन्हें प्यास लगी। पानी न मिलने पर उन्होंने खुदा से प्रार्थना की फलस्वरूप वर्षा होने लगी और उनकी प्यास बुझी। वर्षा जल उस पत्थर पर भी पड़ा जिससे उसके सात भाग हो, उसमें से जल धाराएँ बहने लगी। इन धाराओं से सप्त ध्वनियाँ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, उत्पन्न हुई। 

कुछ विद्वानों का मत है कि वर्षा जल से पत्थर के सात भाग होने, तथा सप्त ध्वनि प्रस्फुटित होने के बाद आकाशवाणी हुई- ‘‘हे मूसा इन आवाजों को स्मृण कर लो’’। यूनान में भी संगीत की उत्पत्ति से एक कथा जुड़ी है। ‘‘यूनान में फैनिक्स (Phoenix) नामक एक पक्षी है जिसे फ्रांस में ‘अतिषेजन पुकारते है ‘कोहकाक’ नामक पर्वत पर रहता है। इस पक्षी की संख्या पृथ्वी पर केवल एक ही है और इसकी आयु सहस्त्र वर्ष होती है। इसकी चोंच मे बाँसुरी की भाँति सात छिद्र होते है। जब उसकी आयु पूर्ण हो जाती है तो वह मस्त हो जाता है। उसी मस्ती की अवस्था में घास-फूस और टूटी-फूटी टहनियाँ एकत्रित करके ढेर सा लगा देता है।’’

‘‘चाल्र्स डारूइन का कहना है कि पशु-पक्षियों के ध्वनि के अनुकरण से मानव को संगीत मिला। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलफ्रेड आइनस्टाइन ने भी इस मत का समर्थन किया है। पाश्चात्य दार्शनिक रूसो, हर्बर्ट स्पेन्सर आदि का कहना है कि उच्च स्वर में वार्तालाप से संगीत का विकास हुआ। ऐतिहासिक रोबोथम कथन इससे कुछ भिन्न है। वह कहते है कि किसी भी वस्तु के आविष्कार का मूल कारण है, प्रबल इच्छा। इच्छा से ही संगीत की सृष्टि हुई है। किन्तु हम्बली ने रूडाइन का मत स्वीकारते हुए कहा है-

अब वह उन टहनियों के ढेर को मादा कल्पना करके चहकता है, मयूर की भाँति नृत्य करता है। तथा अपने पंख फड़फड़ाता है। परिणाम स्वरूप उसकी चोंच से वायु का आवागमन आरम्भ हो जाता है और भिन्न-भिन्न प्रकार की राग-ध्वनियाँ उत्पन्न हो उठती है। जब दीपक राग के स्वरों का संचार होता है तो उसके पंखों से अग्नि उत्पन्न हो जाती है तथा वह टहनियों के साथ जलकर राख बन जाता है। जब उस पर वर्षा होती है तो प्राकृतिक रूप से भस्म से एक अण्डे का उद्भव होता है और उस अण्डे से पुन: एक पक्षी का जन्म होता है।

वर्तमान में यह पक्षी है अथवा नहीं, यह तो खोज का विषय है परन्तु कथानुसार इस पक्षी की आवाज से राग-रागिनीयों का जन्म हुआ है। इसी प्रकार कुछ विद्वानों ने ‘बुलबुल’ को संगीत की जन्मदात्री बताया है तो कुछ ने ‘‘लिंडा’’ नामक चिड़िया कों। ‘‘ईसा मसीह ने सर्वप्रथम ‘लिंडा’ का स्वर सुना। इसीलिए ईसामसीह ने सर्वप्रथम संसार को संगीत प्रदान किया।’’ यह मत तो सर्वथा काल्पनिक प्रतीत होता है। ‘‘इतिहास कहता है कि ईसा से हज़ारों वर्श पूर्व संगीत विराजमान था और अपनी चर्म पर थी।’’ इस लिए केवल काल्पनिक तथ्यों पर विचार करना कठिन है।

भारतीय संगीत का इतिहास

1. प्रागैतिहासिक काल - 

इस काल में मनुष्य पूर्णरूपेण प्रकृतिस्थ प्राणि था मानव-मुख से नि:सृत स्वाभाविक ध्वनियांँ ही उसका संगीत थीं। पूर्व-पाशाणकाल में आधुनिक मंजीरा वाद्य के समान पत्थर से निर्मित अग्सा नामक वाद्य बनाया गया था। उत्तर-पाशाणकाल में संगीत का कुछ विकास हुआ। तत्पश्चात धातुयुग में संगीत का कुछ अधिक विकास हुआ। इस युग के लोग पर्वोत्सवों को गीत-नृत्य के साथ मनाते थे। 

उपर्युक्त विवरण से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि इस काल में गीतों का विकास हो चुका था तथा अनेक छन्द बन चुके थे, जोकि सांगीतिक रूप से गाये जाते थे। अत: स्पष्टतया कहा जा सकता है कि उस समय प्रागैतिहासिक-कालीन संगीत विकसित था एवं उसका स्तर भी उत्कृष्ट था।

2. सिन्धु घाटी की सभ्यता काल -

ईसा से सहस्रों वर्ष पूर्व सिन्धू नदी की घाटी में एक उन्नत एवं समृद्ध सभ्यता का प्रस्फुटन हुआ। यही भारत की प्रथम सभ्यता थी। संगीत कला का जितना गहरा एवं विषद ज्ञान इस सभ्यता में मिलता है इससे पूर्व कही नही मिलता मोहन जोदड़ों तथा हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त पुरातत्वावषेशों से यह विदित होता है कि तत्कालीन जीवन में संगीत का पर्याप्त प्रचलन था। धार्मिक एवं लौकिक समारोंहों में गीत, वाद्य एवं नृत्य द्वारा मनोरंजन होता था। खुदाई में प्राप्त ताबीजों पर नृत्य और वाद्य के संकेत मिलते है तथा साथ ही नृत्य करती हुई स्त्रियों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। चीनी मिट्टी का एक ऐसा ताबीज प्राप्त होता है जिस पर एक मनुष्य ढोल बजाते हुये तथा सामने कुछ मनुष्य नृत्य करते हुए दिखाई पड़ते है। इसके अतिरिक्त सतलज के किनारे अम्बाला से साठ मील उत्तर में रोपड़ नामक स्थान पर भी विविध प्रकार के संगीत-वाद्यों के चिन्ह प्राप्त हुए है। इस स्थान पर एक नृत्यरत नारी प्राप्त हुई है, जोकि चार तारों की वीणा पर वादन कर रही है। यहीं पर मिले कुछ सिक्कों पर वीणा के चित्र भी प्राप्त हुए है। ये सिक्के समुद्रगुप्त के समय है। 

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री कीर्डियल शोम्स ने सिन्धु घाटी की सभ्यता के विषय में लिखा है कि ‘‘भारतीय’’ संगीत विश्व के संगीत में पहले भी अग्रगणीय था। इस काल में नृत्य एवं गीत के साथ-साथ वाद्यों का भी पर्याप्त प्रचार था। मोहनजोदड़ों एवं हड़प्पा की खुदाई में उपलब्ध दो मुद्राओं में दीर्घाकार ढोलक अंकित है जिनके दोनों मुख चर्म में मढ़े हुये है। इस प्रकार उस समय संगीत का रूप विकसित एवं स्तर उत्कृष्ट था।

3. वैदिक काल -

ईसा से लगभग 2000 वर्ष पूर्व का वेदों का रचना-काल ‘‘वैदिक काल’’ कहलाता है। वैदिक काल में ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद-इन चतुर्वेदों की रचना हुई। आधुनिक भारतीय संगीत का प्रादुर्भाव वैदिक-कालीन सामगान से माना गया है। सामवेद पूर्णतया संगीतमय है। यही कारण है कि चारों वेदों में सामवेद का एक विशिष्ट स्थान है। श्रीमद्भागवदगीता में श्री कृष्ण ने ‘‘वेदानाम् सामवेदोंSस्मि’’ कहकर सामवेद की महत्ता की पराकाष्ठा को सुस्पष्ट कर दिया है। ‘‘साम’’ शब्द का मूल आधार गान अथवा गेय वस्तु रहा है। सामगान में वाणी की सुस्पश्टता का और उसको विविध प्रकार से गाने का विधान था। सामगान का प्रारम्भ और समापन दोनों ही ऊँ स्वर द्वारा सम्पन्न होते थे। इसके अतिरिक्त रिगवेद में गायन के साथ साथ वाद्यों के निरन्तर साहचर्य के उद्धरण भी मिलते । तैत्तरीय ब्राम्हण एवं सामण के भाश्य के अनुसार वैदिक काल के संगीतज्ञ ताल पद्धति से पूर्णत: परिचित थे। सामगान में प्रथमत: उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित का ही प्रयोग होता था।

कुछ अन्य विद्वानों के मतानुसार प्रारम्भ में मूल स्वर उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित ही है, जिनसे अन्य स्वरों का विकास हुआ पाणिनि ने भी उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित इन तीन मूल स्वरों के विकास के द्वारा ही अन्य स्वरों के तथ्य को स्वीकारते हुए अपने ग्रन्थ ‘‘सिद्धान्त-कौमुदी’’ में लिखा है कि ‘‘निषाद और गान्धार उदात्त, ऋषभ एवं धैवत अनुदात्त तथा शड्ज माध्यम एवं पंचम स्वरित स्वरों पर आधारित है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक काल, से 1000 ईसा पूर्व ही ‘‘सा रे गा म प ध नि’’ ये सात स्वर प्रचार में आ गये थे। इनमें से प्रत्येक स्वर एक दूसरे से ऊँचा कहा गया है। नारद ने अपने ग्रन्थ ‘‘भरत-भाष्य’’ में स्वरों की उच्चता-नीचता को स्पष्ट किया है।

4. प्राचीन काल -

वैदिक युग के पश्चात पुराणों में यथा-मार्कण्डेय पुराण, वायु-पुराण एवं स्कन्द-पुराण आदि में तथा रामायण व महाभारत जैसे महाकाव्यों में संगीत सम्बन्धी चर्चा हुई है। इस काल में संगीत के प्रयोगात्मक पक्ष का विकास हुआ तथा नृत्य की नवीन “ौलियों का सृजन हुआ। इसी काल में लोक-संगीतों एवं लोक-नृत्यों का प्रचार-प्रसार भी बढ़ा। उत्सवों और मेलों में गायन, वादन एवं नृत्य का सामूहिक रूप से आनन्द लिया जाता था।

मार्कण्डेय-पुराण के 23 वें अध्याय में संगीत का विस्तृत विवेचन हुआ है। छान्दोग्य-उपनिषद् में गीत वाद्य एवं नृत्य इन तीनों का ही उल्लेख हुआ है। प्रतिषाख्य एवं शिक्षा ग्रन्थों में भी संगीत सम्बन्धी विवरण मिलते है।

रामायण महाकाव्य में दशरथ के पुत्रों के जन्मोत्सव एवं विवाह तथा राम के वनवास के पश्चात पुन: अयोध्या-आगमन जैसे मांगलिक अवसरों पर संगीत की मधुर स्वरलहरियों की एवं नृत्य के घुंघरुओं की झंकार सुनाई पड़ती है। इसी काल में रावण के द्वारा गज से बजाये जाने वाले वाद्य ‘‘रावणास्त्र‘‘ का भी आविष्कार हुआ। आधुनिक वायलिन इसी ‘‘रावणास्त्र‘‘ का ही परिष्कृत रूप है। नृत्य का प्रयोग वैदिक काल से ही यज्ञादि अवसरों पर होता था, परन्तु घुंघरू का प्रयोग सबसे पहले रामायण में ही मिलता है। रामायण में रागप्रणाली के प्रचलन के उदाहरण भी मिलते है।

महाभारत-काल में संगीत उत्तमता के चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका था। भगवान श्रीकृष्ण गायन, वादन एवं नृत्य तीनों में ही पारंगत थे। श्रीकृष्ण की वंशी ने समाज को संगीतमय बना दिया इस काल में संगीत के कलापक्ष के साथ ही साथ उसके शास्त्रपक्ष का भी विकास हुआ।

भरत मुनि कृत ‘‘नाट्यशास्त्र‘‘ इसी काल का संगीत विषयक विख्यात ग्रन्थ माना गया है। यद्यपि इसके रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वत्तजन एकमत नहीं है, फिर भी अधिकांश गुणीजन इसी काल में इसकी रचना मानते है। ‘‘नाटयशास्त्र‘‘ विशेषतया नाटयकला पर आधारित ग्रन्थ है, किन्तु भरत मुनि ने गायन को नाट्य का अभिन्न अंग स्वीकार करते हुए अपने ‘‘नाट्यशास्त्र‘‘ के 28वें से 33वें अध्यायों तक में संगीत विषयक विषद चर्चा की है। इस प्रकार भरत कृत ‘‘नाट्यशास्त्र‘‘ में जहां संगीत सम्बन्धी सामग्री उपलब्ध होती है, वहीं इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस समय तक संगीत अत्यन्त ही विकसित अवस्था में था।

जैन एवं बौद्ध काल में भी संगीत जनसामान्य के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया था। राज्य सभा में गायक, वादक तथा नर्तक नियुक्त होते थे भगवान बुद्ध के समस्त सिद्धान्तों को गीतबद्ध करके उन्हें जनसामान्य में प्रचारित एवं प्रसारित किया गया। इस युग में संगीत अपने चरमोत्कर्ष पर था । बौद्धकालीन जातक-कथाओं में भारतीय संगीत के तत्कालीन नृत्य, गीत एवं वाद्यों के प्रसंगानुकूल उल्लेख प्राप्त होते है।

वैपुल्य-सूत्र में मृदंगादि विभिन्न लय वाद्यों का उल्लेख प्राप्त है। बौद्ध साहित्य में वाराणसी में एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय का उल्लेख प्राप्त होता है। जिससे सम्बंद्ध संगीत-विद्यालय भी था। इस संगीत-विद्यालय में देष के श्रेष्ठ गुणीजनों को संगीत-शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। नालन्दा, तक्षषिला विक्रमषिला एवं तदन्तपरी विश्व-विख्यात विश्वविद्यालयों में संगीत-विभाग ‘‘गान्धर्व’’ विद्या के नाम से था।

अत: हम यह स्पश्टरूप से कह सकते है कि बौद्ध जैन काल में संगीत शास्त्र गुणों की संरक्षा, संगीत शास्त्र का परिष्कार और धर्म प्रचार में संगीत का लोक प्रचलन आदि महत्वपूर्ण कार्य हुये ।

जैन काल में बौद्धधर्म से भी अधिक जैन धर्म का प्रभाव संगीत पर पड़ा। जैन युग में संगीत साधना का मुख्य विषय बन गया। इस समय संगीत वर्ग-विषेश की धरोहर न होकर, सामाजिक उपयोग की कला बन गया था।

मौर्य काल में संगीत मनोरंजन का मुख्य साधन था। भारत का प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य संगीतप्रेमी था। उसने संगीत के विकास के लिए बहुत प्रयत्न किया। इस काल में भारतीय एवं यूनानी संस्कृतियों का समन्वय हुआ। चन्द्रगुप्त के पश्चात उसके पुत्र बिन्दुसार के शासनकाल में संगीत के क्षेत्र में कोई विषेश परिवर्तन नहीं हुआ। बिन्दुसार के पश्चात सम्राट अशोक के काल में संगीत का आध्यात्मिक रूप सामने आया।

शुंगकाल में संगीत के क्षेत्र में कोई विषेश उन्नति नहीं हुई। गुजरात प्रान्त में गरवा नृत्य का प्रादुर्भाव शुंगकाल में ही हुआ। कनिष्क के काल में भारतीय संगीत का अच्छा विकास हुआ। कनिश्क-कालीन संगीत के काल को विकास की दृष्टि से हम ‘‘प्रगतिशील युग’’ कह सकते है।

गुप्तकालीन संगीत गुप्तकाल काव्य, संगीत सहित अन्य कलाओं के पल्लवन का काल कहा जा सकता है। सरीदाकार वीणा का प्रचलन परिलक्षित होता है।1 चन्द्रगुप्त प्रथम एवं समुद्रगुप्त आदि सम्राट संगीतप्रेमी थे। तत्कालीन एक स्वर्णमुद्रा में समुद्रगुप्त का वीणा सदृश वाद्य बजाते हुए चित्र प्रदर्शित है। महाराज विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने बृहत नाटयशालाओं और संगीतशालाओं का निर्माण करवाया। महाकवि कालीदास के काव्य में एवं नाटकों में गुप्तकालीन संगीत का आंशिक परिचय मिलता है। कालिदास के ‘‘कुमारसम्भव’’, ‘‘मालविकाग्निमित्रम’’ एवं ‘‘अभिज्ञन-शाकुन्तलम’’ आदि ग्रन्थों में सांगीतिक शब्दों का प्रयोग मिलता है। भरतपुत्र दत्तिल ने ‘‘दात्तिलम’’ की रचना इसी काल में की। यह ग्रन्थ भी नाट्यषास्त्र के समान भारतीय संगीत की एक गौरवशाली रचना है।

हर्षवर्धन के काल में संगीत का विकास निर्बाध गति से चलता रहा। इसी काल में मतंगमुनि द्वारा ‘‘बृहददेशी’’ नामक ग्रन्थ की रचना हुई। उन्होंने जाति-गायन के स्थान पर राग-गायन का उल्लेख किया। नारद कृत ‘‘नारदीय-शिक्षा’’ का रचनाकाल भी यही है।

5. मध्यकाल -

संगीत जिसका मुख्य ध्येय ईष्वरोपासना था, वह इस काल में विलासिता के आवरण में प्रच्छन्न हो गयी। जिस गति से भारतीय संगीत विकास-क्षितिज की और अग्रसर हो गया था, अगर उसके मार्ग में मुस्लिम-प्रवेश-युग न आता तो फिर आज विश्व में भारतीय संगीत के गौरव की सुषमा अनिर्वचनीय एवं अवर्णनीय होती।

मुस्लिम आक्रमणों के परिणामस्वरूप मुगल-सभ्यता से प्रभावित होकर भारतीय संगीत अपनी प्राचीनता को विस्मृत करते हुए एक नवीन रूप में विकसित होने लगा। यह काल सांगीतिक दृष्टि से युगान्तकारी कहा जायेगा। संगीत के स्वरूप में इस समय कल्पनातीत परिवर्तन हुआ । संगीत पर आधारित ग्रंथों, कात्यादि का सृजन, पुरानी राग “ौलियों और पद्धतियों का परिष्कार, नवीन रागों की उद्भावना, नये वाद्यो और सांगीतिक उपकरणों का अविश्कार आदि के माध्यम से संगीत चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया था। परिणामत: भारतीय संगीत उत्तरी एवं दक्षिणी दो पद्धतियों में विभक्त हो गया। दक्षिण भारतीय संगीत अपने प्राचीन मौलिक रूप को अक्षुण रखते हुए उन्नति-पथगामी होता रहा, जबकि उत्तर भारतीय संगीत मुस्लिम-संगीत के सम्पर्क में आकर नित-नवरूपों में विकसित होने लगा।

संगीत की विकासयात्रा मध्यकाल में भी निर्बाध गति से चलती रही। संगीत एवं संगीतज्ञों को राजाश्रय प्राप्त होने के कारण संगीत सामंतषाही बन गया और जनसामान्य से दूर होता चला गया। सामंतषाही ऐश्वर्य के प्रवेश के कारण संगीत अपनी मौलिक मर्यादा से च्युत होकर श्रृंगार-प्रधान हो गया।

मध्यकाल के पूर्वार्ध में प्रबन्ध-गायन प्रचलित था, इसी कारण से यह प्रबन्ध-काल भी कहलाता है। इस काल में ‘‘संगीत-मकरंद’’ ‘‘गीतगोविन्द’’ एवं ‘‘मानसोल्लास’’ जैसे महत्वपूर्ण संगीत-ग्रन्थों की रचना हुई। सन 1290 ई0 से 1320 ई0 के बीच अलाउददीन खिलजी के शासनकाल में महान संगीतज्ञ शारंगदेव ने भारतीय संगीत के आधार एवं अमर ग्रन्थ ‘‘संगीत-रत्नाकर’’ की रचना की। यह कहना भी अत्युक्ति नहीं है कि भरत के नाट्य शास्त्र मे जो संगीत संबधी तीन अध्याय है, संगीत रत्नाकर उसी का विस्तृत भाश्य है।

चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ से नवीन राग-रागिनियों का जन्म हुआ। तत्पश्चात बाबर के शासनकाल में ख्याल, गजल एवं कव्वाली आदि गायन-शैलियों का आरम्भ हुआ संगीत में शृंगारिकता समाविष्ट होने के बाद भी शास्त्रीय संगीत उन्नति होती रही। बाबर के समकालीन कल्लिनाथ पण्डित ने ‘‘संगीत-रत्नाकर’’ की एक विस्तृत टीका लिखी। रामामात्य कृत ‘‘स्वरमेल-कलानिधि’’ भी इसी काल में लिखा गया। 

मध्यकालीन संगीत के इतिहास का विवेचन करने पर यह विदित होता है कि इस काल में संगीतकला की अत्यधिक उन्नति हुई, अनेक नये रागों एवं तालों की रचना हुई तथा तराना, गलज, टप्पा व ख्याल जैसी गायन-शैलियां प्रचार में आयी।

6. आधुनिक काल -

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतवर्ष पर यूरोप निवासियों के आधिपत्य के परिणामस्वरूप संगीत का विकास बाधित हो गया। इस काल में भारतीय संगीत को कोई आश्रयदाता नहीं मिला इस कारण उसके गुण एवं परिणाम में निश्चित कमी आयी। ब्रिटिषकाल के पूर्वार्ध में भारतीय संगीत की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। रियासती राजा पहले संगीत से विषेश प्रेम-स्नेह रखते थे, किन्तु अंग्रेजी संस्कृति के वशीभूत होकर वे भारतीय संगीत की उपेक्षा करने लगे। परिणामत: वंश-परम्परा के श्रेष्ठ संगीतज्ञ अपने वंशजों एवं प्रतिनिधियों के पास अपनी श्रेष्ठतम कला को छोड़कर न जा सके। यही कारण है कि आज देष में प्रथम श्रेणी के कलाकार गिने-चुने ही है। इस संक्रमण-काल में भी भारतीय संगीत से प्रभावित होकर कैप्टन बिलार्ड और सर विलियम जोन आदि अंग्रेजी विद्वानों ने संगीत के पुन: जीवित करने का प्रयास किया तथा ‘‘ए ट्रीटाइज आन दि म्यूजिक ऑफ हिन्दुस्तान’’ जैसे संगीत सम्बन्धी पुस्तकें लिखी, जिससे समाज के शिक्षित वर्ग पर अच्छा प्रभाव पड़ा। इसी समय सौरेन्द्र मोहन ठाकुर ने ‘‘यूनिवर्सल हिस्ट्री आफ म्यूजिक’ नामक संगीत-ग्रन्थ की रचना की।

रवीन्द्र संगीत के प्रतिश्ठाता रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 7 हजार छंदो की रचना अनेक गीत नाट्य और नृत्य नाटिकाओं की रचना की तथा उन्होंने 1920 में कलकत्ता में शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय की स्थापना की1 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मुहम्मद रजा ने ‘‘नगमाते-आसफी’’ नामक संगीत का समीक्षा-ग्रन्थ लिखा। इसी शताब्दी के मध्य में कृश्णानन्द व्यास ने राग-कल्पद्रुम’’ की तथा जयपुर के राजा प्रतापसिंह देव ने ‘‘संगीत-सार’’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इसी समय में शास्त्रीय बन्धनों में शिथिलता होने के कारण संगीत की एक पृथक धारा ‘‘सुगम संगीत’’ भी क्रमष: जनमानस में प्रचलित होने लगी। 

19वीं शताब्दी के मध्य में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में संगीत पुर्नप्रतिश्ठित हुआ।

19वीं शताब्दी के मध्य में संगीत-जगत में पं0 विष्णु नारायण भातखण्डे तथा पं0 विष्णु दिगम्बर पलुस्कर दो महान विभूतियों का पदार्पण हुआ। पं0 विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने संगीत के उन्नयन हेतु सतत प्रयत्न किये। पं0 पलुस्कर जी ने सन 1908 मे बम्बई मे एक ‘‘गान्धर्व संगीत महाविद्यालय’’ स्थापित किया। उन्होंने ‘‘संगीत-बाल-बोध’’ संगीत-बालप्रकाश’’, ‘‘स्वत्पालापगायन’’, ‘‘संगीत-तत्वदर्शक’’, ‘‘राग-प्रवेश’’ एवं ‘‘भजनामृत’’ आदि संगीत सम्बन्धी 60 से अधिक पुस्तकों की रचना की। उन्होंने एक पृथक स्वरलिप-पद्धति भी आविष्कृत की।

पं0 विष्णुनारायण भातखण्डे जी ने भी संगीत के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अत्यन्त ही सरल एवं सुबोधगामी स्वरलिपि-पद्धति का आविष्कार किया, जोकि आज अत्यन्त लोकप्रिय है। उन्होंने लक्षण-गीत नामक नवीन गायनषैली की रचना की, जिसमें राग का नाम, स्वरूप आरोह-अवरोह एवं जाति आदि अनेक विशेषताएं दी जाती है। पं0 भातखंडे जी ने संगीत-कला को शास्त्रीय आधार प्रदान करके उसे उच्चस्तरीय स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने विभिन्न घरानों और प्रतिष्ठित गायकों को सुनकर, उनकी स्वरलिपि तैयार करके, उनका संकलित रूप ‘‘क्रमिक-पुस्तक-मालिका’’ के रूप में प्रकाशित कराया। उन्होंने थाट-पद्धति विकसित करके नियमबद्ध प्रणाली से गायन-वादन की प्रेरणा दी तथा 10 थाटों में राग वर्गीकरण किया। उन्होंने संगीत-शिक्षा प्रदान करने हेतु अनेक स्थानों पर संगीत-विद्यालयों की भी स्थापना की।

स्वतन्त्रता - प्राप्ति के साथ भारतीय संगीत ने भी करवट बदली। रियासतों के विलीनीकरण के उपरान्त भारतीय सरकार ने संगीत को संरक्षण प्रदान किया। स्वतन्त्र भारत में कला संस्कृति का विकास हुआ। भारत सरकार ने संगीतकला को प्रोतसाहन प्रदान करने हेतु पदमश्री एवं पदमविभूषण जैसे सम्माननीय राश्ट्रीय पदक प्रदान करने आरम्भ किये। इसी क्रम में प्रख्यात गायिका एम0एस0 सुब्बुलक्ष्मी को सन 1997 में भारत सरकार के सर्वोच्च पुरस्कार ‘‘भारतरत्न’’ से सम्मानित किया गया। सन 1953 में ‘‘संगीत नाटक अकादमी’’ की स्थापना की गयी थी तथा सन 1954 में ‘‘ललितकला अकादमी’’ की स्थापना हुई।

इस प्रकार राष्ट्रीय संरक्षण मिलने पर संगीतज्ञों एवं कलाकारों में प्रगति की ओर उन्मुख होने की एक तीव्र इच्छा प्रदीप्त हो उठी। आकाशवाणी ने भी संगीतकला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। सन 1952 से आकाशवाणी के द्वारा ‘‘अखिल भारतीय संगीत’’ का कार्यक्रम प्रसारित किया जाने लगा। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को राज्यसभा में कलाकारों को नामांकित करने का अधिकार दिया गया। अन्तर्राश्ट्रीय जगत में भी सांस्कृतिक सम्बन्धों को सृदृढ़ता प्रदान करने हेतु यूरोपीय एवं एशियाई देशों में सांस्कृतिक-मण्डलों का आदान-प्रदान किया गया। राष्ट्रीय-संगीत-महोत्सव तथा संगीत सम्बन्धी गोष्ठियों का आयोजन केन्द्रीय प्रान्तीय सम्भागीय एवं मण्डलीय स्तरों पर होता रहता है।

संगीत के छात्रों को प्रोत्साहन करने हेतु केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों द्वारा विविध छात्र-वृत्तियॉ प्रदान की जाती है। प्रारम्भ से लेकर उच्च शिक्षा तक संगीत एक विशय के रूप में पाठ्यक्रम में सम्मिलित हो चुका है। प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद, भातखण्डे संगीत सम विश्वविद्यालय लखनऊ, गान्धर्व महाविद्यालय पूना, स्कूल आफ इण्डियन म्यूजिक बम्बई, इत्यादि आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा शास्त्रीय संगीत तथा सुगम संगीत के अन्तर्गत भजन, गीत व गजल आदि प्रसारित किये जाते है।

आधुनिक युग में संगीत जन-साधारण के अत्यन्त निकट है। बम्बई की ‘‘सुर सिंगार संसद’’ नामक संस्था प्रत्येक वर्ष युवा कलाकारों के लिए ‘‘कल के कलाकार’’ नामक संगीत-सम्मेलन आयोजित करके उन्हें ‘‘सुर-मणि’’ एवं ‘‘ताल-मणि’’ आदि अलंकरणों से विभूषित कर प्रोत्साहित करती है। आज हमारा भारतीय संगीत पूर्णत: विकासोन्नमुख है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत सरकार ने भी संगीत के विकास की ओर ध्यान दिया, रेडियो, संगीत सम्मेलनों, परीक्षाओं के लिये संगीत संस्थाओं की स्थापना, संगीत नाटक अकादमियों सांस्कृतिक केन्द्रों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के फलस्वरूप आज संगीत की झंकार प्राय: प्रत्येक घर में गूंज रही है, मधुर संगीत की दिव्य लहरियाँ आज प्राय: प्रत्येक घर में गूँज रही है।

Comments