Advertisement

प्लेटो का जीवन परिचय, प्रमुख रचनाएँ

प्लेटो का जीवन परिचय

प्लेटो का जन्म एथेन्स के एक प्राचीन समृद्ध कुल में 428-27 ई. पू. में हुआ। उसके पिता का नाम अरिस्तोन (Ariston) एवं माता का नाम पेरिकतिओन (Perictione) था। 

प्लेटो का वास्तविक नाम अरिस्तोक्लीज (Aristoclese) था। उसके कन्धे भरे हुए और चौड़ा थे, इसी कारण उसके व्यायाम शिक्षक ने उसे प्लातोन (Platon) कहना शुरू किया क्योंकि प्लेटो शब्द का अर्थ ही होता है-चौड़ा-चपटा। प्लेटो शब्द का शुद्ध यूनानी उच्चारण ‘प्लातोन’ है। अरबी में इसी का विकृत रूप ‘अफलातून’ है। धीरे-धीरे प्लातोन के स्थान पर कालान्तर में प्लेटो शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया जाने लगा।

अपने जीवन के सन्ध्याकाल में प्लेटों ने स्वयं लिखा, युवावस्था में अन्य युवकों की तरह मैंने भी सोचा था कि बालिग होते ही मैं राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लूंगा। लेकिन विधि का कुछ दूसरा ही विधान था। प्लेटो एक कुशल राजनीतिज्ञ तो नहीं बन सका, लेकिन एक महान राजनीतिक दार्शनिक अवश्य बन गया।

18-20 वर्ष की आयु में प्लेटो सुकरात के संपर्क में आया। वैसे दोनों के व्यक्तित्व में बुनियादी अन्तर था। सुकरात एक साधारण शिल्पकार का पुत्र था जबकि प्लेटो एक कुलीन का पुत्र था। सुकरात चपटी नाक और मोटे होंठ वाला कुरूप व्यक्तित्व था जबकि प्लेटो एक सुन्दर, स्वस्थ और अभिराम व्यक्तित्व था। सुकरात तार्किक वक्ता था, जबकि प्लेटो एक कुशल लेखक जिसकी भाषा में कविता का प्रवाह था। सुकरात हंसोड़ था जबकि प्लेटो गम्भीर। सुकरात जन-साधारण को भी आदर की दृष्टि से देखता था जबकि प्लेटो सिर्पफ बुद्धिमान और साहसी व्यक्तियों का ही सम्मान करता था। सुकरात एक ऐसा व्यक्ति था जिसने यह घोषणा की कि वह कुछ नहीं जानता जबकि प्लेटो अपने को सर्वाधिक ज्ञानी व्यक्ति समझता था, किन्तु इनके बावजूद सुकरात की शिक्षाओं ने प्लेटो को आकृष्ट किया। प्लेटो उसका शिष्य बना और उसके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुआ। 

जब सुकरात को विषपान का दण्ड दिया गया तो प्लेटो की आयु 28 वर्ष की थी। प्लेटो पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा। इसने उसे राजनीति से विरक्त कर दर्शन की ओर आकृष्ट कर दिया। 

प्लेटो की प्रमुख रचनाएँ

प्लेटो द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या लगभग 36 या 38 मानी जाती है, किन्तु इनमें से प्रामाणिक ग्रन्थ केवल 28 हैं। उसके सभी प्रामाणिक ग्रन्थों का बर्नेट द्वारा सम्पादित यूनानी संस्करण 2,662 पृष्ठों (आक्सपफोर्ड द्वारा प्रकाशित) में प्रकाशित हुआ है। इनमें से कुछ प्रमुख ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं-
  1. अपाॅलाॅजी (Apology),
  2. क्रीटो (Crito),
  3. यूथीफ्रो (Euthyphro),
  4. जोर्जीयस (Gorgias),
  5. मीनो (Meno),
  6. प्रोटागोरस (Protagoras),
  7. सपोजियम (Symposium),
  8. पेफडो (Phaedo),
  9. रिपब्लिक (Republic),
  10. सोपिफस्ट (Sophiest),
  11. स्टेट्समैन (Stateman),
  12. लाॅज (Laws)
रचनाकाल की दृष्टि से प्लेटो की समस्त रचनाओं को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम वर्ग में वे रचनाएँ आती हैं जिन्हें सुकरात से सम्बन्धित कहा जा सकता है। उनके विषय और विचार सुकरात के विचारों को ही अभिव्यक्त करते हैं। अपाॅलाॅजी, क्रीटो एवं यूथीफ्रो इसी प्रकार की रचनाएँ हैं।

प्लेटो प्रथम साम्यवादी के रूप में

मैक्सी ने अपने ग्रन्थ ‘पोलिटिकल फिलास्फी’ (Political Philosophy) में लिखा है कि प्लेटो साम्यवादी विचारों का मुख्य प्रेरणा-स्रोत है और ‘रिपब्लिक’ (Republic) में सभी साम्यवादी और समाजवादी विचारों के बीज मिलते हैं। लेकिन प्रो0 नैटलशिप, प्रो0 कैटलिन, प्रो0 बार्कर, मैकरी के इस विचार से सहमत नहीं हैं। 

प्रो. कैटलिन के अनुसार प्लेटो का साम्यवाद न तो स्ववर्गीय है और न ही अन्तरराष्ट्रीय है। यह आधुनिक साम्यवाद से बिल्कुल मेल नहीं खाता। आधुनिक साम्यवाद जिसका प्रतिपादन कार्ल माक्र्स और लेनिन जैसे विचारकों ने किया है, एक वर्ग-विहीन और राज्य-विहीन समाज के विश्वास करते हैं। मुख्य रूप में यह विचारधारा पूंजीपति वर्ग के सर्वहारा वर्ग के शोषण को समाप्त करने पर जोर देती है। 

प्रो. जायजी की राय में प्लेटो और रूस के साम्यवादियों में बहुत सी समानता है। दोनों ही व्यक्तिगत सम्पत्ति को सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं, दोनों ही व्यक्तिगत सम्पत्ति और गरीबी को समाप्त करने के पक्षधर हैं। दोनों ही सामूहिक शिक्षा और बच्चों की सामूहिक देख-रेख में चाहते हैं। दोनों ही कला और साहित्य को राज्य का केवल साधन मानते हैं और दोनों सभी विज्ञान और विचारधाराओं को राज्य के हित में प्रयोग करना चाहते हैं। इस आधार पर प्लेटो को प्रथम साम्यवादी मानना सर्वथा सही है। लेकिन दूसरी ओर टेलर ने इसके विपरीत विचार दिए हैं। 

टेलर के अनुसार- “रिपब्लिक में न तो समाजवाद पाया जाता है और न साम्यवाद।” प्लेटो को प्रथम साम्यवादी मानने के लिए साम्यवाद की आधुनिक विचारधारा को प्लेटो की विचारधारा से तुलना करना आवश्यक हो जाता है। दोनों अवधारणाओं में कुछ समानताएँ व असमानताएँ हैं।

1. समानताएँ

प्लेटो के प्रथम साम्यवादी होने के पक्ष में कुछ विचार हैं, जो परस्पर दोनों विचारधाराओं की समानता पर आधारित है। दोनों में मुख्य समानताएँ हैं :-

1. व्यक्तिगत सम्पत्ति सारी बुराइयों की जड़ है : प्लेटो और आधुनिक साम्यवाद दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि समाज में समस्त दोषों का कारण निजी सम्पत्ति का पाया जाना है। इलिए इसके स्थान पर सार्वजनिक सम्पत्ति की व्यवस्था करना आवश्यक है। प्लेटो ने संरक्षक वर्ग को व्यक्तिगत सम्पत्ति से वंचित करके स्वयं को आधुनिक साम्यवाद के पास लाकर रख दिया है। व्यक्तिगत सम्पत्ति के अन्त से ही समाज की सभी बुराइयों का अन्त हो सकता है।

2. अधिनायकतन्त्र मे आस्था : दोनों ही साम्यवाद सम्पूर्ण समाज के हित के लिए एक सर्वसत्ताधिकावादी राज्य या शासक में विश्वास करते हैं। प्लेटो विवेकयुक्त दार्शनिक शासक के अधिनायकतन्त्र की स्थापना करता है जो कानून एवं परम्परा से ऊपर है। वह उत्पादक व सैनिक वर्ग पर समाज हित में पूर्ण नियन्त्रण रखता है। प्लेटो का दार्शनिक शासक सर्वशक्तिमान है। आधुनिक साम्यवादी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही में विश्वास करते हैं। अत: दोनों ही अधिनायकतन्त्र के पक्षधर हैं।

3. स्त्री-पुरुष की समानता में विश्वास : दोनों ही साम्यवादी स्त्री-पुरुष की समान योग्यता व क्षमता में विश्वास करते हैं। प्लेटो के अनुसार स्त्री-पुरुष में लिंग भेद को छोड़कर कोई अन्तर नहीं है। स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह प्रशासकीय पदों को अच्छी तरह संभाल सकती हैं। आधुनिक साम्यवादी भी नारी शक्ति में पूर्ण विश्वास करते हैं।

4. कला और साहित्य राज्य के साधन हैं : दोनों ही साम्यवाद कला और साहित्य को केवल एक साधन मानते हैं जो केवल राज्य के हितों के अनुकूल होना चाहिए। इसलिए वे कला और साहित्य पर नियन्त्रण की बात करते हैं। कविता की भावना, संगीत के स्वर, वाद्ययन्त्रों की लय तक को वे राज्य द्वारा नियन्त्रित व निर्देशित करना चाहते हैं। इसी तरह आधुनिक साम्यवादी भी कला और साहित्य पर कठोर नियन्त्रण की बात करते हैं। यदि कोई कला व साहित्य राज्य हितों के विपरीत है तो उसे किसी भी अवस्था में सम्मान नहीं दिया जा सकता। अत: दोनों ही साम्यवादी कला ओर साहित्य पर नियन्त्रण के पक्षधर हैं और वे इन्हें राज्य के कल्याण का एक साधन मानते हैं। इस साधन का पवित्र होना जरूरी है।

5. कर्त्तव्य की भावना ही सामाजिक न्याय है : दोनों ही साम्यवाद समाज के हित में ही व्यक्ति का हित मानते हैं। वे कर्त्तव्यों पर अधिक जोर देते हैं। वे अधिकारों के नाम पर प्रतिबन्धों की व्यवस्था के समर्थक हैं। प्लेटो ने अपनी योग्यतानुसार योग्य स्थान पर काम करने को सामाजिक न्याय कहा है। आधुनिक साम्यवाद भी इस बात पर जोर देता है कि खाने का अधिकार उसी मनुष्य को है जो समाज के लिए काम करता है। अत: दोनों ही साम्यवादी अधिकारों की तुलना में कर्त्तव्यों को महत्त्व देते हैं।

6. अव्यावहारिक: दोनों ही साम्यवाद मानव-स्वभाव व मनोविज्ञान के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए वे व्यावहारिक नहीं है। इस दोष के कारण न तो प्लेटो की साम्यवादी व्यवस्था कभी कायम हुई है और न ही होगी। इसी तरह आधुनिक साम्यवादी जिस शक्ति द्वारा साम्यवादी समाज की स्थापना की बात करते हैं, वह भी अव्यावहारिक है। आज विश्व के अनेक साम्यवादी व्यवस्था पतन की राह पर है।

7. समष्टिवाद में विश्वास : दोनों ही व्यवस्थाएँ समष्टिवादी हैं। दोनों साम्यवाद समुदाय की सर्वोच्चता में विश्वास करते हैं जिसमें व्यक्ति की वैयक्तिकता की उपेक्षा करते हैं। दोनों व्यवस्थाओं में व्यक्ति को एक साधनमात्र माना गया है। 8ण् आर्थिक प्रतियोगिता की समाप्ति : दोनों ही साम्यवाद समाज के आर्थिक प्रतियोगिता को समाप्त करने के पक्षधर है। प्लेटो का विश्वास है, यही राजनीतिक कलह का कारण है। आधुनिक साम्यवाद भी आर्थिक प्रतियोगिता को समाप्त कर समाज में एकता का भाव पैदा करना चाहता है।

उपर्युक्त तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्लेटो ने ही साम्यवाद के बीज बो दिए थे। प्लेटो के साम्यवादी सिद्धांतों के आधार पर ही आधुनिक साम्यवादी दर्शन खड़ा किया है। इस दृष्टि से प्लेटो को प्रथम साम्यवादी कहना सर्वथा सही है।

2. असमानताएँ 

प्लेटो के साम्यवाद व आधुनिक साम्यवाद में बहुत सी असमानताएँ हैं जिनके आधार पर उसके प्रथम साम्यवादी होने के विचार का खण्डन किया गया है। वे आधार हैं :-

1. अर्ध साम्यवाद और पूर्ण साम्यवाद: प्लेटो का साम्यवाद सारे समाज पर लागू न होकर केवल संरक्षक वर्ग तक ही सीमित है। प्लेटो ने उत्पादक वर्ग को अपनी इस व्यवस्था से पूर्णतया बाहर रखकर अपने अर्ध-साम्यवादी होने का ही परिचय दिया है। आधाुनिक साम्यवाद पूरे समाज के लोगों पर समान रूप से लागू होता है लेकिन इसमें परिवार का साम्यवाद शामिल नहीं है। आधुनिक साम्यवाद समाज के हर वर्ग को अपने में समेटकर चलता है। अत: दोनों में अन्तर है।

2. संन्यासवाद और भौतिकवाद : प्लेटो का साम्यवाद वास्तव में तपस्यात्मक है। प्लेटो शासकों को भौतिक सुख साधनों से विरक्त बनाता है। 

बार्कर के शब्दों में - “यह समर्पण का मार्ग है और उस समर्पण की माँग सर्वोत्तम और केवल सर्वोत्तम व्यक्ति से ही की गई है।” प्लेटो ने संरक्षक वर्ग को समस्त सम्पत्ति से वंचित कर दिया है क्योंकि वह निजी सम्पत्ति को सार्वजनिक कल्याण के कर्त्तव्य-पालन में एक बाधा मानता है। आधुनिक साम्यवाद की आधारशिला भौतिकता है। आधुनिक साम्यवाद भौतिक सुख-साधनों में वृद्धि को ही अपना लक्ष्य श्मानता है। आधुनिक साम्यवाद सम्पत्ति की वांछनीयता को स्वीकार करते हुए उसके वितरण पर बल देता है। 

अत: प्लेटो के साम्यवाद में न्याय का तात्पर्य कार्यों का यथोचित वितरण है तो आधुनिक साम्यवाद के सन्दर्भ में राज्य के उत्पादन का न्यायोचित वितरण।

3. राजनीतिक उद्देश्य और आर्थिक उद्देश्य : प्लेटो के साम्यवाद का लक्ष्य राजनीतिक है क्योंकि वह विशेष प्रकार की आर्थिक योजना के आधार पर राज्य में कुशासन तथा भ्रष्टाचार को समाप्त कर अच्छे शासन की स्थापना करना चाहता है। प्लेटो का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता पैदा करता है। आधुनिक साम्यवाद का प्रमख लक्ष्य आर्थिक है। आधुनिक साम्यवादी विशेष प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर आर्थिक साधनों का न्यायपूर्ण वितरण करना चाहते हैं। अत: एक का लक्ष्य राजनीतिक है तो दूसरे का आर्थिक।

4. सवर्ग समाज और वर्गहीन समाज : प्लेटो के साम्यवाद में वर्गों का अस्तित्व है जिनके कार्यों की विशिष्टता द्वारा राज्य की एकता मे वृद्धि की जाती है। आधुनिक साम्यवाद में वर्गविहीन समाज की स्थापना की बात की जाती है। इसमें वर्गों का कोई महत्त्व नहीं है।

5. पारिवारिक साम्यवाद के सम्बन्ध में भेद : प्लेटो की साम्यवादी व्यवस्था में सम्पत्ति के साम्यवाद के साथ-साथ पत्नियों के साम्यवाद की भी व्यवस्था की गई है। किन्तु आधुनिक साम्यवाद में इस प्रकार की किसी व्यवस्था का प्रतिपादन नहीं किया गया है।

6. नगर राज्यों और अन्तरराष्ट्रीय का भेद : प्लेटो का साम्यवाद यूनान के छोटे-छोटे नगर-राज्यों को ध्यान में रखकर प्रतिपादित किया गया है। प्लेटो ने कभी विश्व व्यवस्था की बात नहीं की। अत: उनका साम्यवाद क्षेत्रवाद पर ही आधारित है। कार्लमाक्र्स सम्पूर्ण विश्व के आर्थिक व राजनीतिक घटनाचक्र को ध्यान में रखते हुए अपने साम्यवादी सिद्धांत की रचना की है। वे समस्त विश्व की एकता में विश्वास रखते हैं। अत: आधुनिक साम्यवाद विश्वस्तरीय है।

7. साम्यवाद में दार्शनिक शासकों की भूमिका में अन्तर : प्लेटो के साम्यवाद में शासन का संचालन दार्शनिक शासक के नेतृत्व में होगा और सामान्य नागरिक उसका अनुसरण करेंगे, जबकि आधुनिक साम्यवाद में दार्शनिक राजा का कोई स्थान नहीं। मजदूरों का साम्यवादी दल तानाशाही से सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था पर नियन्त्रण रखता है।

8. साधन सम्बन्धी अन्तर : प्लेटो ने अपने साम्यवाद की स्थापना के लिए किसी साधन का वर्णन नहीं किया है। आधुनिक साम्यवादी क्रान्ति या दूसरे हिंसात्मक साधनों के प्रयोग द्वारा साम्यवाद की स्थापना करने की बात कहते हैं।

9. वर्गों  की संख्या में अन्तर : प्लेटो ने समाज में तीन वर्ग - दार्शनिक , सैनिक तथा उत्पादक का वर्णन किया है, जबकि माक्र्स ने पूंजीपति व सर्वहारा वर्ग की ही व्याख्या की है। अत: प्लेटो के अनुसार समाज में तीन तथा आधुनिक साम्यवादी दो वर्गों की बात करते हैं।

10. श्रमिक वर्ग की महत्ता के सम्बन्ध में अन्तर : प्लेटो के साम्यवाद में श्रमिक वर्ग को कोई महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं है, जबकि आधुनिक साम्यवाद में श्रमिक वर्ग को ही क्रान्ति का आधार माना गया है। आधुनिक साम्यवादी दर्शन तो श्रमिक वर्ग के इर्द-गिर्द ही घूमता है।

11. व्यावहारिक एवं अव्यावहारिक : प्लेटो का साम्यवाद पूर्णत: अव्यावहारिक है और इसे व्यवहार में कभी भी लागू नहीं किया जा सकता। आधुनिक साम्यवाद के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आधुनिक साम्यवाद अनेक देशों में व्यावहारिक रूप में लागू हुआ है। यद्यपि यह रूस में तो असफल रहा लेकिन चीन में इसका अब भी अस्तित्व है। अत: प्लेटो के साम्यवाद की तुलना में आधुनिक साम्यवाद अधिक व्यावहारिक है।

12. परिस्थितियों सम्बन्धी अन्तर : प्लेटो का साम्यवाद 5 वीं शताब्दी को एथेन्स की परिस्थितियों की उपज है, जबकि आधुनिक साम्यवाद 19 वीं सदी में ब्रिटेन में उत्पन्न औद्योगिक क्रान्ति का परिणाम है।

इस प्रकार अनेक असमानताओं के आधार पर टेलर का कथन उचित है- “रिपब्लिक में समाजवाद तथा साम्यवाद के बरे में बहुत कुछ कहे जाने के बावजूद वास्तव में इस ग्रन्थ में न तो समाजवाद है और न ही साम्यवाद।” इसलिए प्लेटो को प्रथम साम्यवादी मानना सर्वथा गलत है। प्लेटो में ऐसा कोई विशेष तत्त्व नहीं है, जो आधुनिक साम्यवाद से मेल खाता हो। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

Post a Comment

Previous Post Next Post