राष्ट्रीयता क्या है?

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वर्तमान युग राष्ट्रीयता का युग माना जाता है। सभी देश अपने निवासियों में राष्ट्रीयता की भावना पर निर्भरत करते हैं, और यह प्रयास करते है कि शिक्षा विद्यार्थियों में राष्ट्रीयता को प्रफुल्लित करें और उसके विकास में सहायक हो। राष्ट्रीयता देश के सभी नागरिकों में हम और हमारा का दृष्टिकोण उत्पन्न कर देता है और यह सबको एक सूत्र में बांधे रहता है।किसी भी राष्ट्र में भिन्न क्षेत्रों भाषा जाति धर्म व संस्कृति के लोग रहते है, परन्तु इतने विभिन्नता के होते हुये भी किसी राष्ट्र के व्यक्ति समान हित की भावना से जुड़े होते हैं और सभी व्यक्तियों के इन समान हितों की रक्षा के लिये राज्य उत्तरदायी होता है और यह व्यक्ति को व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्र के हितों को रखने पर ही सम्भव हो पाता है। राष्ट्रीयता में मूल शब्द राष्ट्र है, और यता प्रत्यय लगा है और इसका अभिप्राय है राष्ट्र के प्रति लगाव। राष्ट्रीयता की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की गयी है और इसे मन की स्थिति तथा आत्मा की सम्पत्ति मानते हैं। यह भावना जीवन एवं विचार की पद्धति के रूप मे भी मानी जाती हैं।

ब्रुवेकर के द्वारा राष्ट्रीयता की निम्न परिभाषा दी गयी- ‘‘राष्ट्रीयता साधारण रूप से देश प्रेम की अपेक्षा देश भक्ति के अधिक व्यापक क्षेत्र की ओर संकेत करती है। राष्ट्रीयता में स्थान के सम्बन्ध के अलावा, प्रजाति, भाषा, इतिहास, संस्कण्ति और परम्पराओं के भी सम्बंध आ जाते हैं।’’

उपरोक्त परिभाषा यह स्पष्ट करती है कि राष्ट्रीयता किसी भी राष्ट्र के व्यक्तियों के मध्य एका की भावना हेाती है, इसमें देशप्रेम, देशभक्ति व देश के प्रति समर्पण की भावना छिपी रहती है और राष्ट्र हित की भावना के आगे वैयक्तिक व सामूहिक हितों को त्याग का प्रवृत्ति पायी जाती है, यही भावना राष्ट्रीयता कहलाती हैं।

राष्ट्रीयता के प्रकार

राष्ट्रीयता दो रूपों में परिलक्षित होती है- 1. संकीर्ण राष्ट्रीयता 2. उदार राष्ट्रीयता।

संकीर्ण राष्ट्रीयता - 

इस प्रकार की राष्ट्रीयता में व्यक्तियों में यह धारणा विकसित होती है कि मेरा ही राष्ट्र सर्वश्रेण्ठ है और वह संसार के अन्य देशों को अपनी राष्ट्र से पीछे व कमतर समझते हैं। यह राष्ट्र के प्रेम की सभी हदों के पार के विश्वास की बात मानते हैं, परन्तु इसमें व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित पीछे रह जाते हैं। संकुचित राष्ट्रवाद ने संसार में क उथल-पुथल मचाया है इसके कारण-
  1. अन्तराष्ट्रीय विचारधारा पनप नहीं पाती और यह मानव हित के लिये घातक है।
  2. संकुचित राष्ट्रीयता की भावना उस राष्ट्र एवं नागरिक को स्वाथ्री बना देता है, और दूसरे देशों के प्रति घृणा उत्पन्न करती है और यह आपसी संघर्ष उत्पन्न करता है।
  3. संकुचित राष्ट्रीयता की भावना पड़ोसी देशों की भी परवाह नहीं कर आपसी तनाव बढ़ाती है जिससे कि दोनेां देश उन्नति नहीं कर पाते। यह विश्व के अस्तित्व के लिये भी खतरा उत्पन्न करती है।
  4. यह वैयक्तिक हितों के विपरीत है। इसमें सामान्य व्यक्ति का विकास अधिकांशत: उपेक्षित भी हो सकता है और यह व्यक्तियों पर दबाव बनाती है। 

उदार राष्ट्रीयता - 

यह राष्ट्रीयता व्यक्तियों को स्वेच्छा से अपने राष्ट्र को पम्रे करने के लिये प्रेरित करती है। यह अपने राष्ट्र से प्रेम करने के साथ अन्य देशों के साथ घृणा करने की आज्ञा नहीं देता, यह समवेत विकास में विश्वास करती है। इस प्रकार की राष्ट्रीयता धर्मों जातियों और भाषाओं के लोगों में पारस्परिक सहिष्णुता की भावना को जन्म देती है। इस प्रकार की राष्ट्रीयता राष्ट्र के निवासियों को बाह्य बंधन से मुक्त होने और रहने की प्रेरणा देती है।

राष्ट्रीयता के गुण एवं कमियां

किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व वहां के निवासी के हम की भावना पर निर्भरत करती है क्येांकि यह किसी भी राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र में बांधती है। राष्ट्रीयता के गुणों की चर्चा अब हम कर रहे हैं-
  1. राष्ट्रीयता किसी देश के नागरिकों को एक सूत्र में बांध देती है, इसमें स्थान, जाति, भाषा, संस्कृति आदि के आधार पर भिन्नता होते हुये भी एकता स्थापित हो जाती है।
  2. यह नागरिकों को अपने स्वार्थों से ऊपर राष्ट्र के हित को रखने के लिये प्रेरित करता है।
  3. यह राष्ट्र को उसकी सीमाओं में बांधे रखता है।
  4. राष्ट्रीयता व्यक्तियों को राष्ट्र के प्रति प्रेम होने के कारण अनुशासन स्थापन के लिये प्रेरित करती है।
  5. उदार राष्ट्रीयता राष्ट्र के उन्नति के साथ व्यक्तियों के अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति भी सचेत रहती है।
  6. राष्ट्रीयता नागरिकों को अपने राष्ट्र के उन्नति एवं विकास हेतु संचेतना जागृत करती है।
  7. उदार राष्ट्रीयता नागरिकों में अन्तर्राष्ट्रीय जागरूकता की भावना विकासित करने में सहायक होती है।
  8.  उदार राष्ट्रीयता वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना में विश्वास करती है। 
  9. किसी भी प्रकार की राजनैतिक व्यवस्था तानाशाही, साम्यवादी, समाजवादी और प्रजातंत्रीय व्यवस्था को दृढ़ बनाये रखने के लिये वहां के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना आवश्यक होती है।
  10. राष्ट्रीयता राष्ट्रों के मध्य होड़ एवं संघर्ष भी उत्पन्न कर सकती है, और राष्ट्र एक-दूसरे से आगे निकलने के लिये संघर्ष करते हैं।

राष्ट्रीयता की कमियां -

राष्ट्रीयता की भावना उदारवादी हो यह आवश्यक है, उसके संकुचित रूप न उभरे इसी कमी को इंगित करते हुये जवाहर लाल नेहरू ने लिखा था- ‘‘राष्ट्रीयता एक ऐसा विचित्र तत्व है जो एक देश के इतिहास में जहां जीवन मानव शक्ति में एकता का संचार करता है,वहां संकुचित बनाता है, क्योंकि इसके कारण एक व्यक्ति अपने देश के बारे में संसार के अन्य देशों से पृथक-पृथक रूप में सोचता है।’’ इस रूप में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है कि -
  1. राष्ट्रीयता के गुण व्यक्तियों को एक सूत्र में बांधने के साथ यह दुर्गुण पैदा करती है कि मेरा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से श्रेण्ठ है।
  2. यह राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिये प्रेरित करती है परन्तु अन्धाधुन्ध प्रेम दूसरे राष्ट्र की सीमाओं को भंग कर अपने राष्ट्र की सीमाओं के प्रसार करने के लिये भी अग्रसर करती है।
  3. राष्ट्रीयता अपने देश की अस्मिता एवं अस्तित्व को बचाने के लिये प्रेरित करती है, तो दूसरी ओर दूसरे देश को आगे बढ़ते देखकर उसकी अस्मिता व अस्तित्व को भंग करने के लिये अभिप्रेरित करती है।
  4. अंधी राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को भी प्रभावित करती है। देश आपस में सहयोग लेना-देना नहीं चाहते है।
  5. राष्ट्रीयता की भावना का संघर्ण अन्तराष्ट्रीयता के विकास में बाधक होता है।

राष्ट्रीयता एकता हेतु शैक्षिक कार्यक्रम

शिक्षा को आधार बनाकर राष्ट्रीय एकता एवं भावात्मक एकता को प्राप्ति के प्रयास किये जाने चाहिये। और अनौपचारिक, औपचारिक व नौपचारिक शिक्षा तीनों माध्यमों का प्रयोग किया जाये। हमारे शैक्षिक कार्यक्रम विभिन्न स्तर पर किस प्रकार से संगठित हो कि वह विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता एवं भावात्मक एकता को प्रतिस्थापित कर सम्बंधित मूल्यों का विकास करे।

प्राथमिक स्तर - 

इस स्तर पर बच्चों का कामे ल मन होता है, जिसमें राष्ट्र पम्रे को प्रफुल्लित करना आसान होगा अत: -
  1. पाठयक्रम में लोक गीत व स्थानीय देश से सम्बंधित कहानियां रखी जाये।
  2. महान व्यक्तियों के जीवन से परिचित कराया जाये।
  3. सामाजिक गुणों के विकास का प्रयास हो।
  4. अपने राष्ट्रीय प्रतीकों की जानकारी देकर राष्ट्रीयगान व राष्ट्रीय चिन्ह का पूर्ण ज्ञान कराया जाये।
  5. सभी राष्ट्रीय पर्व विद्यालय में मनाया जाये।

माध्यमिक स्तर - 

इस स्तर के विद्यार्थी प्राथमिक से जो देश पम्रे की भावना लेकर आये उन्हें विकसित किया जाना चाहिये।
  1. पाठ्यक्रम में सामाजिक व सांस्कृतिक इतिहास को सम्मिलित किया जाये।
  2. विद्यार्थियों को देश के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति एवं सामाजिक दशाओं से परिचित कराया जाये।
  3. विद्यार्थियों के सामाजिक विकास हेतु पाठ्य सहगामी क्रियाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाये।

विश्वविद्यालय स्तर - 

इस स्तर के विद्यार्थी समाज व देश के लिये तैयार मानव संसाधन है अत: इस स्तर पर राष्ट्रीय एकता व भावात्मक एकता स्थापित करने के ठोस उपाय किये जाने की आवश्यकता है।
  1. सभी स्तर की कक्षाओं में विचार- गोष्ठियों और अध्ययन गोष्ठियों की व्यवस्था की जाये।
  2. इस स्तर पर भी राष्ट्रीय पर्वों को धूम-धाम से मनाने की व्यवस्था होनी चाहिये।
  3. राष्ट्र भाषा से सम्बंधित प्रतियोगिता (लेखन, वाद-विवावद, कविता) आदि का अयोजन कराया जाये।
  4. युवा महोत्सवों का आयोजन कर विद्यार्थियों का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास का प्रयत्न करना चाहिये।
  5. पाठ्यक्रम में सामुदायिक क्रियाकलापों को जोड़कर विद्यार्थियों को समाज के समीप लाने का प्रयास किया जाये।
  6. राष्ट्र गौरव से सम्बंधित तथ्यों को पाठ्यक्रमों में जोड़ा जाये। इन सभी उपायों को करके हम देश की रक्षा का उपाय कर सकते है, क्योंकि देश प्रेम की भावना को शिक्षा ही जगा सकती है।

राष्ट्रीयता एवं शिक्षा भारत के परिप्रेक्ष्य में

भारत एक धर्म सहिष्णु समाजवादी विशाल लोकतंत्र है, परन्तु एक विशेष विशिष्टता इसके अनेक धर्म अनेक धर्मगत जातियां, अनेक भाषाओं का होना है और यही इसके राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक है। भारत इन विभिन्नताओं के साथ ही आगे बढने का प्रयास तेजी से कर रहा है। हमारे इस विकास की गति में भी हमारी राष्ट्रीयता की भावना की आवश्यकता अधिक है। सर्वप्रथम इसे जानना चाहिये कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में हमारे समक्ष कौन सी चुनौतियां है-

दूषित राजनीति - 

भारत में विभिन्न जाति धर्म के लागे आदि काल से ही एक साथ रहते आये परन्तु उनमें संघर्ष भावात्मक रूप से अब अधिक प्रतीत होता है, क्योंकि देश के संविधान में समुदाय विशेष, वर्ग विशेष को अधिक सुविधा देकर आत्मा से ही समाज को बांट दिया जैसे कि वर्तमान समय में सरकार किसी एक वर्ग विशेष को संतृप्त करने के फिराक में रहती है तो दूसरे वर्ग इसके कारण असंतुष्ट हुये। दलगत राजनीति अपने स्वार्थ के कारण समाज को भौतिक एवं मानसिक रूप से बांटने का काम कर रही है

संवैधानिक त्रुुटि - 

हमारे संविधान में कुछ तथ्य ऐसे है सम्मिलित है जिन्होने देश को जोड़ा नहीं तोड़ा जैसे राज्य, स्थान, जाति, लिंग व धर्म आदि किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगा और दूसरी ओर धर्म के आधार पर बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक का दर्जा देकर साम्प्रदायिक तनाव को जन्म दिया। यह हमारे देश के अतिरिक्त विश्व के किसी देश में नहीं है। इसी प्रकार जातिगत प्रश्रय देना भी भारतीय समाज की एकता के लिये बाधक है

आर्थिकत विषमता - 

भारत में गरीबी भी एक प्रमुख समस्या है। समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग करीब 30 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। अत: यह जनसंख्या पूरी जीवन अपने मूल आवश्यकताओं को भी नहीं जुटा पाती है तो फिर इनसे राष्ट्र व समाज के प्रति प्रेम की भावना कठिन है, और अमीर व गरीब की खा मानसिक दूरी भी बढ़ाती है।

अत्यधिक जनसंख्या - 

भारत संसार में जनसख्ं या की दृष्टि से दूसरा बडा़ देश है, परन्तु वृद्धि दर को देखते हुये यह प्रतीत होता है कि शीघ्र ही यह चीन को पीछे छोड़ देगा। जनसंख्या भले ही बढ़े परन्तु संसाधन नहीं बढ़ रहे हैं इससे आपसी संघर्ष ने जन्म लिया है, परिणामत: भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता की भावना की कमी होती जा रही है।

अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेप - 

भारत बाहरी हस्तक्षेप के कारण भी अस्थिर है। हमारे देश के क मसलो पर बाहरी देशों का अनावश्यक हस्तक्षेप है, जिसमें कश्मीर मुद्दा भी एक है, दूसरी ओर असम है तो एक ओर पश्चिमी बंगाल है। यहां तक भी देखने में आ जाता है कि भारत में रहकर लोग पाकिस्तान को या अन्य देशों को अपना मानते हैं यह राष्ट्रीयता के लिये घातक है।

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