ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय एवं विचार

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महात्मा ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय एवं विचार
ज्योतिबा फुले 
महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे या पूना शहर में हुआ था । वैसे उनकी जन्म तिथि के बारे में स्पष्ट एवं निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है । फुले के पिता सातारा से 25 किलोमीटर दूर कटगन गांव के निवासी थे । उनके परिवार का कुल नाम ‘गौरेह’ था । वे माली जाति से थें । ऐसा बताया जाता है कि उनके परदादा वहाँ पर ‘चौगुला’ के रूप में कार्य करते थें । ‘चौगुला’ लोगों का मुख्य कार्य अधिकारियों की सेवा करना, सरकारी कागजात इधर-उधर पहुंचाना और लगान वसूली के समय सहायता करना आदि था ।

उनके पास थोड़ी सी जमीन थी जिस पर काश्तकारी करके वे अपना गुजारा करते थें । गाँव के किसी ब्राह्मण के साथ एक दिन उनका झगड़ा हो गया जिस कारण ब्राह्मणों से तंग आकर वे गांव छोड़कर चले गाँव गए। इसके बाद वे पूना जिले के पुरंदर तालुका के एक गाँव खानवाडी में अपने परिवार के साथ रहने लगें । यहाँ उनका एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम शेतिबा रखा गया । शेतिबा का बचपन गांव में बीता लेकिन बड़े होने पर वे पूना में रहने लगें शेतिबा के तीन लड़के हुए: राणोजी, कृष्ण व गोविंद ।

इन तीनों भाईयों ने अब फूल-माली का व्यवसाय चुना। इस क्षेत्र में उन्होंने इतना नाम कमाया कि उनकी ख्याति पेशवा दरबार तक पहुंच गयी। अब वे पेशवा परिवार के लिए फूलों के गलीचे, गुलदस्ते तथा अन्य श्रंगार की वस्तु बनाने लगें पेशवा ने प्रसन्न होकर उन्हें 35 एकड़ जमीन इनाम में दे दी । तब से वे ‘फुले’ उपनाम से ही पहचाने जाने लगें ।

जोति के पिता का नाम गोविन्दराव फुले थे। उनकी पूना में फूलों की दुकान थी । उनका विवाह चिमनाबाई नामक महिला से हुआ जो जगादे पाटिल की लड़की थी । चिमनाबाई के दो पुत्र पैदा हुए । बड़े का नाम राजाराम व छोटे पुत्र का नाम जोतिराव रखा गया था । जब जोती एक वर्ष के हुए, तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था । उनके पिता ने दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि अपने महात्मा ज्योतिबा फुलेनवजात शिशु के पालन-पोषण हेतु एक आया की व्यवस्था कर दी की ।

ज्योतिबा फुले के परदादा सतारा से 25 मील दूर कटगन गाँव के निवासी थे और वहाँ पर चौगुला के रूप में कार्य करते थे। जिसकी बहुत छोटे दर्जे के ग्राम सेवक जैसी हैसियत थी। चौगुला गाँव के अधिकारी का सहायक हुआ करता था जो इन अधिकारियों के वस्तों, रजिस्टरों और रिकॉर्ड आदि रखते थे। लगान की वसूली करने और कटाई के दिनों में फसलों का निरीक्षण करने में सहायता करता था। इनके परदादा का कुल नाम ‘गोरे’ था। जो क्षत्रिय माली जाति से थे। थोड़ी-सी खेती के सहारे परिवार अपनी गुजर-बसर करता था। इनके परदादा का गाँव के कुलकण्र्ाी ब्राह्मण से झगड़ा हुआ, जिसके अत्याचारों से परेशान होकर एक रात को चौगुला ने उस कुलकण्र्ाी की हत्या कर दी और उसके बाद पूना जिले के खानवाड़ी गाँव में जाकर बस गये। वहाँ पर चौगुला को पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम शेतिबा था, अकेली सन्तान होने के कारण शेतिबा का पालन पोषण काफी अच्छे ढंग से हुआ जिससे शेतिबा खर्चीले हो गये। जिसके कारण इनकी आर्थिक स्थिति काफी दयनीय हो गई। गरीबी के कारण आजीविका की खोज में इन्होंने अपने परिवार को पूना शहर में स्थानान्तरित कर दिया।

शेतिबा के तीन पुत्र हुए- राणोजी, कृष्णा और गोविंद। पिता की दरिद्रावस्था के कारण इन तीनों को बचपन से ही रोटी-रोजी कमाने में जुट जाना पड़ा। प्रारम्भ में वे एक महाजन के यहाँ भेड़-बकरियों की रखवाली का काम करने लगे। थोड़े बड़े हो जाने पर महाजन ने उन्हें अपने फूलों के व्यवसाय में नौकर रख लिया। मूलत: माली जाति के होने से उन्होंने उस व्यवसाय की सभी बारीकियाँ सीखीं और कुछ दिनों बार वे उसमें निपुण बन गयें। उनका नाम चारों ओर फैल गया। जब उनकी कुशलता का समाचार पेशवा के कानों तक पहुँचा, तब उन्होंने उन तीनों को बुलाकर फूलों तथा फूलों से बनने वाली वस्तुओं की आपूर्ति करने का काम उनको सौंपा। तीनों भाइयों ने पेशवा की सेवा में कोई कमी नहीं रखी। तब उनकी सेवा से प्रसन्न होकर पेशवा ने उन्हें पुरस्कार में पुणे की पर्वती पहाड़ी के पास पैंतीस एकड़ भूमि दे दी जो अब भी उनके वंशजों के पास है। फूलों के व्यवसाय के कारण उनका कुल नाम ‘गोरे’ लुप्त हो गया और लोग उन्हें ‘फुले’ के नाम से जानने लगे। शेतिबा की मृत्यु के बाद उनके बड़े लड़के रानोजी ने पेशवा से प्राप्त इनामी भूमि पर अपना नाम चढ़वा लिया था। अब तक पूरा परिवार सम्मिलित रूप में शेतिबा के मामा जगाड़े के यहाँ रह रहा था। रानोजी ने अपने दोनों भाई-कृष्ण और गोविंद को वहाँ से निकलवा दिया। अब वे जीवन-यापन के लिए इधर-उधर भटकते रहे। किन्तु दृढ़ चरित्र, परिश्रमी और संयमी गोविंदराव ने हिम्मत नहीं हारी।

अंग्रेज उन दिनों महाराष्ट्र में अपने पैर जमा चुके थे। इसी बीच बाजीराव पेशवा द्वितीय की गद्दी छिन गई। हजारों परिवार जिन्हें दक्षिणा में पेशवा गद्दी से रोजी-रोटी मिली हुई थी यकायक अनाथ हो गए थे। फुले परिवार पर भी विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। रानोजी पहले ही पूरे परिवार को तोड़ने में लगा हुआ था। अब राज्याश्रय भी छिन गया था। कुछ समय पश्चात भाई गोविंदराव ने बड़ी मेहनत और लगन से पूना में फूलों की एक दुकान खोल ली। गोविंद बड़ी सूझ-बूझ वाला मेहनती व्यक्ति था।

पूना के निकट कवाड़ी गांव के एक माली जगाड़े पाटिल की सुन्दर, सुशील लड़की चिमनाबाई से गोविंद का विवाह हुआ। चिमनाबाई सीधी-सादी और धर्मपरायण महिला थी। अपनी गृहस्थी जमाने में गोविंद ने शुरू में बड़ा परिश्रम किया। इस दंपत्ति के दो पुत्र हुए। बड़े लड़के का नाम राजाराम और छोटे पुत्र का नाम ज्योति था। जिनको लोग ज्योतिबा कहते हैं, जो सन् 1827 में पूना में पैदा हुए। ज्योतिबा के जन्म से केवल आठ-नौ वर्ष पूर्व पूना अपना वैभव खो चुका था। ज्योतिबा के पिता गोविन्दराव ने मराठा शासन की गिरती हुई शान शौकत को देखा था। पूना ने अपना सम्मान तथा ताकत खो दिया था और ब्राह्मण लोग काफी पतित हो गये थे। बाजीराव द्वितीय जो ब्राह्मण राज का मुखिया था, बहुत दुराचारी था। वह हमेशा निर्बलों, चरित्रहीन और अय्यास लोगों से घिरा रहता था। पूना जुआरी, गुण्डे-बदमाशों और शराबियों का अड्डा बन गया। चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला था। पूना के प्रथम अंग्रेज कलक्टर रोबर्टसन यह देखकर आश्चर्यचकित था कि तत्कालीन समाज ने नैतिकता के सारे मूल्य ध्वस्त कर दिये है। यह नैतिक पतन का समय था।

जोतीराव एक वर्ष के भी नहीं हुए कि उनकी माता चिमणाबाई का निधन हुआ। गोविंदराव पर तो जैसे दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उस समय की रूढ़ि के अनुसार मित्रों और सगे-सम्बन्धियों ने गोविंदराव केा दूसरा विवाह करने की सलाह दी, लेकिन गोविंदराव ने सोचा, ‘‘क्या एक सौतेली माँ मेरे बच्चों को सगी मॉं की ममता, पे्रम दे सकेगी?’’ उन्होंने बहुत दिनों तक इस पर सोचा, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर शायद उन्हें ना में मिला। इसलिए उन्होंने दूसरे विवाह की बात मन से निकाल दी। गोविंदराव का यह निर्णय उस जमाने में सचमुच ही अनोखा और सराहनीय था जब पुरूष की कई पत्नियाँ हुआ करती थीं। उन्होंने अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए जोतीराव की मौसेरी बहन सगुणाबाई क्षीरसागर को नियत किया। वे बाल-विधवा थीं और जॉन नामक ईसाई पादरी के यहॉं अनाथ बच्चों की देखभाल का काम किया करती थीं। उन्होंने बड़ी ममता और अपनेपन से जोतीराव और राजाराम का पालन किया और उन्हें कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। स्वयं महात्मा ज्योतिबा फुले के शब्दों में- ‘‘माँ-जैसा दूसरा देवता नहीं लेकिन जिसने मुझे जन्म दिया, उसकी मुझे याद नहीं। मेरे जीवन की यह कमी सगुणाबाई क्षीरसागर ने पूरी की। उसकी कामना थी कि मैं बड़ा ‘‘फादर’’ बनूँ। न जाने क्यों वह मुझे ज्ञान-बोध कराती थी। बचपन में तो उसने ममता से मेरी सेवा की। कभी न घटने वाली ज्ञान-संपत्ति उसी ने मुझे दी। धन्य है मेरी आऊ।’’ बाद में यही सगुणा बाई ज्योतिबा फुले की प्रेरणा भी बनीं।

जब जोती पाँच वर्ष का हुआ तब अपने मातृविहीन मजबूत स्वस्थ और सुन्दर लड़के को देखकर गोविन्दराव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने प्यारे पुत्र को स्कूल में दाखिला कराने के बारे में सोचा। यद्यपि गोविन्दराव के वर्ग के लोग उस समय शिक्षा ग्रहण नहीं करते थे क्योंकि ब्राह्मणेतर जातियों के व्यक्तियों के लिये शिक्षा के दरवाजे बन्द थे। उस समय स्कूल निजी व्यक्तियों द्वारा उच्च जातियों की आबादी में चलाये जाते थे, जहाँ पंडित लोग संस्कृत, व्याकरण, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र और कानून पढ़ाते थे। निम्न वर्ग के लोगों को पढ़ने का अधिकार नहीं था और न ही वह इसकी आवश्यकता महसूस करते थे।

भारत में ब्रिटिश शासन की मौजूदगी के कारण हमारे देश की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था में अत्यन्त व्यापक परिवर्तन हुए, और जिससे सरकार की शैक्षिक नीति भी प्रभावित हुई। 1824 में मिशनरियों द्वारा पूना में मराठी स्कूलों की शुरूआत की गयी। मिशनरियों द्वारा मिशन स्कूल या पाठशालाओं को खोलने का मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार करना होता था। जिनको ब्रिटिश राज से संरक्षण प्राप्त था।

इस संक्रमण काल में जबकि निम्न जातियों के विद्याथ्र्ाीयों के लिये शिक्षा के दरवाजे बन्द थे, कतिपय विचारशील और बुद्धिमान लोग ही अपने बच्चों को विद्यालय भेजते थे। गोविन्दराव ने भी अपने पुत्र जोती को स्कूल भेजना मुनासिब समझा और जोती को 7 वर्ष की आयु में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु मराठी स्कूल में दाखिल करवाया। उस समय गोविन्दराव फुले ने अपने पुत्र जोती को पढ़ाने का साहस दिखाया जो वास्तव में बहादुरी का काम था। लेकिन हण्टर कमीशन के लागू होने तक ब्राह्मणों के लिए सहन करना बड़ा ही कठिन था कि निम्न वर्ग के लोग शिक्षा ग्रहण करे। गोविन्द राव की दुकान में एक ब्राह्मण क्लर्क का काम करता था। उस ब्राह्मण क्लर्क ने गोविन्दराव से पूछा कि तुम्हारे पुत्र के पढ़ने-लिखने से तुमको क्या लाभ होगा? शिक्षा उसे फूलों के कार्य के क्षेत्र में अयोग्य बना देगी। शिक्षा मनुष्य को अधार्मिक तथा राजद्रोही बना देती है। इस समय तक जोती ने मराठी कोर्स पूरा कर लिया था और पढ़ना, लिखना तथा गणित हल करना सीख लिया था।

उसी समय पूना में कट्टरपंथी हिंदू शूद्र और निम्न जाति के विद्यार्थियों को स्कूलों से निकालने पर तुले हुए थे। यही हालत महाराष्ट्र (बंबई प्रेसीडेंसी) के अन्य नगरों में भी थी। बंबई के एक ऐसे ही कट्टर हिन्दू नेता धकजी दादाजी प्रभु के इशारे पर ‘बंबई नेटिव एजूकेशन कमेटी’ द्वारा संचालित विद्यालय से ऐसे सभी छात्रों के नाम काट दिए गए। रूढ़िवादिता, संकुचित विचारधारा, जातिवाद और छुआछूत अपने वास्तविक रूप में खुलकर सामने आ गई। पिता गोविंदराव मौन रह सब कुछ सहन कर गए। साथ ही समाज द्वारा भी उन पर दबाव डाला जा रहा था कि वह बेटे की पढ़ाई छुड़वा दे। परिणामस्वरूप ज्योति की पढ़ाई बीच में ही रोक दी गई। कहा जाता है कि विद्यालय के ब्राह्मण लिपिक ने उनके पिता को अशुभ का भय दिखाकर ज्योति को स्कूल से निकलवाने में सफलता पाई। सामाजिक दबाव से गोविन्दराव ने अपने पुत्र ज्योतिबा को स्कूल से निकाल लिया।

विवश बालक ज्योति भी पढ़ाई छोड़कर अपने पिता के काम में हाथ बटाने लगा। अपने सुन्दर और स्वस्थ बेटे को फूल, फल और सब्जियों की खेतीबाड़ी में हाथ बंटाते देखकर गोविंद को संतोष तो होता था, लेकिन मन में यह बात चुभती थी कि उसका बेटा पढ़ाई जारी नहीं रख पाया। ज्योतिबा में एक अच्छे खेतिहर-बागवान, एक सुयोग्य माली के सभी गुण उसमें विद्यमान थे। परन्तु ईश्वर ने तो उनको एक ऐसे भविष्य के माली, एक ऐसे बागवान के रूप में पैदा किया था जिसे समाज रूपी उद्यान की समस्त जड़ता, अज्ञान, कुरीति और अंधविश्वास को समूल नष्ट करना था।

तभी जाति-विरादरी के लोग अब उसकी शादी के प्रस्ताव लाने लगे थे। उन दिनों महाराष्ट्र में सभी जातियों में बाल-विवाह प्रथा प्रचलित थी। इस कुप्रथा और अंधविश्वास को लोगों ने पुण्य-कार्य का रूप दे रखा था। गोविन्दराव बहुत दिनों तक बिरादरी वालों को टाल नहीं सके। गोविन्दराव ने जोतीराव का, मौजूदा रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह सावित्री से संपन्न कराया। उस समय सावित्री की आयु नौ वर्ष की थी तथा जोतीराव तेरह वर्ष के थे। जिन रीति-रिवाजों के अनुसार ज्योतिबा का बाल-विवाह हुआ, उसी का आगे चलकर उन्होंने घोर विरोध किया।

जोतीराव की शिक्षा खंडित होने पर भी शिक्षा में उनकी रूचि जरा भी कम नहीं हुई। वे रात के समय में पढ़ा करते थे। इससे उनके पास-पड़ोस में रहने वाले कुछ सज्जनों का ध्यान उनकी ओर गया। उनमें दो विद्वान व्यक्ति थे- श्री गफ्फार बेग मुन्शी और श्री लिजिट साहब। मुन्शीजी उर्दू-फारसी के अध्यापक थे तो लिजिट साहब ईसाई पादरी थे। उन्हें जोतीराव जैसे तेज छात्र की शिक्षा में आई हुई रूकावट उचित नहीं लगी। इसलिए वे दोनों गोविंदराव से मिले और उन्होंने जोतीराव की शिक्षा में रूचि, लगन, समझदारी, परिश्रमशीलता आदि बातों को बताकर उन्हें समझाया कि जोतीराव का आगे पढ़ना क्यों आवश्यक हैै।

गोविन्दराव ने दोनों विद्वानों की बात मानकर 1841 में जोती को मिशन स्कूल में पुन: दाखिल कराया। उस समय वह 14 वर्ष के थे। जोती को स्कॉटिश मिशन से मनुष्य के कर्त्तव्यों और अधिकारों के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ। जोती ने अंग्रेजी स्कूल की पढ़ाई जारी रखते हुए 1847 में पढ़ाई पूरी कर ली। इसी दौरान एक घटना घटी जिसने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया।

जोती को एक ब्राह्मण मित्र की शादी के समारोह में आमंत्रित किया गया था। वह अपने ब्राह्मण मित्र को बहुत ही प्रेम करता था, वह समारोह में शामिल हुआ। दुल्हा दुल्हन के घर में जा रहा था। इस समारोह में पुरूष, स्त्री और बच्चे सभी ब्राह्मण थे। शायद ही कोई ऐसा था जो अन्य समुदाय से सम्बन्धित था। जोती भी उन लोगो के साथ चल रहा था। कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने उसको पहचान लिया और इस बिचार के साथ कि वह एक निम्न माली जाति का लड़का है, ब्राह्मणों - भूदेवों की बारात में साथ-साथ चल रहा है, इस दृश्य से रूढ़िवादी ब्राह्मण अत्यन्त क्रोधित होकर बोले कि शूद्र बालक तेरी, हमारी बारात में हम लोगों के साथ चलने की हिम्मत कैसे हुई, तुम शुद्र हो, तुमने सारे जाति नियमों केा तोड़ कर हम लोगों को अपमानित किया है। तुम हम लोगों के बराबर नहीं हो। तुमको बारात में आने से पहले सौ बार सोचना चाहिए था। पीछे जाओ, नही तो यहाँ से चले जाओ। लोग आजकल सारी शर्म हया छोड़ दिये हैै, ब्रिटिश राज में लोग उत्तेजित हो गये है तथा जाति नियमो की धज्जियाँ उड़ा रहे है। जोती उधेड़ बुन मे था। वह अचंभित रह गया। उसने अन्दर से गहरा अपमानित महसूस किया। उसके सारे शरीर और दिमाग मे घबड़़़़़ाहट होने लगी। वह उस समारोह को छोड़कर घर लौट आया। अपमान की यह घटना उनके लिए आगे वरदान सिद्ध हुई और वह एक महान समाज सुधारक और क्राँतिकारी बने। ज्योति ने घर लौटकर पिता को सारी घटना सुनाई। क्षुब्ध ज्योति को पिता गोविंदराव ने ब्राह्मणवाद की बहुत-सी बुराइयों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि पूरा समाज सामंती होते हुए भी ब्राह्मण और पुरोहितों की कृपा से नियंत्रित होता है। हिन्दू समाज में जन्म से ही शुद्र जाति के लोग ऊचे वर्गो की तुलना में बहुत छोटे माने जाते है और उनके अधिकार भी सीमित होते हैं। वे सदियों से गुलामी के शिकार हैं तथा ऊंचे वर्गों की सेवा के लिए ही बने हैं। शिक्षा प्राप्त करने का उन्हें अधिकार नहीं है। वे पुरोहितों की छाया से भी दूर रहने को मजबूर हैं।

गोविन्दराव ने अपने बेटे को परंपरागत अमानवीय दुर्व्यवहारों की अनेक गाथाएं सुनायी, जिनको शूद्र लोग असहाय होकर सहते चले आ रहे थे। किन्तु साथ ही पिता ने उनको उपदेश भी दे दिया कि वह आवेश में आकर ब्राह्मणों के विरूद्ध ऐसा कोई काम न कर बैठे जिससे वह उनके कोप का भाजन बने तथा परंपरागत रीति-रिवाज खंडित हो।22 जोती ने अपने पिता की बातों को ध्यान से सुना। लेकिन जोती उनकी बातों से सहमत नहीं हुआ क्योंकि उसकी आस्था शिवाजी, वाशिंगटन और लूथर से जुड़ी हुई थी।23 जोती को भविष्य का रास्ता खुलता हुआ दिखाई दिया। मन ही मन उसने ठान ली कि अब आगे चलकर बस एक ही काम करना है, जाति-भेद के खम्भों पर खड़े विषमता के महलों को ढहा देना है। वे ब्राह्मण है, जो इस व्यवस्था के निर्माता हैं, तो पहले हमला पुरोहित पंथ पर होगा। जन्मजात ऊँच-नीच की नींव ही उखाड़ फेंकनी होगी। उसने यह भी जान लिया कि निम्न जातियों की दुर्दशा का मुख्य कारण है- अशिक्षा। ज्ञान के सारे रास्तों पर ब्राह्मण वर्ग का पहरा है। वे अन्य जातियों तक आसानी से ज्ञान पहुॅंचने ही नहीं देते। निम्न जातियों के लिए, स्त्रियों के लिए तो उन्होंने ग्रन्थों का पठन-पाठन तक मना कर दिया था। अन्धविश्वासी, अज्ञानी और धर्मभीरू जनता न इस व्यवस्था के खिलाफ लड़ सकती है, न नया रास्ता अपना सकती है। धर्म नियमों का आधार लेकर विषम समाज व्यवस्था का एक ऐसा चौखटा पुरोहित वर्ग ने खड़ा किया है, जिसे तोड़ना आसान नहीं।

हिन्दू समाज की अच्छाइयों और बुराइयों की तह में जाकर जोतिबा ने संकल्प किया कि अन्धविश्वास, रूढ़िता और अज्ञान के आवरण को उठाकर सच्चाई का उद्घाटन करेंगे। शोषण के विरूद्ध लड़ने के लिए शोषितों को जागृत करेंगे। इसके लिए हिन्दू धर्मग्रन्थों के विचारों पर यदि आक्रमण करना पड़ा तो भी पीछे नहीं रहेंगे। व्यक्ति की जन्मजात श्रेष्ठता की धारणा का विखण्डन करेंगे और जनमानस को बतायेंगे कि ईश्वर ने सबको एक जैसा समान पैदा किया है। हर व्यक्ति नंगा ही पैदा होता है जाति, धर्म, कुल का वस्त्र बाद में पहनाया जाता है। ज्ञान, कार्य-श्रेष्ठता तथा पराक्रम के गुण व्यक्ति में न्यूनाधिक्य हो सकते हैं, परन्तु ये किसी जाति या जनसमूह की धरोहर नहीं हैं और न ही वंशानुगत हैं। जोतीराव ने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपना सम्पूर्ण जीवन ‘सामाजिक क्रान्ति’ के साफल्य को अभ्यर्पित कर देंगे। शोषण मुक्त समाज की स्थापना का संकल्प साकार करेंगे।

फुले चाहते तो उन्हें सरकारी नौकरी आसानी से मिल सकती थी। लेकिन वह अपने समय के उन सभी श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ताओं में अग्रणी थे जिन्होंने सरकारी दाने चुगने से इन्कार कर दिया था। बारात के अपमान के उस एक प्रसंग ने फुले के जीवन की दिशा ही बदल दी।

आगे चलकर ज्योतिबाफुले एक महान समाज सुधारक बने जो आजीवन स्वतंत्रता, समता, भाईचारा, मानव अधिकार और सामाजिक न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के लिये कार्य करते रहे और अपने विचार व्यक्त किये।

ज्योतिबा फुले के प्रेरणा स्रोत

ज्योतिबा फुले में सामाजिक सुधार और सामाजिक परिवर्तन की भावनाओं ने अचानक जन्म नहीं लिया था। उनके चरित्र गठन में कई बातों का बड़ा योगदान है। 

थॉमसपेन -

ज्योतिबा फुले के विचारात्मक गठन में पेन के साहित्य और उनके कार्यों का बहुत ज्यादा योगदान है।
थॉमसपेन क्रांतिकारी था। उसके ग्रन्थ ‘राईट्स ऑफ मेन’ का इन पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। राइट्स ऑफ मेन ने इनको भविष्य के कार्यों के लिए तैयार किया। पेन कट्टर एकेश्वरवादी थे। उनका कथन था- ‘‘धर्म ईश्वर की आराधना करने वाले प्रत्येक मनुष्य का निजी तथा व्यक्तिगत विषय है। विश्व का निर्माणकर्र्त्ता ईश्वर है और विशुद्ध भाव से उसकी शरण में जाने वाले मनुष्य और ईश्वर के बीच में किसी भी बिचौलिये की आवश्यकता नहीं है। इसलिए मैं यहूदी, रोमन, तुर्की, प्रोटेस्टंट या अन्य किसी भी धर्मशासन (चर्च) को नहीं मानता। मेरा मन ही मेरा चर्च है। धर्मश्रद्धा स्वतंत्र तथा स्वयंफूर्त होनी चाहिए, उस पर किसी भी बाहरी सत्ता का अधिकार नहीं होना चाहिए।

ईश्वर के नाम पर जो धर्म का बाजार लगाया जाता है, वह केवल अनावश्यक और अनिष्टकर ही नहीं है, बल्कि पापमूलक और पाखंड-सर्जक भी है।’’ पेन का प्रभाव फुले पर स्पष्ट दिखाई देता है। जोतीराव फुले सभी प्रकार के कर्मकाण्डो के विरूद्ध थे। इसलिए उन्होंने धर्मग्रन्थों को श्रेष्ठ नहीं माना। कर्मकाण्डो के माध्यम से ही पुरोहितशाही आती है। फिर यह पुरोहितशाही ब्राह्मणों, मुल्लाओं, पादरियों या लामाओं की ही क्यों न हो, इस पुरोहितशाही को वे नहीं मानते थे।

पेन ने एक दूसरे लेख में नारी-दास्य विमोचन की समस्या पर लिखा है। उन्होंने कहा है कि समस्त विश्व की नारी-जाति कई शताब्दियों से पुरुष-जाति के अन्याय का शिकार बनी हुई है। माना जाता है कि नारी को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए, चुपचाप निष्ठा से अपने कर्तव्य करते रहना चाहिए। पेन ने बड़े स्पष्ट शब्दों में सुसभ्य माने जाने वाले समाज में भी नारी की बुरी हालत का वर्णन करते हुए स्त्री-पुरुषों की समानता पर बल दिया है। नारी दास्य विमोचन में जोतीराव को भी विशेष रुचि थी।

थॉमस पेन का सारा साहित्य बार-बार मनुष्य की स्वतंत्रता का और उसके निसर्गदत्त अधिकारों का उद्घोष करता है। स्वातंत्र्य, समता और बंधुता इन तीन सूत्रों पर उसका पूरा विश्वास था। आदमी की प्रतिष्ठा, उसकी स्वतंत्रता, समता, न्याय, बुद्धिनिष्ठा और उसे प्राप्त निसर्गदत्त अधिकार तथा उसके कर्त्तव्य को उसने सदैव प्रधानता दी। फुले मानवतावाद से अभिभूत तो थे ही, पेन के विचारों ने उनके मानवतावाद को और एक निश्चित दिशा दी।

छत्रपति राजा शिवाजी -

ज्योतिबा फुले ने छत्रपति राजा शिवाजी की जीवनी से भी प्रेरणा ली थी। उन्होंने बचपन में ही छत्रपति शिवाजी की वीरता के किस्से और मराठी लोकगीत सुने थें। ज्योतिबा के युवा मन पर शिवाजी का भारी प्रभाव था।

फुले ने यह भी सुना कि छत्रपति शिवाजी स्त्रियों और सभी धर्मों का आदर करते थे। एक बार उनका एक सरदार युद्ध जीतने पर किसी विधर्मी की सुन्दर युवती को भी ले आया। शिवाजी को जब पता चला तो उन्होंने उस युवती को उसके घर ससम्मान विदा किया और उसके लूटे आभूषण वापिस कराए। शिवाजी ने धार्मिक स्थलों, मस्जिदों को कभी नहीं गिराया। वरन वह सब धर्मों को बराबर समझते थे।

फुले ने भी आगे चलकर स्त्री शिक्षा पर काफी ध्यान दिया तथा वे भी सभी धर्मों का सम्मान करते थे।

जैसे लोकमान्य तिलक जी ने राजनैतिक जागरूकता के लिए राजा शिवाजी और उनकी जीवनी का प्रयोग किया, वैसे ही महात्मा फुले ने तिलक जी से भी पहले सामाजिक जागरूकता के लिए राजा शिवाजी और उनकी जीवनी का प्रयोग किया।

महात्मा ज्योतिबा फुले की शिक्षा

जब जोति पाँच वर्ष के हुए तब पिता ने उनको स्कूल में दाखिल कराने के बारे में सोचा । यद्यपि उस समय गोविन्दराव के समुदाय के लोग प्राय: शिक्षा ग्रहण नहीं करते थें । दरअसल उस समय महाराष्ट्र में लगभग सभी ब्रह्माणेतर जातियों के व्यक्तियों के लिए शिक्षा के दरवाजे बन्द थें । हालांकि अंग्रेजों का राज कायम होने के बाद शिक्षा के दरवाजे वैधानिक रूप से सबके लिए खुल गए थे ।

काफी सोचने के बाद गोविन्दराव ने जोतिराव को 7 वर्ष की आयु में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु एक मराठी स्कूल में दाखिल करवाया गया । उस काल में पुस्तकों की बाईण्डिग और स्याही को कुछ लोग ‘प्रदूषणकारी’ मानते थें तथा विशेषकर अंग्रेजी पढ़ना कट्टर रूढ़िवादियों की दृष्टि में ‘अशुद्धि’ फैलाने के समान था । इन सब बातों से बढ़कर उन दिनों निम्न जातिय लोगों के लिए शिक्षा ग्रहण करना ‘धर्म-विरुद्ध कार्य’ समझा जाता था । ऐसे अन्धकारपूर्ण युग में गोविन्दराव फुले ने अपने पुत्र जोतिराव को शिक्षा दिलाने का जो साहस दिखाया, वह वास्तव में एक हिम्मत का काम था।

जोति ने जल्दी ही प्राथमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी कर ली। उन दिनों पूना में कट्टरपंथी हिन्दू विशेषकर चितपावन ब्राह्मण निम्न जातियों के विद्यार्थियों के स्कूलों में जाने की बढ़ रही प्रवृत्ति से नाराज थें । यहीं हालत बम्बई प्रेसीडेंसी के अन्य नगरों की भी थी। बंबई के एक ऐसे ही कट्टरपंथी हिंदू नेता हाकजी दादाजी प्रभु के इशारे पर ‘बंबई एजुकेशन कमेटी’ द्वारा संचालित विद्यालयों में पढ़ रहे ऐसे सभी छात्रों के नाम काट दिए गए । ऐसे में बढ़ते सामाजिक दबाव के कारण गोविन्दराव ने भी अपने पुत्र को आगे पढ़ाने की बजाए स्कूल से ही हटा लिया ।

जोति अब पढ़ाई छोड़कर अपने खेती-बाड़ी के पुश्तैनी काम में लग गए । उन्होंने बड़ी लगन और उत्साह से अपने पिता का फूल उत्पादन का कार्य सीख लिया । इसी दौरान 13 वर्ष की आयु में उनकी शादी 8 वर्ष की एक कन्या सावित्रीबाई से हुई । सावित्रीबाई पूना के पास ही एक गांव खण्डोजी के नेवासे पाटिल की पुत्री थी ।

वस्तुत: प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जोतिराव के मन में और अधिक पढ़ने की रूचि उत्पन्न हो गई थी। वे फुर्सत अथवा रात के समय अक्सर बड़े ही चाव से यूं ही किताबें पढ़ते रहते थें । उन्हें ऐसे ही पढ़ते देखकर गोविन्दराव के दो प्रबुद्ध पड़ोसी बहुत प्रभावित हुए ।

महात्मा ज्योतिबा फुले के विचार

स्कॉटिश मिशन स्कूल में उनका पहली बार मानवाधिकारों के विचार से परिचय हुआ । इन्हीं दिनों उन्होंने शिवाजी और जॉर्ज वाशिंगटन की जीवनीयां पढ़ी । इन पुस्तकों ने उनके भीतर देशभक्ति और स्वतन्त्रता की भावनाएं पैदा की । 1847 ई. में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली । शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त वे पुन: अपना पुश्तैनी कार्य अर्थात् बागवानी करने लगें । उस समय तक आजादी के लिए अमेरिकावासियों के संघर्ष से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने समता और स्वतन्त्रता के मानवीय मूल्यों के बारे में गहराई से सोचना शुरू कर दिया था । वस्तुत: जोतीराव घिसे पिटे रास्ते के अनुगामी नहीं थे, बल्कि स्वयं रास्ता बनाने वाले व्यक्ति थे । उनके दिमाग में मानव कल्याण व मानव सेवा के विचार उमड़ रहे थे ।

उनके जीवन में तभी एक घटना घटी जिसने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया और जिसके कारण वे आगे चलकर महान क्रान्तिकारी समाज सुधारक बने । सन् 1848 में वे अपने एक घनिष्ठ ब्राह्मण मित्र सदाशिव गोविंद के विवाह में सम्मिलित हुए जिसका उन्हें निमन्त्रण मिला था । जोतिराव अपने मित्र की बारात के साथ-साथ चल रहे थे कि तभी कुछ कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने उन्हें पहचान लिया। वे उन पर अत्यधिक क्रोधित होकर बोले कि “हे शूद्र, हमारी बारात में चलने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई है?” अचानक यह फटकार सुनकर वे स्तब्ध रह गये । तुरन्त बारात छोड़कर घर आ गए और घटना की जानकारी अपने पिता को दी। पिता ने समझाया कि “हम लोग ब्राह्मणों की बराबरी नहीं कर सकते । वर्ण-धर्म के अनुसार यही विधान है ।”

उस रात सो नहीं सकें और सारी रात मंथन करते रहें उनको अपने पिता की वह चेतावनी याद थी कि यदि पेशवाओं के युग में उसने ऐसा कर दिया होता तो उसे ‘विद्रोही’ घोषित करके दण्ड दिया जाता । उन्होंने ऐसा महसूस किया कि शूद्र के जीवन का अर्थ गरिमा और सम्मान को खो देना है । यह घटना उस समय के हिन्दू समाज में निम्नजातियों की दशा को दर्शाती है । परन्तु फुले यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थें कि निम्न जातियों को ब्राह्मणों के बराबर जीवन जीने का अधिकार नहीं हैं। उनके विद्रोही मानस ने प्रश्न किया कि “जब ब्राह्मण और हम शूद्र एक ही धर्म को मानते हैं तो हम ब्राह्मणों से तुच्छ कैसे हुए? अन्तत: वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जातिभेद की जड़ वर्ण व्यवस्था है ।

लेकिन इस व्यवस्था के पीछे ब्राह्मण धर्म एवं ब्राह्मणवादी विचारधारा विद्यमान हैं जिसने शूद्रों एवं गैर-ब्राह्मणों को जाति रूपी दासता की जंजीरों में जकड़ दिया है। इस निष्कर्ष पर पहुँचते ही फुले के मन में एक नई चेतना उत्पन्न हुई। उन्होंने संकल्प लिया कि अब से अनुचित ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था को समाप्त कर समता, स्वतन्त्रता, भाईचारे और न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना उनके जीवन का उद्देश्य होगा ।

वस्तुत: महात्मा ज्योतिबा फुले के ऐसे विचारों के प्रेरणा स्त्रोत पाश्चात्य जगत के महान दार्शनिक मार्टिन लूथर, थॉमस पेन और जॉर्ज वाशिंगटन जैसे लोग थें जिनका वे अब तक अध्ययन कर चुके थें । मार्टिन लूथर ने यूरोप में ‘माफीनामें’ बेचने वालों और पोपशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की थी उनके धर्म-सुधार आन्दोलन ने लोगों को आध्यात्मिक मामलों में विचार-स्वतन्त्रता दिलाई । उन्हीं के अनुरूप जोतिराव ने भी ईश्वर तथा मानव के बीच में आने वाले पंडितों के क्रिया-कलापों का पर्दाफाश कर लोगों को उनके सम्पूर्ण मानवाधिकार दिलवाने के लिए संघर्ष किया ।

फुले के विचारात्मक गठन में महान् अमेरीकी राजनीतिक चिन्तन थॉमस पेन के साहित्य एवं उनके विचारों का भी बहुत बड़ा योगदान था । उनकी पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मैन’ पाश्चात्य जगत की एक चर्चित रचना थी जिसमें वर्णित दार्शनिक विचारों ने अमेरिकी राज्य क्रान्ति के आधार स्तम्भ खड़े किये । इसी कारण इस पुस्तक को “गरीबों की बाईबल” कहा जाता है। इस पुस्तक में अमेरिकी लोगों का ध्यान नीग्रो लोगों की गुलामी की ओर भी आकर्षित किया गया था । पेन ने मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों की पुर्नस्थापना की बात कही थी । उनके दृष्टिकोण ने जोतिराव फुले को अत्याधिक प्रभावित किया । उनका भी मानना था कि प्रकृति ने सबको समान दर्जा प्रदान किया है । ऊँच-नीच, असमानता व भेदभाव मनुष्यकृत है जो भारत के सन्दर्भ में वर्ण-व्यवस्था और जाति प्रथा की देन है ।

पेन के अलावा महात्मा ज्योतिबा फुले पर अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन का भी काफी प्रभाव था । अमेरिकी क्रान्ति (1776) विश्व इतिहास की असाधारण घटना थी इसके बाद अमेरिका में अनुवांशिक राजशाही का खात्मा, सामंती-कुलीन तंत्र का अंत, लिखित संविधान सत्ता विभाजन आदि ऐसी चीजें लागू हुई थी जिनसे फुले के विचारों को एक नई रोशनी प्राप्त हुई ।

फ्रांस की राज्यक्रान्ति (1789) का भी फुले के चिंतन पर गहन प्रभाव पड़ा । फुले ने इस क्रान्ति से समता, स्वतन्त्रता, बन्धुता और मानवीय अधिकारों सम्बन्धी विचार ग्रहण किए । फ्रांस का उच्च वर्ग, जिसमें पादरी व सामन्ती वर्ग के लोग थे, आम जनता का शोषण करता था । महात्मा ज्योतिबा फुले ने भारत के परिपे्रक्ष्य में देखा कि यहाँ पर ब्राह्मणों ने सर्वोच्च पुरोहित वर्ग का रूप धारण कर लिया है जो शूद्रों, अतिशूद्रों व महिलाओं का मनचाहा दमन तथा शोषण कर रहे हैं । ऐसी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रान्ति किया जाना आवश्यक है । भारत के प्राचीन बौद्ध धर्म एवं उसके दर्शन का भी फुले के सामाजिक दृष्टिकोण पर बहुत प्रभाव था।

महात्मा बुद्ध के जिन सिद्धान्तों ने फुले पर प्रभाव डाला, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है उनका ‘बुद्धिवाद’ । उन्होंने अपने उपदेशों में कहा कि किसी बात को इसलिए मत स्वीकार करो कि वह वेदों में कही गई है अथवा उसे कहने वाला हमारा गुरु है बल्कि जब स्वयं अनुभव करो कि वह वास्तव में सच्ची है तब ही उसे स्वीकार करो। फुले ने भी बुद्ध की तरह विचारों की स्वतन्त्रता व तार्किक सोच को बहुत महत्त्व दिया । इसी कारण उन्होंने वेदों की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया । फुले को शीघ्र ही इस बात का अहसास हो गया कि सभी तरह के परिवर्तनों की जड़ और स्वतंत्रता की भावना का उद्गम स्थल शिक्षा होती है । लेकिन भारतीय जनमानस में शिक्षा का घोर अभाव है। अज्ञान के कारण ही शूद्रों-अतिशूद्रों का पतन हुआ है । इसलिए उनमें शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना सबसे जरूरी है ।

ब्राह्मण, पुरोहित तथा अन्य उच्च जातियाँ सदियों से शिक्षा पर एकाधिकार जमाएँ बैठी हैं जिसके कारण शूद्रों, अतिशूद्रों एवं महिलाओं को अज्ञानता के अंधकार में रहने को विवश होना पड़ा है । लेकिन अब अंग्रेजों के राज के अन्तर्गत शिक्षा के द्वार सबके लिए खुल गए हैं अत: महिलाओं और शूद्रों-अतिशूद्रों में शिक्षा के प्रति अनुराग पैदा होना चाहिए । ऐसे में फुले ने यह निश्चय किया कि वे पूना में निम्नजातिय बालिकाओं के लिए एक पाठशाला स्थापित करेंगे ।

जिन दिनों जोतिराव के मन में बालिका विद्यालय खोलने का विचार उमड़ रहा था, उन्हीं दिनों उनके मित्र सदाशिवराव गोविंदे उन्हें अहमदाबाद स्थित एक ईसाई मिशनरी शिक्षा केन्द्र में ले गये। वहाँ उसने श्रीमती फॅरार का मिशन स्कूल देखा । श्रीमती फॅरार ने इस बात पर अफसोस जताया कि भारत में महिलाओं की शिक्षा को नकारा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को चाहिए कि वह सर्वप्रथम अपनी पत्नी को शिक्षित करे। इस बात का जोतिराव पर बहुत प्रभाव पड़ा । जब वे पूना लौटै तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को लिखने-पढ़ने की प्रेरणा दी । शीघ्र ही वे शिक्षित हो गईं । अब फुले दम्पत्ति ने अगस्त 1848 में पूना के बुधवार पेठ नामक मुहल्ले में लड़कियों के लिए देश की प्रथम पाठशाला की स्थापना की ।

महिलाओं को शिक्षा देने के कार्य को उन दिनों ‘अनुचित’ एवं ‘धर्म-विरुद्ध’ माना जाता था । फलत: रूढ़ीवादियों ने उनके इस कार्य का भारी विरोध किया । दबाव के आगे झुकते हुए उनके पिता ने उनसे पाठशाला को बन्द करने को कहा । परन्तु फुले अपने निश्चय पर दृढ़ रहें। अन्तत: पिता ने बेटे और पुत्र-वधू को अपने घर से चले जाने के लिए कह दिया । घर से निकाले जाने के बाद फुले-दम्पति पूना के गंजपेठ में आकर रहने लगें । यहाँ आने के बाद उन्होंने पूना और उसके आसपास के स्थानों पर कई अन्य स्कूलों की स्थापना की जिनमें से कुछ ‘अछूत’ बच्चे के लिए भी खोले गए थें । सन् 1855 ई। में फुले ने पूना में ही एक रात्रि-पाठशाला भी खोली । इस पाठशाला में दिनभर काम करने वाले मजदूर, किसान और गृहणियाँ पढ़ने के लिए आती थीं । यह भारत की पहली रात्रि-पाठशाला थीं ।

1864 में फुले ने पूना मे अपने ही घर में गर्भपात के खिलाफ एक केन्द्र ‘बालहत्या प्रतिबंध गृह’ की स्थापना की जहाँ गर्भवती विधवाएं अपने बच्चों को पैदा कर सकती थी। यहाँ उनके बच्चों की देखभाल भी की जाती थी। यह भी देश में अपनी तरह का पहला केन्द्र था । यह केन्द्र विशेषकर ब्राह्मण समुदाय में पथभ्रष्ट कर दी गई विधवाओं को गर्भपात बदनामी एवं आत्महत्या से बचाने का पुण्यकारी कार्य कर रहा था । काशीबाई नाम की एक ब्राह्मण महिला ने इसी केन्द्र में एक बच्चे को जन्म दिया था जिसका नाम यशवंत रखा गया । जोतिराव और सावित्रीबाई ने उसे पुत्र के रूप में गोद ले लिया क्योंकि उनकी स्वयं की कोई संतान नहीं थी । अपनी वसियत में इसी दत्तक पुत्र के नाम उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति कर दी थी।

महात्मा ज्योतिबा फुले मन में अस्पृश्यों के लिए विशेष प्रेम था । उनके घर में एक कुआं व पानी का एक बड़ा हौज था जिसे उन्होंने सन् 1868 में अस्पृश्य लोगों के लिए खोल दिया । यहाँ तक कि उन्होंने अछूतों के साथ भोजन करना भी प्रारम्भ कर दिया था ।

1848 में जब उन्होंने पूना में कन्या पाठशाला शुरू की, तब उनके दिमाग में एक बात साफ थी कि पहले हमें उस अविद्या से लड़ना है जो सारे अनर्थ की जड़ है। इसके साथ ही उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था से बौद्धिक रूप से लड़ना है जो अज्ञान का घना कोहरा बना रही है । फलत: महाराष्ट्र के आम लोगों में अपने विचारों का प्रसार करने के लिए फुले ने मराठी भाषा में लिखना शुरू कर दिया । उन्होंने ने मराठी में एक काव्य-संग्रह ‘ब्राह्मणांचे कसाब’ (ब्राह्मणों की चालाकी) की रचना की । इसमें पुरोहितों द्वारा धर्म और देवताओं के नाम पर अनपढ़-अशिक्षित लोगों को भ्रमित किए जाने के विषय में लिखा गया है ।

ज्योतिबा ने लिखा कि किस तरह अपनी मासूमियत और अज्ञानता के कारण शूद्र किसान स्त्री-पुरुष ब्राह्मण-पुरोहितों द्वारा सैंकड़ों धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर शोषण का शिकार बनाए जा रहे हैं । उन्होंने एक अन्य वीर रस से ओत-प्रोत काव्य रचना ‘शिवाजी का पंवाडा’ लिखी । यह पुस्तक 1869 में प्रकाशित हुई । इसके अन्दर ‘शूद्र राजा’ छत्रपति शिवाजी के वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन किया गया था ।

1872 में उन्होंने ‘गुलामगिरी’ नामक अपनी अति प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। भारतीय समाज में व्याप्त ‘जातिगत गुलामी’ के बारे में लिखी गई यह एक अत्यन्त विचारोत्तेजक पुस्तक थी । अमेरिका में अब्राहम लिंकन ने सन् 1863 में दासता का अंत किया था । फुले ने उनसे प्रेरित होकर यह ‘गुलामागिरी’ लिखी और इसे अमेरिका के लोगों को समर्पित किया । इस पुस्तक में उन्होंने ब्राह्मणवादी धर्म एवं व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्रों, अछूतों एवं स्त्रियों पर लादी गई गुलामी का उल्लेख किया है । वे शूद्रों-अतिशूद्रों को ‘भारत के मूल निवासी’ मानते थें जिनको ‘ईरान से आए आर्यों’ (वर्तमान ब्राह्मणों) ने गुलाम बना लिया था ।

यद्यपि उन्होंने जाति भेद के नस्लीय सिद्धान्त, जिसे तत्कालीन साम्राज्यवादी-उपयोगितावादी विद्वानों ने आगे बढ़ाया था, को अपनाया था, किंतु जाति भेद संबंधी उनका समाजशास्त्रीय विमर्श काफी गहन, मौलिक एवं क्रान्तिकारी था। उनका चिन्तन व लेखन-कार्य निरन्तर जारी रहा । यहाँ तक कि एक बार पैरालाइज होने के कारण यद्यपि उनका दांया हाथ प्रभावित हुआ, परन्तु उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा ।

एक अन्य प्रसिद्ध रचना ‘सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक’ को उन्होंने अपने बांए हाथ से लिखा था । इस पुस्तक में वे ‘सार्वभौमिक सत्य पर आधारित धर्म’ के नियमों को परिभाषित करते हैं जिनमें उनका सर्वाधिक जोर स्त्री-पुरुष के समान ‘मानव अधिकारों’ पर रहा ।”

अपने ‘सत्यधर्म’ के विचार पर आधारित ‘धर्मयुद्ध’ को आगे बढ़ाने तथा महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी दासता से शूद्रों, अतिशूद्रों तथा ब्राह्मणेत्तर ‘बहुजन समाज’ को मुक्ति करने के लिए फुले ने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की । इस संस्था का लक्ष्य एक ‘सच्चे धर्म’ की खोज-शोध करना था और इसे समाज में स्थापित करना था । इसका मुख्य उद्देश्य था कि सभी समूहों के लोगों को उनके समान मानव अधिकारों की जानकारी प्रदान की जाए और उन्हें ब्राह्मणवादी धर्म ग्रन्थों एवं व्यवस्था द्वारा थोपी गई गुलामी से मुक्त कराया जाए ।

ब्रह्म समाज, आर्य समाज तथा प्रार्थना समाज से भी अधिक क्रान्तिकारी दृष्टिकोण रखने वाले सत्यशोधक समाज ने भारत में वास्तविक समाज सुधार लाने हेतु ब्राह्मणवादी विचारधारा एवं संस्कृति के पूर्णत: परित्याग एवं मानवतावाद की विचारधारा को अपनाने का आह्वान किया । यह संस्था सभी स्त्री-पुरुषों को समान मानते हुए उनको बराबर ‘मानव अधिकार’ दिलाने पर जोर देती थी । इस संस्था ने महाराष्ट्र में धर्म-सुधार एवं समाज-सुधार की दिशा में पहल की । लोग अब उनको सम्मान से ‘महात्मा’ व ‘ज्योतिबा’ जैसे नामों से पुकारने लगे थें ।

फुले स्वयं किसान के पुत्र थें । इसलिए वे किसानों को समस्या से भलीभांति अवगत थें । उन्होंने 1883 ई. में किसानों की समस्याओं पर ‘किसान का कोड़ा’ नामक एक पुस्तक लिखी । इसमें उन्होंने अशिक्षित, असंगठित, गरीब, धर्मभीरू तथा कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की दुर्दशा के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया । किसानों की सामाजिक-आर्थिक दशा का मार्मिक चित्रण करने के साथ-साथ उन्होंने इसमें कृषक-उत्थान हेतु बहुमूल्य सुझाव भी दिए थें । ‘अछूतों की कैफियत’ नामक अपनी एक अन्य रचना में फुले ने अस्पृश्य लोगों की दुर्दशा का चित्रण किया और बताया कि कैसे संयोगवश “महारानी विक्टोरिया से मिलने का मौका मिलने पर” अस्पृश्य समुदाय के लोग उन्हें अपनी पीड़ा और वेदना का बयान करेंगें ।

उन्होंने 1885 में ‘सतसार’ नाम की पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया । इसके माध्यम से उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर अपने विचार प्रकट किए । परन्तु ‘सतसार’ के 1885 में केवल दो अंक ही छपे और इसके बाद इसका प्रकाशन बन्द करना पड़ा । पहला अंक जून में तथा दूसरा अंक अक्तूबर में प्रकाशित हुआ था । ये अंक भारत की स्त्रियों की स्थिति के विषय पर केन्द्रित थें। इनमें उन्होंने उस समय की परम विदूषी एवं समाज-सुधारक पंडिता रमाबाई द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने का उल्लेख किया था । तत्पश्चात् उन्होंने ‘दीनबन्धु’ नामक एक अन्य पत्रिका के प्रकाशन में अपने साथियों को सहयोग दिया जिसका प्रकाशन बाद तक होता रहा ।

1876 से 1882 तक ज्योतिबा पूना नगरपालिका के सदस्य रहे। इस काल में उन्होंने महसूस किया कि उच्च वर्गीय अधिकारी गरीबों-अछूतों की बस्तियों में पानी पहुँचाने तथा सड़क बनाने पर ध्यान नहीं देते हैं । उन्होंने इन बस्तियों में पानी व सड़कों की व्यवस्था कराई । साथ ही उन्होंने निम्न वर्गों में से कर्मचारियों की नियुक्ति करने पर जोर दिया तथा अपने कार्यकाल में गरीब लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य कराये ।

महात्मा ज्योतिबा फुले एक ऐसे सुधारक व विचारक थे जिनका अवलोकन चहुँमुखी था। उनका ध्यान बम्बई के मिल मजदूरों की ओर भी गया क्योंकि प्राय: वे बम्बई जाते रहते थे । अत: वहाँ के मजदूरों और उनकी समस्याओं से वे भली-भांति आवगत थे । फुले ने उनकी समस्याओं को समझा और उनका समाधान करने की ठानी। इस कार्य में उनका साथ दिया नारायणराव मेधाजी ने जो ‘दीन-बंधु’ पत्रिका के संपादन का कार्यभार संभालते थे । उन्होंने अपनी पत्रिका ‘दीनबंधु’ में प्रकाशित किया कि मजदूरों को एक दिन में 14-14 घण्टे काम करना पड़ता है, वह भी बन्द कमरों में, सुरक्षा के अभाव व कम वेतन में । थोड़े समय के अवकाश पर ही उन्हें चार आने जुर्माना देना पड़ता है ।

फुले तथा नारायण राव ने मिल मजदूरों की समस्याओं के लिए अनेक सभाएं की ओर मिल मजदूरों को संगठित किया। इस प्रकार 1880 में बम्बई में मिल मजदूरों के प्रथम संगठन का निर्माण हो सका ।यह उल्लेखनीय है कि ज्योतिबा फुले अंग्रेजी शासन की गलत नीतियों और निर्णयों के विरुद्ध भी आवाज उठाते थें । उन दिनों पूना में अंग्रेजी शासन ने शराब दुकानों में वृद्धि करने का निश्चय किया और सन् 1880 तक कई नई दुकानें खोल दी गई।

ऐसे में फुले ने सरकार की इस नीति का विरोध किया । उन्होंने नगरपालिका की मैनेजिंग कमेटी के चैयरमैन मिस्टर प्लंकेट को 18 जुलाई 1880 को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने पूना नगर में तेजी से खुल रही शराब की दुकानों से होने वाले नुकसान से अवगत कराते हुए बताया कि किस प्रकार नगर वासियों के स्वास्थ्य तथा नैतिक आचरण पर उसका कुप्रभाव पड़ रहा है । इस समाचार ने शहर में खलबली मचा दी । ‘ज्ञान प्रकाश’ नामक पत्र ने टिप्पणी की कि “फुले ने जिस विषय पर आवाज उठाई है, वह बड़े महत्त्व का है । नगरपालिका को इस पर ध्यान देना चाहिए ।” फलत: मैनेजिंग कमेटी ने फुले के सुझाव पर ध्यान दिया और भविष्य में शराब के ठेकों में कमी करने का अश्वासन किया ।

फुले ने अंग्रेजी सरकार द्वारा ब्राह्मणों को दिये जाने वाले ‘दक्षिणा फण्ड’ पर रोक लगाने की बात उठाई । दरअसल शिवाजी के शासनकाल के समक्ष से ही ब्राह्मणों को मराठा राज्य की तरफ से दक्षिणा देने की परिपाटी चली आ रही थी । दक्षिणा में अनाज और सिक्के ब्राह्मणों को उनकी योग्यता के अनुसार दिये जाते थे । परन्तु पेशेवा बाजीराव-II के 46 काल में इस परिपाटी का पतन हुआ। इस काल में दस लाख रुपये की दक्षिणा का वितरण साठ हजार ब्राह्मणों को होने लगा । 1849 में सर्वप्रथम लोकहितवादी गोपाल गणेश देशमुख ने इस गलत परिपाटी और अवांछित भुगतान के विरुद्ध आवाज उठाई थी । वे चाहते थे कि ‘दक्षिणा फण्ड’ में से तीन हजार रुपये मराठी लेखकों को अच्छे मराठी लेखन के लिए पारितोषिक के रूप में दिये जाऐं ।

इसके लिए ब्रिटिश सरकार को प्रस्तुत करने हेतु एक याचिका तैयार की गई । इसे बम्बई के गवर्नर को भी भेजा गया । कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने इसकी जानकारी मिलने पर याचिका पेश करने वाले लोगों को डराया-धमकाया । ऐसे में देशमुख ने ज्योतिबा फुले से सहयोग माँगा । वे इसके लिए तैयार हो गए और उन्होंने 200 महार और माँग लोगों को एकत्र कर लिया ।

उन्होंने घोषणा कर दी कि यह याचिका हमारे संगठन द्वारा तैयार की गई है तथा मराठी के मौलिक ग्रन्थों या निबन्धों पर पारितोषिक देने की माँग हमारी है । फुले के इस हस्तक्षेप के कारण सरकार को मराठी भाषा में साहित्य लेखन पर पारितोषिक के रूप में ‘दक्षिणा फण्ड’ से राशि व्यय करने पर सहमति देनी पड़ी। ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र के प्रथम सुधारक थें जो अपने जीवनपर्यन्त दबे-कुचले लोगों का जीवन सुधारने तथा उन्हें सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन जीने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए संघर्ष करते रहें । उनके सम्मान में उनके अनुयायियों ने 11 मई 1888 को एक सम्मेलन माँडवी के कोलीवाड़ा सभागार में आयोजित किया ।

इस सम्मेलन में बड़ौदा के 47 महाराज सयाजीराव गायकवाड़ को आमंत्रित किया गया था, परन्तु वे किसी कारणवश उपस्थित न हो सकें । परन्तु उन्होंने दामोदर सावलाराम पाण्डे के जरिए भेजे अपने सन्देश में कहा कि ज्योतिबा को ‘भारत के बुकर टी. वाशिंगटन’ की उपाधि प्रदान की जाए । तमाम नेताओं के द्वारा भी फुले के सम्मान में ऐसी बातें कहीं गई जिनमें उन्होंने उनके द्वारा जीवन भर दबे-कुचले लोगों की निस्वार्थ सेवा करने के कार्य की मुक्त कंठ से सराहना की । यहाँ पर नेताओं एवं उपस्थित जनसमुदाय ने उनको एक स्वर में ‘महात्मा’ घोषित किया ।

फुले की मृत्यु

जुलाई 1888 में पूना में भयंकर गर्मी का मौसम था । इसके चलते ज्योतिबा के शरीर के दाहिने हिस्से में अचानक पक्षाघात हो गया । उनके एक मित्र चिकित्सक ने उनका इलाज किया । फुले तत्काल उपचार मिलने पर ठीक तो हो गए, लेकिन बहुत कमजोर हो गए थें । फलत: एक वर्ष व चार महीनों बाद 28 नवम्बर 1890 को उनका देहावसान हो गया । उसी दिन सत्यशोधक समाज की परंपराओं के अनुरूप बगैर किसी कर्मकाण्ड के दत्तक पुत्र यशवंत द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया ।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि महात्मा ज्योतिबा फुले ग्रामीणों कुनबी-किसानों, खेतिहर मजदूरों, शूद्रों-अतिशूद्रों एवं नारी जाति समेत सम्पूर्ण ‘बहुजन समाज’ के मसीहा एवं सुधारक थें । नारी समस्या, अतिशूद्रों की समस्या, ब्राह्मण विधवाओं विधवाओं की समस्या, सतीप्रथा, देवदासी प्रथा, किसानों, मिल मजदूरों, कृषि-श्रमिकों आदि की समस्या – सभी के समाधान के लिए फुले ने अपना जीवन अर्पण किया ।

संदर्भ –
  1. यु. बी. शाह, सामाजिक क्रान्ति के जनक – महात्मा ज्योतिबा फुले, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1998, पृ. 71.
  2. कन्हैयालाल चंचरीक, पूर्व उद्धृत, पृ. 114.
  3. एल जी मेश्राम ‘विमलकीर्ति’ (सं.), महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली, खण्ड-II, पृ. 88.
  4. 129. आर. चन्द्रा व कन्हैयालाल चंचरीक, आधुनिक भारत का दलित आन्दोलन, यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. 57
  5. 130. एल. जी. मेश्राम ‘विमल कीर्ति’, महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली, भाग ii, पृ. 82. 131. धनंजय कीर, पूर्व उद्धृत, पृ. 37-38.
  6. 137. तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी, पूर्व उद्धृत, पृ. 80-81.
  7. 138. कन्हैयालाल चंचरीक, पूर्व उद्धृत, पृ. 142.

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