ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय

महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे या पूना शहर में हुआ था । वैसे उनकी जन्म तिथि के बारे में स्पष्ट एवं निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है । ज्योतिबा फुले के पिता सातारा से 25 किलोमीटर दूर कटगन गांव के निवासी थे । उनके परिवार का कुल नाम ‘गौरेह’ था । वे माली जाति से थें । 

उनके पास थोड़ी सी जमीन थी जिस पर काश्तकारी करके वे अपना गुजारा करते थें । गाँव के किसी ब्राह्मण के साथ एक दिन उनका झगड़ा हो गया जिस कारण ब्राह्मणों से तंग आकर वे गांव छोड़कर चले गाँव गए। इसके बाद वे पूना जिले के पुरंदर तालुका के एक गाँव खानवाडी में अपने परिवार के साथ रहने लगें । यहाँ उनका एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम शेतिबा रखा गया । शेतिबा का बचपन गांव में बीता लेकिन बड़े होने पर वे पूना में रहने लगें शेतिबा के तीन लड़के हुए: राणोजी, कृष्ण व गोविंद । इन तीनों भाइयों ने अब फूल-माली का व्यवसाय चुना। 

ज्योतिबा फुले


ज्योतिबा फुले के पिता का नाम गोविन्दराव फुले थे। उनकी पूना में फूलों की दुकान थी । उनका विवाह चिमनाबाई नामक महिला से हुआ जो जगादे पाटिल की लड़की थी । चिमनाबाई के दो पुत्र पैदा हुए । बड़े का नाम राजाराम व छोटे पुत्र का नाम जोतिराव रखा गया था । जब जोती एक वर्ष के हुए, तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था । 

गोविन्दराव जी ने ज्योतिबा का प्रचलित रीति रिवाजों के अनुसार विवाह करने का निश्चय किया। जब वह 13 वर्ष का था उनकी शादी 9 वर्ष की लड़की सावित्री बाई से जो सतारा जिले में खण्डाला तहसील के नया गाँव के खण्डोजी नेवा पाटिल की कन्या थी सम्पन्न कर दी गईइ। सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ। उनकी माता का नाम लक्ष्मी बाई और पिता का नाम खण्डोजी था।   

सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई फुले

फूलों के व्यवसाय के कारण उनका कुल नाम ‘गोरे’ लुप्त हो गया और लोग उन्हें ‘फुले’ के नाम से जानने लगे। 

ज्योतिबा फुले के प्रेरणा स्रोत

सन् 1847 में ज्योतिबा ने अपना स्कूल अध्ययन पूरा कर लिया। तब सबसे ऊँची कक्षा सातवी। तक ही होती थी। वे बाहर पढ़ने नहीं जा सके, लेकिन तब तक वे विभिन्न महापुरूषों वांशिगटन, शिवाजी, विलियम जॉन्स, मर्टिन लूथर आदि की जीवनियां पढ़कर स्वतन्त्रता आंदोलन के विषय में प्रेरणा प्राप्त कर चुके थे।

थॉमसपेन -

ज्योतिबा फुले के विचारात्मक गठन में पेन के साहित्य और उनके कार्यों का बहुत ज्यादा योगदान है।
थॉमसपेन क्रांतिकारी था। उसके ग्रन्थ ‘राईट्स ऑफ मेन’ का इन पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। 

छत्रपति राजा शिवाजी -

ज्योतिबा फुले ने छत्रपति राजा शिवाजी की जीवनी से भी प्रेरणा ली थी। उन्होंने बचपन में ही छत्रपति शिवाजी की वीरता के किस्से और मराठी लोकगीत सुने थें। ज्योतिबा के युवा मन पर शिवाजी का भारी प्रभाव था।

ज्योतिबा फुले ने यह भी सुना कि छत्रपति शिवाजी स्त्रियों और सभी धर्मों का आदर करते थे। एक बार उनका एक सरदार युद्ध जीतने पर किसी विधर्मी की सुन्दर युवती को भी ले आया। शिवाजी को जब पता चला तो उन्होंने उस युवती को उसके घर ससम्मान विदा किया और उसके लूटे आभूषण वापिस कराए। शिवाजी ने धार्मिक स्थलों, मस्जिदों को कभी नहीं गिराया। वरन वह सब धर्मों को बराबर समझते थे।

ज्योतिबा फुले ने भी आगे चलकर स्त्री शिक्षा पर काफी ध्यान दिया तथा वे भी सभी धर्मों का सम्मान करते थे।

महात्मा ज्योतिबा फुले की शिक्षा

जब जोति पाँच वर्ष के हुए तब पिता ने उनको स्कूल में दाखिल कराने के बारे में सोचा । यद्यपि उस समय गोविन्दराव के समुदाय के लोग प्राय: शिक्षा ग्रहण नहीं करते थें । जोतिराव को 7 वर्ष की आयु में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु एक मराठी स्कूल में दाखिल करवाया गया । जोति ने जल्दी ही प्राथमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी कर ली। 

प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जोतिराव के मन में और अधिक पढ़ने की रूचि उत्पन्न हो गई थी। वे फुर्सत अथवा रात के समय अक्सर बड़े ही चाव से यूं ही किताबें पढ़ते रहते थें । उन्हें ऐसे ही पढ़ते देखकर गोविन्दराव के दो प्रबुद्ध पड़ोसी बहुत प्रभावित हुए ।

ज्योतिबा फुले की मृत्यु

जुलाई 1888 में पूना में भयंकर गर्मी का मौसम था । इसके चलते ज्योतिबा के शरीर के दाहिने हिस्से में अचानक पक्षाघात हो गया । उनके एक मित्र चिकित्सक ने उनका इलाज किया । ज्योतिबा फुले तत्काल उपचार मिलने पर ठीक तो हो गए, लेकिन बहुत कमजोर हो गए थें । फलत: एक वर्ष व चार महीनों बाद 28 नवम्बर 1890 को उनका देहावसान हो गया । उसी दिन सत्यशोधक समाज की परंपराओं के अनुरूप बगैर किसी कर्मकाण्ड के दत्तक पुत्र यशवंत द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया ।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि महात्मा ज्योतिबा फुले ग्रामीणों कुनबी-किसानों, खेतिहर मजदूरों, शूद्रों-अतिशूद्रों एवं नारी जाति समेत सम्पूर्ण ‘बहुजन समाज’ के मसीहा एवं सुधारक थें । नारी समस्या, अतिशूद्रों की समस्या, ब्राह्मण विधवाओं विधवाओं की समस्या, सतीप्रथा, देवदासी प्रथा, किसानों, मिल मजदूरों, कृषि-श्रमिकों आदि की समस्या – सभी के समाधान के लिए ज्योतिबा फुले ने अपना जीवन अर्पण किया ।

संदर्भ –
  1. महात्मा ज्योतिबा फुले, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1998, पृ. 71.
  2. एल जी मेश्राम ‘विमलकीर्ति’ (सं.), महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली, खण्ड-II, पृ. 88.

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