मानसून किसे कहते हैं ?

मानूसन से तात्पर्य उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के ऐसे पवनों के तंत्र से है जिसमें ग्रीष्म और शीत ऋतुओं में पवनें अपनी दिशा पूर्णतया पलट लेती हैं। शीतऋतु में ये पवनें स्थल से समुद्र की ओर तथा ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं। इसलिये, मानसून पवनों के प्रभाव प्रदेशों में अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है; जबकि शीत ऋतु सामान्यतया शुष्क होती है।

मानसून किसे कहते हैं ?

मानसून से तात्पर्य उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के ऐसे पवनों के तंत्र से है जिसमें ग्रीष्म और शीत ऋतुओं में पवनें अपनी दिशा पूर्णतया पलट लेती हैं।

परम्परागत विचारधारा के अनुसार, स्थल व समुद्र जल के गर्म होने की प्रवृति में अंतर के कारण मानसून का जन्म होता है। ग्रीष्मकाल में स्थल पर ऊंचे तापमान के कारण महाद्वीपों पर निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है और पवनें निकटवर्ती महासागरों से स्थल की ओर चलने लगती हैं। ये पवनें समुद्री भागों में पैदा होती हैं, अत: ग्रीष्म काल में पर्याप्त वर्षा करती हैं। 

दूसरी ओर, शीत काल में महाद्वीप निकटवर्ती महासागरों की तुलना में अधिक ठण्डे हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप महाद्वीपों पर उच्चदाब क्षेत्रा बन जाता है। इसलिये शीत काल में पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। चूंकि ये पवनें महाद्वीपों की विशेषताएं लिए हुई होती हैं, अत: शुष्क होती है और वर्षा नहीं करती। 

मानसून के इस परम्परागत सिद्धांत की जर्मन मौसम विज्ञानी फ्लोन ने आलोचना की है। उसके विचार से भूमण्डलीय स्तर पर पवनों की दिशा में आमूल परिवर्तन के लिए मात्रा स्थलीय व समुद्री भागों के भिन्न प्रकार से गर्म होना काफी नहीं है। उसने मानसून की उत्पत्ति को सूर्य की सीधी किरणों के खिसकने के प्रभाव से वायुदाब व पवन पेटियों के मौसम के अनुसार खिसकने के आधार पर स्पष्ट किया है। 

इस सिद्धांत के अनुसार, जब सूर्य की किरणें ग्रीष्म ऋतु में उत्तर की ओर कर्क वृत्त पर लम्बवत् पड़ती हैं, तब अन्त:उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आई.टी.सी.जैड.) भी उत्तर की ओर स्थानान्तरित हो जाता है। 

इसके परिणामस्वरूप भारत के उत्तरी पश्चिमी भागों में एक निम्न दाब क्षेत्रा बन जाता है। यह निम्न दाब इस प्रदेश के उच्च तापमानों के कारण और अधिक गहन हो जाता है। यह निम्न दाब क्षेत्रा हिन्द महासागर से वायु को दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारतीय भू-भाग की ओर खींचता है। शीत ऋतु में आई.टी.सी. जैड. दक्षिण की ओर स्थानान्तरित हो जाता है और भारत के उत्तरी भागों पर उच्च दाब विकसित हो जाता है। यह उच्च दाब, उपोष्ण उच्च दाब पेटी के विषुवत वृत्त की ओर खिसकने से और अधिक गहन हो जाता है। उत्तरी भारत के इस उच्च दाब के कारण पवनें उत्तर-पूर्वी मानसूनों के रूप में चलने लगती हैं जिसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है।

इससे भी अधिक नवीन अवलोकनों के अनुसार, भारतीय मानूसन की उत्पत्ति स्थल व समुद्री भागों के भिन्न रूप से गर्म होने तथा दाब व पवन पेटियों के मौसमी स्थानान्तरण के अलावा अन्य अनेक कारकों से प्रकाशित होती है। इसमें से सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारक उपोष्ण कटिबन्धीय पश्चिमी तथा उष्ण कटिबन्धीय पूर्वी जेट वायुधाराएं हैं। उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट वायुधारा शीतकाल में भारत के ऊपर चलती है। इससे उत्तरी भारत में उच्च दाब क्षेत्रा का निर्माण होता है। इस प्रकार यह उत्तर-पूर्वी मानसून पवनों को अधिक शक्तिशाली बनाने में मदद करती है। 
यह जेट वायुधारा ग्रीष्म ऋतु में भारत से दूर उत्तर की ओर खिसक जाती है तथा इस ऋतु में उष्ण कटिबन्धीय पूर्वी जेट वायुधारा का विकास हो जाता है। इस जेट वायुधारा का आगमन भारत में दक्षिण पश्चिमी मानसून के प्रारम्भ होने के साथ-साथ ही होता है।
  1. परम्परागत मत के अनुसार, स्थल व जलीय भागों के भिन्न प्रकार से गरम होने के कारण मानसून की उत्पत्ति होती है। 
  2. जर्मन मौसमविज्ञानी के अनुसार मानसून की उत्पत्ति का प्रमुख कारण वायु दाब व पवन पेटियों का खिसकना है। 
  3. आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि भारतीय मानूसन पवनों की उत्पत्ति के लिये अनेक कारक उत्तरदायी है, इनमें सबसे महत्वपूर्ण जेट वायुधारा है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

1 Comments

Previous Post Next Post