स्व-अधिगम सामग्री क्या है?

अनुक्रम
स्व-अधिगम साग्रमी दूरस्थ शिक्षा की मूलाधार है। इसे स्व-अनुदेशनात्मक, स्व-अध्ययन सामग्री एवं स्व-शिक्षण सामग्री के रूप में पुकारा जाता है। सभी नामों के मूल में एक ही तथ्य है अपने आप पढ़ने-सीखने वाली सामग्री अर्थात् ऐसी पाठ्यवस्तु सामग्री जिसे अध्येता स्वतंत्रत रूप से अध्ययन करके अपनी गति अपनी रूचि से सीखता है, और स्वयं अपना शिक्षण करता है। यह विशेष रूप से अभिकल्पित मुद्रित पाठ्यवस्तु दूर शिक्षा में एक लोकप्रिय कार्यनीति है। मुद्रित पाठ्यों को स्वशिक्षण सामग्री के अभिकल्पन के सिद्धान्तों के आधार पर विकसित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उन विद्यार्थियों को सहायता करना होता है जो अपनी परिस्थितियों में स्वंत्रत रूप से सीखते हैं। दूरस्थ शिक्षा माध्यम में यह शिक्षण सामग्री के रूप में हैं, इसका उत्पादन व्यापक स्तर पर होता है। प्रभावी स्व-अधिगम सामग्री अध्येताओं में अधिगम के प्रति रूचि जागृत करती है, और बनाये रखती है। किसी लेख तथा पुस्तक के विपरीत स्व-अधिगम सामग्री का उद्देश्य विवेकपूर्ण प्रस्तुतीकरण नहीं होता। इस प्रकार स्व-अधिगम सामग्री पहचाने गये लक्ष्य वर्गों को ज्ञानात्मक अभिवृत्तियों और कौशलों के अर्जन के योग्य बनाने के प्रयोजन से विशेष रूप से अभिकल्पित की जाती है। दूर शिक्षा के अध्येता अधिकत दूर से ही सीखते हैं, वे अपने घर अथवा कार्यस्थल से अध्यापक एवं अपने सहपाठियों से बराबर अन्योन्यक्रिया नहीं कर पाते है। अत: दूर शिक्षा में स्व-अधिगम सामग्री में अध्यापक अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षण करता है और अध्येता के साथ अप्रत्यक्ष वार्तालाप करते हुये अधिगम की परिस्थितियां उत्पन्न करता है। दूरस्थ अध्ययन में स्व-अधिगम सामग्री को प्रदान करने के निम्न उद्देश्यों को हम उल्लेखित कर सकते हैं।
  1. दूर अध्येताओं को पाठ्यक्रम विशेष की जिसमें वे नामांकित है, उसकी रूपरेखा बताना ।
  2. दूर अध्येताओं को आवश्यक पाठ्यक्रम के स्वरूप से परिचित कराते हुये अस्थिागम हेतु रूचि जागृत करना। 
  3. दूर अध्येताओं को पाठ्यवस्तु के आकार से परिचित कराना। 
  4. दूर अध्येताओं की पाठ्यक्रम विशेष में आवश्यक पाठ्यवस्तु एकत्र करने हेतु मार्गदर्शन प्रदान करना। 
  5. पूर्व अध्ययन कर परामर्ण कक्षाओं में अपनी समस्याओं को समाधान हेतु उठाने में दूर अध्येयताओं को अधार प्रदान करना।
  6. अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षक एवं शिक्षार्थी की अन्त:क्रिया को प्रत्यक्ष करने का प्रयास करना।
  7. अध्येता को, स्व-अध्ययन हेतु अभिप्रेरित करना और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना जिसमें वह अपनी गति से सीख सके।
  8. दूर-अध्येताओं को अध्ययन केन्द्रों से जोड़ना अर्थात् समस्याओं को सुलझाने व परामर्श कक्षाओं में उपस्थिति का आधार स्व-अधिगम सामग्री बनती है। 
  9. दूर अध्येताओं को दत्त कार्य एवं प्रोजेक्ट तथा अन्य व्यावहारिक क्रियाकलापों हेतु आधार प्रदान करना। 
  10. स्व अध्ययन हेतु आवश्यक दिशा निर्देश व अभिप्रेरण प्रदान करना। 
  11. दूर अध्येताओं में पाठ्यक्रम विशेष से सम्बंधित अन्तर्दृष्टि एवं अवबोध उत्पन्न करना। 

स्व-अधिगम सामग्री का स्वरूप 

स्व-अधिगम सामग्री को प्रदान किये जाने हेतु निर्धारित उद्देश्यों के विषय में आप विस्तार से पढ़ चुके है, अब यह आवश्यक है कि स्व-अधिगम सामग्री का स्वरूप एवं प्रकृति की चर्चा की जाये। इसका स्वरूप एवं विशेषतायें निम्न है-
  1. स्वत: अधिगम सामग्री का आधार सम्प्रेषण सिद्धान्त- सम्पूर्ण विश्व में दूरस्थ एवं मुक्त शिक्षा प्रणाली एक नवीन सामाजिक, राजनैतिक चेतना के परिणाम स्वरूप किया गया है। यह स्वतंत्र प्रेस एवं सामाजिक दायित्व के सिद्धान्त प्रयोग द्वारा इन उद्देश्यों को पूर्ण करने वाली एक सशक्त प्रणाली सिद्ध हो सकती है। अधिगम सामग्री में कुशल सम्प्रेषण प्रक्रिया का प्रयोग करते हुये सूचनाओं की प्रासंगिकता उपयुक्त चयन, सम्प्रेषण हेतु उपयुक्त संकेतों का निर्माण एवं उनकी अर्थापन क्षमता तथा संग्राहक से प्राप्त पृष्ठ पोषण को ध्यान में रखा जाता है। 
  2. स्व-अधिगम सामग्री के निर्माण का आधार अधिगम के सिद्धान्त- दूरस्थ शिक्षा में शिक्षक-शिक्षार्थी के मध्य अन्त: क्रिया मुद्रित पाठ्य सामग्री एवं इलेक्ट्रानिक उपकरणों के माध्यम से सम्पन्न होता है। इसमे थार्नाडाइक द्वारा प्रतिपादित प्रभाव का नियम, तत्परता का नियम एवं अभ्यास के नियम सम्मिलित है। अधिगम के व्यवहारवादी दृष्टिकोण का प्रयोग कर तीन चीजों पर ध्यान देने का प्रयास किया जाता है। 
    1. परिणाम का ज्ञान अथवा पुष्टि तथा सकारात्मक पुनर्बलन का प्रयोग। 
    2. पुनर्बल प्रदान करने में कम से कम विलम्ब। 
    3. जटिल व्यवहारों की व्याख्या हेतु छोटे-छोटे घटक/उपघटक के रूप में अधिगम विभाजन। व्यवहारवादी उपागम के पुनर्बलन सिद्धान्त पर आधारित स्व-अधिगम सामग्री के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्किनर के अनुसार पुनर्बलन अधिगम को आगे बढ़ाने में सहायक होता है। 
  3. वास्तविक कक्षा शिक्षण हेतु परिस्थितियों का निर्माण- सम्पूर्ण स्व-अधिगम सामग्री इस रूप में प्रस्तुत की जाती है जैसे कि वास्तविक कक्षा शिक्षण में परिस्थितियां उत्पन्न होती हे। वास्तविक कक्षा शिक्षण में अध्यापक एवं अध्येता के मध्य की सम्पूर्ण प्रतिक्रियायें अप्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न की जाती है। सभी इकाइयां अपने आप में परिपूर्ण होती है। प्रस्तावना के साथ प्रारम्भ कर अध्येता को सीखने के लिये प्रेरित कर वास्तविक विषय वस्तु का प्रारम्भ अवधारणा या संकल्पना से की जाती है। विषय को छोटे खण्डो में प्रस्तुत कर बोध प्रश्नों को रखकर प्राप्त ज्ञान को मापा जाता है, और फिर अध्येता को आगे बढ़ने हेतु अभिप्रेरित किया जाता है। सम्पूर्ण विषय सामग्री में अध्यापक अप्रत्यक्ष रूप से अध्येता से अन्त:क्रिया करता रहता है 

रोचक एवं लचीला 

स्व-अधिगम सामग्री को रोचक एवं अध्येता की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के अनुसार संग्रहित एवं रचित होती है। स्व-अधिगम सामग्री में सभी तथ्यों को व्यवस्थित करके रखते हुये सम्पूर्ण विषय वस्तु को सरलतम तरीके से रखा जाता है। इस बात पर विशेष ध्यान रखा जाता है, कि विषय सामग्री को सरल से कठिन की ओर प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर एवं ज्ञात से अज्ञात की ओर प्रस्तुत किया जाता है। अध्येता को पारिभाषिक शब्दावली, अनुभाग शीर्षक एवं उनके उपशीर्षक, रेखाचित्र, उदाहरण एवं व्याख्या कर विषय वस्तु को ग्रहण करने में सहायक होते है।

व्यावहारिकता 

स्व-अधिगम सामग्री का स्वरूप व्यावहारिक होता है क्योंकि इसमें उसके लिये बोध प्रश्न एवं अभ्यास कार्य दिये जाते हैं, सम्पूर्ण विषय वस्तु अब तक जुड़ा रहता है। स्व-अधिगम सामग्री में नवीन एवं आवश्यक तथ्यों को विषय सामग्री में जोड़ा जाता है, जिससे कि अध्येता हेतु वह उपयोगी हो और वह निर्धारित स्तर तक अधिगम कर सके।

दूरस्थ शिक्षा हेतु स्व-अधिगम सामग्री विकास के आवश्यक तत्व 

शिक्षा एक सोद्देश्य प्रक्रिया है तथा पाठ्यक्रम इन उद्देश्यों की पूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। दूरस्थ शिक्षा में भी उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रमुख साधन/आधार पाठ्यक्रम ही होता है। दूरस्थ शिक्षा में पाठ्यक्रम का अर्थ अधिक व्यापक होता है तथा इसके अन्तर्गत शिक्षण अधिगम के साथ-साथ अध्ययन के अन्य सभी तत्वों को भी सम्मिलित किया जाता है। दूरस्थ शिक्षा में स्व-अधिगम सामग्री का प्रारूपण एक जटिल एवं लम्बी प्रक्रिया हे। अत: पाठ्यक्रम विकास ने परम्परागत शिक्षा के सभी प्रमुख बिन्दुओं को समाहित करने के साथ दूरस्थ शिक्षा की आवश्यकतओं एवं लक्ष्यों को भी ध्यान में रखना होता है। इसी प्रकार दूस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम में अग्रलिखित तत्वों को सम्मिलित किया जाता है-

  1. अधिगम के उद्देश्य का प्रस्तुतीकरण एवं व्याख्या - पाठ्यवस्तु में व्यापकता के कारण तीनों पक्षों को समाहित करने का प्रयास किया जाता है। इसमें अधिगम के उद्देश्यों का प्रस्तुतीकरण करते हुये व्याख्या करने का प्रयास किया जाता है।
  2. अध्ययन सामग्री के माध्यम से संवाद -  परम्परागत शिक्षा में वास्तविक कक्षा शिक्षण के दौरान अध्यापक एवं अध्येता के मध्य सक्रिय सम्प्रेषण हो जाता है, जबकि दूरस्थ शिक्षा में संवादशीलता भी स्व-अधिगम सामग्री के माध्यम से ही स्थापित की जाती है। इसके लिये पाठ्य सामग्री में अन्त: क्रियात्मकता की प्रवृत्ति एवं लय से युक्त होती है। अथार्त् सामग्री प्रस्तुतीकरण में वार्तालाप शैली का पुट होना चाहिये। पाठ्यलेखक को प्रश्नों एवं क्रियाओं को समाविष्ट करना होता है। इसके अतिरिक्त गृहकार्य पर शिक्षण टिप्पणियां श्रव्य-दृश्य माध्यमों से शिक्षक की आवाज एवं प्रदर्शन भी अध्यापक-अध्येता की अन्त: क्रिया को सम्भव बनाते हैं।
  3. व्यक्तिगत जुड़ाव को महत्व - सम्पूर्ण स्व-अधिगम सामग्री तुम या आपके द्वारा अध्येता को सम्बोधित किये जाते हैं, इससे अध्येता अध्यापक से जुड़ाव का अनुभव करता है, और इसे वह अपना महत्व भी समझाता है। इससे अध्येता का व्यक्तिगत विकास होता है। प्रत्यक्ष अन्त: क्रिया हेतु प्रावधान दूरस्थ शिक्षा में भी एक निश्चित अवधि अथवा सुविधाजनक समय पर आमने-सामने की अन्त:क्रिया हेतु अध्यापक एवं अध्येता को अवसर दिया जाता है। विज्ञान एवं अन्य प्रयोगात्मक विषय इसके अतिरिक्त व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में भी सम्पर्क कार्यक्रमों के आयोजन में प्रत्यक्ष सम्पर्क पर अत्यधिक बल दिया जाता है।
  4. अध्ययन कौशलों के विकास पर केन्द्र बिन्दु - दूरस्थ शिक्षा में पाठ्यक्रम पूर्णतया स्व-अध्ययन पर आधारित होता है, अत: अध्येताओं को इसके लिये तैयार करने का कार्य भी अनुदेशनात्मक सामग्री के माध्यम से करना पड़ता है, और स्व-अध्ययन के विविध कौशलों की उत्पत्ति एवं विकास हेतु आवश्यक संकेत एवं निर्देशन दिये जाने की आवश्यकता होती है, और पाठ्यक्रम प्रारूपण में इसका ध्यान रखा जाता है।
  5. अध्येता की प्रकृति एवं आवश्यकता - दूरस्थ शिक्षा अध्येता उन्मुक्त होती है अत: पाठ्यक्रम निर्धारण में भी अध्येता की प्रकृति एवं आवश्यकता को केन्द्र बिन्दु बनाकर किया जाता है, उसकी आयु योग्यता, अनुभव एवं आकांक्षा स्तर में पर्याप्त भिन्नता हो सकती है। इसके अतिरिक्त दूर अध्येता विभिन्न क्षेत्रों व विविध शिक्षण संस्थाओं के पूर्व विद्यार्थी हेाते हैं, और उनके अधिगम की आदतों के अतिरिक्त प्रकृति एवं उपलब्धि में भी प्र्याप्त अन्तर होता है, इस हेतु दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था में लगातार शोध निष्कार्णों का सहारा लिया जाता है।
  6. राष्ट्रीय एवं सामाजिक लक्ष्यों का समाहित किया जाना - सभी स्तर की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य, व्यक्तिगत एवं सामाजिक विकास होता है और शिक्षा के द्वारा समाज व्यक्ति व राष्ट्र की उन्नति की संकल्पना को पूरा करना है। ठीक इसी प्रकार से मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा में भी पाठ्यक्रम विकास में इन तथ्यों को समाहित किया जाता है, और इस रूप में तैयार किया जाता है कि वह समाजोपयोगी एवं राष्ट्रोपयोगी मानव संसाधन तैयार करें।

स्व-अधिगम सामग्री की आवश्यकता 

दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था का मुख्य स्वरूप दूर अध्येता का दूर शिक्षा संस्थान से दूरी है। इससे अध्येता पाठ्यक्रम के स्वरूप से लेकर शिक्षण तक निराश्रित रहता है। उसे न तो अध्यापक का निर्देशन प्राप्त होता है न ही सहपाठियों का मार्गदर्शन। इसीलिये स्व-अधिगम सामग्री इस कमी को ध्यान में रखकर ऐसे संकल्पित की जाती है, कि वह स्वयं में पूर्ण पर्याप्त, शैक्षणिक, स्पष्ट, निर्देशित, आंकलन करने योग्य तथा सहपाठी की भांति होती है। दूर अध्येता को सहारा देने के साथ अधिगम व अध्ययन हेतु मार्गदर्शन देती है। इसके साथ ही दूर अध्येता के अधिगम को सुलभ बना देती है, और बाह्य सहायता को कम कर देती है।

स्व-अधिगम सामग्री दूर अध्येता को पाठ्यक्रम विशेष में क्या और कितना पढ़ना है, और कहां तक जानना आवश्यक है यह स्पष्ट करती है। यह दूर अध्येताओं के समक्ष अधिगम की परिस्थितयां उत्पन्न कर देती है, जिसमें विद्यार्थी सीखने के लिये विवश हो जाता है। इनका स्वरूप इस प्रकार से निर्मित किया जाता है कि वह ऐसा प्रतीत होता है कि अध्यापक को अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित कर देता है, और अध्येता को ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि अप्रत्यक्ष रूप से कोई उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहा हो, उन्हें निर्देश दे रहा है। स्व-अधिगम सामग्री में अध्येता को अपनी गति से अधिगम की सुविधा के साथ-साथ अपने अधिगम के आंकलन की भी सुविधा दी जाती है, इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण शिक्षण सामग्री अध्यापक अध्येता की अप्रत्यक्ष वार्तालाप को प्रकट करती है। स्व-अधिगम सामग्री पूर्णतया अध्येता उन्मुख होती है, इसीलिये यह मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर अभिकल्पित किया जाता है।

स्व-अधिगम सामग्री का अभिकल्पन 

स्व-अधिगम सामग्री की अभिकल्पना करने तथा उसका विकास करने के लिये उसकी मुख्य विशेषताओं का बोध अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त स्व-अधिगम सामग्री के लेखकों एवं अभिकल्पकों की पूर्वापे्रक्षाओं का ज्ञान भी आवश्यक है। आइये हम इन पर नीचे चर्चा करें।

स्व-अधिगम सामग्री की मुख्य विशेषतायें

स्व-अधिगम सामग्री के कुछ विशेष अभिलक्षण होते हैं। यद्यपि स्व-अधिगम सामग्री की ये विशेषतायें, उद्देश्यों, प्रयोजन और प्रस्तुतीकरण की शैली के आधार पर थोड़ा बहुत भिन्न हो सकती है, तथापि स्व-अधिगम सामग्री की कुछ स्थायी विशेषतायें हैं। आइये हम नीचे इन विशेषताओं पर विचार करें।

स्व-अधिगम सामग्री को यद्यपि यह नाम दिया जाता है, तथापि उनका ध्यान केन्द्र अध्यापन अथवा शिक्षण की अपेक्षा अधिगम पर अधिक होता है। ये अलग-अलग शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं पर आधारित है, न कि अध्यापक तथा मुक्त अधिगम संस्थाओं की रूचियों पर। ये विद्यार्थियों को अपने अधिगम पर यथासंभव अधिक से अर्थिाक नियंत्रण प्रदान करती है। इसीलिये आजकल स्व-अधिगम सामग्री को स्व-अधिगम सामग्री कहा जाता है। स्व-अधिगम सामग्री के कुछ निश्चित अभिलक्षण हैं। इनमें से महत्वपूर्ण है-

स्व-व्याख्यात्मक- 

स्व-अधिगम सामग्री इस अर्थ में स्व-व्याख्यात्मक होती है कि विद्यार्थी अधिगम सामग्री के द्वारा अध्ययन कर सकते हैं, और विषयवस्तु को बिना किसी प्रकार की अधिक बाह्य सहायता/समर्थन के आसानी से समझ सकते हैं। इसलिये, ये सामग्री विषयवस्तु, प्रस्तुतीकरण और भाषा की दृष्टि से किसी भी अस्पष्टता से मुक्त होनी चाहिये। विषयवस्तु तर्कसंगत रूप से व्यवस्थित होनी चाहिये, और प्रस्तुतीकरण सरल और प्रभावी होना चाहिये। प्रत्येक वस्तु इस प्रकार स्पष्ट होनी चाहिये कि अध्येता को सीखने और ज्ञान की वृद्धि करने में सहायक हो।

स्व-पूर्ण 

स्व-अधिगम सामग्री स्वयं में पूर्ण अथवा स्वयं में पर्याप्त होनी चाहिये। विद्यार्थी के लिये पाठ्यक्रम उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये अपेक्षित समस्त आवश्यक विषयवस्तु स्व-अधिगम सामग्री में सम्मिलित करनी चाहिये। विद्यार्थी को अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये अतिरिक्त अध्ययन सामग्री की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये, क्योंकि अतिरिक्त सामग्री प्राप्त करने में समस्यायें आती हैं। साथ ही स्व-अधिगम सामग्री अत्यधिक विषयवस्तु अथवा अधिगम कार्य से अतिभारित नहीं होनी चाहिये कि अध्येता उससे डर ही जाय।

स्व-निर्देशित- 

एक प्रभावी अध्यापक के महत्वपूर्ण प्रकायोर्ंं में से एक विद्यार्थियों को आवश्यक ज्ञान, कौशल तथा अभिवृत्तियों को स्वयं अर्जन के लिये विद्यार्थियों को निर्देश दे। इसी प्रकार शिक्षार्थियों को स्व-अधिगम प्िरक्रया की प्रत्येक अवस्था पर आवश्यक मार्गदर्शन, संकेत और सुझाव प्रदान करके स्व-अधिगम शिक्षा एक प्रभावी अध्यापक का कार्य सम्पादित करती है। विषयवस्तु को तर्कसंगत अनुक्रम में प्रस्तुत करके, विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार अधिगम संकल्पनाओं की व्याख्या करके उचित स्व-अधिगम कार्यकलाप प्रदान करके और विषयवस्तु को समझने में सरल बनाने के लिये चित्रोदाहरण प्रस्तुत करके अधिगम को दिशा दी जाती है।

स्व-अभिप्रेरक 

अभिप्रेरण प्रभावी अधिगम की पूर्व आवश्यकता है। स्व-अधिगम सामग्री मेंं विद्यार्थियों में रूचि और अभिप्रेरणा उत्पन्न करने और बनाये रखने की क्षमता होनी चाहिये। विषयवस्तु को जिज्ञासात्मक होना चाहिये, समस्यायें उठानी चाहिये और ज्ञान का सम्बंध विद्यार्थियों की परिचित परिस्थितियों से स्थापित करना चाहिये ताकि विद्यार्थी अभिप्रेरित अनुभव करे और उनका ज्ञान दश्ढ़ हो जाये। इस प्रकार का अभिप्रेरण और प्रबलीकरण अधिगम की प्रत्येक अवस्था पर देना चाहिये।

स्व-अधिगम 

स्व-अधिगम सामग्री कार्यक्रमबद्ध शिक्षण के सिद्धान्तों पर आधारित होती है। कार्यक्रम शिक्षण के अभिलक्षण जैसे कि उद्देश्यों का विनिर्देशन, विषयवस्तु को छोटे (परन्तु प्रबंधनीय) चरणों में बांटना, अधिगम अनुभवों का अनुक्रमण करना, प्रतिपुष्टि प्रदान करना आदि को स्व-अधिगम सामग्री में सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार स्व-अम्मिागम सामग्री की ये विशेषतायें विद्यार्थियों को स्वंतत्र रूप से सिखाती है। विद्यार्थी अपनी स्वयं की अधिगम कार्यनीतियों को बना लेते हैं, और अपने आप ही सीखते हैं।

स्व-मूल्यांकन 

स्व-अधिगम सामग्री विद्यार्थियों को इष्टतम अधिगम को सुनिश्चित करने के लिये, उचित प्रतिपुष्टि प्रदान करते हैं। वे विद्यार्थियों को यह भी जानकारी देते हैं कि क्या वे ठीक दिशा में प्रगति कर रहे हैं अथवा नहीं। स्व-जॉच अभ्यास, मूल पाठ में प्रश्न, कार्यकलाप और अभ्यास के दूसरे प्रकार अध्येताओं को उनकी प्रगति के विषय में बहुअपेक्षित प्रतिपुष्टि देते हैं। यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रगति से सम्बंधित प्रतिपुष्टि विद्यार्थियों को एक अधिगम बिन्दु से दूसरे अधिगम बिन्दु तक सीखने और आगे बढ़ने के लिये प्रबलित और अभिप्रेरित करता है। दूसरे शब्दों में, परिणाम का ज्ञान अध्येताओं को आगे सीखने के लिये सकारात्मक प्रबलन प्रदान करता है। उपर्युक्त विशेषताओं के साथ स्व-अधिगम सामग्री के विकास के लिये इस बात की भी आवश्यकता है कि विणिण्ट ज्ञान, कौणलो और सक्षमताओं वाले लोगों को सम्मिलित किया जाये। इसका यह तात्पर्य है कि दूरस्थ शिक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनमें प्रभावी स्व-अधिगम सामग्री के विकास के लिये कुछ निश्चित विशेषताएं हों।

पाठ्यक्रम लेखकों अपेक्षाए

दूरस्थ अध्येताओं के लिये अधिगम सामग्री का विकास करने के काम में लगे हुये अध्यापकों में विशिष्ट ज्ञान, कौशलों और सक्षमताओं की अपेक्षा की जाती है। दूरस्थ शिक्षा अध्येताओं के लिये स्व-अधिगम सामग्री तैयार करने वाले पाठ्यक्रम लेखकों में निम्नांकित मुख्य पूर्वापेक्षाये होनी चाहिये।

प्रणाली की सुविज्ञता 

पाठ्यक्रम लेखकों को सम्बंधित दूर शिक्षा संस्था की शिक्षण प्रणाली से पूरी तरह परिचित होना चाहिये। उन्हें पद्धति के विद्यार्थियों की रूपरेखा और अनुसरण किये जा रहे माध्यम उपागम से भी परिचित होना चाहिये।

लक्ष्य वर्ग की सुविज्ञता 

दूर शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी विभिन्न पृष्ठभूमियों, शैक्षिक योग्यताओं, अनुभव, सामाजिक आर्थिक स्तरों और आयु आदि से आते हैं। वे दूर शिक्षा पाठ्यक्रम में विभिन्न भाषात्मक योग्यताओं, सीखने की सामथ्र्य, अध्ययन आदतों, पूर्व आवश्यक ज्ञान ग्राम-शहरों आदि से आकर भाग लेते हैं। अधिगम सामग्रियों के विकास में लगे पाठ्यक्रम लेखकों को दूर शिक्षा के माध्यम से शिक्षा लेने वाले विद्यार्थियों के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं, अपेक्षाओं और सीखने की आदतों से परिचित होना चाहिये। अधिगम सामग्री विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर के अनुसार तैयार करनी चाहिये। अर्थपूर्ण, प्रभावी अधिगम सामग्री को विकसित करने के लिये पाठयक्रम लेखक को पाठ्य विवरण का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये। इसलिये यह दावा करने के लिये कि दूरस्थ शिक्षण सामग्री स्व-पूरित और स्व-अधिगम है तो पाठ्यक्रम लेखक को सबसे पहले अधिगम अनुभव/कार्यों की दृष्टि से पाठ्य विवरण का पूरी तरह विश्लेषण करना चाहिये। अपने परस्पर संबंधों पर आधारित, अधिगम कार्यों को उचित क्रम से व्यवस्थित करना चाहिये। पाठ्यक्रम विशेष में विद्यार्थियों को उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता देने की दृष्टि से लेखक केा उसकी विषयवस्तु की व्याप्ति का ज्ञान होना चाहिये।

अधिगम के सिद्धान्तों से परिचय 

कक्षा-आधारित अध्येताओं के विपरीत, दूर शिक्षा अध्येता अपने घरों तथा कार्यस्थलों पर स्वतंत्र रूप से पढ़ते हैं। पाठ्यक्रम लेखक के लिये विविध अध्यापन कार्यनीतियों के प्रयोग की आवश्यकता हेाती है, ताकि विद्यार्थी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अधिगम रणनीति का चयन कर सके। पाठ्यक्रम लेखकों में अधिगम और संचार के सिद्धान्तों का पर्याप्त ज्ञान ऐसी स्व-शिक्षण सामग्री की सर्जनात्मक अभिकल्पना में उनकी सहायता करता है जो अलग-अलग विद्यार्थियों के अनुकूल होते हैं। स्व- अधिगम सामग्री का आधार अधिगम सिद्धान्तों और शिक्षण मापदण्डों की ठोस नींव पर होना चाहिये ताकि विद्यार्थियों में इष्टतम अधिगम सुनिश्चित हो सके। यहां इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि स्व-अधिगम सामग्री के लेखन/विकास के सिद्धान्त अध्यापन और अधिगम के सिद्धान्तों से उत्पन्न किये जाते हैं। इसलिये पाठ्यक्रम लेखकों को शिक्षण और अधिगम सिद्धान्तों की सम्यक जानकारी होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त दूर अध्येयताओं के लिये स्व-अधिगम सामग्री विकसित करने के कार्य में लगे हुये व्यक्तियों में प्रभावी संचार के पूर्णज्ञान का होना भी एक पूर्वापेक्षा है। विषयवस्तु, व्याख्या, भाषा, प्रस्तुतीकरण आदि की स्पष्टता प्रभावी संचार और विद्यार्थियों द्वारा अर्थपूर्ण अधिगम का सुनिश्चित करने में बहुत सहायक होगी। यह कहने की जरूरत नहीं है कि दूर शिक्षा, या यों कहिये कि किसी प्रकार का अध्यापन परस्पर सहमत उद्देश्यों (प्रेषक और प्रापक द्वारा) सूचना, अनुभव, विचारों आदि के आदान-प्रदान की एक प्रक्रिया है। अनुभव और विचारों का बॉटना, सूचना और संदेशों के प्रेषक और प्राप्तकर्ता के मध्य प्रभावी संचार पर निर्भर करता है। विशेषकर संचार तब प्रभावी होता है, जब वह उस भाषा में होता है जिसको प्राप्तकर्ता पूरी तरह से समझता है जिससे प्राप्तकर्ता की आवश्यकता की पूर्ति होती है।

स्व-अधिगम सामग्री के निर्माण की प्रक्रिया 

स्व-अधिगम सामग्री की निर्माण करना उसकी रूपरेखा तैयार करने की तरह है जो कुल मिलाकर दूर शिक्षा संस्था के पाठ्यक्रम/कार्यक्रम की अभिकल्पना बनाती है।

अधिगम एवं सम्प्रेषण सिद्धान्तों का पाठ्यक्रम निर्माण में प्रयोग 

दूर शिक्षक को भी लगभग वे सभी क्रियायें (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में) सम्पन्न करनी होती है। जिन्हें एक औपचारिक एवं परम्परागत प्रशिक्षित कक्षा-शिक्षक करता है। किन्तु देानों में प्रमुख अन्तर यह है कि परम्परागत शिक्षक जिन क्रियाओं को पाठ्य-वस्तु के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप में छात्रों के सम्मुख करता है, दूर शिक्षक को वहीं क्रियायें दूर शिक्षार्थी को भेजी जानी वाली स्वि-अधिगम सामग्री के अन्दर अप्रत्यक्ष रूप में करनी होती है। दूसरे शब्दों में दूर शिक्षक को पाठयक्रम के प्रारूपण एवं निर्माण में ही एक प्रशिक्षित शिक्षक की भूमिका निभानी होती है। इसके साथ ही दूर शिक्षक को पाठ्यक्रम प्रारूपण में इसका भी विशेष ध्यान रखना होता है कि पाठ्य-सामग्री का सफलतापूर्वक सम्पे्रषण भी सम्भव हो सके। अधिगम सिद्धान्त एवं सम्प्रेषण सिद्धान्त दूर शिक्षक को इनक कार्यों को सम्पन्न करने में दिशा निर्देश प्रदान करते हैं। स्वत: अनुदेशनात्मक सामग्री का प्रारूप तैयार करने में दूर शिक्षक को क्रियायें करनी होती है-
  1. पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण।
  2. उद्देश्यों की पहचान करना। 
  3. शिक्षार्थियों को अभिप्रेरित करना। 
  4. शिक्षार्थियों के अनुभवों का अधिकतम उपयोग करना।
  5. अधिगम क्रियाओं हेतु परिस्थितियां प्रदान करना।
  6. धारण शक्ति में वृद्धि हेतु प्रावधान करना। 
  7. अधिगम-स्थानान्तरण को प्रोत्साहित करना। 
  8. पृष्ठपोषण हेतु अवसर प्रदान करना। 
  9. निर्देशन प्रदान करना। 

पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण 

स्वत: अधिगम सामग्री का प्रस्तुतीकरण पाठ्यक्रम के स्वरूप पर निर्भर करता है। चूॅूकि दूर शिक्षा के पाठ्यक्रमों हेतु पूर्व निर्धारित पाठ्य-पुस्तकें नहीं हेाती है तथा पाठ्य-सामग्री को शिक्षार्थी के स्वत: अधिगम को ध्यान में रखते हुये प्रस्तुत करना होता है। अत: सामग्री प्रस्तुतीकरण निम्नलिखित विशिष्टताओं से युक्त होना चाहिये- 

बौद्धिक स्पष्टता 

विषय-वस्तु का सही एवं स्पष्ट ज्ञान होन पर ही लेखक उसे तार्किक एवं क्रमबद्ध ढंग से से विश्लेषित एवं प्रस्तुत की गयी सामग्री ही स्वत: अधिगम को प्रोत्साहित करने में सक्षम होती है। 

भाषा की सरलता 

पाठ्य सामग्री में जटिल भाषा एवं शब्दों को प्रयोग स्वत: अधिगम में बाधक होता है। अत: स्व अधिगम सामग्री सरल भाषा में प्रस्तुत की जानी चाहिये। इसके लिये सामान्य शब्दों, छोटे एवं सरल वाक्यों, विचारों एवं सम्प्रत्ययों की स्पष्ट अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत सम्बंधों को विकसित करने वाली शैली तथा यथासम्भव मनोरंजनात्मक प्रसंगों आदि का प्रयोग किया जाना चाहिये। 

सम्प्रत्ययों की मूर्तता 

शिक्षार्थियों के लिये अमूर्त सम्प्रत्ययों को मूर्त वस्तुओं के माध्यम से समझना सरल होता है। अत: कठिन सम्प्रत्ययों को चित्रों, रेखाचित्रों, शाब्दिक चित्रावली, उदाहरणों आदि के द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिये। 

उपयुक्त माध्यम 

यद्यपि शोध निष्कर्षों एवं अनुभवों से यही पता चलता है कि शिक्षार्थी सभी माध्यमों (मुद्रित, श्रव्य एवं दृश्य) से समान रूप में सफलतापूर्वक सीखते हैं, अथवा सीख सकते हैं। इसके अतिरिक्त माध्यमों के चयन में लागत-दक्षता सिद्धान्त का अनुपालन भी आवश्यक होता है। 

उद्देश्यों की पहचान करना 

उद्देश्यों की स्पष्टता स्वत: अधिगम को प्रोत्साहित करने में बहुत अधिक सहायक होती है। अत: स्व अधिगम सामग्री के प्रारम्भ में ही उस पाठ इकाई के उद्देश्यों की सूची प्रस्तुत करनी आवश्यकत होती है। यदि ये उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों (ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक) से सम्बंध रखते हो। उन्हें अलग-अलग सूचियों में प्रस्तुत करना चाहिये। अधिकांश विषयों में उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने की आवश्यकता होती है क्येांकि इससे शिक्षार्थी को उन्हें समझने एवं प्राप्त करने में सरलता होती है। उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने हेतु ब्लूम के प्रतिमान का अनुसरण दूर शिक्षक के लिये बहुत उपयोगी हो सकता है। 

शिक्षार्थी को अभिप्रेरित करना 

शिक्षक की ही भांति अधिगम सामग्री को अभिप्रेरित कर सकती है। अभिप्रेरणा का (स्तर उच्च, सामान्य, निम्न) सामग्री के बाह्य एवं आन्तरिक स्वरूप पर निर्भर करता है। सामग्री के बाह्य स्वरूप से तात्पर्य उसकी बाहरी साज-सज्जा से है जो शिक्षार्थी को प्रथम दृष्टि में आकर्षित करते है। उदाहरणाथ- अनुदेशनात्मक सामग्री जिस पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत की जाती है, उसका आचरण, कागज, छपाई, चित्र, रंग, आकार तथा कभी-कभी पैंकिंग तक भी शिक्षार्थी को उसके प्रति आकर्षित होने के बाध्य करते हैं। अत: ये सब बाह्य अभिप्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।
स्व अधिगम सामग्री का आन्तरिक स्वरूप अर्थात् पस्तुत की गयी समिति की गुणवत्ता ही सही अर्थों में शिक्षार्थी को अभिप्रेरित करती है। सामग्री के आन्तरिक स्वरूप को गुणवत्ता युक्त तभी कहा जा सकता है जब कि वह-’ 
  1. शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली हो।
  2. शिक्षार्थियों के अनुभवों के भरपूर प्रयोग से युक्त हो। 
  3. पर्याप्त पृष्ठपोषण प्रदान करने वाली हो। 
  4. स्ूचनाओं को व्यक्तिगत सम्बंध विकसित करने वाली शैली में प्रस्तुत किया गया हो। 
  5. मनोरंजनात्मक एवं रूचिकर अभ्यासों से युक्त हो। 
  6. अध्ययन इकाइयों को उपयुक्त आकार एवं लम्बाई में प्रस्तुत किया गया हो। 
  7. आवश्यक सम्पूर्ण पाठ्यवस्तु उसमें निहित हो।
  8. दूर अध्येता की विशेषताओं को धन में रखकर लिखी गयी हों।
  9. गश्हकार्यों को कठिनाई स्तर के क्रम में प्रस्तुत किया गया हो। 
उपर्युक्त गुणों से युक्त स्व अधिगम सामग्री सामग्री शिक्षार्थियों को उच्च स्तरीय अभिप्रेरणा प्रदान कर सकती है। शिक्षार्थी के अनुभवों का भरपूर उपयोग करना शिक्षार्थियेां को अभिप्रेरित करने का एक अच्छा तरीका उनके अनुभवों का अधिक से अधिक उपयोग करना भी है। स्वत: अनुदेशानात्मक सामग्री के निर्माण में भी इस विधि से लाभ उठाया जा सकता है। यह उपागम शिक्षार्थियेां को अभिप्रेरणा प्रदान करने के साथ-साथ पाठ लेखकों को इस रूप में भी सहायता प्रदान करता है कि पाठ को शिक्षार्थियों के पूर्व ज्ञान से जोड़ते हुये प्रारम्भ किया जाये, तथा उसके आधार पर नवीन ज्ञान प्रस्तुत किया जाये। पाठ सामग्री की भाषा व्यक्तिगत सम्बंध विकसित करने वाली शैली में होने पर अधिकांश शिक्षार्थी इसे अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर सरलता से ग्रहण कर लेते हैं, जबकि कठिन भाषा में वे पाठ्य-पुस्तक से विरक्त हो सकते हैं। अत: पाठ लेखक को शिक्षार्थी के अनुभवों से युक्त भाषा का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिये। 

पाठ इकाई के प्रारम्भ में दिये गये अध्ययन सम्बंधी कुछ आवश्यक निर्देश भी शिक्षार्थी के लिये बहुत लाभदायक होते हैं। इससे शिक्षार्थी प्रस्तुत की गयी नवीन सामग्री को अपने पूर्वज्ञान से सम्बंधित कर सकने में समर्थ हो जाता है। 

पाठ लेखक शिक्षार्थियों के अनुभवों को आवश्यकतानुसार विभिन्न स्रोतों (इतिहास, भूगोल, जीवविज्ञान, समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र,वाणिज्य, दैनिक जीवन की क्रियाओ, साहित्य, लोक कथाओं, जन संचार आदि) से चयनित कर सकता है। शिक्षक के आसपास भी इस तरह के अनेक अनुभव होते हैं। 

अधिगम क्रियाओं हेतु परिस्थितियां प्रदान करना 

अधिगम की सबसे अच्छी विधि करके सीखना है। अत: स्व अधिगम सामग्री के अन्तर्गत भी इस तरह की परिस्थितियां प्रदान की जानी चाहिये, जिससे शिक्षार्थी को अधिक से अधिक अधिगम क्रियाओं को करने का अवसर मिल सके। इसके लिये कुछ प्रमुख अधिगम परिस्थितियां इस प्रकार की हो सकती है। 

अभ्यास कार्य - दूरस्थ शिक्षार्थी को स्वयं करने के लिये प्रत्यके उप इकाई के पश्चात् अभ्यास कार्य दिये जाने चाहिये। यदि सम्भव हो तो पाठ के अन्त में उनके उत्तर या उत्तर संकेत अथवा संक्षिप्त उत्तर भी दिये जायें, जिससे शिक्षार्थी अपने उत्तरों की पुष्टि कर सके। इससे उसे पृष्ठपोषण मिलता रहता है। 

गृहकार्य - दूर शिक्षार्थी के लिये सबसे महत्वपूर्ण अधिगम क्रिया गृहकार्य को पूरा करना होता है। गश्हकार्य अभ्यास कार्य से भिन्न होता है। इनमें अपेक्षाकृत लम्बा उत्तर लिखना होता है। अत: गृहकार्य सम्बंधी प्रश्नों को ब्लाक (इकाई समूह) के अन्त में दिया जाना चाहिये। गृहकार्य से जहां एक तरफ शिक्षार्थी की निश्पत्ति का आंकलन हो पाता है, वहीं दूसरी ओर यह द्विमार्गी शैक्षणिक संवाद स्थापित करने में भी सहायक होता है। गृहकार्य हेतु विभिन्न प्रकार के प्रश्नों को दिया जा सकता है। उदाहरणार्थ- दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, वस्तुनिष्ठ प्रश्न, प्रोजेक्ट कार्य, इकाई के बारे में सकारात्मक सुझाव एवं समालोचना आदि। 

धारण शक्ति में वृद्धि करना 

शिक्षा का उद्देश्य मात्र नवीन ज्ञान को प्रदान करना ही नहीं बल्कि उसे शिक्षार्थी के मस्तिष्क में लम्बे समय तक धारण करवाना भी है, जिससे वह उसका अपने जीवन में सदुपयोग भी कर सके। धारण शक्ति में वृद्धि का सबसे अच्छा एवं प्रचलित तरीका सीखी गयी क्रियाओं को थोड़े-थोड़े अन्तराल पर दुहराते रहना है। स्वअधिगम सामग्री के अन्तर्गत भी सारांश प्रस्तुतीकरा, पुनर्बोधात्मक प्रश्नों तथा गृहकार्य प्रश्नों के माध्य से पाठ को कई बार दुहराने के अवसर प्रदान किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त अधिक से अधिक उदाहरणो, उपयुक्त व्याख्याओं एवं टिप्पणियों केा प्रस्तुत करके भी शिक्षार्थी को यह अवबोध बार-बार कराया जा सकता है। 

अधिगम स्थानान्तरण को प्रोत्साहित करना 

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के अन्तर्गत नवीन सम्प्रत्ययों, कौशलों को सीखना तथा नवीन अभिवृत्तियों को विकसित करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता है। अधिगम की पूर्णता तभी होती है, जब शिक्षार्थी उसे दूसरी परिस्थितियों में भी स्थानान्तरित एवं प्रयुक्त कर सके। इस प्रकार का उच्चस्तरीय अधिगम जटिल प्रयोगों एवं समस्या समाधान वाले अभ्यास कार्यों के माध्यम से प्रदान किया जा सकता है। 

पृष्ट पोषण प्रदान करना - 

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिये उसमें निरन्तर सुधार की आवश्यकता होती है। अत: शिक्षक एवं शिक्षार्थी के मध्य द्विमार्गी पृष्टपोषण प्रक्रिया सम्पादित की जानी चाहिये।
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