वित्तीय प्रबंधन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, कार्य एवं महत्व

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वित्तीय प्रबंधन व्यावसायिक प्रबंधन का एक कार्यात्मक क्षेत्र है तथा यह संपूर्ण प्रबंधन का ही एक भाग होता है। वित्तीय प्रबंधन उपक्रम के वित्त तथा वित्तीय क्रियाओं के सफल तथा कुशल प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होता है। यह कोई उच्चकोटि के लेखांकन अथवा वित्तीय सूचना प्रणाली नहीं होती है। यह फर्म के वित्त तथा वित्त से संबंधित पहलुओं पर निर्णय करने तथा नीति निर्धारित करने से संबंधित क्रियाओं का समूह होता है। इसमें पूँजी, रोकड़, प्रवाह, साख, मूल्य एवं लाभ नीतियाँ, निष्पत्ति नियोजन एवं मूल्यांकन तथा बजटरी नियंत्रण नीतियाँ एवं प्रणालियाँ शामिल होती हैं। बजटरी नियंत्रण एवं प्रणालियाँ प्रमुख रूप से वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में आती हैं। परन्तु ये अन्य विभागों के सहयोग एवं सहमति के बगैर प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं किये जा सकते है। वित्तीय प्रबंधन उपक्रम के व्यापक हितों का प्रतिनिधित्व करता है। तथा वह इनके लिए संस्था का रखवाला कुत्ता होता है। वित्तीय प्रबंधन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कुछ परिभाषाओं का अध्ययन किया जा सकता है :
  1. हॉबर्ड एवं उपटन के शब्दों में, “वित्तीय प्रबंधन नियोजन तथा नियंत्रण का वित्त कार्य पर लागू करना है।”
  2. वैस्टन एवं ब्रा्रा्राइगम के अनुसार, “ वित्तीय प्रबंधन वित्तीय निर्णय लेने की वह क्रिया है जो व्यक्तिगत उद्देश्यों और उपक्रम के उद्देश्यों में समन्वय स्थापित करती है।”
  3. जे. एल. मैसी  के अनुसार, “वित्तीय प्रबधं एक व्यवसाय की वह सचं ालनात्मक प्रक्रिया है जो कुशल प्रचालनों के लिए आवश्यक वित्त को प्राप्त करने तथा उसका प्रभावशाली ढंग से उपयोग करने के लिए दायी होता है।
  4. जे. एफ. बेडले के अनुसार, “वित्तीय प्रबंधन व्यावसायिक प्रबंधन का वह क्षेत्र है जिसका संबंध पूँजी के विवेकपूर्ण उपयोग एवं पूँजी साधनों के सतर्क चयन से है; ताकि व्यय करने वाली इकाई (फर्म) अपने उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ सके।
  5. इजरा सोलोम के अनुसार, “वित्तीय प्रबंधन का तात्पर्य एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक òोते अर्थात् पूँजी कोष के कुशलतम उपयोग से होता है।
  6. व्हीलर के अनुसार, “वित्तीय प्रबंधन का अर्थ उस क्रिया से होता है जो उपक्रम के उद्देश्यों एवं वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतू पूँजी कोषों के संग्रहण एवं उनके प्रशासन से संबंध रखती है।
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है वित्तीय प्रबंधनन व्यावसायिक प्रबंधन का एक वह क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत व्यवसाय की वित्तीय क्रियाओं एवं वित्त कार्य का कुशल संचालन किया जाता है। इसके लिए नियोजन, आबंटन एवं नियंत्रण कार्य किये जाते हैं।

वित्तीय प्रबंधन की प्रकृति अथवा विशेषताएँ

आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्त कार्य व्यावसायिक प्रबंधन में अत्याधिक महत्त्पूर्ण है। अत: इससे वित्तीय प्रबंधनक की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण बन गई है। आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्त कार्य अथवा वित्तीय प्रबंधन की अग्रविशेषताएँ होती है।
  1. व्यावसायिक प्रबंधंन का एक अभिन्न अंग - वित्तीय प्रबंधन की परंपरागत विचारधारा के प्रचलन के समय वित्तीय प्रबंधनक को व्यवसाय के प्रबंधन में अमहत्त्वपूर्ण व्यक्ति माना जाता था, परन्तु आधुनिक व्यवसायिक प्रबंधन में वित्तीय प्रबंधन व्यावसायिक प्रबंधन का एक प्रमुख अंग है तथा वित्तीय प्रबंधनक उच्च प्रबंधन टोली के सक्रिय सदस्यों में से एक होता है। व्यवसाय की गतिविध के साथ वित्त का प्रश्न जुड़ा हुआ है, अत: वित्तीय प्रबंधनक सभी महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक निर्णयों में आधारभूत भूमिका निभाता है।
  2. सतत् प्रक्रिया - परंपरागत वित्तीय प्रबंधन की धारणा के अन्तर्गत वित्तीय प्रबंधन की प्रक्रिया निरन्तर नहीं चलती थी, बल्कि यह प्रक्रिया कुछ विशिष्ट घटनाओं के धटित होने पर जाग्रत होती थी तथा उनसे उत्पन्न वित्त प्राप्ति की समस्याओं के समाधान होने पर मंद हो जाती थी। परन्तु आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्तीय प्रबंधन की प्रक्रिया सतत् चलने वाली प्रक्रिया है तथा व्यवसाय की सफलता के लिए वित्तीय प्रबंधनक को निरंतर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है।
  3. वर्णनात्मक कम तथा विश्लेषणात्मक अधिक - परंपरागत वित्तीय प्रबंधन वर्णनात्मक अधिक तथा विश्लेषणात्मक कम था, जबकि आधुनिक वित्तीय प्रबंधन वर्णनात्मक कम तथा विश्लेषणात्मक अधिक है। आज वित्तीय विश्लेषण की सांख्यिकीय तथा गणितात्मक विधियाँ विकसित हो गई हैं, जिनके द्वारा किन्हीं दी हुई आन्तरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के संदर्भ में संभावित विकल्पों में से श्रेष्ठ विकल्प को चुना जा सकता है।
  4. लेखांकन कार्य से भिन्न - बहुत से लोग वित्त कार्य तथा लेखांकन कार्य को एक ही मानते हैं, क्योंकि दोनो में बहुत सी शर्तें एवं अभिलेख (Termsand records) एकसमान ही होते हैं, परन्तु वित्त कार्य लेखांकन कार्य से भिन्न होता है। लेखांकन कार्य में वित्तीय एवं संबंधित समंकों का संग्रहण किया जाता है जबकि वित्त कार्य में इनका निर्णयों के लिए विश्लेषण एक उपयोग किया है।
  5. केन्द्रीयकृत स्वभाग - आधुनिक व्यावसायिक प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रोंं में वित्तीय प्रबंधन का स्वभाव केन्द्रीयकृत है। जहाँ उत्पादन, विपणन तथा कर्मचारी प्रबंधन के कार्यों का अत्याधिक विकेन्द्रीकरण सम्भव है। वहाँ दिन कार्य का व्यावहारिक दृष्टिकोण से विकेन्द्रीयकरण वांछनीय नहीं है तथा वित्त कार्य के केन्द्रीयकरण द्वारा ही व्यवसाय के उद्देश्यों को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्राप्त किया जा सकता है।
  6. व्यापक क्षेत्र - वित्तीय प्रबंधन का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। वित्तीय प्रबंधन का कार्य उपक्रम की अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं के लिए साधनों को प्राप्त करना, उनका आबंटन करना तथा अनुकूलतम उपयोग करना है। वित्तीय प्रबंधन लेखांकन अंकेक्षण, लागत लेखांकन, व्यावसायिक बजटन, रोकड़ व साख प्रबंधन, सामग्री प्रबंधनन आदि के लिए भी उत्तरदायी होता है।
  7. उच्च प्रबंधंकों के निर्णर्यय में सहायक - वित्तीय प्रबंधन की आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्तीय प्रबंधनक उपक्रम के सर्वोच्च प्रबंधन को निर्णय लेने में सहायता पहुँचाता है। वित्तीय प्रबंधनक उपक्रम की वित्तीय स्थिति तथा किसी अवधि विशेष के कार्यों की निष्पत्ति के संबध में आवश्यक तथ्य, आंकड़े तथा प्रतिवेदन उच्च प्रबंधनकों को प्रस्तुत करता है जिनके आधार पर उच्च प्रबंधनक ठोस निर्णय लेते हैं। इसलिए आजकल वित्तीय प्रबंधनक अथवा नियंत्रक संचालक मण्डल सदस्य होता है। 
  8. कार्य निष्पत्ति का मापक - आधुनिक युग में व्यावसायिक उपक्रम में विभिन्न कार्यों की निष्पत्ति (Performance) को वित्तीय परिणामों (Financial Results) में मापा जाता है। यदि एक उपक्रम पूर्व निर्धारित यात्रा में आगम प्राप्त कर सका है तथा लागतों को उचित स्तर पर रख सका है तो वह अपने लाभ उद्देश्य अथवा संपदा के मूल्य को अधिक करने के उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल होता है। वित्तीय प्रबंधनक को संस्था के लिए तरलता तथा लाभदायकता के कार्यों (Liquidity and Profitability Functions) को पूरा करना होता है। इन कार्यों के लिए उसे जोखिम तथा लाभदायकता का सही विभाजन करना होता है। ऐसा करने पर ही वांछित निष्पत्ति का स्तर प्राप्त किया जा सकता है।
  9. उपक्रम के अन्य विभागों से समन्वय आवश्यक - एक वित्तीय प्रबंधनक उपक्रम के अन्य विभागों के सहयोग तथा समन्वय के बगैर प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य नहीं कर सकता है। हर विभाग के कार्यों का वित्तीय परिणामों पर प्रभाव पड़ता है, अत: किसी भी एक अन्य विभाग के असहयोग की स्थिति में वांछित परिणाम प्राप्त नहीं होते हैें। वित्त कार्य का अन्य सभी कार्यों से पूर्ण समन्वय आवश्यक होता है।
  10. वित्तीय नियोजन, नियंत्रण एवं अनुवर्तन - आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्तीय प्रबंधन में साधनों की प्राप्ति तथा उपयोग के लिए योजना बनाना, उनके अनुसार साधन प्राप्त करना, प्रभावी उपयोग करना, बजट के अनुसार नियंत्रण करना विचलनों की खोज करना तथा अनुवर्तन (Feedback) द्वारा सुधारात्मक कार्य करना शामिल होता है।
  11. सभी प्रकार के संगठनों पर लागू - वित्तीय प्रबंधन सभी प्रकार के संगठनों में लागू होता है।, चाहे वे संगठन निर्माणी हों अथवा सेवा संगठन हों अथवा एकांकी स्वामित्व वाले अथवा नियमित संगठन। यह गैर लाभकारी संगठनों की क्रियाओं पर भी लागू होता है।

वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य

एक व्यावसायिक उपक्रम के वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य क्या होते हैं ? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। संकुचित दृष्टिकोण से देखने पर कहा जा सकता है कि वित्तीय प्रबंधन का तात्कालिक उद्देश्य उपक्रम के लिए पर्याप्त सरल एवं लाभदायक वित्त की व्यवस्था करना होता है। परन्तु विस्तृत रूप से देखने पर कहा जा सकता है कि वित्तीय प्रबंधन का उद्देश्य फर्म के उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिकतम सहयकता पहुँचाना होता है। इस बात पर सामान्य सहमति है कि फर्म का वित्तीय उद्देश्य फर्म के स्वामियों के आर्थिक कल्याण को अधिकतम करना होना चाहिए। स्वामियों के आर्थिक कल्याण को किस प्रकार अधिकतम किया जा सकता है, इसके लिए अत्यधिक चर्चित दो आधार बताये जाते हैं, ये हैं : (i) लाभ को अधिकतम करना, तथा (ii) संपदा के मूल्य को अधिकतम करना। हम इन दोनों ही अधिकारों का अध्ययन करेंगे तथा यह स्पष्ट करेंगे कि स्वामियों के कल्याण को अधिकतम करने के लिए संपदा को अधिकतम करने का आधार व्यवहार में लागू करने की दृष्टि से अधिक प्रामाणिक आधार है।

लाभ को अधिकतम करना

परंपरागत रूप से व्यवसाय को एक आर्थिक संस्था माना गया है तथा संस्था की कुलशता को जाँचने के लिए लाभ को एक अच्छा प्रमाप माना गया है। इसलिए व्यवसाय का यह एक प्राकृतिक उद्देश्य है कि अधिकतम लाभ अर्जित करें। लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य की उपयुक्तता को तर्कों के आधार पर न्यायोचित बताया जाता है :
  1. लाभ अधिकतम करना विवेक के आधार पर ठीक है - एक व्यक्ति कोई आर्थिक क्रिया विवेकपूर्ण ढंग से करता है तो उसका उद्देश्य उपयोगिता को अधिकतम करना होता है। यह तर्क दिया जाता है कि उपयोगिता को लाभ के रूप में मापा जा सकता है। अत: विवेक के आधार पर लाभ को अधिकतम करना उचित ठहराया जा सकता है।
  2. आर्थिक कुशलता का सूचक - एक उपक्रम में लाभ उसकी आर्थिक कुशलता का सूचक होता है जबकि हानि आर्थिक अकुशलता का। 
  3. साधनों का कुुशल आबंटन एवं उपयोग - उपलब्ध साधनों का कुशल आबंटन एवं प्रयोग लाभ के आधार पर किया जा सकता । वित्तीय प्रबंधन साधनों को कम लाभदायक उपयोगों से निकाल कर अधिक लाभदायक उपयोगों में लगाता है जिससे कुशलता बढ़ती है।
  4. व्यावसायिक निर्णर्ययों की सफलता का मापक - सभी व्यावसायिक निर्णय लाभोपार्जन के उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिये जाते हैं। अत: यह निर्णयों की सफलता का प्रमुख साधन है। एक उपक्रम अपने उत्पादन, विक्रय तथा निष्पादन में कुशलता अर्जित करके ही लाभ अर्जित कर सकता है, प्रबंधन का कोई कार्य अथवा निर्णय सफल हुआ अथवा नहीं इसका मापन लाभ के आधार पर किया जा सकता है।
  5. प्रेरणा का स्रोत -  लाभ व्यवसाय के प्रेरणा का एक प्रमुख स्रोत होता है। अधिक लाभ अर्जित करने के लिए एक फर्म अन्य फर्मों से अधिक कुशल बनने के प्रयत्न करती है, अत: लाभ व्यावसायिक कुशलता का आधार है। यदि व्यावसायिक उपक्रमों से लाभ की प्रेरणा समाप्त कर दी जाये तो प्रातियोगिता का अन्त हो जायेगा तथा इससे विकास एवं प्रगति की दर धीमी पड़ जाएगी।
  6. सामाजिक लाभ को अधिकतम बनाना - एक फर्म अपने लाभ अधिकतम करने के उद्दश्ेय का पालन करके सामाजिक आर्थिक कल्याण को अधिकतम करती है, क्योंकि फर्म लाभ अर्जित करके ही विभिन्न सामाजिक कार्यों जैसे शिक्षा, चिकित्सा, श्रम कल्याण, आवास, मनोरंजन आदि पर व्यय करके लोगों के कल्याण को बढ़ा सकती है।
व्यवसाय के लाभ अधिकतम करने के उद्देश्य की पिछले वर्षों में अनेक आलोचनाएं की गई है।

प्रथम अब अनेक विद्वानों द्वारा यह माना जाता है कि एक व्यवसाय लाभ को अधिकतम करने का उद्देश्य केवल पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में ही प्राप्त कर सकता है, जबकि आजकल सभी देशों में तथा सभी बाजारों में अपूर्ण प्रतियोगिता देखने को मिलती है। अत: अपूर्ण प्रतियोगिता की दशाओं में लाभ को अधिकतम करने का उद्देश्य उचित नहीं जान पड़ता है।

द्वितीय यह भी कहा जाता है कि जब 19 वीं शताब्दी के आरम्भ में लाभ को अधिकतम करने को व्यवसाय का उद्देश्य स्वीकार किया गया, उस समय व्यवसाय के ढाँचे की विशेषताएँ, स्वयं वित्त, निजी संपत्ति तथा एकाकी संगठन थे। एकाकी स्वामी के उद्देश्य अपनी निजी संपत्ति एवं शक्ति को बढ़ाना होता था जो लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य द्वारा संतुष्ट किये जा सकते थे। परन्तु आधुनिक व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ सीमित दायित्व एवं प्रबंधन तथा स्वामित्व में पृथक्करण है। आज व्यवसाय के लिए वित्त की व्यवस्था अशंधारियों तथा लेनदारों द्वारा की जाती है तथा उसका प्रबंधन पेशेवर प्रबंधनकों द्वारा किया जाता है

तृतीय व्यवसाय से अन्य पक्षकार ग्रा्रा्राहक, कर्मर्चर्चचारी, सरकार एवं समाज भी संबंधित होते हैं। परिवर्तित व्यावसायिक ढाँचे के अन्तर्गत स्वामी प्रबंधनक का स्थान पेशेवर प्रबंधनकों ने ले लिया है, जिसे व्यवसाय से संबंधित सभी पक्षों के विभिन्न टकराव वाले हितों में मेल बैठाना होता है। इस नवीन व्यावसायिक वातावरण में लाभ को अधिकतम करने का उद्देश्य वास्तविक, कठिन तथा अनैतिक लगता है।

उपर्युक्त आलोचनाओं के अतिरिक्त लाभ को अधिकतम करने का विचार व्यवसाय के स्वामियों के आर्थिक कल्याण को प्राप्त करने के आधार के रूप में भी अव्यावहारिक लगता है। इसके द्वारा वैकल्पिक कार्यों का श्रेणीबद्ध करना (Ranking of alternative course of action) संभव नहीं है।

लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य की सीमाएँ अथवा आलोचनाएँ -
  1. अस्पष्ट धारणा - लाभ की धारणा एक अस्पष्ट धारणा है। अल्पकालीन लाभ को अधिकतम करें अथवा दीर्षकालीन लाभ को ? लाभ के अनेक रूप हो सकते हैं, जैसे- सकल लाभ, ब्याज एवं कर के पूर्ण लाभ, कर के बाद लाभ, शुद्ध लाभ आदि। इनमें से कौन से लाभ को अधिकतम किया जाय।
  2. मुद्रा के समय मूल्य की उपेक्षा - लाभ का अधिकतम करने के उद्देश्य की इस आधीर पर भी आलोचना की जाती है कि यह विभिन्न समय अवधियों में प्राप्त की गई लाभ की राशियों में अन्तर नहीं करता है अर्थात् यह मुद्रा के समय मूल्य को महत्व नहीं देता हे। आज जो लाभ होता हे, तथा एक साल, दो अथवा अधिक सालों बाद प्राप्त होने वाले लाभ मुद्रा के मूल्य की दृष्टि से समान नहीं हो सकते हैं। आज प्राप्त होने वाले एक रुपये का मूल्य आज से एक साल बाद प्राप्त होने वाले एक रुपयें के मूल्य से निश्चित रूप से अधिक होगा। इसका कारण यह है कि आज प्राप्त होने वाले लाभ की राशि को आय अर्जित करने के लिए पुन: विनियोग किया जा सकता है। इसे मुद्रा का समय मूल्य कहा जाता है, जिसकी इस विचारधारा द्वारा अपेक्षा की जाती है।
  3. भावी क्रियाओं से लाभ के उत्कर्ष तत्त्व की उपेक्षा - यह सिद्धांत लाभ के उत्कर्ष तत्त्व (Quality aspect of profit) की ओर ध्यान नहीं देता है। किसी कार्य के करने पर प्राप्त होने वाले लाभ की निश्चितता का अंश अधिक अथवा अनिश्चितता का कम मात्रा में हो सकता है जो जोखिम की न्यून मात्रा का प्रतीक होता है; जबकि किसी कार्य में अनिश्चितता अधिक हो सकती है जो अधिक जोखिम का प्रतीक होगा। किसी कार्य के फलस्वरूप लाभ की निश्चितता अधिक परन्तु थोड़ा कम लाभ हो इसके विपरीत लाभ की अधिकता परन्तु बहुत अधिक अनिश्चितता हो, तो पहली स्थिति को अधिक पसंद किया जाना चाहिए। यह सिद्धांत इस पर विचार नहीं करता है।
  4. व्यवसाय के सामाजिक दायित्व की उपेक्षा - यह विचारधारा स्वामियों के लाभ को अधिकतम करता है तथा व्यवसाय के सामाजिक दायित्व की उपेक्षा करता है इसमें श्रमिकों, उपभोक्ताओं, सामान्य जनता व सरकार की अपेक्षा की गई है।
उपर्युक्त अध्ययन के बाद यह कहा जा सकता है कि लाभ को अधिकतम करने का उद्देश्य आज की परिवतर्तित व्यावसायिक परिस्थितियों में ठीक नहीं जान पड़ता तथा इसको व्यवहार में वित्तीय निर्णयों पर लागू करना भी कठिन है।

संपदा के मूल्य को अधिकतम करना

अब लाभ को अधिकतम करने के स्थान पर फर्म की संपदा के मूल्य को अधिक करना व्यवसाय का मूल उद्देश्य माना जाता है, अत: वित्तीय प्रबंधन का उद्देश्य भी फर्म की संपदा के मूल्य को अधिकतम करना होता है। वित्तीय प्रबंधन को फर्म के लिए ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे फर्म की संपदा का मूल्य बढ़ता है तथा ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए जिससे संपदा का मूल्य कम होता है। वह कार्य अवश्य किया जाना चाहिए जिससे संपदा का निर्माण होता है। तथा फर्म का शुद्ध मूल्य (Net worth of the firm) बढ़ता है। यदि वित्तीय प्रबंधन के सामने एक से अधिक वैकल्पिक कार्यों में किसी एक को चुनने की समस्या हो, तो वह कार्य चुना जाना चाहिए जिससे सर्वाधिक संपत्ति अथवा शुद्ध मूल्य का निर्माण हो। किसी आर्थिक काय्र को करने से शुद्ध वर्तमान मूल्य (Net present value of worth) धनात्मक होता है तो उस कार्य को किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे फर्म की संपदा के मूल्य में वृद्धि होती है। किसी कार्य का शुद्ध वर्तमान मूल्य उस कार्य से प्राप्त कुल वर्तमान मूल्य में से उस कार्य में की गई प्रारम्भिक पूँजी विनियोजन की राशि को घटाने से प्राप्त हो सकता है।

संपदा के मूल्य को अधिकतम करने का सिद्धांत परिवर्तित व्यवसायिक परिस्थितियों में नियमित उपक्रमों के लिए भी उपयुक्त होता है। यह सिद्धांत संभावित लाभ के समय मूल्य को मान्यता देता है तथा जोखिम एवं अनिश्चिता का भी विश्लेषण करता है। इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव किया जा सकता है।

जो कंपनियाँ साधारण अंश निर्गमित करती है तथा जिनके अंशों का मूल्य बाजार में उद्धृत किया जाता है उनके अंशों के बाजार मूल्य के आधार पर यह देखा जा सकता है कि कंपनी की संपत्तियों के मूल्य को व्यक्त करता है। कंपनी के अंशधारियों की विनियोंजित संपत्ति तभी बढ़ती है जब उनके अंशों के बाजार मूल्य में बढ़ोत्तरी हो। कंपनी के अंशों का मूल्य उसके द्वारा अर्जित लाभों की मात्रा से प्रभावित होता है, परन्तु यह भी संभव है कि लाभ कमाने वाली कंपनियों के अंशों के बाजार मूल्य में पर्याप्त वृद्धि न हो, क्योंकि अंशों का बाजार मूल्य कंपनी लाभ की मात्रा के साथ-साथ उसके भावी लाभ कमाने की क्षमता कंपनी की लाभांश नीति, संपत्तियों की तरलता तथा कंपनी की शोधन क्षमता जैसे अन्य तत्त्वों पर भी निर्भर करता है। इसीलिए दो अथवा अधिक कम्पनियों में लाभ की मात्रा समान होने पर भी उनके अंशों के बाजार मूल्यों में भिन्नता होती है। कंपनी के अंशों का बाजार मूल्य कंपनी की समृद्धि तथा संपन्नता का सूचकांक तथा प्रबंधन की कुशलता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए वित्तीय प्रबंधन का उद्देश्य उपक्रम की संपत्तियों के मूल्यों को अधिकतम करना होना चाहिए। निगमित उपक्रमों में यदि अंशों का मूल्य एक लंबे समय में लगातार बढ़ रहा है तो यह कहा जा सकता है कि वित्त प्रबंधन निगम उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम रहा है। संपदा के मूल्य को अधिकतम करने के सिद्धांत के लाभ हैं :
  1. संपदा मूल्य अधिकतम करना एक स्पष्ट अवधारणा है, इसमें भावी रोकड़ प्रवाहों का वर्तमान मूल्य लिया जाता है।
  2. यह सिद्धांत मुद्रा के समय मूल्य पर विचार करता है जिससे रोकड़ प्रवाहों के वर्तमान मूल्य के आधार पर प्रबंधन महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकता है।
  3. इस सिद्धांत को सार्वभौमिक स्वीकृती प्राप्त हुई क्योंकि यह वित्तीय संस्थाओं स्वामियों, कर्मचारियों तथा समाज सब के हित का ध्यान रखता है।
  4. यह सिद्धान्त प्रबंधन को सुदृढ़ लाभांश नीति अपनाने का निर्देशन देता है जिससे समता अंशधारियों को अधिकतम प्रत्याय प्रााप्त हो।
  5. यह सिद्धांत जोखिम तत्व को विनियोग निर्णयों में आवश्यक महत्त्व प्रदान करता है।
एक फर्म जो अपने अंशधारकों की संपत्ति का मूल्य अधिकतम बनाने का कार्य करती है, ऐसे निम्न कार्य करने चाहिए :
  1. ऊँच स्तर की जोखिमों से बचा जाय - यदि फर्म के दीर्घकालीन व्यवसायिक प्रचालनों को देखा जाये तो उनमें अनावश्यक तथा अधिक मात्रा वाली जोखिमों से बचना चाहिए। अधिक जोखिम कार्यो की तुलना में कम जोखिमपूर्ण तथा अधिक लाभदायकता वाले क्षेत्रों को चुनना चािहए। ऊँचे स्तर की जोखिम की क्रियाएँ फर्म के लिए बड़ी घातक सिद्ध हो सकती है।
  2. लागत में कमी - संस्था को एक तरफ पूँूजी की लागत कम करनी चाहिए अर्थात् साधन न्यूनतम लागत पर प्राप्त किये जायें तथा द्वितीय इसे अपने कार्यचालन की लागत (Operating Cost) को कम करना चाहिए।
  3. लाभांश का भुगतान - लाभांशों का भुगतान फर्म तथा अंशधरियों की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। फर्म के जीवन के प्रारभ्भिक वर्षों में नीची दर से लाभांश दिया जाये तथा जैसे-जैसे फर्म परिपक्व हो तथा उसे विस्तार के लिए धन की कम आवश्यकता हो, वैसे-वैसे अधिक लाभांश बाँटा जाये। निरन्तर उपयुक्त मात्रा में लाभांश दिए जाने पर विनियोक्ता आकर्षित होते हैं। फर्म के अंशों का बाजार मूल्य तथा फर्म की वर्तमान संपदा बढ़ती है।
  4. विकास अथवा वृद्धि की प्राप्ति - एक फर्म को अपने वर्तमान मूल्य को अधिकतम करने के लिए अपने विक्रय तथा लाभों में वृद्धि करनी होती है। उसे विकास एवं विस्तार की योजनाएँ बनाकर लागू करनी चाहिए। कोई भी संस्था या तो विकास करती है या उसका पतन हो जाता है। इसलिए फर्म को सदैव विकास व विस्तार के लिए कार्यशील रहना चाहिए।
  5. अंशों के बाजार मूल्य को बनाये रखना - जो प्रबंधन फर्म की संपदा के मूल्य को अधिकतम करना चाहता है, उसका कर्त्तव्य है कि वह फर्म के अशों का बाजार में ऊँचा मूल्य बनाये रखे। वित्तीय प्रबंधनक को उपक्रम के स्वास्थ्य के साथ-साथ स्वामी -हित भी अक्षुष्ण रखना होता है।

वित्तीय प्रबंधन का क्षेत्र अथवा कार्य

एक व्यावसायिक उपक्रम में वित्तीय प्रबंधन को कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करने होते हैं, जिन्हें वित्त के कार्यों के रूप में जाना जाता है। इन्हें वित्त कार्य के क्षेत्र अथवा वित्त कार्य की विषय वस्तु के रूप में भी जाना जाता है। वित्तीय प्रबंधन के कार्यों तथा उनके नामों के बारे में वित्तीय विशेषज्ञ एक मत के नहीं हैं। विभिन्न विशेषज्ञ वित्तीय प्रबंधन के विभिन्न कार्य बताते हैं। तथा एक ही कार्य को विभिन्न विशेषज्ञ विभिन्न नामों से करते हैं, उदाहरण के लिए कुछ विशेषज्ञों ने वित्तीय प्रबंधनकों द्वारा किये जाने वाले निर्णयों के अनुसार इनक कार्यों को विनियोग-निर्णय (Investment Decisions), वित्त प्रबंधनन निर्णय (Financing Decisions) तथा लाभांश नीति निर्णय (Dividend Policy Decision) का नाम दिया है तथा कुछ अन्य ने वित्तीय नियोजन, संपत्तियों का प्रबंधन, कोषों का संग्रहण तथा विशेष समस्या का समाधान नाम दिया है। कुछ विशेषज्ञों ने वित्तीय प्रबंधन के कार्यों को आवर्ती वित्त कार्यों (Recurring finance Functions), अनावर्ती वित्त कार्यों (Non-recurring Finance Functions) तथा नैत्यक कार्यों (Routine Functions) में बाँट कर इनका वर्णन किया है। हम यहाँ पर सुविधा की दृष्टि से इन तीनों प्रकार के वित्त कार्यों का वर्णन कर सकते है :

आवर्ती वित्त कार्य

आवर्ती वित्त कार्य वे होते हैें जो फर्म के कुशल संचालन तथा फर्म के उद्देश्य की पूर्ति हेतु निरन्तर पूरे किये जाते हैं। कोषों का नियोजन एवं संग्रहण, कोषों एवं आय का आबंटन, कोषों का नियंत्रण तथा वित्त कार्य का संस्था के अन्य कार्यों से समन्व आवर्ती वित्त कार्य माने जाते है। आवर्ती वित्त कार्यों का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है :
  1. कोषों का नियोजन - एक वित्तीय प्रबंधनक का सर्वप्रथम कार्य व्यवसाय के लिए चाहे, वह नया हो अथवा पुराना, एक सुदृढ़ वित्तीय योजना तैयार करना होता है। वित्तीय योजना का तात्पर्य उस योजना से होता है जिसके द्वारा व्यवसाय के वित्तीय कार्यों का अग्रिम निर्धारण किया जाता है। फर्म की वित्तीय योजना का निर्धारण इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे फर्म के कोषों का समुचित उपयोग हो सके तथा उनकी तनिक सी भी बर्बादी न हो। वित्तीय योजना के निर्माण के लिए फर्म के दीर्घकालीन तथा अल्पकालीन वित्तीय उद्देश्यों का निर्धारण करना होता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न वित्तीय नीतियों एवं व्यवहारों की रचना की जाती है। वित्तीय नियोजेजेजना के लिए निम्न नीतियों का निर्मार्ण्ण किया जाता है : 
    1. पूँजी की मात्रा तथा अवधि को निर्धारित करने वाली नीतियाँ;
    2. पूँजीकरण को निर्धारित करने वाली नीतियाँ;
    3. कोष प्राप्त करने के लिए विभिन्न òोतो के चुनाव को निर्धारित करने वाली नीतियाँ;
    4. स्थायी तथा चालू संपत्तियों के विनियोजन से संबंधित नीतियाँ; तथा
    5. आय के निर्धारण एवं वितरण के संबंध में नीतियाँ
  2. कोष का संग्रहण - वित्तीय प्रबंधनक को वित्तीय योजना के निर्माण के बाद उसमें निर्धारित साधनों से कोषों का संग्रहण करना आवश्यक है। व्यवसाय की स्थापना के समय दीर्घकालीन कोषों की प्राप्ति के लिए अंशों का निर्गमन किया जाता है तथा इसके लिए अभिगोपकों की सेवाओं का प्रयोग किया जाता है। पूर्व-स्थापित प्रतिष्ठि उपक्रम की स्थिति में वित्तीय प्रबंधनक को यह निर्णय लेना होता है कि दीर्घकालीन वित्तीय साधन अंशों के निर्गमन से प्राप्त किए जायें अथवा ऋणपत्रों द्वारा अथवा दोनों से। वित्तीय प्रबंधनक यह निर्णय उपक्रम की लाभदायकता, वर्तमान वित्तीय स्थिति, पूंँजी एवं मुद्रा बाजार की स्थिति, वित्तीय संस्थाओं की सहायता करने की नीति आदि बातों को ध्यान में रखकर कर सकता है। वित्तीय प्रबंधनक को विभिन्न òोतों से पूँजी प्राप्त करने के वित्तीय परिणामों पर विचार कर के दी हुइर््र परिस्थितियों में श्रेष्ठ साधन का चुनाव करना चाहिए तथा उस साधन से अनुकूलतम शर्तों पर वित्त प्राप्त करना चाहिए। वित्तीय प्रबंधनक को चुने गये òोत से वित्त प्राप्त करने के लिए आवश्यक समझौता करना चाहिए।
  3. कोषों का आबंटन - वित्तीय प्रबंधनक का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य विभिन्न संपत्तियों में साधनों का आबंटन करना होता है। साधनों के आबंटनों मे प्रतियोगी प्रयोगों, लाभदायकता, अनिर्वायता, संपत्तियों के प्रबंधन तथा फर्म के समग्र प्रबंधन को ध्यान में रखा जाना चाहिए यद्यपि स्थायी संपत्तियों का प्रबंधन करने की जिम्मेदारी वित्तीय प्रबंधनक की नहीं होती है परन्तु उसे उत्पादन प्रबंधनक को स्थायी संपत्तियों की व्यवस्था करने में सहायता पहुँचानी चाहिए। वित्तीय प्रबंधन ही उत्पादन प्रबंधनक को पूँजी परियोजनाओं के विश्लेषण तथा फर्म के पास उपलब्ध पूँजी की जानकारी देती है। वित्तीय प्रबंधनक रोकड़ प्राप्यों तथा सामग्री के कुशल प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है। वित्तीय प्रबंधनक को चालू संपतियों में कोषों का विनियोजन करते समय लाभदायकता तथा तरलता में उचित समायोजन करना होता है।
  4. आय का आबंटन - वित्तीय प्रबंधनक को ही फर्म की वार्षिक आय विभिन्न प्रयोगों में आबंटित करनी होती है। फर्म की आय को विस्तार कार्यों के लिए रोका जा सकता है अथवा इसे देय ऋणों के भुगतान के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है अथवा इसे मालिकों को लाभांश के रूप में वितरित किया जा सकता है। इस संबंध में निर्णय फर्म की वित्तीय स्थिति, वर्तमान तथा भावी नगदी आवश्यकताओं एवं अंशधारियों की रुचि के अनुसार लिए जाते है।
  5. कोषों का नियंत्रण - वित्तीय प्रबंधनक का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य साधनों के प्रयोग को नियन्त्रित करना है। इस कार्य के लिए वित्तीय निष्पादन प्रमाप निर्धारित किया जाता है तथा उनके संदर्भ में वास्तविक निष्पादन की जाँच करके विचलनों को ज्ञात किया है। यदि ज्ञात विचलन सह्य सीमा (Tolerance Limit) के बाहर होते हैं तो वहाँ शीघ्र सुधारात्मक कार्यवाही की जाती है। कोषों का नियंत्रण कार्य कोषों की कमी के समय अधिक महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
  6. फर्म के अन्य विभागों से समन्वय - किसी भी उपक्रम की सफलता उपक्रम के विभिन्न विभागों के कार्यों में पाये जाने वाले समन्वय पर निर्भर करती है। वित्त कार्य व्यवसाय के प्रत्येक कार्य को प्रभावित करता है, अत: वित्त विभाग तथा अन्य विभागों में अच्छा समन्वय होना चाहिए। वित्तीय प्रबंधनक का यह दायित्व है कि वह फर्म में लिये गये विभिन्न निर्णयों में इस प्रकार का समन्वय स्थापित करे कि जिससे उनमें एकरूपता हो तथा वित्तीय उद्देश्यों की पूर्ति हो तथा वित्तीय साधनों की बाधाएँ कार्यों को विपरीत रूप से कम से कम प्रभावित करें।

अनावर्ती वित्त कार्य

अनावर्ती वित्त कार्य वे कार्य होते हैं जो एक वित्तीय प्रबंधनक को यदा-कदा संपन्न करने होते हैं। कंपनी के प्रवर्तन के समय वित्तीय योजना का निर्माण, संविलयन के समय संपत्तियों का मूल्यांकन, तरलता के अभाव के समय पुनर्समायोजन का कार्य आदि अनावर्ती वित्त कार्यों के कुछ उदाहरण है। इन विशिष्ट घटनाओं के घटने के समय उत्पन्न होने वाली वित्तीय समस्याओं के समाधान के कार्य वित्तीय प्रबंधन को ही करने होते हैं।

नैत्यक कार्य अथवा दैनिक कार्य

इस वर्ग में वे कार्य शामिल किये जाते हैं जो नैत्यक प्रवृत्ति अथवा दैनिक प्रवृत्ति के होते हैं। ये कार्य प्रतिदिन निम्नस्तरीय कर्मचारियों जैसे - लेखाकार, रोकड़ियों, लिपिक आदि द्वारा किये जाते हैं। सामान्य: इनमें निम्नलिखित कार्यों को शामिल किया जाना है
  1.  रोकड़ प्राप्ति एवं उसके वितरण का पर्यवेक्षण।
  2. रोकड़ शेषों को व्यवस्थित व सुरक्षित रखना।
  3. प्रत्येक व्यवहार का लेखा करके लेखों को सुरक्षित करना।
  4. उधार के व्यवहारों का प्रबन्ध करना।
  5. प्रतिभूतियों व महऋत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा करना।
  6.  पेंशन व कल्याण योजनाओं का प्रशासन।
  7. शीर्ष प्रबंधन को सूचनाएँ भेजना।
  8. राजकीय नियमों का पालन करना।

वित्तीय प्रबंधन का महत्व

व्यावसायिक संगठनों में वित्तीय प्रबंधन का महत्त्व पिछले 35.40 वर्षों में अत्यधिक बढ़ गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व तक प्रबंधन की परंपरागत विचारधारा के अन्तर्गत वित्तीय प्रबंधन का कार्य संस्था के लिए उचित शर्तों पर पूँजी प्राप्त करना था। परन्तु आधुनिक विचारधारा के अनुसार वित्तीय प्रबंधन का कार्य केवल पूँजी प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि व्यवसाय में पूँजी का अनुकूलतम उपयोग करना भी है। साधारण व्यावसायिक संगठनों में वित्तीय प्रबंधन का कार्य बड़ा सरल होता है, परन्तु निगमित व्यवसायों में वित्तीय प्रबंधन का कार्य बड़ा कठिन होता है। आज उद्योग, व्यापार, बैकिंग, बीमा, परिवहन आदि सभी क्षेत्रों में निगमित उपक्रमों का महत्त्व बढ़ रहा है। निगमित उपक्रमों के प्रबध में सभी अंशधारी प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले सकते हैं, अत: इनका संचालन सामान्य अंशधारियों द्वारा चुने गये संचालन मंडल द्वारा किया जाता है। संचालक मंडल के निर्देशन में प्रबंधनकीय विशेषज्ञ निगमों के विभिन्न कार्यों को पूरा करते हैं। निगमों के सफल संचालन में वित्तीय प्रबंधन का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। अंशधारी संचालन तथा प्रबंधनक वित्तीय प्रबंधन के बारे में जानकारी रखते है तो वे निगम के कार्यों को सही दिशा दे सकते हैं तथा निगम के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। वित्तीय प्रबंधन का महत्त्व निगमित उपक्रमों के लिए ही नहीं बल्कि, गैर निगमित उपक्रमों के लिए भी बहुत होता है।

वित्त आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था का जीवन रक्त है। यह समस्त क्रियाओं का आधार है। इसके अभाव में न तो उपक्रम को आरम्भ किया जा सकता है और न ही उसे सफलातापूर्वक संचालित किया जा सकता है। आवश्यकतानुसार पर्याप्त वित्त की व्यवस्था व्यावसायिक सफलता का मूल मंत्र है। किसी भी व्यापार एवं उद्योग को चाहे वह बडे़ पैमाने पर हो या छोटे पैमाने पर, प्रारंभ करने एवं उसके भावी विस्तार के लिए पर्याप्त वित्त की आवश्यकता होती है। वर्तमान समय में देश की औद्योगिक उन्नति वित्त प्रबंधन पर ही निर्भर है। वित्त प्रबंधन की उचित व्यवस्था के अभाव में अनेक औद्योगिक विकास की योजनाएँ मात्र काग़जी योजनाएँ बनकर रह जाती है। जिस प्रकार एक इंजिन को चलाने के लिए कोयले अथवा बिजली की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रत्येक व्यापार एवं उद्योग को स्थापित करने तथा चलाने के लिए वित्तीय प्रबंधन की आवश्यकता होती है। हसबैंड एवं डोकरे के अनुसार “विभिन्न आर्थिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों को एक सूत्र में बाँधने के लिए वित्तीय प्रबंधन की आवश्यकता होती है। “प्रोñ सोलेमन ने भी वित्तीय प्रबंधन का अर्थ बताते हुए लिखा है कि, “वित्तीय प्रबंधन आज केवल वित्तीय साधन संकलित करने की एक विशेषज्ञ क्रिया मात्र नहीं है, अपितु संपूर्ण प्रबंधनकीय विज्ञान का एक अभिन्न अंग बन गया है- वित्तीय संसाधन एकत्रित करने के साथ-साथ वित्तीय प्रबंधन उत्पादन, विपणन और उपक्रम में प्रत्येक निर्णायात्मक क्रिया से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित रहता है।

“वित्त एक ऐसी धुरी है।, जिसके आस-पास समस्त व्यावसायिक क्रियायें चक्कर लगाती हैं। इसके सफल प्रबंधन में समस्त वर्गों तथा पूरी फर्म का जीवन, विकास तथा कल्याण निर्भर है। वित्त प्रबंधन का कार्य एक कुशल, विशेषज्ञ, अनुभवी, निष्ठावान तथा उत्तरदायी व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए। वित्तीय प्रबंधन के महत्त्व अथवा इसकी उपयोगिता को निम्न शीर्षकों में देखा जा सकता है :
  1. उपक्रम की सफलता का आधार - चाहे वह उपक्रम छोटा हो अथवा बड़ा, चाहे उपक्रम निगमित हो अथवा गैर निगमित, चाहे उपक्रम निर्माणों हो अथवा सेवा संस्थान, उसकी सफलता वित्तीय प्रबंधन की कुशलता पर निर्भर करती है। कुशल वित्तीय प्रबंधन हानि में चलने वाले उपक्रम को लाभ में बदल सकता है तथा अकुशल वित्तीय प्रबंधन लाभ में चलने वाले उपक्रम को बर्बाद कर सकता है, अत: उपक्रम की सफलता वित्तीय पर निर्भर करती है।
  2. साधनों का अनुकूलतम आबंटन एवं उपयोग - एक कुशल वित्तीय प्रबंधनक उपक्रम के उपलब्ध साधनों का अनुकूलतम आबंटन एवं उपयोग सम्भव बनाता है, तथा इस कार्य के द्वारा फर्म के संपदा मूल्य को अधिक बनाने में सहायक होती है।
  3. निर्णय का केन्द्र - व्यवसाय में पहले प्रबंधनकों द्वारा अंत: प्रेरणा (Intuition) तथा अनुभव के आधार पर निर्णय लिए जाते थे, परन्तु आज अधिकांश निर्णय वित्तीय विश्लेषण एवं तुलना के आधार पर लिये जाते हैं। सभी निर्णयों के वित्तीय प्रभावों को पूर्वानुमानित करके ही उचित निर्णय लिए जाते हैं।
  4. कार्य निष्पति एवं कुुशलता का मापन - उपक्रम में जो कुछ कार्य होता है अन्तिम रूप से उसका मापन एवं उसकी कुशलता वित्तीय आधार पर जाँची जाती है। इस जाँच के लिए वित्तीय प्रबन्ध में अनेक तकनीकों का विकास हुआ है।
  5. नियोजन, समन्वय एवं नियंत्रण का आधार- वित्तीय प्रबन्ध उपक्रम में नियोजन, समन्वय तथा नियंत्रण का आधार प्रस्तुत करता है। वित्तीय पूर्वानुमानों के आधार पर योजना बनाई जाती है जिसमें सभी विभागों कें कार्यो को समन्वित किया जाता है तथा विभिन्न विभागों के कार्य-कलापों पर बजटरी नियंत्रण लागू किया जाता है।
  6. राष्टी्रय महत्त्व - भारत जैसे विकासशील देशों में विभिन्न विकास कार्यों पर करोड़ों रुपयों का विनियोग किया जाता है। इस विनियोग की कुशलता द्वारा राष्ट्रीय विकास की दर ऊँची की जा सकती है। सार्वजनकि विनियोग का अकुशल प्रबंधन हमारी गरीबी का एक कारण है।
  7. व्यावसायिक प्रबंधनकों के लिए उपयोगिता - वित्तीय प्रबंधन विषय की सर्वाधिक उपयोगिता व्यावसायिक प्रबंधन के क्षेत्र में होती है। निगमों में जनता की पूँजी विनियोजित होती हे। प्रबंधनक जनता की पूँजी के प्रन्यासी होते हैं। यह उनका दायित्व है कि वे जनता के विभिन्न वर्गों द्वारा विनियोजित पूँजी को सुरक्षा प्रदान करें तथा उस पर उचित प्रत्याय की व्यवस्था करें। ऐसा तब ही हो सकता है जब व्यावसायिक प्रबंधनक वित्तीय प्रबंधन के सिद्धान्तों से पूर्ण रूप से परिचित हों तथा संस्था के लिए प्रभावपूर्ण वित्तीय नीति का निर्धारण कर सकें।
  8. अंशधारियों के लिए उपयोगिता - कंपनी तथा निगम के वास्तविक स्वामी अंशधारी होते हैं। इनकी संख्या अधिक होन के कारण ये प्रबंधन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले सकते हैं। प्रबंधन का कार्य इसके द्वारा चुने गये संचालकों को सौंप दिया जाता है। संचालक मंडल अंशधारियों के हित में कार्य करते हैं अथवा नहीं, इसको देखना अंशधारियों का कार्य है। यदि अंशधारी वित्तीय प्रबंधन विषय का पर्याप्त ज्ञान रखते हैं तो वे कंपनी की आर्थिक स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकते हैं तथा कंपनी की वार्षिक सभाओं में अच्छे सुझाव दे सकते हैं। यदि संचालक अंशधारियों के हितों के विरुद्ध कार्य करते हैं तो अंशधारी उन्हें उचित वित्तीय नीति अपनाने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
  9. विनियोक्ताओं के लिए उपयोगिता - देश के बहुत से विनियोक्ता बचत करके अपनी बचतों को कम्पनियों के अंशों में विनियोजित करते हैं। भारत में विनियोग बैंकों का अभाव होने के कारण विनियोक्ताओं को प्रतिभूति विक्रेताओं एवं दलालों पर निर्भर रहना पड़ता है। वे लोग विनियोक्ताओं को सही सलाह नहीं दे सकते हैं। यदि विनियोक्ता स्वयं वित्तीय प्रबंधन के सिद्धांतों एवं व्यवहार से परिचित हों तो वे स्वयं यह निर्णय कर सकते हैं कि उन्हें कौन-सी कंपनी की प्रतिभूतियों में विनियोग करना चाहिए जिससे उन्हें पर्याप्त लाभ प्राप्त हो सके।
  10. वित्तीय संस्थाओं के लिए उपयोगिता - विभिन्न वित्तीय संस्थाओं जैसे- विनियोग बैंकों, व्यापारिक बैंकों, अभिगोपकों, प्रन्यास कंपनियों, स्वीकृति गृहों, बट्टा गृहों आदि के व्यवस्थापकों को वित्तीय प्रबंधन का विस्तृत ज्ञान होना चाहिए। इन संस्थाओं के प्रबंधनकों को विषय का पूर्ण ज्ञान न होने पर वे गलत कंपनियों को अधिक उधार दे सकते हैं अथवा खराब प्रतिभूतियों में विनियोजन कर सकते हैं। अथवा गलत अभिगोपन द्वारा अनावश्यक हानि उठाने के लिए बाध्य हो सकते हैं। इसलिए वित्तीय संस्थाओं में वित्तीय विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाता है।
  11. अन्य व्यक्तियों के लिए उपयोगिता - वित्तीय प्रबंधन, विषय का ज्ञान समाज के विभिन्न व्यक्तियों के लिए लाभदायी होता है। राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, वाणिज्य एवं प्रबंधन विषय के विद्याथ्र्ाी इससे लाभान्वित होते हैं। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न पंचवष्र्ाीय योजनाओं में भारी मात्रा में सरकारी उपक्रमों में विनियोग किया गया है। इस विनियोग की सफलता वित्तीय प्रबंधन की प्रभावशीलता पर ही निर्भर करती है। भारत में सरकारी उद्यमों की अकुशलता के कारण करोड़ों रुपयों की पूँजी पर उचित एवं पर्याप्त लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है। इस स्थिति को वित्तीय प्रबंधन के आधुनिक सिद्धांतों एवं व्यवहारों के उपयोग द्वारा ही ठीक किया जा सकता है।

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