द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के कारण, घटनाएँ, परिणाम

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1852) (Second Anglo-Burma War 1852)

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध लार्ड डलहौजी के शासनकाल में हुआ। लार्ड डलहौजी घोर साम्राज्यवादी था। उसने जिस प्रकार भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का विस्तार किया, उसी प्रकार उसने बर्मा के मामले में भी विस्तारवादी नीति अपनायी।

1. यान्दूब के बाद की स्थिति (Position after yandoub) -

बर्मा ने आवा नरेश अंग्रेजों से किसी प्रकार के राजनीतिक या व्यापारिक संबंध नहीं रखना चाहते थे। संभवत: वे जानते थे कि भारत में अंगे्रंजों ने क्या किया है। यान्दूब की संधि के अनुसार आवा के राजा को अपना दूत कलकत्ता भेजना था लेकिन उसने दूत नहीं भेजा। वह यह भी नहीं चाहता था कि उसके दरबार में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रहे। 1830 ई. से 1840 ई. के वर्षो में दा े ब्रिटिश रेजीडेण्ट मेजर बर्नी और कर्नल बेनसन, आवा दरबार में रहे। दरबार में उनका सम्मान नहीं था और उन्हें कठोर शिष्टाचार का पालन करना पड़ता था। अत: 1840 ई. के बाद ब्रिटिश रेजीडेण्ट आवा दरबार में नहीं भेजा गया।

बर्मियों को अंग्रेजों पर गहरा संदेह था। 1836 ई. में चीन के सम्राट ने आवा के राजा को एक पत्र में लिखा था कि अंग्रेज पीपल के पेड़ के समान थे। जिस राज्य में वे एक बार प्रवेश पा लेते थे, उसी पर छा जाते थे।

2. शेपर्ड और लेविस के प्रकरण (Types of Shepherd and Lewis) -

यान्दूब की सधि के पश्चात् बड़ी संख्या में अंग्रेज व्यापारी बर्मा में बसने लगे। यह स्वाभाविक था कि बर्मा में व्यापार करने वाले व्यापारी गवर्नर जनरल डलहौजी से संरक्षण तथा सहायता की आशा करते थे। डलहौजी भी साम्राज्य के प्रसार के लिए व्यापारियों की सहायता करना अपना कर्त्तव्य समझता था। इस स्थिति में आवा नरेश तथा अंग्रेज व्यापारियों के मध्य विवाद होना आवश्यक हो गया था। शपे र्ड के जहाज से एक नाविक समुद्र में कूद गया और तैरकर तट पर पहुँचा। लेविस का जहाज मारीशस से आ रहा था। उसके जहाज पर एक नाविक की मृत्यु हो गयी। रंगून के गवर्नर ने बर्मी कानून के अनुसार इनको अपराध माना और उन पर जुर्माने कर दिये। वास्तव में, शेपर्ड तथा लेविस ने बर्मी कानूनों का पालन नहीं किया और उद्दण्डता दिखाई। इसी प्रकार अन्य अंग्रेज व्यापारी आयात-निर्यात न देने के लिए बर्मी अधिकारियों के साथ धोड़ाधड़ी और झगड़ा करते रहते थे। वे आयात-निर्यात करों को हटाने की माँग कर रहे थे।

शेपर्ड और लेविस ने डलहौजी से शिकायत की। डलहौजी बर्मा के विरूद्ध कार्यवाही का अवसर तलाश कर रहा था। उसने बर्मी सरकार से झगड़ा करने के लिए कमोडारे लेम्बर्ट को तीन युद्धपाते ों के साथ रंगून भेज दिया।

3. लेम्बर्ट का आक्रामक व्यवहार (Lambert's aggressive behavior) -

डलहौजी का उद्देश्य विवाद को सुलझाना नहीं बल्कि सैनिक कार्यवाही की भूमिका तैयार करना था। डलहौजी ने यह भी जाँच करने का प्रयत्न नहीं किया कि उन दो व्यापारियों की क्या गलतियाँ थीं। डलहौजी के आदेश के अनुसार लेम्बर्ट ने रंगून पहुँचकर दो माँग े प्रस्तुत कीं - प्रथम, दोनों व्यापारियों को क्षतिपूर्ति 1000 रूपये दी जाये और द्वितीय, रंगून के गवर्नर को पद से हटाया जाये। बर्मा का राजा युद्ध से बचना चाहता इसलिए उसने रंगून के गवर्नर को पद से हटा दिया। नये गवर्नर को आदेश दिया गया कि वह जुर्माने के मामले को हल करें।

लेकिन लेम्बर्ट युद्ध करने पर उतारू था। उसने दूसरा बहाना ढूँढ लिया। 5 जनवरी, 1852 को उसने अपने कुछ असफरों को नये गवर्नर से मिलने भेजा। ये अफसर घोड़ों पर चढ़े हुए राज भवन के प्रांगण में चले गये। यह बर्मी शिष्टाचार के विरूद्ध था। बर्मी अधिकारियों को अनुमान था कि ये अधिकारी शराब पिये हुए थे। अत: उन्होंने कहा कि गवर्नर सो रहा है और उनसे नहीं मिल सकता है। लेम्बर्ट ने इसे अपमान माना और रंगून को घेरे कर गोलाबारी की। डलहाजै ी ने लेम्बर्ट के दुव्र्यव्हार को निंदा नहीं की बल्कि आवा के राजा को एक लाख पॉण्ड क्षतिपूर्ति के रूप में माँगा। उसने यह भी चेतावनी दी कि अगर 1 अपै्रल, 1852 तक उसे उत्तर प्राप्त नहीं हुआ तो युद्ध आरंभ जो जायेगा। आवा के राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया, अत: डलहौजी ने युद्ध की घोषणा कर दी।

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के कारण (Cause of the Second Anglo-Burma War)

  1. बर्मा का शासक अंग्रेजों को अपने राज्य में प्रवेश नहीं देना चाहता था। अत: उसने यान्दबू की संधि को स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों ने इसे युद्ध का कारण माना। 
  2. दक्षिणी बर्मा में अंग्रेज व्यापारी मनमानी कर रहे थे। वे चाहते थे कि बर्मा को अंग्रेजी आधिपत्य में ले लिया जाय े जिससे उन्हें लूट करने स्वतंत्रता प्राप्त हो जाये। 
  3. अंग्रेजों को शिकायत थी कि आवा दरबार में उनके रेजीडेन्टों के साथ दुव्र्यवहार किया गया था। इसलिए उन्होंने 1840 ई. के बाद रेजीडेण्ट नहीं भेजा। 
  4. वास्तविक कारण डलहाजै ी की साम्राजयवादी नीति थी। इंग्लैण्ड में भी नवीन प्रदेश को प्राप्त करने की माँग जोर पकड़ रही थी। 
  5. युद्ध का तात्कालिक कारण रंगून के दो अंग्रेज व्यापारियों शेपर्ड और लेविस का प्रकरण था। इस विषय में बर्मा के राजा को अल्टीमेटम दिया गया कि वह क्षमा याचना करे और एक लाख पॉण्ड क्षतिपूर्ति में दे। इन माँगों को उत्तर न आने पर डलहौजी ने युद्ध की घोशना कर दी।

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध की घटनाएँ (Events of the Second Anglo-Burma War)

इस युद्ध में अंग्रेज सेनापति गाडविन ने रंगून बसीन, प्रोम तथा पेगू पर अधिकार कर लिया। इससे बर्मा के संपूर्ण समुद्र तट पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया लेकिन डलहौजी ने राजधानी आवा की और बढ़ने का विचार त्याग दिया क्योंकि यह संकटों से पूर्ण था। उसने आवा नरेश से वार्ता का प्रयास किया। इसमें असफल होने पर उसने 20 दिसम्बर, 1852 के पेगू दक्षिणी बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी।

 द्वितीय आंग्ल-बर्मा के परिणाम (Second Anglo-Burma Results)

दक्षिणी बर्मा को एक नवीन प्रान्त बनाया गया जिसकी राजधानी रंगून बनायी गयी। बर्मा के समस्त समुद्र तट पर अंग्रजों का अधिकार हो जाने से उत्तरी बर्मा को समुद्र तट तक पहुँचने के लिए कोई रास्ता नहीं रहा। दक्षिण बर्मा की विजय से अंतत: उत्तरी बर्मा को जीतने का भी मार्ग अंग्रेजों के लिए प्रशस्त हो गया।

 द्वितीय आंग्ल-बर्मा की समीक्षा (Second Anglo-Burma Review)

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध विशुद्ध रूप से साम्राज्यवादी युद्ध था। यह युद्ध केवल साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा से किया गया था। बर्मा के राजा ने युद्ध से बचने तथा अंग्रेजों को संतुष्ट करने का पूरा प्रयत्न किया लेकिन शक्ति के अहंक ार में अंग्रेज उद्दण्ड हो गये थे। भ्रष्ट व्यापारियों की शिकायतों को सुनना तथा आवा नरेश से क्षतिपूर्ति माँगना अनैतिक और अनुचित था। व्यापारी डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति से लाभ उठाना चाहते थे। लेम्बर्ट को भेजना भी युद्ध की योजना का एक अंग था डलहौजी की माँगें को कोई अर्थ नहीं था क्योंकि उसने युद्ध का निर्णय पहले ही कर लिया था। यहां तक कि डलहौजी की नीति की इंग्लैण्ड में भी आलोचना की गयी।

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