रामकाव्य की विशेषताएँ

रामकाव्य ने भारतीय जनता को बहुत प्रभावित किया है। इसने भक्ति के उदात रूप को जनता के सन्मुख उपस्थित किया है। रामकाव्य जनता का मनोरंजन करता है। आधुनिक काल में जो रामलीलाएँ होती है, उनसे आबाल वृद्ध, ग्रामीण एवं नागरिक सभी का मनोरंजन होता है और इस मनोरंजन के द्वारा मानसिक उन्नयन भी। राम मर्यादा पुरुषोत्तम है, उनका चरित्र मानव जाति के लिए आदर्श है। 

रामकाव्य की विशेषताएँ

राम काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(1) दास्य भाव की भक्ति- कृष्णकाव्य में सख्य भक्ति की प्रधानता है, किन्तु रामकाव्य में दास्य. भक्ति प्रधान है। वैसे उसमें नवधा भक्ति के सभी प्रकार श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन मिल जाते हैं। इसमें राम की उपासना सेव्य सेवक भाव से की गयी है। इस काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं, क्योंकि आज तक हिन्दी के राम साहित्य में ‘रामचरितमानस’ जैसा ग्रन्थ और नहीं लिखा गया। यह कृषि चार सौ वषोर्ं से हिन्दी भाषी जनसमूह का दिशा निर्देश कर रही है।

(2) मर्यादा की प्रतिष्ठा- रामकाव्य में मर्यादा का प्रमुख स्थान है। राम का चरित्र ही मर्यादा पुरुषोत्तम का चरित्र है। चरित्र में पूर्णत: मर्यादित किये बिना कोई भी व्यक्ति पुरुषोत्तम नहीं बन सकता है। राम काव्य में मर्यादा कई रूपों में दिखलाई पड़ती है। जीवन के विभिन्न कार्य व्यापारो में मर्यादा को मूल्य के रूप में स्थापित किया गया है। धर्मनीति व्यक्ति के चरित्र को मर्यादित करती है, राम का चरित्र आद्यन्त धर्ममय है, इसलिए मर्यादा उसके चरित्र में सर्वत्र दिखलाई पड़ती है। मितभाषी होना, सत्य पर –ढ़ रहना, पिता की आज्ञा का पालन करना, प्रतिज्ञापूरी करना आदि गुण मर्यादा के ही अंग हैं। इसी तरह रामकाव्य के अनेक चरित्र मर्यादा से मुक्त है। तुलसीदास जी ने Üाृंगार को भी मर्यादित कर दिया है। उनसे पूर्व कृष्णकाव्य की रचना हो चुकी थी, उसका प्रभाव रामकाव्य पर अवश्य पड़ा। 

तुलसीदास जी की ‘गीतावली’ में राम के हिंडोला.विहार और फाग.क्रीड़ा का उल्लेख है। अग्रदास और नाभादास जी के अष्टयानों में श्रृंगार की मात्रा अधिक है। मुनिलाल के ‘रामप्रकाश’ में राम.कथा का वर्णन रीति.पद्धति के अनुसार है। रीतिकाल में जो रामकाव्य रचा गया उसकी मुंगारिता अश्लीलता की सीमा तक जा पहुँची। परन्तु तुलसी ने कहीं भी श्रृंगार को मर्यादा की सीमा से नीचे नहीं गिरने दिया।

(3) आदर्श की स्थापना- रामकाव्य में विभिन्न आदशोर्ं की कल्पना की गई है और उनकी स्थापना पर बल दिया गया है। आदर्श चरित्र की कल्पना से आदर्श समाज की कल्पना का स्वरूप रामकाव्य में साकार सामने आता है। आदर्श भाई, पुत्र, मित्र, राजा आदि तो यहाँ है ही, आदर्श परिवार और आदर्श समाज का चित्र भी विद्यमान है। राम का राज्य आदर्श राज्य है। वही आदर्श राज्य रामराज्य कहलाता है। राम काव्य में  चित्रित विभिन लोकादर्श हमेशा प्रेरणादायक रह े हैं। इन आदर्शों के कारण ही राम काव्य की ऊँचाई को दूसरे काव्य प्राप्त न कर सकें।

(4) लोकमंगल की भावना- प्रभाव की दृष्टि से राम काव्य की गणना उच्चकोटि के उन काव्यों में होगी जिनका उद्देश्य जन.कल्याण या लोकमंगल होता है। ये काव्य सिर्फ मनोरंजन के लिए न लिखे जाकर गम्भीर कल्याणकारी उद्देश्य को लेकर रचे गये हैं। हिन्दी साहित्य में राम काव्य के प्रवर्तक तुलसी यद्यपि यह कहते हैं कि उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना स्वान्त:सुखाय की, किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि उतनी ही लोकहिताय भी हो गई। अर्थात् उसका उद्देश्य जन कल्याण या लोक.मंगल को उबुद्ध करना हो गया। राम काव्य के नायक का उद्देश्य भी लोकमंगल ही है। उसका उद्देश्य इन काव्यों को उद्देश्य भी बन गया।

(5) काव्यरूपों की विविधता- राम.साहित्य का काव्य.क्षेत्र अधिक विस्तृत है क्योंकि इसमें काव्य की सभी शैलियों और विधियों को अपनाया गया है। तुलसीदास जी का ‘रामचरितमानस’ महाकाव्य है। इसकी गणना संसार में श्रेष्ठ महाकाव्यों में की गई है। ‘जानकीमगल’ अत्यन्त सुन्दर और मनोरम खण्डकाव्य है। ‘गीतावली’ गीतिकाव्य है जिसमें सरसता और संगीत का अपना स्थान है। ‘विनयपत्रिका’ स्तुतिपरक काव्यों में गणमान्य है। विद्वानों की –ष्टि में यह रचना तुलसी के सभी काव्यों  में उत्कृष्ट है। कवितावली’ में वीरगाथाकालीन चरण पद्धति का अनुसरण हुआ है, जिसमें कवित्त, चप्पय, सवैये आदि के माध्यम से रामकाव्य की सरसता को उपस्थित किया गया है। ‘रामललानहछू’ लोकगीत का अनुपम साहित्यिक उदाहरण है। 

संवाद की दृष्टि से केशव की ‘रामचन्द्रिका’ अनुपम है। इन श्रव्यकाव्यों के अतिरिक्त रामकाव्य में –ष्यकाव्य भी उपलब्ध है, जिनमें हृदयराम का ‘हनुमान्नाटक’, प्राणचन्द्र चौहान का ‘रामायण महानाटक’ और विश्वनाथसिंह का ‘आनन्द रघुनन्दन नाटक’ उल्लेखनीय है।

रामकाव्य में पद्य के साथ.साथ गद्य का प्रयोग भी दृष्टिगोचर होता है। रामप्रसाद निरंजनी का भाषा ‘योगवासिष्ठ’ खड़ी बोली गद्य में है। विश्वनाथ सिंह के ‘आनन्द रघुनन्दन नाटक’ में पद्य के साथ ब्रजभाषा का भी प्रयोग उपलब्ध होता है।

(6) भाषा.प्रयोग की विविधता- भाषा के क्षेत्र में भी रामकाव्य अपना महत्त्व रखता है। कृष्ण. भक्त कवियो  ने केवल ब्रजभाषा को अपनाया। अवधी में कृष्ण पर कोई महत्त्वपूर्ण प्राचीन रचना उपलब्ध नहीं होती, किन्तु रामकाव्य की रचना प्राय: सभी भाषाओं में हुई है। ‘रामचरितमानस’ अवधी मे रचा गया। ‘कवितावली’, ‘विनयपत्रिका’ आदि की रचना ब्रजभाषा में हुई। ‘रामललानहछू’ में अवधी का प्रयोग हआ है, और रामप्रसाद निरंजनी की ‘भाषा योगवासिष्ठ’ खड़ी बोली के गद्य में लिखा गया। इसके अतिरिक्त केशव की ‘रामचन्द्रिका’ में ब्रजभाषा के अतिरिक्त बुन्देलखण्डी शब्दों का प्रयोग हुआ है। तुलसी की रचनाओं में भोजपुरी के अतिरिक्त अरबी और फारसी के शब्द भी पाये जाते हैं। 

(7) सभी रसों का समावेश- राम का चरित्र बड़ा व्यापक है। उसमें सभी रसो  का समावेश बड़ी सरसता से हो जाता है। ‘रामचरितमानस’ में सभी रस उपलब्ध होते हैं। केशव की ‘रामचन्द्रिका’ में भी सभी रसों की व्यंजना हुई है। राम के विवाह में सौन्दर्य और माधुर्य की भावना निहित है। राम वनवास के समय करुण रस के चित्रण का यथेष्ट अवसर प्राप्त हुआ है। राम रावण के युद्ध वर्णन में वीर, भयानक, रौद्र और वीभत्स की सुन्दर व्यंजना है। लक्ष्मण परशुराम संवाद में मधुर हास्य के दर्शन होते हैं। रामकाव्य में सेवक सेव्य भाव की प्रधानता के कारण शान्त रस प्रधान है। अधिकतर रामकाव्यों में श्रृंगार अथवा शान्त ही प्रधान रस के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।

(8) विविध छन्दों का प्रयोग- रामकाव्य में  विविध छन्द उपलब्ध है। प्रबन्ध काव्य में प्राय: दोहे. चौपाइयों का प्रयोग हुआ है। इनके अतिरिक्त बीच.बीच में अन्य छन्द भी काव्य.सौन्दर्य को बढ़ाने में सफल सिद्ध हुए हैं। संस्कृत श्लोक और स्तुतियों में गोस्वामी जी ने वर्णित छन्दों का प्रयोग किया है। केशव ने तो  ‘रामचन्द्रिका’ को छन्दो  का भण्डार बना दिया है। पद-पद पर नवीन छन्दों के दर्शन होते हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने भी बहुत.से छन्दो का प्रयोग किया है, जो हिन्दी में अधिक प्रचलित नहीं हैं।

(9) प्रकृति चित्रण- रामकाव्यों में प्रकृति.चित्रण का अभाव नहीं है। इनमें वन, पर्वत, सूर्योदय, चन्द्रोदय, वर्षा ऋतु के चित्रण के साथ.साथ मानव.प्रवृत्तियों का भी चित्रण किया गया है। ‘रामचन्द्रिका’ का भी प्रकृति.चित्रण सुन्दर है।

(10) जन-श्रद्धा का आधार- रामकाव्य की विशेषता यह है कि यह कृष्णकाव्य की भाँति आगे चलकर कलुषता को प्राप्त न हुआ। कृष्ण.भक्ति में माधुर्य.भावना का प्रधान्य था, जो रसिक समाज को अपनी ओर आकर्षित करती थी। यही कारण था कि राम.भक्ति की अपेक्षा कृष्ण.भक्ति का प्रचार अधिक हुआ, किन्तु रामचरित्र के आदर्श और मर्यादा भाव शिष्टता और धर्म की पवित्रता के प्रहरी रहे। कृष्ण.भक्ति की अपक्ष्े ाा भले ही अधिक रहा हो किन्तु जनसामान्य में रामकाव्य अधिक लाके प्रिय रहा। तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ का सम्मान उत्तरी भारत में आज भी अक्षुण्ण है। बड़े श्रद्धा भाव से आज भी उसका पाठ होता है।

(11) समन्वय-भावना- रामकाव्य में समन्वय.भावना भी परिलक्षित है। यद्यपि गोस्वामी जी रामभक्त थे, किन्तु उन्होंने शिव, पार्वती गणेश आदि अन्य देवताओं की भी स्तुतियों की है। उन्होंने शिव.पूजन को पर्याप्त महत्त्व प्रदान किया। उनके राम ने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना की, सीता ने भी गौरी पूजन किया है। तुलसी ने राम के मुख से कहलाया है- शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहुं नहि भावा। धार्मिक समन्वय के अतिरिक्त ज्ञान और भक्ति का दार्शनिक समन्वय भी तुलसी के रामकाव्य में उपलब्ध हैं। तरह शैव और वैष्णव भक्तियों तथा ज्ञान और भक्ति के बीच समन्वय का बड़ा दायित्व रामकाव्य में बखूबी निभाया गया है।

(12) विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के साथ भक्ति पर बल- रामकाव्य का दार्शनिक सिद्धान्त विशिष्टाद्वैतवाद है। शंकराचार्य का अद्वैत सिद्धान्त बड़ा प्रसिद्ध सिद्धान्त रहा है। उसमें ज्ञान पर बल दिया गया है और ईश्वर तथा जीव को एक माना गया है। विशिष्टाद्वैत में भक्ति को उच्च स्थान प्राप्त हआ है। तुलसीदास ने यद्यपि शंकराचार्य की भाँति ब्रह्म की अद्वतता का भी आख्यान किया है, पर उनका अधिक बल भक्ति पर ही रहा। भगवत्कृपा को वे सर्वोपरि मानते रहे हैं- 
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंत तुलसीदास हूँ।। 
पायो परम विश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।

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