सामाजिक स्तरीकरण क्या है? इसकी विशेषताएँ

सामाजिक स्तरीकरण से आशय ऐसे समाज से है, जो विभिन्न स्तरों में विभाजित रहता है उदाहरण के तौर पर हिन्दू समाज का चार वर्गों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा अलग-अलग जातियों में विभाजन या पश्चिमी समाजों का पूंजीपति एवं सर्वहारा वर्ग में विभाजन सामाजिक स्तरीकरण के ही उदाहरण हैं।

दूसरे शब्दों में सामाजिक स्तरीकरण समाज को विभिन्न वर्गों में विभाजित करने और उसी के अनुसार सामाजिक संरचना में उनकी स्थिति व भूमिका को निर्धारित की एक सामाजिक व्यवस्था है। अतः सामाजिक स्तरीकरण में उच्चतम से निम्नतम सामाजिक स्थिति वाले समूह के सदस्यों को जितने अधिकार व सुविधाएं प्राप्त होती हैं, उतनी ही सुविधाएं या अधिकार निम्नतम स्थिति वाले समूह के सदस्यों को उपलब्ध नहीं होती है। इस अर्थ में सामाजिक स्तरीकरण अनेक सामाजिक समूहों में न सिर्फ सामाजिक स्थिति या पद को बल्कि सामाजिक अधिकार, शक्ति सत्ता या निर्योग्यताओं को भी बांटने की एक सामाजिक व्यवस्था है।

सामाजिक स्तरीकरण की विशेषताएँ

  1. स्तरीकरण की प्रकृति सामाजिक है। 
  2. स्तरीकरण काफी पुराना है। 
  3. प्रत्येक समाज में स्तरीकरण पाया जाता है। 
  4. स्तरीकरण के विभिन्न स्वरूप आयु, जाति, एवं वर्ग हैं। 
  5. स्तरीकरण से जीवन शैली में भिन्नता आ जाती है।

1. जाति के आधार स्तरीकरण

  1. जाति व्यवस्था में स्तरीकरण में ब्राह्मण सबसे ऊंचे स्तर पर है, तथा शूद्र सबसे निचले स्तर पर । 
  2. जाति संरचना में प्रत्येक जाति का संरचना ऊंच नीच के आधार पर बना हुआ है। 
  3. जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है। समाज में उसे उसी जाति का संस्तरण प्राप्त होता है।

2. वर्ग के आधार पर स्तरीकरण

  1. वर्ग के आधार पर स्तरीकरण जन्म पर आधारित न होकर, कार्य, योग्यता एवं कुशलता, शिक्षा आदि पर आधारित है। 
  2. वर्ग के द्वारा सबके लिए खुले हैं। 
  3. व्यक्ति अपने वर्ग को बदल सकता है, तथा प्रयास करने पर सामाजिक स्तरीकरण में ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है।
सामाजिक स्तरीकरण की विभिन्न विशेषताएं हैं-जिनमें से कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं- 

1. सार्वभौमिकता-सामाजिक स्तरीकरण किसी न किसी रूप में विश्व के प्रत्येक समाज में पाया जाता है। वर्गविहीन समाज का दावा करने वाले पूर्व साभ्यवादी देशों में भी यह पाया जाता है। प्रतिष्ठा, धन, दौलत तथा सत्ता के आधार पर हर समाज में व्यक्तियों की विभिन्न परिस्थितियाॅ होती हैं, और इन्हीं के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण का निर्माण होता है। 

2. आपसी संबद्धता-इसके तहत समाज के विभिन्न स्थायी समूह व श्रेणियाँ उच्चता एवं अधीनता के संबंधों द्वारा आपस में जुड़ी रहती हैं। दसू रे शब्दांे में विभिन्न स्तर एक दूसरे से पृथक न होकर परस्पर संबद्ध होते हैं। 

3. समाज का विभिन्न स्तरों में विभाजन-यहाँ पर समाज को विभिन्न स्तरों में अलग-अलग कर दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर हिन्दू समाज का चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) अथवा अलग-अलग जातियों में विभाजन या पश्चिमी देशों का पूंजीपति एवं सर्वहारा वर्ग में विभाजन सामाजिक स्तरीकरण के ही उदाहरण हैं। 

4. स्थायित्व-इसके अंतर्गत किया गया स्तरीकरण स्थायी होता है। जब तक स्तरीकरण इकाईयों में स्थिरता न आ जाए, तब तक उसे स्तरीकरण की संज्ञा नही दी जा सकती। 

5. उच्चता एवं निम्नता की भावना-हमेशा समाज उच्च व निम्न सामाजिक इकाईयों में विभाजित होता है। यह उच्चयता एवं निम्नता कही-कही स्पष्ट एवं कही कही अस्पष्ट भी हो सकती है। वास्तव में समाज में पाई जाने वाली ऊचं -नीच की व्यवस्था का दूसरा नाम ही सामाजिक स्तरीकरण है। 

6. सामाजिक स्तरीकरण या विषमताः-प्राचीनकाल में काली माक्र्स के अनुसार आज तक के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है, हरेक समाज में दो वर्ग हमेशा से ही रहे हैं। यह वर्तमान सभ्यता की देन नहीं है। प्रत्येक काल में किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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