1909 के अधिनियम के पारित होने के कारण | 1909 ka adhiniyam ke parit hone ke karan

1909 ई. में ब्रिटिश संसद ने भारतीय परिषद अधिनियम पारित किया। इसे मार्ले-मिण्टो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है। लाॅर्ड मिण्टो भारत के तत्कालीन वायसराय थे और लाॅर्ड मार्ले भारत सचिव थे। 

 1909 अधिनियम पारित होने के कारण (Reasons for Passage of the Act)

1. 1892 ई. के अधिनियम के प्रति असंतोष- 1892 ई. का अधिनियम भारतीयों की आशाओं और मांगो के अनुकूल नहीं था। भारतीयों का नाराज़गी सरकार के खिलाफ अनेक जन आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ।

2. उग्रवादी आंदोलनों का प्रभाव- 19 वीं शताब्दी के अंतिम दशक में राष्ट्रीय काँग्रेस पर उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा। ब्रिटिश सरकार उग्रवादी राष्ट्रवादीता के उदय से चिंतित होकर सुधारों द्वारा उग्रवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रभाव किया।

3. क्रांतिकारी आंदोलन- लाॅर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन के बाद भारत में क्रांतिकारी आंदोलन तेजी से बढ़ रहा था। चापेकर बंधुओं ने पूना में मि. रॅण्ड और उसके सहयोगी की हत्या कर दी। नासिक के कलेक्टर को गोली मार दी गयी। पूर्वी बंगाल के गवर्नर फ्रेजर की हत्या का प्रयास किया गया। इन सब घटनाओं से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो उठी। उसने प्रशासकीय सुधारों के द्वारा भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। 

4. मुस्लिम सांप्रदायिकता- मुस्लिम लीग अलग प्रतिनिधित्व की मांग कर रही थी। वायसराय मिण्टो अलग प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को स्वीकार कर चुका था। अब समय था कि 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम में सुधार किया जाये।

5. इंग्लैन्ड में उदारवादियों की विजय- दिसंबर 1905 में इंग्लैन्ड में उदारवादी दल की जीत हुई और वह सत्ता में आ गई। वह संवैधानिक सुधारों द्वारा भारत के लोगों की समस्या का समाधान करना चाहती थी।

6. लाॅर्ड कर्जन का शासनकाल- लाॅर्ड कर्जन की निरंकुशतावादी नीतियों ने भारत की स्थिति को और बिगाड़ दिया। अकाल के कारण भारत में जनता भुखमरी का सामना कर रही थी, उस समय कर्जन ने कलकत्ता में विक्टोरिया स्मारक बनवाने में लाखों रूपया खर्च किया 1905 में बंगाल विभाजन कर भारतीयों को बहुत असंतुष्ट कर दिया इस असंतोष को शांत करना आवश्यक था।

1909 के अधिनियम की प्रमुख धाराएँ (Major Sections of the Act of 1909)

1909 अधिनियम में अनेक धाराएँ थी, जिनमें से कुछ प्रमुख ये थी-

1. सर्वोच्च विधान परिषद केन्द्रीय व्यवस्थापिका- इस अधिनियम द्वारा सर्वोच्च विधान परिषद की सदस्य संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई। गवर्नर जनरल, उसकी कार्यकारिणी के 6 सदस्य, सेनाध्यक्ष एवं एक प्रांतीय गवर्नर को मिलाकर इस परिषद की कुल संख्या 69 हो गई।

2. प्रांतीय विधान परिषद- 1909 के अधिनियम द्वारा प्रांतीय विधान परिषदों की कुल सदस्य संख्या में बढ़ोतरी की गई। मद्रास व बम्बई में 1909 के पहले 24-24 सदस्य थे। इस अधिनियम द्वारा 46-46 कर दिये गये। बंगाल में 21 से 52 और पंजाब में 10 से 24 सदस्य संख्या हो गई। उत्तर पश्चिमी प्रांत की सदस्य संख्या 16 से बढ़ाकर 47 कर दी गई।

3. विधान परिषदों के कार्यो में वृद्धि- केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों के कार्यों एवं अधिकारों में वृद्धि की गई। सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने, प्रस्ताव रखने, पूरक प्रश्न पूछने तथा सार्वजनिक हित के विषयों पर चर्चा करने का अधिकार दिया गया।

4. अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति प्रारंभ- 1909 के अधिनियम के द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति शुरू की गई। परिषदों के निर्वाचन के लिये तीन प्रकार के मंडलों का प्रावधान था। साधारण वर्ग, विशेष तथा विशेष निर्वाचन मंडल। 

5. इंग्लैन्ड स्थित भारत परिषद तथा गवर्नर जनरल की परिषद में भारतीयों की नियुक्ति- इस अधिनियम के द्वारा इंग्लैन्ड स्थित भारत सचिव की परिषद एवं भारत के गवर्नर जनरल की परिषद में भारतीयों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

6. प्रांतीय कार्यकारिणी की सदस्य संख्या में वृद्धि- 1909 के अधिनियम द्वारा प्रांतीय गवर्नरों की कार्यकारिणी की सदस्य संख्या में वृद्धि की गई। बंगाल, मद्रास तथा बंबई के गवर्नरांे की परिषद में अब दो के स्थान पर चार सदस्य रखे गये।

1909 के अधिनियम का मूल्यांकन (Evaluation of the 1909 Act)

इस अधिनियम द्वारा सभाओं की सदस्य संख्या में वृद्धि की गयी तथा प्रथम बार भारतीयों को प्रतिनिधित्व दिया गया। इस दृष्टि से 1909 के अधिनियम द्वारा प्रजातांत्रिक सिद्धांतों का विकास हुआ। इस अधिनियम के प्रमुख दोष थे-

1. संसदीय प्रणाली स्थापित करने का दिखावा किया गया, जिससे सरकारी कार्यो में अव्यवस्था उत्पन्न हो गयी। निर्वाचन प्रणाली में निम्नलिखित दोष थे-
  1. मतदाताओं की संख्या को नहीं बढ़ाया गया।
  2. स्त्रियों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया।
  3. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का सूत्रपात किया गया। इस अधिनियम का सबसे प्रमुख दोष पृथक सांप्रदायिक प्रणाली को स्थापित करना था। मुसलमानों को अलग प्रतिनिधि निर्वाचित करने का अधिकार मिल गया। इस व्यवस्था ने भारत में सांप्रदायिकता का बीज बो दिया।
2. इस अधिनियम द्वारा प्रांतीय सरकारों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण कम नहीं हुआ। केन्द्रीय सरकार पर भारत सचिव और उसकी परिषद का नियंत्रण बना रहा।

3. अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारों को अनेक नियम एवं विनियमों के द्वारा सीमित कर दिया गया, अनेक राष्ट्रीय नेताओं को चुनाव में भाग लेने से वंचित कर दिया गया।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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